मध्यप्रदेश बना वक्फ सम्पत्तियों को ऑनलाइन करने वाला देश का पहला राज्य

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बोले — वक्फ सम्पत्तियों को माफियाओं से मुक्त कर उनकी आय छात्रों की स्कॉलरशिप, शिक्षा और समाज के विकास में की जाएगी

मध्यप्रदेश ने वक्फ सम्पत्तियों के डिजिटलीकरण की दिशा में बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए देश का पहला राज्य बनने का गौरव प्राप्त किया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि राज्य सरकार वक्फ सम्पत्तियों का पूरा रिकॉर्ड ऑनलाइन कर पारदर्शिता सुनिश्चित कर रही है, जिससे अवैध कब्जों और भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि वक्फ सम्पत्तियों पर कब्जा जमाने वाले माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सरकार इन सम्पत्तियों को सुरक्षित कर उनकी वास्तविक आय को समाजहित में उपयोग करने की योजना पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि वक्फ सम्पत्तियों से प्राप्त आय को छात्रों की स्कॉलरशिप, शिक्षा और जरूरतमंदों के कल्याण के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि युवाओं को बेहतर अवसर मिल सकें और वे शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ सकें।

डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सरकार का उद्देश्य वक्फ सम्पत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाना, समाज के हितों की रक्षा करना और संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित करना है। यह पहल न केवल प्रशासनिक सुधार का उदाहरण बनेगी, बल्कि शिक्षा और सामाजिक विकास को भी नई दिशा देगी।

मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड शिक्षा के क्षेत्र में कर रहा उल्लेखनीय कार्य

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शिक्षा एवं सामाजिक विकास में बोर्ड की भूमिका की सराहना करते हुए अध्यक्ष श्री सनवर पटेल को दी बधाई और शुभकामनाएं

मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों को लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री Dr. Mohan Yadav ने प्रसन्नता व्यक्त की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बोर्ड शिक्षा के माध्यम से समाज में जागरूकता, प्रगति और बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रहा है। उन्होंने बोर्ड द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में यह पहल समाज के विकास और युवाओं के भविष्य को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

मुख्यमंत्री ने बोर्ड के अध्यक्ष Sanwar Patel को बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए आशा व्यक्त की कि भविष्य में भी इसी तरह जनहित और शिक्षा उन्नयन से जुड़े कार्य निरंतर आगे बढ़ते रहेंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षा समाज में सकारात्मक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम है और इस दिशा में किए गए प्रयास निश्चित रूप से प्रेरणादायक हैं।

मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड की ऐतिहासिक पहल: 850 मेधावी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति वितरण

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने कहा — वक्फ बोर्ड ने आय में वृद्धि के साथ शिक्षा को प्रोत्साहन देते हुए विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड द्वारा शिक्षा को बढ़ावा देने और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से छात्रवृत्ति कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के अंतर्गत प्रदेश के 850 मेधावी विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति वितरित की गई।

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादवने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि वक्फ बोर्ड ने न केवल अपनी आय में वृद्धि की है, बल्कि समाज के जरूरतमंद एवं प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को शिक्षा से जोड़ने का सराहनीय कार्य भी किया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही समाज के विकास का सबसे मजबूत माध्यम है और ऐसी योजनाएं विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के लिए नई ऊर्जा प्रदान करती हैं।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों और अभिभावकों में उत्साह देखने को मिला। छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों ने इसे अपने शैक्षणिक सफर में महत्वपूर्ण सहयोग बताया। वक्फ बोर्ड का यह प्रयास आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

प्रदेश सरकार लगातार शिक्षा, कौशल विकास और युवा सशक्तिकरण के क्षेत्र में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से कार्य कर रही है। वक्फ बोर्ड की यह पहल भी इसी दिशा में समाज के उत्थान और विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य निर्माण में अहम भूमिका निभाएगी।

शिवराज दिल्ली आइए… मोहन यादव के शपथ ग्रहण में PM मोदी ने क्यों बुलाया था? अंदर की कहानी

भोपाल 

मुझे 13 दिसंबर, 2023 मध्य प्रदेश में नई सरकार के शपथ ग्रहण का दिन स्पष्ट याद है। मैंने प्रधानमंत्री और वरिष्ठ नेतृत्व का मुख्यमंत्री के रूप में स्वागत किया और जैसे ही मोहन यादव ने शपथ ली, स्वाभाविक रूप से सबका ध्यान उन पर चला गया। बाद में प्रधानमंत्री मेरे पास आए और धीरे से कहा- शिवराज, समय निकालकर दिल्ली आओ। आपसे कुछ बातें करनी हैं। इसके छह महीने बाद नौ जून, 2024 को मैंने केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली। मुझे कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय सौंपा गया। तब मुझे अहसास हुआ प्रधानमंत्री ने उस शपथग्रहण समारोह के दौरान ही मेरे लिए योजना बना ली थी।’

यह अंश है केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की पुस्तक ‘अपनापन’ का, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े कई संस्मरणों को शामिल किया है। पुस्तक में शिवराज सिंह के प्रधानमंत्री मोदी के साथ तीन दशकों से अधिक पुराने आत्मीय संबंधों का हृदयस्पर्शी वर्णन है। इसमें घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि अनुभवों की वह यात्रा है, जो 1991-92 की एकता यात्रा से प्रारंभ होकर वर्ष 2025 में उनके तीसरे कार्यकाल तक विस्तृत है।
पुस्तक में और क्या

शिवराज सिंह ने पुस्तक में कहा है कि पहलगाम हमले के बाद कैबिनेट बैठक के बाद उनके मन में पुस्तक लिखने का विचार आया। तब प्रधानमंत्री सऊदी अरब के राजकीय दौरे पर थे। लेकिन सूचना मिलने पर वह कार्यक्रम को बीच में ही रोककर अगले दिन भारत लौट आए।

उन्होंने लिखा, ‘30 अप्रैल, 2025 को कैबिनेट बैठक के वातावरण में तनाव था, और मेरे मन में बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा था-इन कठिन क्षणों का बोझ मोदीजी पर कितना भारी पड़ रहा होगा? लेकिन मैंने उन्हें अंदाज में कमरे में आते देखा। उनके मन-मानस पर क्रोध और विचलन का नामोनिशान नहीं था। अपनी शांत, परंतु दृढ़निश्चयी आवाज में प्रधानमंत्री ने कहा, ‘इस बार का ऑपरेशन अलग होगा। सर्जिकल स्ट्राइक्स और एयरस्ट्राइक्स से अलग होगा। जिन्होंने यह हरकत करने की जुर्रत की है, वे दुनिया के किसी भी कोने में छुपे हों, हम उन्हें और उनके आकाओं को नहीं छोड़ेंगे।’ ये क्रोध में बोले गए शब्द नहीं, बल्कि अडिग संकल्प और दृढ़ नेतृत्व के परिचायक थे।
जब शिवराज सिंह चौहान को लिस्ट में नहीं मिला उनका नाम

पीटीआई भाषा ने किताब में वर्णित अंशों के हवाले से लिखा, जब भाजपा ने 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की, तो चौहान ने सोचा कि पहले उन सीटों के उम्मीदवारों के नाम घोषित किए जाएंगे, जहां भाजपा की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर मानी जा रही थी। उन्होंने लिखा, ‘मेरा नाम शुरुआती सूचियों में शामिल नहीं था।’
पुराने बयान का जिक्र

किताब के अनुसार, इसी दौरान एक जनसभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने राज्य में विकास का उल्लेख करते हुए कहा था, ‘अगर हम नहीं रहे, तो हमें बहुत याद किया जाएगा।’ उन्होंने लिखा कि विपक्ष ने इस बयान को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया और यह प्रचारित किया कि चौहान का राजनीतिक करियर समाप्त हो गया है।

चौहान ने लिखा कि विपक्ष के कुछ लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। मौजूदा कृषि मंत्री चौहान ने कहा, ‘उन्होंने (विपक्ष ने) यह तक कह दिया कि मामाजी का तो राजनीतिक अंतिम संस्कार भी कर दिया गया है।’ चौहान ने किताब में लिखा कि कांग्रेस पार्टी ने ‘गलत सूचना’ को अपनी चुनावी रणनीति का मुख्य आधार बना लिया और उनके बयान को ‘तोड़-मरोड़कर पेश’ करते हुए सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।

उन्होंने लिखा, ‘शायद वे हमारे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराना चाहते थे। मुझे भी लगा कि हमें अपने कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करने और गलत धारणा को तोड़ने के लिए कुछ करना चाहिए।’ केंद्रीय मंत्री ने लिखा कि जब वह उस समय को याद करते हैं, तो उन्हें कांग्रेस की ‘मजाक उड़ाने वाली बातें’ याद नहीं आतीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी की ‘गहरी भावनात्मक संवेदनशीलता’ सामने आती है।
जब पीएम मोदी का फोन आया

उन्होंने कहा कि चुनाव अभियान के बीच बेहद व्यस्त होने के बावजूद भाजपा के वरिष्ठ नेता मोदी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से फोन किया। चौहान ने किताब में लिखा, ‘उन्होंने (मोदी ने) मुझे मुख्यमंत्री के रूप में संबोधित नहीं किया। बहुत गर्मजोशी और स्नेह के साथ उन्होंने कहा, ‘आज मैं मुख्यमंत्री से बात नहीं कर रहा हूं, न ही चुनावों के संदर्भ में फोन कर रहा हूं। मैं अपने शिवराज से बात कर रहा हूं।’

उन्होंने किताब में कहा कि प्रधानमंत्री ने बहुत ही नरमी से पूछा, ‘आप इतने चिंतित क्यों हो? अगर आपका कोई आध्यात्मिक मार्गदर्शक या गुरु है, जिनका आप सम्मान करते हैं, तो उनके पास जाकर मार्गदर्शन लें। कुछ समय एकांत में बिताएं और अपने मन को शांत, संतुलित एवं स्थिर रखें।’ चौहान ने लिखा कि उन्हें लगा कि शायद प्रधानमंत्री यह सोच रहे थे कि ‘मुझे कुछ आश्वासन की जरूरत हो सकती है’।
शिवराज सिंह चौहान ने क्या रिप्लाई दिया

केंद्रीय मंत्री ने लिखा, ‘मैंने उनसे कहा, ‘भाई साहब, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं सिर्फ काम करना चाहता हूं।’ चौहान के अनुसार, इसपर मोदी ने जवाब दिया, ‘नहीं शिवराज, एक-दो दिन अकेले रहिए, अपना ध्यान रखिए, अपनी मानसिक स्थिति का ख्याल रखें और फिर काम में जुट जाएं।’

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने लिखा, ‘वह (मोदी) चाहते थे कि मैं कुछ समय के लिए रुकूं, अपने ऊपर ध्यान दूं और आंतरिक शक्ति को फिर से जागृत करुं, उनका स्नेह मेरे मन को गहराई से छू गया। जो नेता पूरे देश की जिम्मेदारियों का भार उठाए हुए हैं, वह मेरे व्यक्तिगत मानसिक हालात की भी चिंता कर रहे थे; यही वास्तविक संवेदनशीलता है।’
सलाह मान उत्तराखंड गए

चार बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे चौहान ने लिखा कि उन्होंने प्रधानमंत्री की सलाह मान ली और उत्तराखंड चले गए। चौहान ने लिखा, ‘ऋषिकेश से थोड़ी दूरी पर, मैं गंगा के किनारे एकांत में घंटों बैठा रहा। बहते पानी और अडिग पहाड़ों को देखते हुए मेरा मन धीरे-धीरे शांत होने लगा। तब मैं पूरी तरह समझ गया कि मोदी जी क्या चाहते थे। उनका स्नेह केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि रणनीतिक भी था।’

केंद्रीय मंत्री ने लिखा कि मोदी अच्छी तरह समझते थे कि यदि भ्रामक मीडिया रिपोर्टों से उनका (चौहान) मनोबल कमजोर हुआ, तो उसका असर भाजपा कार्यकर्ताओं पर भी हो सकता है।

नई दिल्ली में 26 मई को पूर्व उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की मौजूदगी में इस पुस्तक का आधिकारिक रूप से विमोचन किया जाएगा।

मंत्री विश्वास सारंग ने किया करोड़ों की लागत से होने वाले विकास कार्यों का भूमि-पूजन

मंत्री विश्वास सारंग ने किया करोड़ों की लागत से होने वाले विकास कार्यों का भूमि-पूजन

वार्ड 78 में सीवेज परियोजना से हजारों परिवारों को मिलेगा प्रत्यक्ष लाभ

भोपाल 

सहकारिता, खेल और युवा कल्याण मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने  नरेला विधानसभा अंतर्गत वार्ड 78, विश्वकर्मा नगर में 23 करोड़ से अधिक की लागत से होने वाली सीवेज परियोजना एवं अन्य विकास कार्यों का भूमि-पूजन किया। मंत्री सारंग ने अपने संबोधन में कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन एवं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार मध्यप्रदेश में विकास और जनकल्याण के नए आयाम स्थापित कर रही है। हर वर्ग के कल्याण और हर क्षेत्र का समुचित विकास सरकार की प्राथमिकता है। मंत्री सारंग ने कहा कि हमारा लक्ष्य केवल विकास कार्य करना नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन को सुगम भी बनाना है। मंत्री सारंग ने कहा कि इस परियोजना से स्वच्छता व्यवस्था बेहतर होगी, जलभराव एवं गंदगी की समस्या से राहत मिलेगी तथा नागरिकों को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण प्राप्त होगा। कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधि सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।

हज़ारों परिवारों को मिलेगा प्रत्यक्ष लाभ

वार्ड 78 स्थित विश्वकर्मा नगर में 23 करोड़ से अधिक की लागत से निर्माण होने वाली इस परियोजना के अंतर्गत 13 करोड़ रुपये की लागत से 42 किलोमीटर लंबा सीवर नेटवर्क बनाया जाएगा तथा 9 करोड़ रुपये की लागत से 8079 हाउस सीवर कनेक्शन प्रदान किए जाएंगे, जिससे लगभग 35,306 नागरिकों को प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा। परियोजना पूर्ण होने के बाद क्षेत्रवासियों को बेहतर स्वच्छता, आधुनिक सीवेज व्यवस्था और सुगम नागरिक सुविधाएं प्राप्त होंगी। इससे न केवल जनजीवन अधिक सरल एवं सुविधाजनक बनेगा बल्कि क्षेत्र के समग्र विकास को भी नई दिशा मिलेगी।

कार्यक्रम में मंत्री सारंग का क्षेत्रवासियों द्वारा पुष्पवर्षा एवं माल्यार्पण कर भव्य स्वागत किया गया। और क्षेत्रवासियों ने करोड़ों की लागत से होने वाले इन विकास कार्यों की सौगात के लिए आभार व्यक्त किया।

 

भोजशाला पर ऐतिहासिक फैसला! MP हाई कोर्ट ने सरस्वती मंदिर माना, नमाज के अधिकार समाप्त

धार 

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धार्मिक स्थलों से जुड़े सबसे अहम फैसलों में से एक में फैसले में 15 मई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह कहा कि धार में स्थित विवादित भोजशाला-कमल मौला परिसर मूल रूप से एक हिंदू धार्मिक और शैक्षिक ढांचा है – यह देवी वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित एक मंदिर और संस्कृत सीखने का एक केंद्र है, जिसकी स्थापना परमार वंश के राजा भोज के शासनकाल में 1034 ईस्वी में हुई थी।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीज़न बेंच द्वारा दिया गया 242 पन्नों का यह फैसला, आपस में टकराने वाले धार्मिक दावों के पारंपरिक निर्धारण से कहीं आगे जाता है। कोर्ट ने कथित तौर पर पुरातात्विक सर्वेक्षणों, शिलालेखों, वास्तुशिल्प अवशेषों, ऐतिहासिक साहित्य, औपनिवेशिक गजेटियरों, विधायी इतिहास, संवैधानिक सिद्धांतों, हिंदू बंदोबस्ती कानून, इस्लामी वक्फ़ सिद्धांत और अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विकसित न्यायिक ढांचे की गहन जांच-पड़ताल की।

इस फैसले का मूल यह है कि कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि भोजशाला में मौजूद मौजूदा ढांचा, पहले से मौजूद एक मंदिर परिसर को नष्ट करने और उसमें बदलाव करने के बाद बनाया गया था, और यह कि इस जगह पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता “कभी खत्म नहीं हुई”।

बेंच ने आखिरकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा 2003 में बनाई गई उस व्यवस्था को रद्द कर दिया, जिसके तहत परिसर के अंदर हिंदू पूजा-अर्चना पर रोक लगाते हुए शुक्रवार की नमाज की इजाजत दी गई थी। साथ ही, कोर्ट ने आपस में टकराने वाले धार्मिक दावों में संतुलन बनाने की कोशिश की – हालांकि यह बहुत ज्यादा भरोसेमंद नहीं लगी – और यह टिप्पणी की कि मुस्लिम समुदाय धार जिले में एक मस्जिद बनाने के लिए किसी दूसरी जगह के आवंटन के लिए राज्य सरकार से आवेदन कर सकता है।

इस फैसले के गहरे कानूनी और राजनीतिक प्रभाव होने की संभावना है, ऐसा न केवल भोजशाला के बारे में इसके निष्कर्षों की वजह से है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि कोर्ट ने जिस संवैधानिक और साक्ष्य-आधारित कार्यप्रणाली को अपनाया है – वह स्पष्ट रूप से अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के विवादास्पद सिद्धांतों से प्रेरित है और उनका विस्तार करती है।

1991 के ‘पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम’ को रद्द करना

नागरिकों और कानूनी जानकारों के लिए जिस बात को समझना और आत्मसात करना सबसे ज्यादा ज़ररी है, वह यह है कि कोर्ट खुद एक मौजूदा कानून – 1991 के ‘पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम’ – के साथ क्या कर रहे हैं। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद पारित यह कानून- जिसे नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पेश किए जाने के बाद विधायिका का जबरदस्त समर्थन मिला था (संयोग से, जिस समय यह गैर-कानूनी काम हुआ था, उस समय भी यही सरकार सत्ता में थी)- फिलहाल भारत के सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती का सामना कर रहा है।

विडंबना यह है कि आखिरी बार इस “कानून को दी गई चुनौती” पर शीर्ष अदालत ने दिसंबर 2024 में सुनवाई की थी, जब यह तय हुआ था कि इस मामले पर चार हफ्तों बाद सुनवाई होगी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन भोजशाला जैसे फैसले एक बार फिर इस कानून को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का 12 दिसंबर, 2024 का आदेश- भले ही यह निचली अदालतों के लिए था- उनसे यह कहता है कि वे पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को दी गई चुनौती पर फैसला आने तक, पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप को चुनौती देने वाले मामलों में कोई भी नया मुकदमा दर्ज न करें और न ही कोई प्रभावी आदेश (सर्वेक्षण के आदेशों सहित) पारित करें।

यह आदेश भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने पारित किया था, जिसमें न्यायमूर्ति पी.वी. संजय कुमार और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन शामिल थे, उस समय न्यायाधीशों ने इस बात पर जोर दिया था कि इस तरह की कार्यवाही पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का उल्लंघन करती है। यह कानून पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है, जैसा कि वे 15 अगस्त, 1947 को थे।

दिसंबर 2024 में अदालत का यह हस्तक्षेप- सालों की पेंडेंसी और देरी के बाद (इन याचिकाओं पर 2021 में नोटिस जारी किया गया था)- ऐसे समय में आया, जब धार्मिक स्थलों की स्थिति को चुनौती देने वाली याचिकाओं और मुकदमों की बाढ़ सी आ गई थी, इनमें से कई स्थल मध्यकालीन मस्जिदें और दरगाहें हैं। उस समय, उत्तर प्रदेश में 16वीं सदी की संभल जामा मस्जिद के संबंध में एक निचली अदालत द्वारा नवंबर 2024 में दिए गए सर्वेक्षण के आदेश ने सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा दिया था, जिसका नतीजा नवंबर में हुई हिंसक झड़पों के रूप में सामने आया, जिसमें चार लोगों की जान चली गई थी। हालांकि अदालत ने उस समय कहा था कि वह इस कानून – पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991- को दी गई चुनौतियों पर सुनवाई शुरू करेगी, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। इन घटनाक्रमों के बारे में विस्तार से यहां पढ़ें।

PWA 1991 का संदर्भ और व्यापक निहितार्थ

1991 का अधिनियम पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप में बदलाव को रोकने के लिए लाया गया था, जिसमें केवल बाबरी मस्जिद स्थल को अपवाद के तौर पर रखा गया था, जो अयोध्या विवाद का विषय था। यह अधिनियम, जिसे अब लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, यह सुनिश्चित करना चाहता है कि धार्मिक स्थलों- विशेषकर ऐतिहासिक महत्व वाले स्थलों- की स्थिति को लेकर 15 अगस्त, 1947 के बाद कोई नया कानूनी विवाद शुरू न हो।

इस महत्वपूर्ण संदर्भ को यहां पढ़ें: ‘राम विलास पासवान ने कब और कैसे पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के पक्ष में जोरदार वकालत की थी।’ बिहार के एक कद्दावर नेता- जिन्हें भारतीय राजनीति का ‘मौसम विज्ञानी’ भी कहा जाता था- राम विलास पासवान (जो उस समय नेशनल फ्रंट के सदस्य थे) ने विपक्ष की बेंच से प्रस्तावित कानून के समर्थन में जोरदार भाषण दिया। उन्होंने पूजा स्थलों को ढहाने की BJP की विनाशकारी राजनीति (बाबरी मस्जिद, 6 दिसंबर, 1991) की तीखी आलोचना की और इस मामले में कांग्रेस को भी नहीं बख्शा।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बारे में, और साथ ही बाबरी मस्जिद फैसले में मौजूद कमियों के विस्तृत विश्लेषण के बारे में यहां, यहां और यहां पढ़ें।

भले ही हम ‘भोजशाला’ फैसले के पीछे की कमियों को समझें और उनका विश्लेषण करें- और ऐसी कई कमियां हैं- लेकिन यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि अदालतें खुद इस कानून के साथ क्या कर रही हैं। कई राज्यों और स्थलों पर, अदालतें अलग-अलग मान्यताओं और निष्कर्षों के जरिए एक ही मंजिल तक पहुंच रही हैं। नतीजतन, अब ‘भोजशाला आदेश’ -ठीक वैसे ही जैसे कई अन्य आदेश निर्णायक रूप से पारित किए जा रहे हैं, जबकि एक महत्वपूर्ण कानून को लेकर संवैधानिक चुनौती अभी भी न्यायिक अनिश्चितता (limbo) में फंसी हुई है -पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के साथ असल में वही कर रहा है, जो न तो संसद और न ही सर्वोच्च न्यायालय करने को तैयार था। इस अधिनियम में कोई संशोधन नहीं किया जा रहा है। इसे रद्द भी नहीं किया जा रहा है। बल्कि, इसे उन लोगों के लिए अप्रभावी और अनुपयोगी बनाया जा रहा है जिनकी सुरक्षा के लिए इसे लिखा गया था- एक-एक करके, हर बार एक अलग सैद्धांतिक रास्ते के जरिए।

संयोग से, शुक्रवार (15 मई) को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ द्वारा सुनाया गया भोजशाला फैसला, इसी प्रवृत्ति की नवीनतम अभिव्यक्ति है। यह सबसे महत्वाकांक्षी अभिव्यक्ति भी है। इस बेंच में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी शामिल थे। इसने 1991 के एक्ट को भोजशाला पर लागू न होने वाला माना है। इसका आधार यह है कि यह जगह एक अलग कानून के तहत केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारक है। इस बेंच ने जो रास्ता दिखाया है, वह अब तक कानूनी तौर पर उपलब्ध नहीं था। यह फैसला अब उन लोगों के लिए एक और मिसाल कायम करता है जो ऐसे ही मामलों में मुकदमा लड़ रहे हैं, यह फैसला उस नक्शे में एक छठा कानूनी रास्ता जोड़ता है जिसमें पहले से ही पांच रास्ते मौजूद थे।

हिंदुस्तान टाइम्स के रिपोर्ट अनुसार, भोजशाला जैसा ही मुकदमा अब उत्तर प्रदेश से लेकर कर्नाटक तक की अदालतों में चल रहा है। इसका भौगोलिक विस्तार अपने आप में एक अहम तथ्य है। आगे हम इसी विस्तार पर चर्चा करेंगे और इसे उस एक्ट के संदर्भ में देखेंगे जिसे यह चुनौती दे रहा है।

1991 के ‘पूजा स्थल अधिनियम’ (Places of Worship Act) की धारा 4 यह कहती है कि किसी भी पवित्र स्थल का धार्मिक स्वरूप “वैसा ही बना रहेगा जैसा कि वह 15 अगस्त, 1947- यानी स्वतंत्रता दिवस- के दिन था।” धारा 5 के तहत इसमें केवल एक ही अपवाद था, जिसमें कहा गया था: “…इस एक्ट में कही गई कोई भी बात उस जगह या पूजा स्थल पर लागू नहीं होगी जिसे आम तौर पर अयोध्या में स्थित ‘राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद’ के नाम से जाना जाता है।”

लेकिन, चाहे वह ज्ञानवापी मस्जिद (वाराणसी) का मामला हो, या कटरा केशव देव मंदिर की 13.37 एकड़ जमीन से जुड़े मुकदमे- जिनमें 17वीं सदी की शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग की गई है- देश की अलग-अलग अदालतों में ऐसे कई मामले लंबित हैं जो संसद द्वारा पारित इस कानून का उल्लंघन करते हैं। शाही ईदगाह मस्जिद को हटाकर जमीन का कब्जा पाने, मंदिर को फिर से स्थापित करने और स्थायी रोक लगाने की मांग वाले कम से कम 18 मुकदमे अभी हाई कोर्ट में लंबित हैं। इस मामले की पहली सुनवाई 18 अक्टूबर, 2023 को हुई थी और अगली सुनवाई की तारीख अभी नहीं दी गई है।

पश्चिमी यूपी में संभल शाही मस्जिद स्थल के अलावा, हुबली में ईदगाह मैदान विवाद का स्थल, कर्नाटक के चिकमंगलूर में बाबा बूढ़ागिरी का साझा धार्मिक स्थल और मंगलुरु के मलाली गांव में मलाली मस्जिद भी पहले से ही दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों द्वारा इसी तरह के मुकदमों का सामना कर रहे हैं।

ऐतिहासिक दावों की होड़ से उपजा विवाद

भोजशाला विवाद – जिस पर MP हाई कोर्ट ने 15 मई को अपना फैसला सुनाया – मध्य प्रदेश के धार में ASI द्वारा संरक्षित एक मध्यकालीन इमारत से जुड़ा है, जिस पर लंबे समय से कई धार्मिक समुदायों द्वारा दावा किया जाता रहा है। जहां एक ओर हिंदू समूह 1990 के दशक की शुरुआत से ही यह दावा करते आ रहे हैं कि इस इमारत को ऐतिहासिक रूप से भोजशाला माना जाता रहा है – जो देवी सरस्वती का एक मंदिर और संस्कृत शिक्षा का एक प्रसिद्ध केंद्र था, जिसकी स्थापना राजा भोज ने की थी (जो अपनी विद्वत्ता, साहित्य और मंदिरों को संरक्षण देने के लिए जाने जाते थे) – वहीं इस स्थल पर एक मस्जिद भी स्थित है।

दूसरी ओर, मुस्लिम समुदाय यहां कमाल मौला मस्जिद में इबादत करता रहा है। उनका दावा है कि यह स्थल सदियों तक एक मस्जिद के तौर पर काम करता रहा है। अपने दावे के समर्थन में वे खिलजी काल के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ-साथ तत्कालीन धार रियासत द्वारा 1935 में जारी एक ‘ऐलान’ का भी हवाला देते हैं, जिसमें इस स्थल को एक मस्जिद के रूप में मान्यता दी गई थी।

जैन याचिकाकर्ताओं द्वारा भी दावों का एक अलग समूह सामने रखा गया। उन्होंने तर्क दिया कि स्थल से बरामद कुछ मूर्तियां और मूर्तिकला संबंधी विशेषताएं यह संकेत देती हैं कि यह स्थल मूल रूप से एक जैन मंदिर था, जो देवी अंबिका या जैन विद्यादेवी परंपराओं से जुड़ा हुआ था।

यह विवाद वर्षों तक ASI द्वारा 2003 में तैयार की गई एक प्रशासनिक व्यवस्था के तहत चलता रहा, जिसके अनुसार हिंदू मंगलवार को पूजा करते थे, जबकि मुस्लिम शुक्रवार को नमाज अदा करते थे।

इस स्थल को एक हिंदू मंदिर के रूप में मान्यता देने और परिसर के भीतर नमाज पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाएं दायर होने के बाद यह विवाद और भी गहरा गया। सुनवाई के दौरान, हाई कोर्ट ने ASI को इस स्थल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया – यह आदेश कुछ समय के लिए सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, जिसके बाद अंततः न्यायिक निगरानी में सर्वेक्षण की प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दे दी गई। इस सर्वेक्षण के परिणामस्वरूप तैयार हुई ASI की रिपोर्ट ही हाई कोर्ट के अंतिम निष्कर्षों का मुख्य आधार बनी।

कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष: भोजशाला देवी सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र था

हाई कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि उपलब्ध समस्त ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य इस बात को पूरी तरह से स्थापित करते हैं कि भोजशाला, देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर और राजा भोज से जुड़ा हुआ एक संस्कृत शिक्षण संस्थान था। बेंच ने दर्ज किया:

“हमने इस बात पर गौर किया है कि इस जगह पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता, भले ही समय के साथ इसे नियंत्रित किया गया हो, कभी खत्म नहीं हुई है। हम यह निष्कर्ष दर्ज करते हैं कि ऐतिहासिक साहित्य से यह साबित होता है कि विवादित क्षेत्र का स्वरूप ‘भोजशाला’ था -जो परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत सीखने का एक केंद्र था और साहित्य तथा वास्तुकला संबंधी संदर्भ -जिनमें राजा भोज के काल से जुड़े संदर्भ भी शामिल हैं-धार में देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं।” (पैरा 210)

महत्वपूर्ण रूप से, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह पारंपरिक अर्थों में किसी दीवानी मालिकाना विवाद का निपटारा नहीं कर रही थी। अयोध्या मुकदमे के विपरीत -जो जमीन के स्वामित्व और मालिकाना हक से जुड़े मुकदमों से उपजा था- भोजशाला मामला, बेंच के अनुसार, मुख्य रूप से पुरातात्विक, ऐतिहासिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के माध्यम से विवादित ढांचे के “धार्मिक स्वरूप” को निर्धारित करने से संबंधित था।

इस अंतर ने अदालत को पारंपरिक मालिकाना दावों के बजाय पूजा-अर्चना के तरीकों, शिलालेखों, वास्तुकला की निरंतरता, ऐतिहासिक संदर्भों और पुरातात्विक निष्कर्षों पर विस्तार से ध्यान केंद्रित करने का अवसर दिया।

ASI सर्वेक्षण: फैसले की नींव

इस फैसले का सबसे निर्णायक पहलू अदालत का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर भरोसा करना था।

मुस्लिम पक्षों ने सर्वेक्षण की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली को जोरदार ढंग से चुनौती दी थी और खुदाई के तरीकों, मलबे के दूषित होने, कलाकृतियों की बरामदगी तथा निष्कर्षों की व्याख्या के संबंध में आपत्तियां उठाई थीं। हालांकि, अदालत ने पक्षपात या प्रक्रियागत अनियमितता के आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया।

बेंच ने इस बात का उल्लेख किया कि सर्वेक्षण ASI के एक अतिरिक्त महानिदेशक की देखरेख में वरिष्ठ पुरातत्वविदों की एक मुख्य तकनीकी टीम द्वारा किया गया था। इसने यह भी दर्ज किया कि मुस्लिम समुदाय से संबंधित अधिकारियों ने भी इस प्रक्रिया में भाग लिया था, और सर्वेक्षण की पूरी कार्यवाही के दौरान वीडियोग्राफी तथा फोटोग्राफी के समय सभी विवादित पक्षों के प्रतिनिधि वहां मौजूद थे।

कोर्ट ने कहा:

“हम पाते हैं कि सर्वे एक वैज्ञानिक तरीके से, निष्पक्ष और बिना किसी भेदभाव के किया गया था। याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादी के प्रतिनिधियों की मौजूदगी वीडियोग्राफी में साफ तौर पर देखी जा सकती है। विशेषज्ञों ने जो तरीका अपनाया था, वह उनकी विशेषज्ञता के अनुसार ही था। कार्बन डेटिंग का तरीका किसी चीज की उम्र पता लगाने के लिए इस्तेमाल होता है, न कि किसी इमारत के बनने के समय का पता लगाने के लिए।” (पैरा 195)

साइट पर कथित तौर पर मिले प्लास्टिक कचरे और आधुनिक मलबे के आरोपों को खारिज करते हुए, कोर्ट ने ASI की इस सफाई को मान लिया कि ऐसी चीजें सिर्फ ऊपरी, मिली-जुली मलबे की परतों में मिला था, जिनमें आधुनिक फेंका हुआ सामान, रैपर और मरम्मत का कचरा शामिल था और इससे नीचे की पुरानी परतों की पुरातात्विक अखंडता को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

बेंच ने ASI की इस सफाई को भी मान लिया कि कार्बन डेटिंग जरूरी नहीं थी, क्योंकि सर्वे का मकसद किसी अलग-थलग जैविक चीज की उम्र पता लगाना नहीं था, बल्कि उस इमारत के बनने के समय और उसके ऐतिहासिक विकास को पहचानना था।

इतिहास और इमारत के बारे में कुछ तथ्य

700 सालों तक, कमाल मौला मस्जिद धार के मुसलमानों के लिए इबादत की जगह रही थी। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने और हिंदुत्व की बहुसंख्यकवादी विचारधारा के राजनीतिक रूप से हावी होने के बाद, फैजाबाद-अयोध्या और दूसरी जगहों पर भी पुरातत्व और इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिशें शुरू हो गईं। असल में, मई 2003 में- गुजरात दंगों के एक साल बाद- ‘कम्युनलिज्म कॉम्बैट’ ने एक विस्तृत सूची छापी थी (जो विश्व हिंदू परिषद/VHP से मिली थी), जिसमें ऐसी दर्जनों “साइटें” शामिल थीं जो “हिंदुत्व की हिट लिस्ट” में थीं। इन्हें यहां पढ़ा जा सकता है।

अब वापस कमाल मौला मस्जिद पर आते हैं। इतिहास हमें बताता है कि 1903 में, ब्रिटिश राज के एक शिक्षा अधिकारी, के.के. लेले ने, एक ऐसी इमारत को देखते हुए जिसे स्थानीय लोग “राजा भोज का मदरसा” कहते थे, उसे “भोजशाला” नाम देने का फैसला किया। उनसे पहले हर ब्रिटिश अधिकारी ने इसे मस्जिद ही कहा था। जॉन मैल्कम 1822 में धार आए थे और उन्होंने उस इमारत से एक शिलालेख वाला पत्थर हटा दिया था। उस इमारत के बारे में उन्होंने बस इतना ही कहा था कि यह एक “खंडहर मस्जिद” है। विलियम किनकैड ने 1888 में मालवा में बिताए अपने समय के बारे में लिखते हुए, राजा भोज से जुड़ी स्थानीय कहानियों का विस्तार से जिक्र किया था, लेकिन उन्होंने एक बार भी ‘भोजशाला’ का जिक्र नहीं किया। फिर, 2003 में- जब यह मामला अदालतों में पहुंचा, यानी 123 साल बाद- ASI ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 2,000 पन्नों की एक रिपोर्ट जमा की। इस रिपोर्ट में नामकरण से जुड़ी बारीकियों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया था और पूरी रिपोर्ट में हर जगह सिर्फ “भोजशाला मंदिर” शब्द का ही इस्तेमाल किया गया था। स्थानीय लोगों के लिए, धार में 1304 ईस्वी से मौजूद यह इमारत ‘कमाल मौला मस्जिद’ है। लेकिन, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के इस फैसले ने इस पूरे इतिहास को ही मिटा दिया है।

“पहले से मौजूद मंदिर की इमारत के सबूत”

हाई कोर्ट बार-बार एक ही मुख्य निष्कर्ष पर लौटता रहा- जो ASI की उस विशाल, लेकिन त्रुटिपूर्ण रिपोर्ट से निकाला गया था- कि मौजूदा इमारत को परमार काल के किसी पुराने मंदिर परिसर के अवशेषों के ऊपर और उन्हीं का इस्तेमाल करके बनाया गया था।

अदालत ने यह पाया कि पुरानी इमारत के अवशेष आज भी मौजूदा परिसर के नीचे मौजूद हैं। साथ ही, मौजूदा इमारत में जड़े हुए कई शिलालेख, मूर्तियां और वास्तुकला के टुकड़े साफ तौर पर किसी पुराने हिंदू धार्मिक स्मारक से जुड़े हुए थे।

फैसले में यह भी कहा गया है कि इमारत के अंदर और आस-पास सैकड़ों छोटे-बड़े शिलालेखों के टुकड़े मिले हैं। ये टुकड़े इस बात का सबूत हैं कि इस जगह की वास्तुकला और धार्मिक पहचान कभी आज से काफी अलग थी।

सर्वेक्षण के संक्षिप्त निष्कर्षों के आधार पर अदालत ने यह टिप्पणी की:

“शिलालेखों, मूर्तियों और वास्तुकला के टुकड़ों से यह संकेत मिलता है कि इस पत्थर की इमारत के ऊपरी हिस्से में बाद में बदलाव किए गए और उसे एक मस्जिद में बदल दिया गया।” (पैरा 173)

ASI के निष्कर्ष ही अदालत के इस फैसले का मुख्य आधार बने कि मौजूदा इमारत में इस्तेमाल किए गए खंभे और स्तंभ मूल रूप से मंदिरों के ही हिस्से थे। अदालत ने न तो ASI की निष्पक्षता या स्वायत्तता की जांच करने की कोई कोशिश की और न ही इस इमारत के बारे में किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ की राय लेने की जरूरत समझी।

बेंच ने मूर्तिकला के उन अवशेषों का विस्तार से जिक्र किया जिनमें ये चीजें दिखाई गई थीं:

● गणेश,
● अपनी पत्नियों के साथ ब्रह्मा,
● नरसिंह,
● भैरव,
● देवी-देवताओं और अर्ध-देवताओं की आकृतियां,
● मवेशियों और इंसानों की नक्काशी,
● और मंदिर से जुड़े प्रतीक, जैसे कीर्तिमुख।

अदालत के अनुसार, इनमें से कई आकृतियों को बाद की इमारत में दोबारा इस्तेमाल करने से पहले जान-बूझकर बिगाड़ा गया था, तोड़ा-मरोड़ा गया था या छेनी से काटकर हटा दिया गया था।

अदालत ने खास तौर पर यह बात नोट की कि इंसानी रूप वाली आकृतियां आम तौर पर मस्जिद की वास्तुकला से मेल नहीं खातीं; और उसने इन आकृतियों को बिगाड़े जाने की घटना को ही इस बात का सबूत माना कि मस्जिद की इमारत बनाते समय मंदिर की सामग्री का ही दोबारा इस्तेमाल किया गया था।

बेंच ने ASI की इस टिप्पणी पर भी भरोसा किया कि मौजूदा इमारत में वास्तुकला की दृष्टि से कोई समरूपता नहीं है और ऐसा लगता है कि इसे अलग-अलग समय और शैलियों की पुरानी सामग्री को जल्दबाज़ी में जोड़कर बनाया गया है।

परमार वंश, राजा भोज और इस स्थल का काल-निर्धारण

फैसले का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर केंद्रित है कि यहां मौजूद पुरानी इमारत किस समय की है-यानी 10वीं-11वीं शताब्दी ईस्वी की, जब यहां परमार वंश का शासन था।

अदालत ने इन चीजों पर भरोसा किया:

● परमार-युग के मिट्टी के बर्तन,
● इंडो-ससैनियन सिक्के,
● संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख,
● मंदिर की वास्तुकला से जुड़े अवशेष,
● लोहे की वस्तुएं,
● खंडित विष्णु मूर्तियां,
● और राजा भोज से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ।

बेंच ने ASI के इस निष्कर्ष का जिक्र किया कि इस स्थल से मिले सबसे पुराने सिक्के इंडो-ससैनियन काल के हैं- यानी उस समय के, जब परमार राजा धार से बैठकर मालवा पर शासन करते थे।

फैसले में जिन सबसे महत्वपूर्ण शिलालेखों पर चर्चा की गई है, उनमें से एक में प्राकृत भाषा की दो कविताएं शामिल हैं, इन दोनों कविताओं में 109-109 छंद हैं और ये राजा भोज से जुड़ी हुई हैं।

अदालत ने यह बात नोट की कि इन शिलालेखों की शुरुआत कथित तौर पर कुछ इस तरह के मंगलाचरणों से होती थी:

“ॐ सरस्वत्यै नमः”

“ॐ नमः शिवाय”

बेंच ने इसे इस बात का एक महत्वपूर्ण सबूत माना कि बाद में लिखे गए इस्लामी शिलालेखों से भी पहले, इस स्थल की एक गहरी जड़ें जमा चुकी संस्कृत-आधारित और हिंदू धार्मिक पहचान थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने यह भी पाया कि संस्कृत और प्राकृत भाषा के ये शिलालेख, इस स्थल पर मिले सभी अरबी और फारसी शिलालेखों से भी ज्यादा पुराने हैं। 

संस्कृत शिक्षा के एक महान केंद्र के रूप में भोजशाला

हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया कि भोजशाला केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि राजा भोज के शासनकाल में संस्कृत शिक्षा से जुड़ा एक प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्थान था।

कोर्ट ने कई ऐतिहासिक ग्रंथों और प्रशासनिक प्रकाशनों को आधार माना, जिनमें शामिल हैं:

● इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया (1908),
● रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के प्रकाशन,
● जी. याज़दानी की किताब ‘मांडू: द सिटी ऑफ़ जॉय’,
● 1972–73 की पुरातात्विक समीक्षाएं,
● और धार रियासत के शैक्षणिक रिकॉर्ड।

बेंच ने उस जगह पर मिले प्रसिद्ध “सर्पाकार व्याकरणिक शिलालेखों” का बार-बार जिक्र किया – ये संस्कृत व्याकरण के सूत्र थे जिन्हें फर्श की शिलाओं और वास्तुशिल्प के हिस्सों पर सांप जैसी आकृतियों में उकेरा गया था।

ये शिलालेख इस इमारत को “भोजशाला” या “भोज का सभागार” के रूप में पहचानने का मुख्य आधार बने। कोर्ट के सामने पेश किए गए ऐतिहासिक साहित्य में इस इमारत को “राजा भोज का मदरसा” या राजा भोज के स्कूल के तौर पर बताया गया था।

कोर्ट ने इन रिकॉर्डों को ऐसे सहायक सबूतों के तौर पर माना, जो इस जगह के विद्वत्ता, संस्कृत शिक्षा और देवी सरस्वती के साथ लंबे समय से चले आ रहे जुड़ाव को साबित करते हैं।

कोर्ट का निष्कर्ष: मौजूदा इमारत मंदिर के अवशेषों से बनाई गई थी

फैसले में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि मौजूदा इमारत में ऐसे स्पष्ट सबूत मिलते हैं कि किसी पुराने हिंदू धार्मिक ढांचे को गिराने या तोड़ने के बाद, उसके मलबे का दोबारा इस्तेमाल करके इसे बनाया गया था।

ASI की रिपोर्ट, जिसका फैसले में विस्तार से जिक्र किया गया है, में कहा गया है कि ऐसा लगता है कि इस इमारत को किसी पुरानी इमारत के मलबे का इस्तेमाल करके जल्दबाजी में खड़ा किया गया था, जिसमें समरूपता या एकरूपता का कोई ध्यान नहीं रखा गया था।

कोर्ट ने इन बातों की ओर इशारा किया:

● दोबारा इस्तेमाल किए गए बेसाल्ट के खंभे,
● मंदिर शैली के स्तंभ,
● खंडित देवी-देवताओं की नक्काशी,
● दोबारा इस्तेमाल किए गए मूर्तिकला के पत्थर,
● और मस्जिद के ढांचे के अंदर जड़े हुए शिलालेखों के टूटे हुए टुकड़े।

कोर्ट के अनुसार, वास्तुकला से जुड़े इन सभी सबूतों को एक साथ देखने पर यह बात साफ तौर पर साबित होती है कि मंदिर के हिस्सों को तोड़कर बाद में बने इस्लामिक ढांचे में शामिल कर लिया गया था।

कोर्ट ने मस्जिद होने के दावे को क्यों खारिज किया

फैसले का सबसे अहम हिस्सा वह है जिसमें कोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया कि विवादित ढांचा मूल रूप से और कानूनी तौर पर एक मस्जिद था। मुस्लिम पक्षों ने खिलजी काल के ऐतिहासिक संदर्भों और 1935 के उस ‘घोषणा’ का हवाला दिया था, जिसमें इस ढांचे को एक मस्जिद के तौर पर मान्यता दी गई थी।

हालांकि, कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि मुस्लिम पक्ष द्वारा पेश की गई किसी भी ऐतिहासिक सामग्री से यह साबित नहीं होता कि यह ढांचा, पहले से स्थापित 1034 ईस्वी के हिंदू धार्मिक ढांचे से पहले एक मस्जिद के रूप में मौजूद था। इससे भी ज्यादा अहम बात यह है कि बेंच ने यह माना कि इस जगह को एक वैध वक्फ संपत्ति साबित करने वाला कोई सबूत नहीं था।

कोर्ट ने इस्लामिक वक्फ सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की और सर दिनशॉ मुल्ला की ‘प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मडन लॉ’ का हवाला दिया। कोर्ट ने पाया कि एक वैध वक्फ के लिए इन चीजों का होना जरूरी है:

● वक्फ करने वाले (वक्फिफ) का उस पर मालिकाना हक हो,
● संपत्ति को सर्वशक्तिमान ईश्वर को समर्पित किया गया हो,
● और वक्फ करने वाले का मालिकाना हक खत्म हो गया हो।

बेंच ने यह माना कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि विवादित जमीन को कभी वक्फ संपत्ति के तौर पर समर्पित किया गया था।

कोर्ट ने कहा:

“ऐसी कोई भी सामग्री नहीं है जिससे यह पता चले कि जमीन का हिस्सा संख्या 604 (पुराना नंबर 313) एक वक्फ संपत्ति है और इसे वक्फ के लिए समर्पित किया गया था या किया जा सकता था। मोहम्मडन कानून के तहत यह अनिवार्य है कि संपत्ति वक्फ करने वाले की ही होनी चाहिए और मालिक को उस संपत्ति को सर्वशक्तिमान ईश्वर को समर्पित करना चाहिए। हमारे सामने पेश की गई ऐतिहासिक सामग्री से यह साबित नहीं हो सका कि कोई वक्फ बनाया गया था, इसलिए, विवादित क्षेत्र में मस्जिद के अस्तित्व के बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। पहली नजर में यह साबित हो चुका है कि इस जगह को 1034 ईस्वी में भोजशाला और देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के रूप में बनाया गया था, जो संस्कृत भाषा सीखने का एक केंद्र था।” (पैरा 192)

कोर्ट ने आगे यह तर्क दिया कि जो जमीन पहले से ही किसी हिंदू देवी-देवता के नाम पर थी, वह कानूनी तौर पर वक्फ संपत्ति नहीं बन सकती थी।

1935 के ‘ऐलान’ को संवैधानिक रूप से अमान्य घोषित किया गया

कोर्ट ने 1935 के उस ‘ऐलान’ पर भरोसा करने से भी इनकार कर दिया, जिसे धार रियासत के शासक ने जारी किया था और जिसमें इस जगह को एक मस्जिद के तौर पर मान्यता दी गई थी। बेंच ने यह माना कि संविधान लागू होने के बाद, वह आदेश अपने आप लागू नहीं रह सकता था।

संविधान के अनुच्छेद 13 और 372 का हवाला देते हुए, कोर्ट ने यह कहा कि संविधान लागू होने से पहले के कार्यकारी आदेश तभी तक लागू रहते हैं, जब तक वे संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप हों। कोर्ट के अनुसार, वह ‘ऐलान’ उन तमाम पुरातात्विक और ऐतिहासिक सबूतों के विपरीत था, जिनसे इस जगह का हिंदू धार्मिक और शैक्षिक स्वरूप साबित होता है। कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि चूंकि इस जगह को ‘प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904’ के तहत पहले ही एक संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका था, इसलिए 1935 में धार के शासक के पास इसकी मूल कानूनी स्थिति को बदलने का कोई अधिकार नहीं था।

जैनों के दावे और ब्रिटिश म्यूजियम की मूर्ति

इस फैसले में जैन याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए दावों पर काफी ध्यान दिया गया है। इन याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया था कि कुछ मूर्तियां और मूर्तिकला से जुड़ी विशेषताएं इस जगह को एक जैन मंदिर के रूप में स्थापित करती हैं। विशेष जोर एक ऐसी मूर्ति पर दिया गया, जो इस समय ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है और जिसे कुछ याचिकाकर्ताओं ने जैन देवी ‘अंबिका’ के रूप में पहचाना है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि यह विवादित ढांचा एक जैन मंदिर था।

बेंच ने यह माना कि कोई भी ऐतिहासिक साहित्य, ASI के निष्कर्ष, या वास्तुकला से जुड़ी सामग्री इस निष्कर्ष का समर्थन नहीं करती कि यह जगह पूरी तरह से एक जैन धार्मिक ढांचा थी।

कोर्ट ने यह टिप्पणी की:

“चाहे वह मूर्ति सरस्वती की हो या अंबिका की, इससे इस तर्क को कोई खास मदद नहीं मिलती कि यह विवादित क्षेत्र एक जैन मंदिर था। जैसा कि हमने पहले ही कहा है, हमारे सामने ऐसा कोई भी सबूत पेश नहीं किया गया है- चाहे वह ऐतिहासिक साहित्य के रूप में हो, वास्तुकला की विशेषताओं के रूप में हो, या ASI के सर्वेक्षण के रूप में हो- जो यह बताता हो कि यह विवादित क्षेत्र एक जैन मंदिर था।” (पैरा 209)

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि सरस्वती की पूजा हिंदू और जैन, दोनों ही परंपराओं में विद्या और बुद्धि की देवी के रूप में की जाती है।

बेंच ने मूर्तिकला से जुड़ी कुछ अन्य विशेषताओं का भी जिक्र किया, जैसे कि देवी के हाथों में पकड़ी हुई किताबें, उनके साथ बनी अन्य आकृतियां, और बैठी हुई तपस्वी मुद्राएं।

इस फैसले की सबसे ज्यादा विवादित टिप्पणियों में से एक टिप्पणी में, कोर्ट ने यह कहा कि जैन धर्म और हिंदू धर्म का विकास एक-दूसरे के साथ-साथ हुआ है। कोर्ट ने ‘हिंदू विवाह अधिनियम’ और ‘हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम’ के तहत आने वाले कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि कुछ नागरिक उद्देश्यों के लिए, जैन, बौद्ध और सिख समुदायों को व्यापक हिंदू कानूनी ढांचे के अंतर्गत ही माना जाता है।

इसलिए, कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि जैन धर्म से जुड़ी मूर्तिकला की मौजूदगी से भी इस जगह के मूल ‘हिंदू स्वरूप’ में कोई बदलाव नहीं आता है।

सरस्वती प्रतिमा और उसकी वापसी की संभावना

हाई कोर्ट ने उन अनुरोधों पर भी विचार किया जिनमें सरस्वती प्रतिमा की वापसी की मांग की गई थी। माना जाता है कि यह प्रतिमा इस समय ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है।

बेंच ने इस बात का संज्ञान लिया कि प्रतिमा की वापसी के लिए केंद्र सरकार को पहले ही अभ्यावेदन (representations) सौंपे जा चुके हैं। बेंच ने यह भी टिप्पणी की कि भारत सरकार प्रतिमा को वापस लाने और उसे भोजशाला परिसर में पुनः स्थापित करने के लिए कदम उठाने पर विचार कर सकती है।

कोर्ट ने प्रतिमा से जुड़े उन शिलालेखों का भी जिक्र किया, जिनमें परमार साम्राज्य के एक अधिकारी ‘वररुचि’ का उल्लेख है। वररुचि ने ही वाग्देवी और अंबिका की प्रतिमाएं बनवाई थीं।

हाई कोर्ट ने अयोध्या के कानूनी ढांचे को भोजशाला मामले में कैसे लागू किया?

शायद इस फैसले की सबसे ज्यादा कानूनी अहमियत वाली बात यह है कि इसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या फैसले में प्रतिपादित सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से अपनाया गया है। हाई कोर्ट ने अयोध्या के फैसले को केवल एक ‘प्रेरक नज़ीर’ (persuasive precedent) के तौर पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक-धार्मिक विवादों को सुलझाने के लिए एक ‘बुनियादी कानूनी ढांचे’ के तौर पर देखा।

कोर्ट ने कई ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए:

● प्राचीन धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों का निपटारा ‘उचित संदेह से परे’ (beyond reasonable doubt) के मानक के बजाय, ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (preponderance of probabilities) के नागरिक मानक के आधार पर किया जाना चाहिए;
● अदालतों को पूजा-अर्चना की निरंतरता, धार्मिक उपयोग के तरीकों और ऐतिहासिक मान्यताओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए;
● प्रतिमाओं को नष्ट करने या उन्हें हटा देने से, उनसे जुड़ी मूल धार्मिक निधि (endowment) समाप्त नहीं हो जाती;
● ASI की रिपोर्टों को साक्ष्य के तौर पर काफी महत्व दिया जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया जाता है;
● और किसी भी स्थल के ऐतिहासिक-धार्मिक स्वरूप को निर्धारित करने में पुरातात्विक अवशेषों, शिलालेखों और धार्मिक प्रतीकों का साक्ष्य के तौर पर बहुत अधिक महत्व होता है।

कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि आस्था को हमेशा कठोर धर्मनिरपेक्ष तर्क या दस्तावेज़ी सबूतों के आधार पर परखा नहीं जा सकता। साथ ही, यदि किसी मान्यता की निरंतरता ऐतिहासिक परिस्थितियों से पुष्ट होती है, तो उसे कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए।

कोर्ट के अंतिम निर्देश

अंततः हाई कोर्ट ने:

● विवादित स्थल के धार्मिक स्वरूप को ‘भोजशाला’ (देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर) के रूप में घोषित किया;
● इस स्थल को राजा भोज से जुड़ा एक ‘संस्कृत शिक्षण केंद्र’ के रूप में मान्यता दी;
● वर्ष 2003 में ASI द्वारा की गई उस व्यवस्था को रद्द कर दिया, जिसके तहत इस स्थल पर नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी;
● केंद्र सरकार और ASI को निर्देश दिया कि वे मंदिर और संस्कृत शिक्षण केंद्र के प्रशासन एवं प्रबंधन के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करें;
● यह स्पष्ट किया कि ASI इस संरक्षित स्मारक पर अपना समग्र वैधानिक नियंत्रण (statutory control) बनाए रखेगा;
● और यह टिप्पणी की कि मुस्लिम समुदाय धार जिले में मस्जिद के निर्माण के लिए किसी वैकल्पिक भूमि के आवंटन हेतु आवेदन कर सकता है। बेंच ने आगे कहा:

“हर सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह न केवल पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के प्राचीन स्मारकों और ढांचों (जिनमें मंदिर भी शामिल हैं) का संरक्षण और सुरक्षा सुनिश्चित करे, बल्कि गर्भगृह और आध्यात्मिक महत्व वाले देवी-देवता का भी संरक्षण करे। तीर्थयात्रियों को बुनियादी सुविधाएं देने, ठहरने की जगहों के लिए उचित व्यवस्था करने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और देवी-देवता की पवित्रता व मूल स्वरूप को बनाए रखने के लिए फंड मंजूर करना भी एक संवैधानिक कर्तव्य है। हमने पाया है कि इस जगह पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता, भले ही समय के साथ इसे नियंत्रित किया गया हो, कभी खत्म नहीं हुई है। हम यह निष्कर्ष दर्ज करते हैं कि पेश किए गए ऐतिहासिक साहित्य से यह साबित होता है कि विवादित क्षेत्र का स्वरूप ‘भोजशाला’ था- जो परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत सीखने का एक केंद्र था- और साहित्य व वास्तुशिल्प संबंधी संदर्भ (जिनमें राजा भोज के काल से जुड़े संदर्भ भी शामिल हैं) यह संकेत देते हैं कि धार में देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर मौजूद था।” (पैरा 210)

भोजशाला से कहीं आगे तक यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण होगा 

भोजशाला फैसला, सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के बाद भारत में धार्मिक स्थलों से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक फैसला बनने की संभावना रखता है; ऐसा केवल इसलिए नहीं कि इसने क्या निर्णय दिया, बल्कि इसलिए भी कि यह जिस कानूनी ढांचे को सामान्य बनाता है और उसका विस्तार करता है। यह फैसला विवादित धार्मिक स्थलों पर भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र के विकास में एक महत्वपूर्ण क्षण का प्रतिनिधित्व करता है, जहां अदालतों से अब ज्यादा से ज्यादा यह अपेक्षा की जा रही है कि वे पुरातत्व, आस्था, पूजा की निरंतरता और संवैधानिक कानून की भाषा के माध्यम से सदियों पुराने ऐतिहासिक, धार्मिक और सभ्यतागत विवादों का निपटारा करें।

इस फैसले के मूल में एक ऐसी न्यायिक कार्यप्रणाली है जो भोजशाला के तथ्यों से कहीं आगे तक जाती है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अयोध्या फैसले के मुख्य सिद्धांतों को अपनाया और लागू किया – विशेष रूप से “संभावनाओं की प्रबलता” (preponderance of probabilities), पूजा की निरंतरता, पुरातात्विक व्याख्या और ढांचों या मूर्तियों के नष्ट होने के बावजूद धार्मिक संपत्तियों के बने रहने पर जोर दिया। ऐसा करके, कोर्ट ने प्रभावी रूप से एक ऐसे कानूनी ढांचे को मजबूत और विस्तृत किया है, जिसके माध्यम से धार्मिक स्थलों पर प्रतिस्पर्धी ऐतिहासिक दावों पर मुकदमे लड़े जा सकते हैं और न्यायिक रूप से उनका समाधान किया जा सकता है।

यह फैसला खास कर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पुरातात्विक साक्ष्यों को असाधारण संवैधानिक और साक्ष्य-संबंधी महत्व का दर्जा देता है। कोर्ट ने बार-बार ASI की रिपोर्ट को एक बेहद विश्वसनीय और तकनीकी रूप से प्रामाणिक दस्तावेज माना, जो न केवल वास्तुकला के इतिहास को, बल्कि उस स्थल के धार्मिक स्वरूप और ऐतिहासिक विकास को भी निर्धारित करने में सक्षम है। हालांकि कोर्ट ने औपचारिक रूप से यह स्वीकार किया कि विशेषज्ञ रिपोर्टें निर्णायक नहीं होतीं, लेकिन फैसले की संरचना यह दर्शाती है कि ASI के निष्कर्ष ही बेंच द्वारा अंततः निकाले गए लगभग हर बड़े निष्कर्ष की रीढ़ बने।

पुरातत्व की यह बढ़ती न्यायिक केंद्रीयता भोजशाला से कहीं आगे तक प्रभाव डालने की संभावना रखती है। यह फैसला इस विचार को मजबूत करता है कि खुदाई की रिपोर्टें, शिलालेख, प्रतिमा-विज्ञान, वास्तुशिल्प के टुकड़े और भौतिक अवशेष धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति से जुड़े संवैधानिक निर्णयों को निर्णायक रूप से आकार दे सकते हैं। व्यवहार में, यह एक ऐसी न्यायपालिका का संकेत देता है जो पुरातात्विक व्याख्या के माध्यम से मध्यकालीन इतिहास को पुनर्निर्मित करने और फिर उन पुनर्निर्माणों पर समकालीन कानूनी परिणाम लागू करने के लिए लगातार ज्यादा इच्छुक है।

कोर्ट द्वारा पूजा की निरंतरता के साथ किया गया व्यवहार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बेंच ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि उस स्थल पर हिंदू पूजा “कभी समाप्त नहीं हुई”, भले ही समय के साथ उसे विनियमित या बाधित किया गया हो। यह सूत्र अयोध्या ढांचे के एक महत्वपूर्ण पहलू को दर्शाता है: कि धार्मिक निरंतरता राजनीतिक विजय, ढांचागत परिवर्तन या भौतिक विनाश के बावजूद बनी रह सकती है। इसलिए, यह फैसला धार्मिक विवादों को केवल स्वामित्व और कब्जे के सवालों के रूप में देखने से हटकर, ऐतिहासिक आस्था, भक्ति-संबंधी स्मृति और सभ्यतागत निरंतरता की व्यापक जांच की ओर ले जाने वाले सैद्धांतिक बदलाव को और गहरा करता है।

परिणामस्वरूप, यह फैसला अन्य विवादित धार्मिक स्थलों से जुड़े भविष्य के मुकदमों को प्रभावित कर सकता है, जहां तर्क पूजा करने में रूकावट, ऐतिहासिक विनाश, या वास्तुशिल्प में बदलाव के बावजूद पवित्र पहचान की निरंतरता के दावों के इर्द-गिर्द गढ़े जाते हैं।

साथ ही, यह फैसला गंभीर संवैधानिक, तथ्यात्मक और धर्मनिरपेक्षता से संबंधित चिंताएं भी खड़ी करता है। कोर्ट बार-बार बेहद पक्षपातपूर्ण और विवादित धार्मिक और ऐतिहासिक क्षेत्रों में शामिल हुआ, विशेष रूप से हिंदू धर्म और जैन धर्म के बीच संबंधों पर चर्चा करते समय। यह मानना कि जैन धर्म “हिंदू धर्म की एक शाखा” है- जिसका समर्थन हिंदू विवाह अधिनियम और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे व्यक्तिगत कानून के संदर्भों से किया गया है- संभवतः संवैधानिक विद्वानों, इतिहासकारों और जैन समुदाय के सदस्यों की ओर से भारी आलोचना को आमंत्रित करेगा। आलोचक संभवतः यह तर्क देंगे कि सीमित विधायी उद्देश्यों के लिए किया गया नागरिक वैधानिक वर्गीकरण, अपने आप में किसी स्वतंत्र धार्मिक पहचान या धार्मिक विशिष्टता को निर्धारित नहीं कर सकता।

यह फैसला उन ऐतिहासिक विवादों को सुलझाने में अदालतों की भूमिका के संबंध में भी व्यापक चिंताएं पैदा करता है, जो अक्सर अधूरे साक्ष्यों, परस्पर विरोधी व्याख्याओं और राजनीतिक रूप से प्रेरित बयानों द्वारा गढ़े जाते हैं। ASI जैसी संस्थाओं पर अत्यधिक निर्भरता- जो न तो स्वतंत्र हैं और न ही स्वायत्त- तथा जिस प्रकार के “साहित्य, शिलालेखों और पुरातात्विक पुनर्निर्माण” में ASI ने विषय विशेषज्ञों की विशेषज्ञता के बिना हाथ आजमाया है- और वह भी, सदियों पुरानी किसी संरचना के “धार्मिक स्वरूप” को निर्धारित करने के लिए- वह गंभीर रूप से सवालों के घेरे में है। न्यायालय ने न्यायपालिका को व्यक्तिपरक निर्णय के क्षेत्र में और भी आगे धकेल दिया है- एक ऐसा क्षेत्र जहां कानूनी संस्थाओं को कार्यप्रणाली संबंधी और (विशेषज्ञता के अभाव से जुड़ी) सीमाओं से जूझना पड़ सकता है।

इस फैसले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू, वक्फ सिद्धांत और मस्जिद की स्थिति के साथ इसका बर्ताव है। न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि कोई वैध वक्फ अस्तित्व में नहीं था, क्योंकि किसी वैध ‘वाकिफ’ (संपत्ति समर्पित करने वाले व्यक्ति) द्वारा संपत्ति के समर्पण को दर्शाने वाले साक्ष्य अपर्याप्त थे। न्यायालय ने आगे यह भी संकेत दिया कि किसी पूर्व-विद्यमान हिंदू धार्मिक संरचना के ऊपर निर्मित मस्जिद, वैध वक्फ समर्पण के अभाव में वैधता प्राप्त नहीं कर सकती। यह तर्क और उससे निकला निष्कर्ष, अपने आप में ही समस्याग्रस्त है। इसके अलावा, भविष्य में होने वाले उन मुकदमों पर भी इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, जिनमें ऐसी मस्जिद संरचनाएं शामिल हैं जो उन स्थलों पर खड़ी हैं जिनके बारे में यह दावा किया जाता है कि उनका पूर्व में कोई धार्मिक इतिहास रहा है।

खास बात यह है कि यह फैसला अयोध्या फैसले के निरंतर जारी संवैधानिक असर को भी दिखाता है। शुरुआत में, कई लोगों ने अयोध्या फैसले को एक बहुत ही पेचीदा विवाद का एक अनोखा और असाधारण हल बताया था। लेकिन, भोजशाला जैसे फैसले यह दिखाते हैं कि अयोध्या में विकसित हुए कानूनी सिद्धांत अब एक बड़े और फैलते हुए कानूनी दायरे का हिस्सा बन रहे हैं, जो पूरे भारत में धार्मिक स्थलों से जुड़े मुकदमों को नियंत्रित करता है।

इसलिए, भोजशाला का फैसला धार में चल रहे एक लंबे विवाद के सिर्फ निपटारे से कहीं ज्यादा मायने रखता है। यह एक नए न्यायिक दृष्टिकोण के मजबूत होने का संकेत देता है, जिसमें अदालतें अब संवैधानिक फैसलों के जरिए, अब तक न जांची गई पवित्र जगहों और ‘ऐतिहासिक शिकायतों’ से जुड़े सवालों पर विचार करने के लिए ज्यादा तैयार दिखती हैं। इस तरह का दृष्टिकोण एक आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था के लिए शायद ही फायदेमंद हो, जिसे ऐतिहासिक तथ्यों पर बहुसंख्यकवादी विवादों पर नहीं- जैसा कि फैजाबाद-अयोध्या में हुआ- बल्कि ऐसे पैदा हुए विवादों के सभी पहलुओं के शांत और निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए।

ट्विशा शर्मा केस में नया मोड़! शॉर्ट्स की जेब से मिली चीज ने बढ़ाई जांच की उलझन

भोपाल

मॉडल और फिल्म एक्ट्रेस ट्विशा शर्मा भले ही पंचतत्व में विलीन हो गईं पर अपने पीछे अनेक सवाल छोड़ गई हैं। उनकी डेथ मिस्ट्री अभी सुलझी नहीं है। भोपाल एम्स AIIMS में दिल्ली एम्स की टीम ने उनके शव का दोबारा पोस्टमार्टम किया और नमूने, फोटोग्राफ, वीडियो आदि लिए। फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. सुधीर कुमार गुप्ता की टीम द्वारा किए गए इस दूसरे पोस्टमार्टम से मामले में कुछ खुलासे की उम्मीद है। इधर ट्विशा की मौत की ​हकीकत जल्द सामने के लिए भोपाल पुलिस भी जुटी है। जहां एक ओर आरोपी पति समर्थ सिंह से सख्ती से पूछताछ की जा रही है वहीं अभी तक मिले साक्ष्यों की पड़ताल भी पुलिस कर रही है। इस बीच मौत के समय पहने ट्विशा की शॉर्ट्स की जेब से मिली एक चाबी ने मामले से संबंधित सभी लोगों को उलझा दिया है। यह फॉक्सवैगन कार की चाबी है जबकि ट्विशा को ड्राइविंग आती ही नहीं थी। कार किसकी है, उसके पास चाबी कैसे आई, अब इन सवालों से पुलिस रूबरू है।

ट्विशा शर्मा केस की सीबीआई जांच मंजूर की जा चुकी है पर अभी केंद्रीय एजेंसी ने मामला अपने हाथ में नहीं लिया है। अभी भोपाल पुलिस ही मामले की जांच कर रही है। पुलिस एक एक कर वारदात के सभी सबूतों, घटनाक्रमों की कड़ी जोड़ रही है।

भोपाल पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक ट्विशा का मोबाइल फोन पहले ही जब्त किया जा चुका है। उसके मोबाइल की कॉल डिटेल्स निकलवाई जा रही है। ट्विशा शर्मा के चैट की जांच भी चल रही है।

कभी घर की कार तक नहीं चलाई
पुलिस ने मौत के समय पहने ट्विशा के कपड़े भी जब्त किए थे। अधिकारियों ने बताया कि उसकी शॉर्ट्स की जेब से एक फॉक्सवैगन की चाबी भी मिली थी। इससे पुलिस के साथ ही ट्विशा के ससुरालवाले, मायका पक्ष और अन्य परिचित, रिश्तेदार, दोस्त भी उलझन में पड़ गए। दरअसल ट्विशा शर्मा को ड्राइविंग ही नहीं आती थी। ससुरालवालों के मुताबिक उसने कभी घर की कार तक नहीं चलाई। ऐसे में ट्विशा शर्मा के पास कार की चाबी मिलने पर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

फॉक्सवैगन कार किसकी
ससुराल वाले तो इस मुद्दे की जांच पर खासा जोर दे रहे हैं। सास गिरीबाला सिंह ने मीडिया से बातचीत में साफ कहा है कि यह फॉक्सवैगन कार किसकी है, इसकी चाबी ट्विशा के पास कैसे आई, इन तथ्यों का पता लगाना बहुत जरूरी है। पुलिस भी इस मुद्दे की अहमियत जानती है। ट्विशा के पास कार की चाबी कैसे पहुंची, इसकी जांच की जा रही है।

गंगा दशहरा जल के प्रति कृतज्ञता का पर्व-डॉ. मोहन यादव

गंगा दशहरा जल के प्रति कृतज्ञता का पर्व-डॉ. मोहन यादव

भोपाल

भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में नदियों को मात्र जल स्रोत नहीं, बल्कि देवी के रूप में पूजा जाता है। इनमें गंगा का स्थान सर्वोपरि है। गंगा दशहरा या गंगावतरण ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला प्रमुख त्यौहार है। इस दिन को गंगा दशहरा, गंगा दशमी या दशहरा के नाम से जाना जाता है। यह पर्व गंगा नदी के पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। दरअसल, गंगा दशहरा जल के प्रति कृतज्ञता का पर्व है.

गंगा यानी पवित्र-साफ जल के इसी महत्व को समझते हुए यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने जल संरक्षण को एक राष्ट्रीय जन आंदोलन का रूप दिया है। उन्होंने जल को विकास का प्रमुख पैरामीटर बनाते हुए हर घर जल और जल है तो कल है के संकल्प को साकार किया। उनके नेतृत्व में जल शक्ति मंत्रालय का गठन, जल जीवन मिशन, नमामी गंगे, अमृत सरोवर मिशन और जल शक्ति अभियान जैसी ऐतिहासिक पहल हुईं, जिन्होंने देश की जल सुरक्षा को नई दिशा दी है।

अमृत सरोवर योजना ने जल संरक्षण को नया आयाम दिया। प्रत्येक जिले में 75 जलाशयों के निर्माण या पुनरुद्धार का लक्ष्य रखा गया। अब तक 70 हजार से अधिक अमृत सरोवर तैयार हो चुके हैं। इनसे वर्षा जल संचयन, भूजल रिचार्ज और सिंचाई सुविधा बढ़ी है। यह मिशन आजादी का अमृत महोत्सव का हिस्सा है और सामुदायिक भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। नमामी गंगे परियोजना, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, नदी फ्रंट विकास और जैव विविधता संरक्षण के कार्य भी हो रहे हैं। इसी प्रकार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजनाके तहत प्रति बूंद अधिक फसल का मंत्र दिया गया, जिसमें ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा मिला। कैच द रेन अभियान ने वर्षा जल संचयन को जन आंदोलन बनाया। प्रधानमंत्री ने बार-बार कहा कि पानी बचाना स्वच्छ भारत मिशन की तरह सामूहिक दायित्व है। उनके मार्गदर्शन में लाखों जल संरचनाएं बनीं, चेकडैम, रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार हुआ।

इन प्रयासों का परिणाम साफ दिखता है। भूजल रिचार्ज बढ़ा है, ओवर-एक्सप्लॉइटेड इकाइयों की संख्या घटी है और कई जिलों में जल संकट कम हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी का विजन केवल बुनियादी ढांचा निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि जल संरक्षण को संस्कृति और आदत बनाने का है। वे बच्चों को वाटर वॉरियर्स बनाने और समाज को जिम्मेदार बनाने पर जोर देते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जल संरक्षण भारत की विकास यात्रा का अभिन्न अंग बन गया है। ये प्रयास न केवल वर्तमान की जरूरतें पूरी कर रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल-समृद्ध भारत का आधार तैयार कर रहे हैं। जल संरक्षण अब मात्र नीति नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बन चुका है।

मध्यप्रदेश भी, जिसे प्राकृतिक जल संसाधनों से समृद्ध माना जाता है, जल संरक्षण की दिशा में अनुकरणीय पहल कर रहा है। जल गंगा संवर्धन अभियान एक राज्य स्तरीय जन आंदोलन है। वर्ष 2025 में यह अभियान 19 मार्च से 30 जून तक चलाया गया। चालू वर्ष-2026 में भी यह अभियान पूरे जोर-शोर से चल रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य जल स्रोतों का संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन करना है, ताकि प्रदेश जल संकट से मुक्त हो सके।अभियान के तहत नदियों, तालाबों, कुओं, बावड़ियों, चेकडैम और अन्य जल संरचनाओं का जीर्णोद्धार, गहरीकरण, स्वच्छता और सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। नए जल स्रोतों का निर्माण, वर्षा जल संचयन, भूजल रिचार्ज और पुरानी जल संरचनाओं का पुनरुद्धार अभियान के प्रमुख स्तंभ हैं। प्रदेश में 10 हजार से अधिक चेकडैम और स्टॉपडैम के संधारण, हजारों तालाबों के गहरीकरण, नई जल संरचनाओं का निर्माण और लगभग 2,500 करोड़ रुपये की लागत से बड़े पैमाने पर कार्य किए जा रहे हैं। ग्राम पंचायतों, नगरीय निकायों, जनप्रतिनिधियों, महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई है।

मध्यप्रदेश कृषि प्रधान राज्य है। यहां की अर्थव्यवस्था और किसानों की समृद्धि जल पर निर्भर है। बढ़ती जनसंख्या, अनियमित वर्षा, भूजल स्तर में गिरावट और जल प्रदूषण ने जल संकट को गहरा दिया है। इस अभियान का महत्व इन्हीं चुनौतियों के समाधान में निहित है।

अभियान से वर्षा जल का अधिकतम संचयन होता है, जिससे सिंचाई सुविधा बढ़ती है। भूजल स्तर में वृद्धि से सूखाग्रस्त क्षेत्रों में भी फसल उत्पादन संभव होता है। खेत तालाबों, रिज-टू-वैली मॉडल और जल संरक्षण संरचनाओं से किसानों की आय बढ़ रही है।

मध्यप्रदेश में प्राचीन बावड़ियां, तालाब और जल संरचनाएं सांस्कृतिक धरोहर हैं। उनका जीर्णोद्धार सांस्कृतिक गौरव बढ़ाता है और पर्यटन को बढ़ावा देता है।अभियान जनभागीदारी पर आधारित है। पानी चौपाल जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को कम पानी वाली फसलें, ड्रिप सिंचाई और आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी जा रही है। इससे जल संरक्षण की संस्कृति विकसित हो रही है। महिलाओं और युवाओं की भागीदारी से सामुदायिक जिम्मेदारी बढ़ रही है।

इस अभियान से मध्यप्रदेश जल संरक्षण में देश का अग्रणी राज्य बन रहा है। अमृत सरोवरों के जल क्षेत्र में भारी वृद्धि, नदियों का पुनःप्रवाह और लाखों जल संरचनाओं का निर्माण राष्ट्रीय स्तर पर उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।

यह अभियान केवल सरकारी प्रयास नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प है।यशस्वी प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन में यह जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने में सफल हो रहा है।यह मध्यप्रदेश के भविष्य की नींव है। यह हमें सिखाता है कि जल ही जीवन है और उसकी रक्षा हमारा दायित्व है। यदि हम आज जल स्रोतों का संरक्षण करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां समृद्ध जल संसाधनों का उपयोग कर सकेंगी। प्रदेशवासियों को इस अभियान से जुड़कर जल संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए। स्वच्छ, समृद्ध और जल-सम्पन्न मध्यप्रदेश का सपना तभी साकार होगा जब हर नागरिक इसमें अपना योगदान देगा।

 

महंगाई का नया झटका! MP के कई शहरों में पेट्रोल ₹115 पार, डीजल भी पहुंचा ₹100 के करीब

भोपाल 

 ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के हालातों के चलते देश में एक बार फिर पेट्रोल – डीजल के दामों में बड़ी बढ़ोतरी की गई है। मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां पेट्रोल – डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। तेल कंपनियों ने 25 मई को फिर ईंधन के दाम बढ़ा दिए। प्राप्त जानकारी के अनुसार, पेट्रोल पर 2.61 रुपए और डीजल में 2.71 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है, जिसे आम लोगों के जेब पर बड़ा झटका माना जा रहा है।

पेट्रोलियम कंपनी की ओर से जारी पेट्रोल और डीजल की नई कीमतों पर गौर करें तो एमपी के कई शहरों में पेट्रोल के दाम 115 रुपए के करीब पहुंच गए हैं, जबकि डीजल 100 रुपए के पार निकल गया है। भोपाल में सोमवार सुबह 6 बजे से पेट्रोल की प्रति लीटर दर से कीमत 114.65 रुपए और डीजल 99.74 रुपए प्रति लीटर बिक रहा है।

उज्जैन में सबसे महंगा पेट्रोल
प्रदेश के बड़े शहरों में उज्जैन सबसे महंगा हो गया है, जहां पेट्रोल 115.03 रुपए और डीजल 100.11 रुपए प्रति लीटर पहुंच गया। इंदौर में पेट्रोल 114.54 रुपए और डीजल 99.57 रुपए हो गया है। जबलपुर और ग्वालियर में भी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

11 दिन में चौथी बार बढ़े दाम
मई महीने में यह चौथी बार है जब तेल कंपनियों ने कीमतें बढ़ाई हैं। 15 मई से शुरू हुई बढ़ोतरी के बाद अब तक पेट्रोल-डीजल करीब 8 रुपए प्रति लीटर तक महंगे हो चुके हैं।

इस महीने कब-कब बढ़े रेट
-15 मई को पहली बार 3.14 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 3.11 रूपए प्ति लीटर की बढ़ोतरी हुई है।

-19 मई को पेट्रोल और डीजल के दामों में लगभग 90 पैसे की बढ़ोतरी हुई।

-23 मई को 87 रूपए पेट्रोल पर तो वहीं, 91 पैसे डीजल पर बढ़ाए गए।

-25 मई यानी आज एक बार फिर पेट्रोल पर 2.61 रूपए और डीजल पर 2.71 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है।

बढ़ेगा मालभाड़ा, महंगी होंगी रोजमर्रा की चीजें
डीजल महंगा होने का सीधा असर परिवहन पर पड़ेगा। ट्रक और मालवाहक वाहनों का किराया बढ़ने से सब्जियां, फल, राशन और दूसरे जरूरी सामान महंगे हो सकते हैं। स्कूल बस, ऑटो और सार्वजनिक परिवहन का किराया भी बढ़ने के संकेत हैं। खेती-किसानी पर भी असर पड़ेगा। ट्रैक्टर और पंपिंग सेट चलाने का खर्च बढ़ने से किसानों की लागत बढ़ेगी, जिसका असर अनाज और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतें बनी वजह
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी को इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह बताया जा रहा है। ईरान-अमेरिका तनाव के बाद क्रूड ऑयल 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। तेल कंपनियों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण दाम बढ़ाना जरूरी हो गया था।

कमलनाथ का सरकार पर निशाना
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सोशल मीडिया पर सरकार को घेरते हुए कहा कि सरकार महंगाई रोकने के बजाय पूरा बोझ जनता पर डाल रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब कच्चे तेल के दाम कम थे तब जनता को राहत नहीं दी गई और अब लगातार कीमतें बढ़ाई जा रही हैं।

भोजशाला इतिहास में पहली बार! मुख्यमंत्री करेंगे मां वाग्देवी के दर्शन, थोड़ी देर में रोड शो

धार 
भोजशाला इन दिनों पूरी तरह भगवामय नजर आ रही है। मां सरस्वती मंदिर के रूप में मान्यता मिलने के बाद यहां लगातार धार्मिक आयोजन हो रहे हैं और देशभर से श्रद्धालुओं का आगमन बढ़ गया है। सोमवार को इस ऐतिहासिक स्थल पर एक नया अध्याय जुडऩे जा रहा है, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं भोजशाला पहुंचकर गर्भगृह में विराजित मां वाग्देवी के दर्शन और पूजन करेंगे।

इतिहास में पहली बार
इतिहास में यह पहला (Historic Day) अवसर माना जा रहा है, जब मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए कोई राजनीतिक हस्ती भोजशाला में विधिवत दर्शन-पूजन करने पहुंचेगी। इसे लेकर हिंदू समाज और स्थानीय नागरिकों में खासा उत्साह दिखाई दे रहा है। 

वसंत पंचमी की तर्ज पर सजी भोजशाला
धारभोजशाला परिसर को बसंत पंचमी की तर्ज पर सजाया गया है। परिसर और आसपास के क्षेत्र में भगवा ध्वज, पताकाएं और स्वागत बैनर लगाए गए हैं, जिससे पूरा वातावरण धार्मिक आस्था और उत्सव की भावना से सराबोर हो उठा है। अटल से मोदी तक कई दिग्गज कर चुके हैं दर्शन भोजशाला लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र रही है।

यहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिघल, प्रवीण तोगडिय़ा, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और शिवराज सिंह चौहान जैसे कई बड़े नेता और हिंदू संगठनों से जुड़े चेहरे दर्शन कर चुके हैं।

पीएम तक पहुंच चुके हैं भोजशाला
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भोजशाला पहुंच चुके हैं। अब बतौर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का दौरा राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संभावना जताई जा रही है कि मुख्यमंत्री इस अवसर पर ‘भोजसरस्वती लोक’ जैसी बड़ी घोषणा भी कर सकते हैं।

900 मीटर तक जनता के बीच पैदल चलेंगे मुख्यमंत्री
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मुख्यमंत्री सोमवार सुबह करीब 10 बजे हेलीकॉप्टर से धार पहुंचेंगे। डीआरपी लाइन हेलीपेड से वाहन द्वारा राजवाड़ा पहुंचने के बाद वहां से भोजशाला तक भव्य रोड शो निकलेगा। करीब 900 मीटर लंबा यह मार्ग पूरी तरह स्वागत द्वारों, बैनरों और धार्मिक सजावट से सुसज्जित किया गया है। रोड शो के दौरान बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता, साधु-संत और स्थानीय नागरिक मौजूद रहेंगे।

भोजशाला पहुंचने पर मुख्यमंत्री पुलिस चौकी के सामने मुख्य प्रवेश द्वार से पैदल गर्भगृह तक जाएंगे और मां वाग्देवी का पूजन-अर्चन करेंगे। मुख्यमंत्री का धार प्रवास दो घंटे से अधिक समय तक रहने की संभावना है।

धारेश्वर और मां गढ़ कालिका के भी करेंगे दर्शन
मुख्यमंत्री अपने धार दौरे के दौरान धारेश्वर मंदिर और मां गढ़ कालिका मंदिर में भी दर्शन-पूजन करेंगे। देवीजी मंदिर क्षेत्र में जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत विशेष श्रमदान कार्यक्रम रखा गया है। मुख्यमंत्री घाट की साफ-सफाई में भी हिस्सा लेंगे और जल संरक्षण का संदेश देंगे।

गंगा दशहरा आयोजन में हितग्राहियों को देंगे सौगात
मुख्यमंत्री का यह दौरा शासकीय कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया जा रहा है, जिसे ‘गंगा दशहरा कार्यक्रम’ नाम दिया गया है। मुख्य आयोजन मोती बाग चौक पर होगा, जहां विशाल वाटरप्रूफ डोम और भव्य मंच तैयार किया गया है। सभा के दौरान मुख्यमंत्री विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के हितग्राहियों को लाभ वितरित करेंगे। साथ ही विकास कार्यों और नई परियोजनाओं की घोषणाएं भी संभव मानी जा रही हैं। प्रशासनिक स्तर पर कार्यक्रम को लेकर व्यापक तैयारियां की गई हैं।

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