दिल्ली हाईकोर्ट से पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को झटका, बैंक फ्रॉड मामले में अपील खारिज

दतिया के पूर्व कांग्रेस विधायक की 3 साल की सजा बरकरार, सजा के बाद चली गई थी विधायकी

दिल्ली हाईकोर्ट ने दतिया के पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की बैंक फ्रॉड मामले में दायर अपील खारिज कर दी है। हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ ही निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन साल की सजा बरकरार रहेगी।

राजेंद्र भारती को बैंक फ्रॉड मामले में दोषी ठहराते हुए तीन साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी। जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों के तहत दो साल या उससे अधिक की सजा होने के कारण उनकी विधानसभा सदस्यता भी समाप्त हो गई थी।

अब दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद उनकी सजा पर राहत नहीं मिली है। इस फैसले को पूर्व विधायक के लिए बड़ा कानूनी झटका माना जा रहा है। मामले में आगे की कानूनी राहत के लिए उनके पास सुप्रीम कोर्ट का विकल्प उपलब्ध है।

CM योगी का दावा: ‘बस्ती में कब्रिस्तान के नाम पर हो रहे कब्जे को कार्यकर्ताओं ने हटवाया’

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बस्ती की एक पुरानी घटना का किया जिक्र, कहा— सपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष की शिकायत पर कराई गई थी कार्रवाई।

बस्ती: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बस्ती की एक पुरानी घटना का जिक्र करते हुए दावा किया कि कब्रिस्तान के नाम पर हो रहे कथित अवैध कब्जे को उनकी पहल पर हटवाया गया था।

मुख्यमंत्री ने कहा कि उस समय समाजवादी पार्टी के तत्कालीन जिलाध्यक्ष उनके पास आए थे। उनके घर के पास कब्रिस्तान के नाम पर जबरदस्ती कब्जा किया जा रहा था। उन्होंने कहा, “वे मेरे पास आए और कहने लगे कि लखनऊ में बैठे लोगों को केवल कब्रिस्तान दिखाई देता है, हम जैसे लोग नहीं दिखाई देते।”

योगी आदित्यनाथ ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद उन्होंने तत्काल कार्यकर्ताओं को मौके पर भेजा और कब्रिस्तान के नाम पर हो रहे कथित कब्जे को हटवाया।

मुख्यमंत्री ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी प्राथमिकता हमेशा आम नागरिकों के हितों की रक्षा करना और अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करना रही है।

यूसुफ पठान के कदम से बढ़ीं अटकलें, शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद ममता बनर्जी को लग सकता है डबल झटका

नई दिल्ली

पूर्व भारतीय क्रिकेटर और लोकसभा सांसद यूसुफ पठान ने हाल ही में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की है। इस मीटिंग के बाद से ही अटकलों का दौर शुरू हो गया है। हालांकि, उन्होंने या भारतीय जनता पार्टी ने इसे लेकर आधिकारिक रूप से बैठक के एजेंडा को लेकर कुछ नहीं कहा है। गुरुवार को उन्होंने नाबन्न में सीएम से मुलाकात की थी।

बहरामपुर से सांसद यूसुफ पठान और बीरभूम से सांसद शताब्दी रॉय ने भी मुख्यमंत्री से हाल के समय में अलग-अलग मुलाकात की है। हालांकि, अब तक यह साफ नहीं हो सका है कि किस मुद्दे को लेकर मुलाकात हुई थी। ये घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहे हैं, जब हाल ही में भाजपा ने राज्यसभा उपचुनाव की तीन सीटों के लिए उम्मीदवारों का ऐलान किया है।

यूसुफ पठान भी हो चुके हैं बागी
जून में तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों ने अलग होकर NCPI यानी नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर दिया था। खास बात है कि इस लिस्ट में पठान का नाम भी शामिल था। इनमें सायोनी घोष, काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंदोपाध्याय जैसे बड़े नाम भी थे। इसके अलावा टीएमसी के 60 से ज्यादा विधायक भी बागी होकर अलग गुट बना रहे हैं।

सुपरस्टार प्रसनजीत चटर्जी की भी मुलाकात
बंगाली फिल्मों के सुपरस्टार प्रसनजीत चटर्जी भी गुरुवार को सीएम अधिकारी से मिलने पहुंचे थे। दोनों के बीच करीब 2 घंटे तक मुलाकात हुई। उनकी इस मुलाकात को लेकर हालांकि नई राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गईं, क्योंकि यह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हाल में राज्य के दौरे के दौरान अभिनेता के आवास पर जाने के कुछ दिनों बाद हुई।

उन्होंने कहा, ‘राजनीति पर कोई चर्चा नहीं हुई।’ उन्होंने कहा, ‘हमने साथ में कॉफी पी और कुछ देर बातचीत की। राजनीति पर कोई चर्चा नहीं हुई। बाहर कई तरह की अटकलें हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर सही नहीं हैं।’

अलग बैठने मांगी थी जगह
बीते महीने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंपे पत्र में 20 सदस्यों ने अलग बैठने की अनुमति देने का अनुरोध किया था। तब दस्तीदार ने कहा था कि अध्यक्ष से मिले इस समूह में 20 सदस्य है और उनकी संख्या, सदन में पार्टी के सदस्यों की कुल संख्या के दो-तिहाई से अधिक है। साथ ही एनसीपीआई में भी विलय की बात कही थी।

इन सांसदों ने की बगावत
लिस्ट में काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हलदार, डॉ शर्मिला सरकार, प्रसून बंद्योपाध्याय, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार माल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सायोनी घोष,खलीलुर रहमान, अबू ताहेर खान, यूसुफ पठान, मिताली बाग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी, जून मलिया और पार्थ भौमिक भी हैं।

राज्यसभा में BJP का बड़ा दांव! उपचुनाव के बाद वही रहेंगे तीनों सांसद, बदलेगी सिर्फ पार्टी

 नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने खाली हुई राज्यसभा की तीन सीटों पर उपचुनाव की घोषणा कर दी है. इस हादसे की सबसे दिलचस्प बात ये है कि उपचुनाव के बाद भी संसद के उच्च सदन में भेजने वाले चेहरे वही रहने की उम्मीद है, बस उनकी पार्टी का रंग बदल चुका है। 

BJP इन तीनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है. दूसरी तरफ, आपसी गुटबाजी और बिखराव से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस के सामने राज्यसभा में अपनी ताकत और कम होने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। जून में टीएमसी के तीन पूर्व राज्यसभा सांसदों- सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने अपनी ही पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. विधानसभा चुनाव में टीएमसी की करारी हार के बाद इन नेताओं ने नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। 

बीजेपी में शामिल होते ही उम्मीदवार घोषित
सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक अब ये बीजेपी का दामन थाम चुके हैं. उन्होंने आज ही बीजेपी जॉइन की और पार्टी ने आज ही उन्हें ही अपना उम्मीदवार बना दिया है। 

संसदीय नियमों के मुताबिक, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाइक का कार्यकाल सितंबर 2029 तक था, जबकि सुष्मिता देव का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक चलना था. अब इन खाली सीटों पर 24 जुलाई को उपचुनाव होने जा रहे हैं और यही तीनों नेता एक बार फिर उम्मीदवार होंगे. सिर्फ उनकी पार्टी नई होगी। 

विधानसभा का गणित: बीजेपी का पलड़ा भारी
बंगाल विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों को देखें तो नंबर गेम पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ है. 294 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास अपने 208 विधायक हैं. राज्यसभा चुनाव के सिस्टम के मुताबिक, तीन सीटों वाले इस उपचुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए लगभग 70 वोटों की जरूरत होगी।

बीजेपी के पास विधायकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वो बिना किसी बाहरी समर्थन के अपने तीनों उम्मीदवारों को आसानी से 70, 69 और 69 वोट दिला सकती है. इस गणित के कारण बीजेपी की तीनों सीटों पर जीत पूरी तरह पक्की मानी जा रही है। 

दो गुटों में बंटी टीएमसी, चुनौती बड़ी
बीजेपी के इस बड़े ‘खेले’ के सामने टीएमसी बेबस नजर आ रही है. किसी भी विरोधी उम्मीदवार को जीतने के लिए कम से कम 70 वोटों की जरूरत होगी. वैसे तो टीएमसी के टिकट पर जीते विधायकों की कुल संख्या अभी भी करीब 80 है. लेकिन पार्टी के भीतर मचे घमासान ने इसे कमजोर कर दिया है. टीएमसी के विधायक अब दो धड़ों में बंट चुके हैं- एक खेमा ममता बनर्जी के साथ है, तो दूसरा बागी गुट विधानसभा में विपक्ष के नेता रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में काम कर रहा है। 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर टीएमसी एकजुट होती, तो वह कम से कम एक सीट के लिए मुकाबला कड़ा कर सकती थी. लेकिन अंदरूनी लड़ाई इतनी बढ़ चुकी है कि दोनों गुटों के बीच किसी आम सहमति की गुंजाइश खत्म हो गई है. बागी गुट का दावा है कि टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने पहले ही रीताब्रत बनर्जी का समर्थन किया था और अब उनके साथ करीब 65 विधायक हैं। 

‘विश्वासघात’ बनाम ‘नेतृत्व का संकट’
ममता बनर्जी का खेमा इस नुकसान को कम आंकने की कोशिश कर रहा है. उनका कहना है कि ये उन नेताओं का ‘विश्वासघात’ है जिन्होंने संकट के समय पार्टी को छोड़ दिया. टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘ये सीटें टीएमसी की थीं, जो पिछले चुनाव में पार्टी की ताकत के दम पर जीती गई थीं. कुछ लोगों ने मुश्किल समय में पार्टी छोड़ दी, बंगाल की जनता सब देख रही है। 

दूसरी तरफ, बागी गुट के नेताओं का कहना है कि ये कोई आम इस्तीफा नहीं है, बल्कि ये पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर अविश्वास का नतीजा है. उन्होंने कहा, ‘नेतृत्व ने संगठन के भीतर से मिल रही चेतावनियों को नजरअंदाज किया, जिसका नतीजा विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. असली मुद्दा राज्यसभा सीट का नहीं, बल्कि ये है कि चुने हुए प्रतिनिधियों का अब मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा क्यों नहीं रहा। 

फिलहाल, दोनों गुटों के बीच टीएमसी के नाम, सिंबल और संगठन पर कब्जे की लड़ाई चुनाव आयोग के सामने लंबित है. अगर 24 जुलाई को होने वाले उपचुनाव में बीजेपी इन तीनों सीटों पर जीत हासिल करती है, तो राज्यसभा में उसकी ताकत बढ़ेगी और टीएमसी का कद घटेगा। 

TMC में बढ़ा सियासी घमासान! नेता प्रतिपक्ष पद, पार्टी दफ्तर के बाद अब बैंक खाते पर भी विवाद

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी का सियासी किला पूरी तरह से ढह गया है. विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद से ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन में सबसे बड़े मुश्किल दौर से गुजर रही हैं. ममता के पैरों के नीचे से पूरी राजनीतिक जमीन खिसक चुकी है. विधायक और सांसदों के बाद एक-एक कर सारी चीजें ममता के हाथों से निकलती जा रही हैं। 

साल 1998 में जिस टीएमस की स्थापना ममता बनर्जी ने खुद की थी, आज पूरी तरह उनके नियंत्रण से बाहर हो चुकी है. दो महीने में टीएमसी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई है. टीएमसी पर नियंत्रण, वफादार नेता और यहां तक कि पार्टी का बैंक खाता भी ममता बनर्जी के हाथों से निकलता दिख रहा है। 

बंगाल की सियासत में टीएमसी की टूट महज महज़ एक राजनीतिक टूट नहीं, बल्कि पूरी पार्टी पर कब्जे की क्रोनोलॉजी के रूप में देखा जा रहा है. बंगाल चुनाव के बाद से एक-एक करके सब कुछ छिन गया है और टीएमसी का कन्ट्रोल भी ममता के हाथ से निकल गया हैं। 

पहले ममता से  ‘नेता प्रतिपक्ष’ का पद छिना
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भले ही टीएमसी को करारी हार के बाद सत्ता से बाहर और विपक्ष में बैठना पड़ा था. टीएमसी के 80 विधायक के के सहारे ममता बनर्जी ने शोभन देव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित करने के लिए स्पीकर को पत्र भेजा था, लेकिन विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने सारे गेम को बिगाड़ दिया। 

टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह ने आरोप लगाया कि इस पत्र पर विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं और यह सब अभिषेक बनर्जी के इशारे पर हुआ. ममता बनर्जी ने तुरंत ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह को पार्टी से निष्कासित कर दिया. इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी टीएमसी के 58 से अधिक विधायकों को अपने मिला लिया। 

टीएमसी बागी गुट ने 58 विधायकों के समर्थन का पत्र विधानसभा स्पीकर रथेंद्र बोस को सौंपा, जिसे स्पीकर ने मंजूर कर लिया. नतीजा यह हुआ कि ममता बनर्जी की मर्जी के खिलाफ ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में नए नेता प्रतिपक्ष बन गए और उन्हें एलओपी का कमरा अलॉट कर दिया गया. इस तरह ममता बनर्जी के हाथों से नेता प्रतिपक्ष का पद छिन गिया। 

MLA-MPs भी ममता के हाथ से निकले
टीएमसी के 80 में से करीब 64 विधायक फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी के साथ हैं. इसके अलावा टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद ममता बनर्जी का साथ छोड़कर एनसीपीआई में विलय कर लिया है. बंगाल की सियासत में ‘तृणमूल कांग्रेस’ तीन गुटों में बंट गई. एक तरफ ऋतब्रत बनर्जी का बागी गुट है जिसके पास दो-तिहाई से ज्यादा 64 विधायक हैं और जो खुद को ‘असली टीएमसी’ कह रहा है तो ममता बनर्जी के साथ करीब  16 विधायको हैं। 

वहीं, काकोली घोष के अगुवाई में टीएमसी सांसदों ने बगावत किया तो ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका था. सांसदों के बगावत से ममता की सियासत दिल्ली में भी कमजोर पड़ गई है. 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी हो चुके हैं और सिर्फ 8 सांसद ममता के साथ है. इसके अलावा 13 राज्यसभा सांसदों में से 3 सांसदों ने पार्टी और अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। 

पार्टी दफ्तर और अध्यक्ष पद से ममता बेदखल
टीएमसी में केवल विधायक और सांसदों के स्तर पर ही बगावत नहीं हुई, बल्कि संगठन पर बागी गुट ने पूरी तरह कब्जा कर लिया. कोलकाता में बागी नेताओं, पूर्व पार्षदों और जिला अध्यक्षों की एक बड़ी बैठक में ममता बनर्जी को पद से हटा दिया गया. टीएमसी के 28 साल के इतिहास में पहली बार हुआ कि ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. बागी गुट ने अरूप रॉय को टीएमसी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। 

ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी के पद से सस्पेंड कर दिया गया और उनकी जगह संदीपन शाह और जावेद खान जैसे नेताओं को कमान सौंप दी गई. नए संगठन के दफ्तरों से ममता बनर्जी की तस्वीरें हटा दी गईं. हालांकि, बागी गुट सीधे ममता पर हमला करने से बच रहा है और उन्हें ‘मुख्य सलाहकार’ का पद ऑफर कर रहा है, लेकिन सक्रिय नेतृत्व से उन्हें पूरी तरह बेदखल कर दिया गया है. इतना ही नहीं टीएमसी के दफ्तर पर बागी गुटों का पूरी तरह से कब्जा हो गया है। 

टीएमसी का बैंक खात हुआ फ्रीज 
पार्टी और पद छिनने के बाद ममता बनर्जी गुट को सबसे बड़ा झटका आर्थिक मोर्चे पर लगा. बागी गुट ने टीएमसी के आधिकारिक बैंक खातों में अवैध फंडिंग और पैसों की हेराफेरी की शिकायत केंद्रीय एजेंसियों से कर दी. इसके चलते  प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और बिधाननगर पुलिस की कार्रवाई के बाद तृणमूल कांग्रेस के तीन मुख्य बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया, जिनमें लगभग ₹440 करोड़ जमा थे। 

आरोप मनी लॉन्ड्रिंग का लगया है.जांच में सामने आया कि चुनावों के दौरान चार्टर्ड फ्लाइट्स और एविएशन कंपनियों को ₹160 करोड़ से ज्यादा ट्रांसफर किए गए थे. खाता फ्रीज के कारण ममता बनर्जी के पास पार्टी चलाने और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए संसाधन जुटाना मुश्किल हो सकता है. टीएमसी के के् दोनों गुट अब इन खातों और पैसों पर अपना मालिकाना हक जता रहे हैं. इस तरह ममता बनर्जी के हाथों से टीएमसी का खजाना भी निकलता दिख रहा है। 

 

महाराष्ट्र में सियासी हलचल तेज! शिंदे के दफ्तर पहुंचे शरद पवार, NCP विधायकों संग बैठक से NDA में शामिल होने की अटकलें

 मुंबई

महाराष्ट्र की राजनीति में फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के प्रमुख शरद पवार और उनकी पार्टी के विधायकों के बीच एक बैठक हुई। इस बैठक ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। यह बैठक किसी विपक्षी नेता के दफ्तर में नहीं, बल्कि राज्य के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के आधिकारिक चेंबर के भीतर हुई। महाविकास अघाड़ी (MVA) के मुख्य स्तंभ शरद पवार को सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के प्रमुख नेता के केबिन में देख राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। हालांकि बाद में दोनों पक्षों ने इसे महज एक संयोग और शिष्टाचार भेंट बताया।

आपको बता दें कि शरद पवार महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद को सुलझाने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक में भाग लेने के लिए विधान भवन परिसर पहुंचे थे।

क्यों चुना गया उपमुख्यमंत्री शिंदे का दफ्तर?
विपक्ष के दिग्गज नेता का सत्ता पक्ष के चेंबर में बैठक करना ही इस पूरे विवाद और चर्चा का केंद्र बना। इस पर सफाई देते हुए एनसीपी (SP) के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल ने कहा कि इस जगह का चुनाव विशुद्ध रूप से व्यावहारिक कारणों से किया गया था और इसका कोई राजनीतिक अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए।

जयंत पाटिल ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, “पार्टी के विधायक विधान भवन परिसर से जाने से पहले शरद पवार साहब से मिलना चाहते थे। पवार साहब की उम्र को देखते हुए उस कमरे तक वापस पैदल जाना उनके लिए काफी कठिन होता जहां विपक्षी दलों के अधिकांश विधायक बैठते हैं। चूंकि उपमुख्यमंत्री शिंदे का केबिन निकास द्वार के बिल्कुल पास स्थित है, इसलिए हमने सोचा कि पवार साहब के लिए लंबी दूरी तक पैदल चलने से बचने के लिए यह केबिन सबसे सुविधाजनक रहेगा।”

पाटिल ने यह भी साफ किया कि जब शरद पवार वहां पहुंचे तब एकनाथ शिंदे अपने दफ्तर में मौजूद नहीं थे। पाटिल ने कहा, “मैंने ही पवार साहब को हमारे विधायकों से मिलने के लिए वहां बैठने का सुझाव दिया था। जब शिंदे को पवार साहब की मौजूदगी का पता चला तो वे भी वहां आए और सम्मानपूर्वक 10 मिनट तक उनसे मुलाकात की।”

संजय राउत ने कहा- गद्दार नेताओं को इज्जत दे रहे…

NCP फाउंडर शरद पवार मीटिंग के लिए विधान भवन गए थे. उस समय उन्होंने डिप्टी चीफ मिनिस्टर एकनाथ शिंदे के ऑफिस में अपनी पार्टी की मीटिंग की थी. एकनाथ शिंदे भी कैबिनेट मीटिंग छोड़कर शरद पवार के स्वागत के लिए कैबिन में आ गए थे. अब इस बारे में बोलते हुए ठाकरे ग्रुप के MP संजय राउत ने कड़ी नाराजगी जताई. संजय राउत ने कहा, शरद पवार गद्दार नेताओं को इज्जत दे रहे हैं। 

संजय राउत ने कहा कि शरद पवार एक बड़े नेता हैं. लेकिन एकनाथ शिंदे, जिन्होंने महाराष्ट्र को करप्शन और धोखे के कीड़े से इंफेक्टेड कर दिया है, उनके कैबिन में मीटिंग करना ठीक नहीं है. क्या पूरा विधान भवन खाली नहीं था? विधान भवन एरिया के सामने एक राष्ट्रवादी भवन और एक शिवसेना भवन है. इससे राष्ट्रवादी शरद चंद्र पवार पार्टी की क्रेडिबिलिटी कम होती है। 

संजय राउत ने कहा, अगर हम अजित पवार के हॉल में जाकर मीटिंग करते, तो इसका मतलब होता कि हम MVA के खिलाफ गए. इसलिए, MVA के घटक दलों को नियमों का पालन करना चाहिए। 

शिंदे के केबिन में हुई बैठक से क्यों मची हलचल?

    महाराष्ट्र विधान भवन में शरद पवार महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद पर गठित उच्चस्तरीय समिति की बैठक में शामिल होने पहुंचे थे. समिति की बैठक खत्म होने के बाद वह उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के कार्यालय पहुंचे. यहीं एनसीपी (एसपी) के विधायक भी उनसे मिलने पहुंचे और बैठक हुई. इसी घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों की अटकलों को जन्म दे दिया. इसके बाद एकनाथ शिंदे ने शरद पवार का शॉल और गुलदस्ता देकर स्वागत किया. हालांकि दोनों नेताओं के बीच क्या बातचीत हुई, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की गई। 

    एनसीपी (एसपी) नेताओं ने बाद में साफ किया कि पहले पार्टी विधायकों की बैठक हुई और उसके बाद शिंदे वहां पहुंचे. उनका कहना था कि बैठक के पीछे कोई राजनीतिक मकसद नहीं था. जयंत पाटिल ने बताया कि शरद पवार को विधानसभा परिसर के भीतर लंबी दूरी तक चलने में दिक्कत होती है. इसलिए विधायकों से मिलने के लिए शिंदे का केबिन सबसे सुविधाजनक स्थान था। 
    उन्होंने कहा, ‘पवार साहेब के लिए विपक्ष के विधायकों के कमरे तक वापस पैदल जाना मुश्किल होता. इसलिए हमने सोचा कि निकास द्वार के पास स्थित एकनाथ शिंदे का केबिन सुविधाजनक रहेगा, जिससे उन्हें ज्यादा चलना नहीं पड़े। 

    जयंत पाटिल ने आगे स्पष्ट किया, ‘जब पवार साहेब वहां पहुंचे, तब एकनाथ शिंदे अपने कार्यालय में मौजूद नहीं थे. मैंने पवार साहेब से कहा कि वे यहीं बैठकर हमारे विधायकों से मुलाकात कर लें. बाद में जब शिंदे को पता चला कि पवार साहेब आए हैं, तो वह करीब दस मिनट के लिए उनसे मिलने पहुंचे.’ बैठक की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी कई तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गईं। 

शिंदे खेमे ने बताया शिष्टाचार मुलाकात
    एकनाथ शिंदे खेमे ने भी किसी राजनीतिक संदेश से इनकार किया. महाराष्ट्र सरकार में मंत्री उदय सामंत ने कहा कि वरिष्ठ नेताओं का सम्मान करना राज्य की राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है. उन्होंने कहा, ‘शरद पवार देश के वरिष्ठ नेता हैं. यदि वे हमारे नेता एकनाथ शिंदे के कार्यालय आते हैं तो उनका सम्मान करना और स्वागत करना महाराष्ट्र की राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है. इसमें कुछ भी गलत नहीं है। 
    उपमुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से भी इस मुलाकात को महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद समिति की बैठक के बाद हुई ‘शिष्टाचार मुलाकात’ बताया गया। 

एनडीए में जाने की अटकलों पर एनसीपी (SP) का जवाब
बैठक के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की होने लगी कि क्या शरद पवार किसी नए राजनीतिक समीकरण की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि एनसीपी (एसपी) ने इन सभी अटकलों को पूरी तरह खारिज कर दिया. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत शिंदे ने कहा, ‘शरद पवार साहेब महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद पर बनी समिति की बैठक में शामिल होने आए थे. इसके बाद हमने अपने विधायकों, सांसदों और नगरसेवकों के साथ बैठक की. विधानसभा सत्र के दौरान पवार साहेब यहां मौजूद हैं, इसलिए उन्होंने सभी जनप्रतिनिधियों से मुलाकात की. एनडीए में शामिल होने या किसी अन्य पार्टी में विलय की जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वे पूरी तरह गलत हैं। 

उन्होंने कहा कि इस बैठक का किसी राजनीतिक बदलाव से कोई लेना-देना नहीं है और पार्टी महा विकास अघाड़ी का हिस्सा बनी हुई है। 

शिंदे गुट की क्या थी प्रतिक्रिया
इस मुलाकात के बाद उपमुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में इसे केवल एक शिष्टाचार भेंट बताया गया। समिति की बैठक खत्म होने के बाद जब शरद पवार वहां पहुंचे तो एकनाथ शिंदे ने शॉल और बुके देकर वरिष्ठ नेता का स्वागत किया। महाराष्ट्र के मंत्री उदय सामंत ने कहा, “शरद पवार देश के बेहद वरिष्ठ नेता हैं। यदि वे हमारे नेता एकनाथ शिंदे के कार्यालय में आते हैं तो उनका सम्मान और स्वागत करना महाराष्ट्र की समृद्ध राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है। इसमें कुछ भी गलत या असामान्य नहीं है।”

एनडीए में शामिल होने की अटकलें खारिज
इस बैठक की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह कयास लगाए जाने लगे कि क्या विपक्षी दल सत्तारूढ़ गठबंधन के साथ किसी नए राजनीतिक समीकरण या समझौते की संभावना तलाश रहा है। शरद पवार की एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत शिंदे ने इन तमाम अफवाहों और दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने किसी भी तरह से एनडीए (NDA) में शामिल होने या किसी अन्य दल में विलय की खबरों को पूरी तरह से झूठ बताया। उन्होंने स्पष्ट कहा, “पवार साहब यहां विधानसभा सत्र के दौरान आए थे, इसलिए उन्होंने हमारे विधायकों, सांसदों और पार्षदों के साथ बातचीत की। एनडीए में जाने या पार्टी विलय की अटकलें पूरी तरह से निराधार और असत्य हैं।”

TMC में बड़ा सियासी मोड़! पार्टी गई, लेकिन खजाने का कंट्रोल फिर ममता बनर्जी के हाथ

कोलकाता
कलकत्ता हाई कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस के तीन बैंक खातों से सीमित लेनदेन का आदेश दिया है. साथ ही इन लेनदेनों की निगरानी के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त किया गया है. खास बात यह है कि बैंक खातों में लेन-देन का ये अधिकार तृणमूल कांग्रेस के ममता गुट को मिला है. TMC पर कब्जे की लड़ाई लड़ रही ममता बनर्जी के लिए ये बड़ी जीत मानी जा रही है. कोर्ट के इस फैसले से पूर्व सीएम ममता बनर्जी को टीएमसी के खाते में मौजूद करोड़ों रुपयों को अदालत की निगरानी में खर्च करने का अधिकार मिल जाएगा। 

कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुब्रता तालुकदार को विशेष अधिकारी नियुक्त किया है. जस्टिस सुब्रता तालुकदार कोर्ट के आदेशानुसार केवल तृणमूल कांग्रेस के दो पदाधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित चेक के आधार पर ही खर्च को अधिकृत करेंगे। 

गुरुवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा कि यह अंतरिम उपाय 30 सितंबर तक प्रभावी रहेगा।

कलकत्ता हाई कोर्ट के अनुसार टीएमसी पार्टी को चलाने में होने वाले खर्चे को पूरा करने के लिए इस अकाउंट से पैसे की निकासी खर्च कर सकेगी. हाई कोर्ट के अनुसार विशेष अधिकारी किसी और तरह के खर्च की इजाजत नहीं देंगे। 

TMC के बैंक अकाउंट्स में सीमित लेन-देन की इजाजत देते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि अकाउंट्स फ्रीज़ करने का आदेश देने के लिए पुलिस ने जो सबूत दिखाए अदालत उससे संतुष्ट नहीं था। 

हाई कोर्ट ने कहा कि इस अंतरिम चरण में उसे ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जो FIR दर्ज होने के तुरंत बाद अकाउंट्स को फ्रीज़ करने के पुलिस के फ़ैसले को सही ठहरा सके। 

बेंच ने कहा, “FIR 18 जून को दर्ज की गई थी और 19 जून को जल्दबाज़ी में अकाउंट्स फ्रीज़ कर दिए गए। इस चरण में, कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि इतने अचानक उठाए गए कदमों का आधार क्या था। 

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस अंतरिम व्यवस्था का मतलब किसी गुट को “असली” तृणमूल कांग्रेस के तौर पर मान्यता देना नहीं होगा; यह मामला अभी भी चुनाव आयोग के पास लंबित है। 

 एक रिपोर्ट के अनुसार TMC की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि डेबिट फ्रीज ने एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के कामकाज को लगभग ठप कर दिया और उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया। 

उन्होंने कहा कि शिकायत अस्पष्ट थी, उसमें खातों को अपराध से हुई कमाई से जोड़ने वाले कोई ठोस आरोप नहीं थे, और उन्होंने बताया कि पार्टी का सारा फंड चुनाव आयोग के नियमों और इनकम टैक्स एक्ट के तहत रेगुलेट होता है। 

चुनाव हारने के बाद ममता के हाथ से पार्टी गई
बता दें कि 4 मई को चुनाव नतीजे आने के बाद ममता बनर्जी की टीएमसी में टूट हुई है. पार्टी के 20 सांसदों ने TMC से अलग होकर NCPI में अपना विलय कर लिया है. कोलकाता में TMC के 60 से ज्यादा विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग हो गए हैं. ऋतब्रत बनर्जी ही इस TMC का नेतृत्व कोलकाता में कर रहे हैं. ऋतब्रत बनर्जी गुट के TMC ने पार्टी के मुख्यालय पर भी अपना हक जता लिया है. ऐसे में पार्टी खाते से खर्च करने का अधिकार ममता बनर्जी को मिलता बड़ी बात है। 
 

 

भाजपा में बदले सियासी समीकरण, निखिल सोनी की नियुक्ति से कई नेताओं के बदले राजनीतिक समीकरण

इंदौर 

 इंदौर भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा के नगर अध्यक्ष पद पर निखिल सोनी की नियुक्ति ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। जानिए कैसे आखिरी समय में बदले समीकरण और क्यों पीछे रह गए दूसरे दावेदार।

भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा में इंदौर नगर अध्यक्ष पद पर निखिल सोनी की नियुक्ति से गुरुवार को भी सभी हैरान हैं। इस घोषणा ने सबको चौंका दिया था, क्योंकि विजय बिंजवा का नाम लगभग तय माना जा रहा था। उनका नाम पूर्व विधायक आकाश विजयवर्गीय ने ही दिया था, लेकिन आखिरी समय पर नगर भाजपा अध्यक्ष की सलाह पर यू टर्न ले लिया गया। उन्होंने एक नंबर विधानसभा के ही युवा व अच्छी टीम वाले निखिल सोनी के नाम पर सहमति दे दी।

पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष पवन पाटीदार ने तीन जिलों के अध्यक्षों की घोषणा की है, जिसमें इंदौर नगर में निखिल सोनी को नियुक्ति से सभी हैरान हैं। जैसे ही सोनी का नाम सामने आया वैसे ही मोर्चा के कई नेताओं की जमीन खिसक गई, क्योंकि वे सोनी को अध्यक्ष का गंभीर दावेदार ही नहीं मान रहे थे। उन्हें लग रहा था कि ऐसे ही पैनल में नाम दिया गया होगा। सबसे ज्यादा झटका विजय बिंजवा को लगा जो खुद को बना हुआ मान रहे थे, क्योंकि मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय ने उनका नाम प्राथमिकता से दिया था और पैनल में भी सबसे ऊपर था।

पर्दे के पीछे की कहानी
विजय का नाम सामने आने पर विरोध शुरू हो गया था। ये बात मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और उनके बेटे आकाश के साथ नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा तक भी पहुंची। आखिर में आकाश और मिश्रा के बीच में चर्चा हुई। इधर, क्षेत्रीय संतुलन और सबसे ज्यादा पिछड़ा वर्ग की आबादी एक नंबर में होने की वजह से मोर्चे का अध्यक्ष क्षेत्र से ही बनाना था जिसके चलते आकाश ने निखिल सोनी के नाम पर सहमति दे दी। मंजूरी मिलते ही मिश्रा ने सोनी के नाम को आगे बढ़ा दिया, जिसके बाद बिंजवा के बजाए सोनी को मौका दे दिया गया।

बताते हैं कि युवा होने के साथ सोनी के पास कार्यकर्ताओं की अच्छी टीम है। मजेदार बात ये है कि सोनी का नाम पैनल में आठवें नंबर पर था तो एक नंबर विधानसभा से संतोष यादव भी दावेदार थे।

रखी गई थी नजर
हाल ही में नगर भाजपा के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन रखा गया था जिसमें सभी नेताओं को भीड़ जुटाने के निर्देश दिए थे। खासतौर पर उन्हें जो कि मोर्चा व प्रकोष्ठ में अध्यक्ष व संयोजक पद के दावेदार हंै। बताते हैं कि बारीकी से सभी दावेदारों की गतिविधियों पर नजर रखी गई। बिंजवा को बनाने से पहले भीड़ लाने के लिए कहा था ताकि परीक्षा हो जाए, लेकिन वे संख्या लेकर नहीं पहुंचे थे जबकि कार्यक्रम में पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष पाटीदार मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे।

चारों खाने चित चौधरी
पिछड़ा वर्ग मोर्चा में नगर अध्यक्ष बनने के लिए निलेश चौधरी पूरी ताकत से जुटे हुए थे जिनका नाम विधायक रहे जीतू जिराती ने रखा था। उन्हें आशा थी कि नियुक्ति हो जाएगी, क्योंकि नगर भाजपा में पदाधिकारी बनने से चूक गए थे। इस बार आकाश विजयवर्गीय के अड़ने की वजह से मोर्चा की कमान एक नंबर को सौंपनी पड़ गई जिसके चलते चौधरी चारों खाने चित हो गए।

18-19 जुलाई को BJP की बड़ी बैठक! वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों के साथ संगठनात्मक रणनीति पर होगा मंथन

भोपाल
 मध्यप्रदेश की राजनीति में से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है। 18 और 19 जुलाई को भाजपा मध्यप्रदेश कार्यसमिति की बड़ी बैठक होगी। सूत्रों के मुताबिक भाजपा संगठन की यह दो दिवसीय बैठक निवाड़ी के ओरछा में आयोजित होगी। बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं समेत पदाधिकारी शामिल होंगे। इस दौरान संगठन को मजबूत बनाने, बूथ स्तर पर काम तेज करने, संगठन के विस्तार समेत कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी।

जानकारी के अनुसार, 18 और 19 जुलाई को ओरछा में भाजपा की मध्यप्रदेश प्रदेश कार्यसमिति की बैठक आयोजित होगी। बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं समेत प्रदेशभर के पदाधिकारी और कार्यसमिति सदस्य शामिल होंगे। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में बैठक आयोजित होगी। बैठक में पार्टी संगठन को मजबूत बनाने, बूथ स्तर पर काम तेज करने, संगठन के विस्तार, कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को आम लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने जैसे विषयों पर चर्चा होगी।

इसके अलावा आने वाले संगठनात्मक कार्यक्रमों और राजनीतिक रणनीति पर भी मंथन किया जाएगा। बैठक में 106 प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, 41 स्थायी आमंत्रित सदस्य, प्रदेश पदाधिकारी, संभाग और जिला प्रभारी, विभिन्न मोर्चों के प्रदेश अध्यक्ष तथा प्रकोष्ठों के संयोजक भाग लेंगे।

राज्यसभा में BJP का बड़ा गेमप्लान! 3 सीटों पर क्लीन स्वीप कैसे संभव, जानिए 2/3 बहुमत से NDA कितनी दूर

नई दिल्ली

राज्यसभा में NDA का कुनबा और बढ़ सकता है। पश्चिम बंगाल की 3 राज्यसभा सीटों पर हो रहे उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत अब लगभग तय हो गई है। इसकी वजह यह है कि मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस से बागी हुए विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने उम्मीदवार उतारने से इनकार कर दिया है। उनके मुताबिक टीएमसी किसी भी सीट को जीतने की स्थिति में नहीं है और इसीलिए पार्टी अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगी। ऐसे में अब भाजपा का इन सीटों पर क्लीन स्वीप तय है।

गौरतलब कि चुनाव आयोग ने बीते सोमवार को बंगाल की 3 सीटों पर उपचुनाव की घोषणा की थी। इन सीटों पर 24 जुलाई को वोटिंग होगी। इससे पहले 14 जुलाई तक नामांकन स्वीकार किए जाएंगे और नाम वापसी की अंतिम तिथि 17 जुलाई है। इससे पहले बंगाल में विधानसभा चुनावों के बाद पैदा हुए राजनीतिक संकट के बीच जून में तृणमूल कांग्रेस के 3 सांसदों, सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने उच्च सदन और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद ये तीनों सीटें खाली हुई थीं।

क्यों उम्मीदवार नहीं उतार रही टीएमसी?
पश्चिम बंगाल में चुनाव के समीकरणों की बात की जाए तो 294 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा के पास 208 विधायकों का समर्थन है। अगर उसके सभी विधायक पार्टी के पक्ष में मतदान करते हैं, तो उसके पास तीन राज्यसभा सदस्यों को आसानी से चुनने के लिए पर्याप्त संख्या है। इसके अलावा विपक्ष की ओर से किसी भी तरह का क्रॉस-वोटिंग होने से भाजपा की स्थिति और मजबूत होगी।

उधर, टीएमसी के दोनों गुटों को मिला भी दिया जाए तो उनके विधायकों की संख्या 80 है। लेकिन किसी भी गुट के पास अकेले राज्यसभा सांसद को चुनने के लिए जरूरी न्यूनतम संख्या नहीं है। इसका नतीजा यह है कि आंतरिक विद्रोह के बाद 2 गुटों में बंटी तृणमूल कांग्रेस के चुनाव लड़ने की संभावना नहीं है। इसीलिए टीएमसी ने उम्मीदवार न उतारने का फैसला लिया है।

लगभग 65 विधायकों वाले बागी गुट का नेतृत्व कर रहे विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने मंगलवार को उम्मीदवार उतारने से इनकार कर दिया है। ऋतब्रत ने एक बयान में कहा, “ विधानसभा में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए तृणमूल इन तीनों में से कोई भी सीट जीतने की स्थिति में नहीं है। हमारे पास उम्मीदवार उतारने के लिए पर्याप्त विधायक नहीं हैं।”

राज्यसभा में कितनी बढ़ जाएगी ताकत?
वर्तमान में पश्चिम बंगाल की 13 राज्यसभा सीटों में से 3 पर बीजेपी का कब्जा है। अगर भाजपा उम्मीद के मुताबिक उपचुनाव की तीनों सीटें भी जीत लेती है, तो पश्चिम बंगाल से राज्यसभा में उसकी ताकत 3 से बढ़कर 6 हो जाएगी। वहीं तीन सीटें जुड़ते ही उच्च सदन में भाजपा की संख्या 117 और NDA की संख्या 145 तक पहुंच जाएगी। बता दें कि 245 सीटों वाली राज्यसभा में 2 तिहाई बहुमत के लिए 162 वोट जरूरी हैं। NDA के पास खुद 150 से ज्यादा सांसदों का सीधा समर्थन माना जा रहा है। इसके अलावा बीजू जनता दल के पांच, चार निर्दलीय और 7 मनोनीत सांसदों के समर्थन से NDA 2-तिहाई बहुमत का आंकड़ा आसानी से छू सकती है।

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