विदेश में मेलोडी, देश में छात्रों पर सख्ती — यही है नया भारत?
विदेश में कैमरों के सामने मुस्कानें, हाथ मिलाना, और “मेलोडी” की चर्चा…
लेकिन अपने ही देश में, जब छात्र सवाल पूछते हैं, तो उन्हें पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज का सामना करना पड़ता है।
लेकिन देश के भीतर, जब छात्र अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो उनका स्वागत संवाद से नहीं, बल्कि लाठी और पुलिस कार्रवाई से होता है।
क्या यही लोकतंत्र की पहचान है?
लोकतंत्र की पहचान सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अच्छी छवि बनाने से नहीं होती।
उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब अपने नागरिक—खासतौर पर छात्र—अपनी बात रखते हैं।
अगर सवालों का जवाब संवाद की जगह बल प्रयोग से दिया जाए, तो लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
एक तरफ़ दुनिया के सामने दोस्ती और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात होती है, दूसरी तरफ़ अपने ही युवाओं के सवालों का जवाब बल प्रयोग से दिया जाता है।
छात्र देश का भविष्य होते हैं। उनसे असहमति हो सकती है, लेकिन उनकी आवाज़ को दबाना किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंता का विषय है।
लोकतंत्र की असली ताकत आलोचना को सुनने और संवाद करने में है, न कि विरोध को कुचलने में।
सवाल सिर्फ़ इतना है—
विदेश में मेलोडी, और देश में छात्रों पर सख्ती… क्या यही है नया भारत?
एक तरफ़ विदेश में मेलोडी…
दूसरी तरफ़ देश में छात्रों पर सख्ती।
यही सवाल आज कई लोग पूछ रहे हैं—
क्या यही है नरेंद्र मोदी का नया भारत?
