जाने कौन हैं मीनाक्षी नटराजन? राहुल गांधी की करीबी नेता को कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह की सीट से बनाया राज्यसभा उम्मीदवार

भोपाल
 मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने चौंकाने वाला फैसला लेते हुए मीनाक्षी नटराजन को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह की खाली हो रही सीट पर पार्टी ने लंबे समय बाद किसी महिला चेहरे पर दांव खेला है। राहुल गांधी की बेहद करीबी और तेलंगाना की एआईसीसी प्रभारी मीनाक्षी नटराजन आखिर कौन हैं और क्रॉस वोटिंग के डर के बीच कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें ही क्यों चुना?

आगामी राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर भाजपा द्वारा मध्य प्रदेश से दो प्रत्याशी घोषित करने के चंद घंटे बाद कांग्रेस पार्टी ने भी देश के 5 राज्यों में खाली हो रही 7 सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित कर दिए। इसमें एकमात्र महिला प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नाम शामिल है। उन्हें मध्य प्रदेश से खाली हो रही कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की सीट से प्रत्याशी बनाया गया है। इसके बाद उन तमाम अटकलों पर विराम लग गया जिसमें अलग—अलग नेताओं के दावेदारी को लेकर दावे किए जा रहे थे।

    उज्जैन के नागदा में जन्म, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा।
    जैव रसायन में स्नातकोत्तर और कानून में स्नातक की डिग्री।
    एनएसयूआई की राष्ट्रीय अध्यक्ष और युवा कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रह चुकी हैं।
    2009 में मंदसौर लोकसभा सीट से सांसद चुनी गई थीं।
    वर्तमान में तेलंगाना की एआईसीसी प्रभारी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता हैं।

दिग्गजों को पछाड़कर महिला चेहरे पर दांव

मध्य प्रदेश से राज्यसभा टिकट के लिए कांग्रेस के भीतर दिग्गजों की लंबी फेहरिस्त थी। दावेदारों में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, अरुण यादव, सज्जन सिंह वर्मा और शोभा ओझा सहित करीब दर्जनभर बड़े नाम शुमार थे। लेकिन पार्टी आलाकमान ने गुटीय राजनीति से दूर रहते हुए एक कद्दावर और साफ-सुथरी छवि वाली महिला नेत्री पर भरोसा जताया है।

राहुल गांधी की करीबी और NSUI की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष
मीनाक्षी नटराजन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की एक बेहद सीनियर और जमीनी नेता मानी जाती हैं। उन्हें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की ‘कोर टीम’ का हिस्सा और उनका बेहद करीबी माना जाता है। उनकी राजनीतिक यात्रा बेहद शानदार रही है।

मीनाक्षी नटराजन का राजनीतिक सफर
उन्होंने छात्र राजनीति से शुरुआत एनएसयूआई से की। वे 1999 से 2002 तक NSUI की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहीं।
इसके बाद 2002 से 2005 तक उन्होंने मध्य प्रदेश युवा कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। वे साल 2009 के लोकसभा चुनाव में मंदसौर निर्वाचन क्षेत्र से 15वीं लोकसभा की सांसद चुनी गई थीं। हालांकि, 2014 और 2019 के चुनावों में उन्हें भाजपा के सुधीर गुप्ता से हार का सामना करना पड़ा। वर्तमान में वह तेलंगाना की एआईसीसी प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं और ‘राजीव गांधी पंचायती राज संगठन’ की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।

क्रॉस वोटिंग का डर, दिल्ली में नेताओं की ‘घेराबंदी’
मीनाक्षी नटराजन के नाम के एलान के साथ ही कांग्रेस के सामने अपनी सीट सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी चुनौती है। बिहार, हरियाणा और ओडिशा जैसे राज्यों में क्रॉस वोटिंग का दंश झेल चुकी कांग्रेस इस बार मध्य प्रदेश में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती।

राज्यसभा उम्मीदवार, जानिए सागर से दिल्ली तक का सफर
सूत्रों के मुताबिक, विधायकों में सेंधमारी रोकने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव को बीते दिनों दिल्ली तलब किया गया था, जबकि इससे पहले कमलनाथ और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी दिल्ली जाकर शीर्ष नेतृत्व को रिपोर्ट सौंप चुके हैं। हालांकि भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है, कि वह खाली हुई तीसरी सीट पर प्रत्याशी नहीं उतारेगी।

BJP की राज्यसभा सूची में बड़ा उलटफेर: रवनीत बिट्टू-जार्ज कूरियन का टिकट कटा, तरुण चुग और सतीश पूनिया को मौका

भोपाल/जयपुर/अहमदाबाद/दिल्ली

भाजपा और कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है। मध्यप्रदेश की दो सीटों के लिए राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और उद्योगपति रजनीश अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया है। राजस्थान से पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया और डॉ. अलका गुर्जर को प्रत्याशी बनाया है।

कांग्रेस ने भी सात उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है। पार्टी ने कर्नाटक से मल्लिकार्जुन खड़गे, पवन खेड़ा और मंसूर अली खान को उम्मीदवार बनाया है।

वहीं मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन, राजस्थान से नीरज डांगी, तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती और झारखंड से प्रणव झा को राज्यसभा चुनाव के लिए टिकट दिया गया है।

ओडिशा में 25 मई को देवाशीष सामंतराय ने बीजू जनता दल (BJD) और राज्यसभा से इस्तीफा देकर भाजपा जॉइन कर ली थी। इस तरह ओडिशा की इस सीट पर उपचुनाव होगा।

इसके लिए भाजपा ने देवाशीष को ही उम्मीदवार बनाया है। 13 राज्यों की 27 राज्यसभा सीटों पर 18 जून को चुनाव होगा। नामांकन भरने की लास्ट डेट 8 जून है।

तमिलनाडु, मेघालय और मिजोरम में भी प्रत्याशी घोषित
    तमिलनाडु: CM विजय की पार्टी TVK ने राज्य की एक राज्यसभा सीट कांग्रेस को दी है। पार्टी ने यहां से प्रवीण चक्रवर्ती को उम्मीदवार बनाया है।

    मेघालय: मेघालय डेमोक्रेटिक अलायंस-II (MDA-II) ने नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) के जेम्स पीके संगमा को सर्वसम्मति से उम्मीदवार बनाया है।

    मिजोरम: राज्य की एक सीट के लिए सत्ताधारी दल जोराम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) ने पार्टी प्रवक्ता के. लालतलुआंगकिमा को प्रत्याशी घोषित किया है।

NDA के पास 18 सीट

राज्यसभा की जिन 27 सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें से NDA के पास अभी 18 (आंध्र प्रदेश से 1, गुजरात से 4, कर्नाटक से 3, राजस्थान-मध्य प्रदेश से 2-2, झारखंड, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से एक-एक सीटे हैं)। वहीं कांग्रेस गठबंधन के पास 5 सीटे हैं। वहीं तीन अन्य सीटें YSRCP के खाते में हैं। एक बीजेडी के पास थी।

इन चुनावों में NDA को 17 सीटें मिलने की संभावना है, जबकि कांग्रेस को पांच, JMM को दो और TVK को एक सीट मिलने की उम्मीद है। एक सीट मिजोरम में जोरम पीपल्स मूवमेंट जीत सकती है। YSRCP अपनी तीनों सीटें गंवा सकती है।

244 सदस्यों वाले उच्च सदन में NDA के पास अभी 149 सांसद हैं, जबकि विपक्ष के पास 78 और गैर-गठबंधन वाले क्षेत्रीय दलों के पास 17 सांसद हैं।

केंद्रीय मंत्री रवनीत बिट्टू और जॉर्ज कूरियन का कटा टिकट, मोदी कैबिनेट से विदाई तय

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए 11 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है. इस सूची के सामने आते ही सियासी गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा दो केंद्रीय राज्य मंत्रियों रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कूरियन के नामों के कटने को लेकर शुरू हो गई है. उम्मीदवारों की सूची में जगह न मिलने के कारण अब दोनों ही मंत्रियों की मोदी मंत्रिपरिषद से छुट्टी तय मानी जा रही है। 

BJP की इस 11 संसदीय उम्मीदवारों की सूची में सबसे चौंकाने वाला  नाम रवनीत सिंह बिट्टू का है. वह राजस्थान कोटे से राज्यसभा सांसद हैं. केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को दोबारा मौका नहीं दिया गया है. पंजाब में सिखों के बड़े चेहरे के तौर पर स्थापित बिट्टू का 21 जून को कार्यकाल समाप्त हो रहा है. संसद का सदस्य न रहने की स्थिति में उनका मंत्री पद जाना अब लगभग तय है। 

वहीं, मध्य प्रदेश कोटे से राज्यसभा सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कूरियन का नाम भी इस सूची से नदारद है. कूरियन का कार्यकाल भी आगामी 21 जून को समाप्त हो रहा है. उन्हें दोबारा राज्यसभा न भेजने के फैसले के बाद अब मोदी कैबिनेट में फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। 

सांगठनिक धुरंधरों को मिला ईनाम पार्टी ने इस बार मंत्रियों को ड्रॉप करके संगठन में रात-दिन काम करने वाले जमीनी रणनीतिकारों पर बड़ा दांव खेला है। 
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और कई राज्यों के चुनावी प्रभारी तरुण चुघ को मध्य प्रदेश कोटे से उम्मीदवार बनाया गया है.चुघ को टिकट देकर पार्टी ने उनके संगठनात्मक कौशल को पुरस्कृत किया है. उनके साथ एमपी से प्रदेश मंत्री और लंबे समय से प्रदेश बीजेपी का प्रमुख चेहरा रहे रजनीश अग्रवाल को भी संसद भेजा जा रहा है। 

इसके अलावा, राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान में हरियाणा बीजेपी के प्रभारी डॉ. सतीश पूनिया को राजस्थान से टिकट मिला है. पूनिया की जमीनी और जाट समुदाय पर मजबूत पकड़ को देखते हुए इसे बड़ा फैसला माना जा रहा है। 

वहीं, बीजेपी की केंद्रीय सचिव डॉ. अलका गुर्जर को भी राजस्थान कोटे से राज्यसभा का टिकट दिया गया है, जो महिला और क्षेत्रीय संतुलन को मजबूत करेगा। 

गुजरात के 4 ‘सरप्राइज’ नाम 
बीजेपी ने अपने अभेद्य किले गुजरात से चार ऐसे चेहरों को मैदान में उतारा है जिन्होंने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है.इन नामों के पीछे RSS की पसंद और ओबीसी-आदिवासी सोशल इंजीनियरिंग साफ दिखाई देती है। 

राजूभाई शुक्ला: मेहसाणा के रहने वाले राजूभाई शुक्ला लंबे समय से पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता और मजबूत ब्राह्मण चेहरा हैं. वर्तमान में वे सुरेंद्रनगर के जिला प्रभारी हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से गहरा जुड़ाव रखते हैं. वे मेहसाणा जिला महामंत्री और कड़ी नगरपालिका के प्रमुख भी रह चुके हैं। 

मानसिंह परमार: युवा चेहरा मानसिंह परमार सोमनाथ जिले से आते हैं. वे ओबीसी मोर्चा के प्रमुख व पूर्व विधायक गोविंद परमार के भतीजे हैं और खुद भी पूर्व जिला अध्यक्ष के रूप में संगठन संभाल चुके हैं। 

जितेंद्र कंजारिया: देवभूमि द्वारका के खंभालिया से पूर्व विधायक मेघजी कंजारिया के बेटे जितेंद्र खुद भी ओबीसी समुदाय से आते हैं और क्षेत्र के बड़े जमीनी नेता हैं। 

मुकेशभाई राठवा: छोटा उदेपुर जिला महामंत्री मुकेश राठवा भारतीय जनता युवा मोर्चा से अपनी राजनीति शुरू कर चुके हैं. RSS के कैडर रहे मुकेश राठवा की गुजरात के आदिवासी समुदाय पर बेहद मजबूत पकड़ मानी जाती है। 

नॉर्थ-ईस्ट पर विशेष फोकस 
मणिपुर में जारी संवेदनशील और सामाजिक हालात के बीच भाजपा ने मणिपुर बीजेपी की प्रदेश अध्यक्ष  ए. शारदा देवी को राज्यसभा का टिकट दिया है. एक महिला और सांगठनिक अध्यक्ष को उच्च सदन में भेजना राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। 

वहीं, अरुणाचल प्रदेश से पार्टी के वरिष्ठ और बेहद अनुभवी नेता ताई तगाक को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। 

ओडिशा उपचुनाव में देबाशीष सामंतराय को तोहफा
ओडिशा की एकमात्र राज्यसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव के लिए बीजेपी ने देबाशीष सामंतराय को अपना प्रत्याशी बनाया है. दिलचस्प बात यह है कि देबाशीष सामंतराय बीजू जनता दल (BJD) छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे. यह उपचुनाव उन्हीं के इस्तीफे के कारण खाली हुई सीट पर हो रहा है, जिस पर बीजेपी ने दोबारा उन्हीं पर भरोसा जताया है।  

ऐसे होता है राज्यसभा चुनाव

राज्यसभा सांसदों के लिए चुनाव की प्रक्रिया दूसरे चुनावों से काफी अलग है। राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं यानी जनता नहीं बल्कि विधायक इन्हें चुनते हैं। चुनाव हर दो साल में होते हैं, क्योंकि राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में रिटायर होते हैं।

राज्यसभा सीटों की कुल संख्या 245 हैं। इनमें से 233 सीटों पर अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव होते हैं और 12 सदस्यों को राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं।

राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए कितने वोटों की जरूरत होती है, ये पहले से ही तय होता है। वोटों की संख्या का कैलकुलेशन कुल विधायकों की संख्या और राज्यसभा सीटों की संख्या के आधार पर होता है। इसमें एक विधायक की वोट की वैल्यू 100 होती है।

महाराष्ट्र की 7 सीटों के उदाहरण से फॉर्मूला समझते हैं
राज्यसभा चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए एक निश्चित संख्या में मतों की आवश्यकता होती है, जिसे जीतने का कोटा (Quota) कहा जाता है। महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 विधायक हैं। खाली हो रही सीटें 7 हैं।

कुल विधायकों की संख्या x 100/ (राज्यसभा की सीटें+1) = +1 288X100/(7+1)= +1 28800/8= +1 3600= +1 3601 चूंकि एक विधायक के वोट की वैल्यू 100 होती है। इसलिए महाराष्ट्र में अभी एक राज्यसभा सीट पर जीत के लिए कम से कम 36 विधायकों की जरूरत होगी।

कर्नाटक कैबिनेट में बवाल: पसंदीदा विभाग न मिलने पर रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा

 बेंगलुरु

कर्नाटक में नई सरकार के गठन और विभागों के बंटवारे के तुरंत बाद कांग्रेस के भीतर का आंतरिक असंतोष एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता और नवनियुक्त कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। 

रेड्डी ने खुलेआम अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि उनसे किया गया वादा पूरा नहीं किया गया, जिसके चलते वे यह बड़ा कदम उठा रहे हैं. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे कैबिनेट छोड़ रहे हैं, लेकिन विधायक (MLA) और कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहेंगे। 

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रामलिंगा रेड्डी ने उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार पर सीधा निशाना साधा. रेड्डी ने दावा किया, “डीके शिवकुमार खुद मेरे घर आए थे और कहा था कि जब मैं सीएम बनूंगा, तो मैं इस मंत्रालय (बेंगलुरु विकास) को छोड़ दूंगा और आप इसे संभाल लेना.” रेड्डी के मुताबिक, शपथ ग्रहण समारोह से ठीक एक दिन पहले भी जब वे शिवकुमार से मिले, तो उन्हें दोबारा आश्वस्त किया गया था कि बेंगलुरु से जुड़ा पोर्टफोलियो उन्हीं को मिलेगा। 

रेड्डी ने भावुक होते हुए कहा, “मैंने कभी इस विभाग की मांग खुद से नहीं की थी, लेकिन मुझे बार-बार इसका भरोसा दिया गया था. दो बार वादा करने के बाद अब मुझे जल संसाधन विभाग दे दिया गया. मैं इस फैसले से बेहद निराश हूं और इसीलिए इस्तीफा दे रहा हूं। 

समर्थक के हाथ भेजा इस्तीफा, पत्र में लिखी बड़ी बात
रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा सीधे मुख्यमंत्री को सौंपने के बजाय अपने एक समर्थक के जरिए मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को भिजवाया है. अपने त्यागपत्र में उन्होंने लिखा, “मैं कैबिनेट में मंत्री पद देने के लिए आपका और कांग्रेस पार्टी का आभार व्यक्त करता हूं. हालांकि, चूंकि मैं अपनी अंतरात्मा के खिलाफ काम करने में असमर्थ हूं, इसलिए मैं मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप रहा हूं. कृपया इसे स्वीकार करें। 

राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर भी चर्चा तेज है कि रामलिंगा रेड्डी ने अपने त्यागपत्र में ‘माननीय मुख्यमंत्री’ के रूप में डी. के. शिवकुमार को संबोधित किया है, जो राज्य के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करता है. हालांकि, रेड्डी ने मीडिया से कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से न तो शिवकुमार से नाराज हैं और ना ही सिद्धारमैया से। 

दरअसल, रामलिंगा रेड्डी ‘बेंगलुरु शहरी विकास’  विभाग की मांग कर रहे थे. वे इस महत्वपूर्ण विभाग पर अपनी कमान चाहते थे, लेकिन मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने यह जिम्मेदारी ब्याटरायनपुरा के विधायक कृष्णा बायरे गौड़ा को सौंप दी। 

मध्य प्रदेश सरकार के टेंडरों और सौदों की जांच करेगी कांग्रेस, भ्रष्टाचार के आरोपों पर घेरा

भोपाल। मध्य प्रदेश में विपक्षी दल कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद के कुछ सदस्यों की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं और सरकार के कई निर्णयों में पारदर्शिता को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ है।

जीतू पटवारी ने दावा किया कि अब पार्टी सरकार के हर टेंडर और हर बड़े सौदे पर नजर रखेगी। पार्टी का कहना है कि वह एक-एक टेंडर की जांच करेगी और यदि कहीं भी अनियमितता या भ्रष्टाचार के प्रमाण मिलते हैं तो उन्हें जनता के सामने लाया जाएगा।

जीतू पटवारी   ने कहा कि वह सरकारी योजनाओं, खरीद प्रक्रियाओं और विभिन्न विभागों द्वारा जारी किए गए टेंडरों की विस्तृत समीक्षा करेगी। पार्टी के अनुसार, भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की परतें खोली जाएंगी और तथ्यों के आधार पर सरकार से जवाब मांगा जाएगा।

हालांकि, इन आरोपों पर सरकार की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। भाजपा और राज्य सरकार पहले भी ऐसे आरोपों को खारिज करते हुए अपनी कार्यप्रणाली को पारदर्शी और नियमों के अनुरूप बता चुकी है।

राज्य की राजनीति में इस मुद्दे को लेकर आने वाले दिनों में सियासी बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप तेज होने की संभावना है। कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि वह कथित अनियमितताओं से जुड़े मामलों को लगातार सार्वजनिक मंचों पर उठाती रहेगी।

“हर दो साल में देश बचाने की अपील क्यों? जीतू पटवारी का केंद्र सरकार पर बड़ा हमला”

मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने केंद्र सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोलते हुए सवाल उठाया है कि आखिर देश की स्थिति ऐसी क्यों बन रही है कि हर दो साल में देशवासियों से ‘देश बचाने’ की अपील करनी पड़ती है। पटवारी ने सरकार के कामकाज और राजनीतिक माहौल को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

जीतू पटवारी ने कहा कि जिस देश को विश्वगुरु बनाने का दावा किया जा रहा है, वहां बार-बार जनता से देश बचाने की अपील किए जाने की नौबत क्यों आ रही है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि सरकार की नीतियां सफल हैं तो फिर लगातार संकट और चेतावनियों का माहौल क्यों बनाया जा रहा है।

जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि जनता महंगाई, बेरोजगारी और अन्य मूलभूत मुद्दों से जूझ रही है, जबकि सरकार अपनी उपलब्धियों के प्रचार में व्यस्त दिखाई देती है। उनके इस बयान को आगामी राजनीतिक बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राजनीतिक मायने:
पटवारी का यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाज़ी तेज़ है। हाल के दिनों में भाजपा और कांग्रेस नेताओं के बीच कई मुद्दों पर तीखे आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिले हैं।

अब देखना होगा कि जीतू पटवारी के इस बयान पर भाजपा की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श में कितना प्रभाव छोड़ता है। ऐसी ही राजनीतिक खबरों के लिए बने रहिए हमारे साथ।

मोहन भैया को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ता को संदेश: “गालियों के जवाब में भी फूल देंगे” जीतू पटवारी 

कांग्रेस नेता Rahul Gandhi की विचारधारा का हवाला देते हुए जीतू पटवारी ने कांग्रेस कार्यकर्ता को राजनीतिक सौहार्द और प्रेम की राजनीति का संदेश दिया है। जीतू पटवारी ने कहा कि उनके नेता राहुल गांधी ने उन्हें “मोहब्बत की राजनीति” सिखाई है।

अपने संदेश में उन्होंने कहा, “मेरे नेता आदरणीय राहुल गांधी जी ने हमें मोहब्बत की राजनीति सिखाई है। मोहन भैया, आप हमें कितनी भी गालियाँ दे दो, हम फिर भी आपको फूल ही देंगे।”

इस बयान को राजनीतिक मतभेदों के बीच संयम, संवाद और सकारात्मक राजनीति के संदेश के रूप में देखा जा रहा है। पी सी सी अध्यक्ष ने यह भी संकेत दिया कि उनकी राजनीति विरोधियों के प्रति कटुता के बजाय प्रेम और सम्मान पर आधारित है।

 

रतलाम में NEET अभ्यर्थियों से मिले कांग्रेस नेता, पेपर लीक मामले पर उठाए सवाल

रतलाम: कांग्रेस नेता ने रतलाम में NEET अभ्यर्थियों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं। इस दौरान छात्रों ने बताया कि परीक्षा रद्द होने और उससे जुड़े विवादों के बाद वे मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं, जिसके कारण दोबारा तैयारी करने में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

मुलाकात के बाद कांग्रेस नेता ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश सहित देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे छात्र हैं जिन्होंने वर्षों की मेहनत और अपने परिवारों की उम्मीदों के साथ परीक्षा की तैयारी की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि NEET पेपर लीक प्रकरण ने लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित किया है।

पोस्ट में उन्होंने कहा कि छात्र परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और न्याय की मांग कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने NEET पेपर लीक मामले को लेकर केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए।

कांग्रेस लगातार NEET परीक्षा से जुड़े विवादों और कथित पेपर लीक मामलों को लेकर सरकार को घेरती रही है। वहीं, केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों का कहना है कि मामले की जांच की गई है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

छात्रों का कहना है कि वे चाहते हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और परीक्षाओं की निष्पक्षता सुनिश्चित की जाए, ताकि उनकी मेहनत और करियर प्रभावित न हो।

दिल्ली की एक मुलाकात से विधानसभा तक मचा सियासी भूचाल, 13 दिन में ऐसे बिखरी TMC

कोलकाता

दिल्ली में ‘संयोगवश’ हुई एक मुलाकात, हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप, तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर बढ़ता असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई जैसी महज 13 दिन के भीतर तेजी से घटी इन सिलसिलेवार घटनाओं ने 28 वर्ष पुरानी पार्टी को उसके पहले विभाजन की दहलीज पर ला खड़ा किया। बंग भवन में 22 मई को तृणमूल के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बीच कथित तौर पर हुई ‘संयोगवश’ मुलाकात से शुरू हुआ घटनाक्रम बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से भी इसकी मान्यता हासिल कर ली। इस बगावत ने औपचारिक रूप से उस पार्टी में विभाजन की रेखा खींच दी, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे।
हार के बाद उभरने लगी थी कलह

विधानसभा चुनाव में चार मई को भाजपा के हाथों मिली हार के बाद पार्टी के भीतर कलह उभरने लगी थी। पार्टी के कुछ विधायकों को लगने लगा था कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे एवं सांसद अभिषेक बनर्जी का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे असंतोष धीरे-धीरे गहराता चला गया। नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में छह मई को ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से चुनाव अभियान में अभिषेक बनर्जी की भूमिका के लिए खड़े होकर उनका अभिनंदन करने को कहा। हालांकि इसका उद्देश्य उनके योगदान को स्वीकारना था, लेकिन पार्टी के एक वर्ग में इस कदम को लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ विधायकों को लगने लगा कि पार्टी का केंद्र धीरे-धीरे एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।
जहांगीर को अभिषेक ने क्यों नहीं किया निष्कासित?

पार्टी में असंतोष पहली बार खुले तौर पर 19 मई को सामने आया। एक अन्य बैठक में ऋतब्रत बनर्जी और इंटाल्ली के विधायक संदीपन साहा ने सवाल उठाया कि फालटा विधायक जहांगीर खान द्वारा पुन: चुनाव से हटने की सार्वजनिक घोषणा किए जाने के बावजूद पार्टी ने उन्हें निष्कासित क्यों नहीं किया। चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को व्यापक तौर पर तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया।
22 मई को ऋतब्रत ने की शुभेंदु से मुलाकात

वरिष्ठ विधायक कुणाल घोष ने भी इसी तरह की चिंताएं जताईं, हालांकि बाद में उन्होंने खुद को बागी खेमे से अलग कर लिया। घटनाक्रम ने तीन दिन बाद निर्णायक मोड़ लिया। ऋतब्रत बनर्जी राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए 22 मई को दिल्ली गए हुए थे तभी वह दोपहर के भोजन के लिए बंग भवन पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हो गई। इसके बाद ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित करने के शुभेंदु अधिकारी के फैसले का स्वागत किया और इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा बताया। उनके इस बयान ने तत्काल राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी

हालांकि, कुछ ही दिन में तृणमूल एक अलग विवाद में घिर गई। 25 मई को आरोप सामने आए कि विधानसभा में विधायक दल के नेतृत्व ढांचे से जुड़े दस्तावेजों पर कई विधायकों के जाली हस्ताक्षर कर विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए थे। इस आरोप ने पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी तथा पार्टी के भीतर जारी खींचतान को खुले टकराव में बदल दिया। इस विवाद ने 27 मई को कानूनी मोड़ ले लिया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से औपचारिक शिकायत कर हस्ताक्षरों की जालसाजी का आरोप लगाया। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने मामले को पुलिस के संज्ञान में दिया, जिसके साथ ही अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) की ओर से जांच शुरू हो गई।
अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला

अगले दो दिन के दौरान जब जांचकर्ताओं ने विधायकों से पूछताछ शुरू की, तो मामला महज एक प्रक्रियागत विवाद तक सीमित नहीं रहा बल्कि तेजी से राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। यह राजनीतिक सकंट 30 मई को उस समय और गहरा गया, जब अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ ने हमला कर दिया। यद्यपि सभी राजनीतिक दलों ने इस घटना की निंदा की, लेकिन तृणमूल के कई नेताओं ने निजी तौर पर संगठन और विधायक दल के कुछ वर्गों की अपेक्षाकृत फीकी प्रतिक्रिया पर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यह नेतृत्व और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के एक हिस्से के बीच बढ़ती दूरी का संकेत था।
ममता की बैठक में पहुंचे कम विधायक

इसके बाद 31 मई तक नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ती साफ दिखाई देने लगी। ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई, लेकिन उसमें अपेक्षा से कम उपस्थिति रही। निर्णायक रूप से विभाजन एक जून को मुख्यमंत्री शुभेंदु द्वारा सार्वजनिक रूप से यह खुलासा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद सामने आया कि सीआईडी जांच रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर शुरू हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन संकट को थामने के बजाय इस कदम ने बगावत को और तेज कर दिया।
‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’

देखते ही देखते बागी खेमे के भीतर इस मुहिम को एक नाम भी मिल गया-‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’। यह राजनीतिक नाटक बुधवार को चरम पर पहुंच गया जब 58 विधायकों के एक समूह ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुने जाने और नई टीम के गठन की जानकारी दी। विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। कुछ ही मिनट बाद इन्हीं में से कई विधायक राज्य सचिवालय ‘नबान्न’ में शुभेंदु अधिकारी द्वारा बुलाई गई सरकारी समीक्षा बैठक में भी शामिल हुए।
अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार

दिल्ली में शुरू हुई यह बगावत, जिसने हस्ताक्षर जालसाजी के आरोपों, संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई के सहारे रफ्तार पकड़ी थी, उसका अंतिम और निर्णायक अध्याय आखिरकार विधानसभा के भीतर ही लिखा गया। ममता बनर्जी के व्यक्तित्व और राजनीतिक प्रभुत्व के इर्द-गिर्द खड़ी हुई पार्टी ने महज 13 दिन में अपने अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार देखी।

BJP नेता सतर्क रहें, मंत्री स्वपन दासगुप्ता का TMC पर बड़ा हमला; बोले- पुराने पाप धोने की कोशिश

कलकत्ता

तृणमूल कांग्रेस आंतरिक कलह के कारण बिखर रही है. ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी फिसलती हुई दिख रही है. इस बीच सीएम शुभेंदु सरकार में मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने अपनी ही पार्टी को चेतावनी दी है. स्वपन दास गुप्ता ने टीएमसी के वैसे नेताओं की ओर इशारा किया है जो बीजेपी के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि उन्हें यही उम्मीद है कि तोड़-फोड़ करने वालों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को दूषित न करे. उन्होंने कहा है कि वे TMC के विनाश पर कोई भी आंसू नहीं बहा रहे हैं। 

TMC के 58 विधायकों के ऐसे गुट के नेता को प्रतिपक्ष की मान्यता मिल गई है, जिसे ममता बनर्जी का समर्थन प्राप्त नहीं है. इस गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी हैं. स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी है। 

कोलकाता के रासबिहारी से विधायक स्वपन दासगुप्ता ने एक्स पर लिखा, “TMC के आत्म-विनाश पर मैं कोई आंसू नहीं बहा रहा हूं. मेरी एकमात्र आशा यही है कि इन तोड़-फोड़ करने वालों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को दूषित न करे। 

बंगाल बीजेपी को आगाह करते हुए स्वपन दासगुप्ता ने लिखा, “हमें झूठे दोस्तों से हमेशा सावधान रहना होगा जो आज हमारे करीब आ रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने पिछले पाप धोने की जरूरत है। 

मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने लिखा, “बंगाल की शुद्धिकरण प्रक्रिया अधूरी नहीं छोड़ी जा सकती। पत्रकार के रूप में सक्रिय रहने वाले स्वपन दासगुप्ता को सीएम शुभेंदु अधिकारी ने अपनी सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया है। 

TMC में इतिहास की सबसे बड़ी टूट
3 जून 2026 को पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूकंप आया. तृणमूल कांग्रेस के इतिहास में पहली बड़ी टूट हुई. विधानसभा स्पीकर रथींद्रनाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी। 

 ऋतब्रत को ममता ने हाल ही में पार्टी से निष्कासित किया था. उन्होंने अपने पास 58 TMC विधायकों का हस्ताक्षर दिखाया और उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया. स्पीकर ने अभिषेक बनर्जी द्वारा नामित शोभनदेब चट्टोपाध्याय के दावे को खारिज कर दिया। 

ऋतब्रत ने खुद को ‘असली TMC’ का प्रतिनिधि बताया और ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार बनाने का प्रस्ताव रखा और कहा कि वे रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे. उनके गुट में संदीपन साहा, जावेद खान, शिउली साहा समेत कई प्रमुख विधायक शामिल हैं। 

इस घटनाक्रम से TMC में गहरा संकट पैदा हो गया है. ममता-अभिषेक गुट ने सभी पार्टी कमेटियों को भंग कर दिया है। 

 

देश के पहले CM बने डॉ. मोहन यादव, काफिले में शामिल की इलेक्ट्रिक कार; दिया विकसित भारत और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक नई पहल करते हुए अपने आधिकारिक काफिले में इलेक्ट्रिक वाहन (EV) शामिल कर देशभर में मिसाल पेश की है। इसके साथ ही वे ऐसे पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं, जिन्होंने अपने काफिले में इलेक्ट्रिक कार को जगह दी है। यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मितव्ययता और पर्यावरण संरक्षण की सोच को आगे बढ़ाने वाला माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री के काफिले में अब महिंद्रा की XEV 9e इलेक्ट्रिक कार शामिल हो गई है। कंपनी के अनुसार यह कार एक बार फुल चार्ज होने पर लगभग 500 किलोमीटर तक का सफर तय कर सकती है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 3 जून को इस नई इलेक्ट्रिक कार से मुख्यमंत्री निवास से स्टेट हैंगर तक यात्रा की।

इस कार का पंजीयन नंबर MP-02-VB-2047 है। ‘VB’ को ‘विकसित भारत’ और ‘2047’ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़कर देखा जा रहा है। आधुनिक तकनीक से लैस इस इलेक्ट्रिक कार में 360 डिग्री कैमरा समेत कई अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। मुख्यमंत्री का मानना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देकर पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्वच्छ और हरित भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है

पर्यावरण और सौर ऊर्जा पर विशेष फोकस

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर्यावरण संरक्षण और सौर ऊर्जा को लेकर लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वे विभिन्न योजनाओं और अभियानों के माध्यम से हरित विकास को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने जैव विविधता संरक्षण के तहत विभिन्न क्षेत्रों में गिद्धों और मगरमच्छों को छोड़े जाने की पहल भी की थी। उनका मानना है कि पर्यावरण संरक्षण के बिना विकास की कल्पना अधूरी है।

सादगी और मितव्ययता की लगातार मिसाल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपने कार्यकाल में सादगी और मितव्ययता को प्राथमिकता देते रहे हैं। हाल ही में इंदौर दौरे के दौरान उन्होंने अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के साथ टेम्पो ट्रैवलर बस में सफर किया था। वहीं सिंगरौली दौरे में भी वे टूरिस्ट बस से कार्यक्रम स्थल पहुंचे थे। इसके अलावा उन्होंने मुख्यमंत्री काफिले में शामिल वाहनों की संख्या भी कम कर दी है।

मुख्यमंत्री की यह नई पहल न केवल इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा बचत और विकसित भारत के संकल्प का भी मजबूत संदेश देती है।

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