बंगाल के स्कूलों में अब अनिवार्य होगा वंदे मातरम, CM शुभेंदु ने जारी किए सख्त निर्देश

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान वंदे मातरम् गीत गाना अनिवार्य करने का फैसला लिया है। स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से जारी आधिकारिक निर्देश के मुताबिक यह व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू होगी और राज्य के सभी छात्रों को स्कूल शुरू होने से पहले प्रार्थना सभा में राष्ट्रीय गीत गाना होगा। विभाग ने सभी स्कूल प्रमुखों को निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा है। 

क्या दिए गए निर्देश?
13 मई को जारी आदेश में शिक्षा निदेशक ने स्पष्ट किया कि कक्षाएं शुरू होने से पहले सुबह की प्रार्थना सभा में वंदे मातरम् गीत का गायन अनिवार्य बनाया जाए ताकि राज्य के सभी स्कूलों में सभी छात्र राष्ट्रीय गीत गाएं। अधिकारियों के मुताबिक स्कूलों को इसके पालन का वीडियो रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखने के लिए कहा गया है, ताकि इसे लागू किए जाने का प्रमाण उपलब्ध रहे।

सीएम शुभेंदु ने क्या बताया?
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत में कहा, अगले सोमवार से राज्य के सभी स्कूलों में वंदे मातरम् को प्रार्थना गीत के रूप में शुरू किया जाएगा। मैं आज नबन्ना जाकर इसकी जानकारी दूंगा।

यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब केंद्र सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़े कानूनों को और मजबूत करने की दिशा में कदम उठा रही है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में संशोधन की तैयारी कर रही है, जिसके तहत वंदे मातरम् के गायन में बाधा डालना दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है। ऐसे में पश्चिम बंगाल सरकार का यह कदम राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर अहम माना जा रहा है।

अब तक राज्य के स्कूलों में गाए जाता था राष्ट्रगान
अब तक राज्य के स्कूलों में मुख्य रूप से राष्ट्रगान जन-गण-मन गाया जाता था, जिसे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों में राज्य की पूर्व तृणमूल कांग्रेस सरकार ने 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान टैगोर द्वारा लिखे गए ‘बांग्लार माटी बांग्लार जल’ को राज्य गीत के रूप में शामिल किया था। अब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् भी प्रार्थना सभा का स्थायी हिस्सा बनेगा।

फैसले पर उठ रहे सवाल
इस फैसले के बाद कुछ शिक्षक संगठनों और स्कूल प्रशासन की ओर से व्यावहारिक सवाल भी उठाए गए हैं। उनका कहना है कि सीमित समय वाली स्कूल असेंबली में राष्ट्रगान, राज्य गीत और राष्ट्रीय गीत तीनों को किस क्रम में और कितनी अवधि में गाया जाएगा, इस पर अभी और स्पष्टता की जरूरत है।

हिंदू स्कूल के प्रधानाध्यापक शुभ्रजीत दत्ता ने कहा कि गर्मी की छुट्टियों के बाद जब छात्र स्कूल लौटेंगे, तब वे जन-गण-मन के साथ वंदे मातरम् भी गाएंगे। उन्होंने बताया कि छात्रों को पहले ही वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के मौके पर इसके ऐतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी दी जा चुकी है और उन्हें इसकी पंक्तियां याद करने के लिए कहा गया था।

वहीं वामपंथी शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि सरकार की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या सभी गीत रोज गाए जाएंगे और उन्हें मौजूदा प्रार्थना सभा के ढांचे में किस तरह शामिल किया जाएगा। हालांकि सरकार ने फिलहाल आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू करने के निर्देश दिए हैं।

अमरनाथ यात्रा सुरक्षा पर बड़ा फोकस, नुनवान से पवित्र गुफा तक तैनात होंगी 4 विशेष टीमें

 जम्मू
 श्री अमरनाथ यात्रा की तैयारियों को लेकर जिला प्रशासन अनंतनाग ने व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। उपायुक्त अनंतनाग एवं यात्रा अधिकारी पहलगाम मार्ग बिलाल मोहुउद्दीन भट्ट ने बुधवार को अधिकारियों की बैठक लेकर यात्रा मार्ग, बेस कैंपों और अन्य महत्वपूर्ण स्थलों पर एडवांस पार्टियों की तैनाती की योजना की समीक्षा की। यात्रा तीन जुलाई से शुरु हो रही है।

बैठक में एडीसी, एसीआर, एसडीपीओ पहलगाम, तहसीलदारों सहित राजस्व, पुलिस, आरडीडी, एसडीआरएफ, अग्निशमन एवं आपात सेवा, पीडब्ल्यूडी और अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।

प्रशासन ने राजस्व, पुलिस, एसडीआरएफ, आरडीडी, आईएफसी और पीडब्ल्यूडी विभागों के अधिकारियों की चार विशेष टीमें गठित की हैं, जो नुनवान बेस कैंप से पवित्र गुफा तक पूरे यात्रा मार्ग का भौतिक निरीक्षण करेंगी। टीमों को मार्ग की स्थिति, संवेदनशील क्षेत्रों, स्वास्थ्य शिविरों, लंगरों, दुकानों और टेंटों के लिए सुरक्षित स्थानों की पहचान करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

हर छोटे-बड़े पहलू का किया जा रहा विस्तृत आकलन
उपायुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि यात्रा मार्ग पर हर छोटे-बड़े पहलू का विस्तृत आकलन किया जाए, ताकि यात्रियों को सुरक्षित और सुगम यात्रा अनुभव उपलब्ध कराया जा सके। उन्होंने फ्लैश फ्लड संभावित क्षेत्रों की पहचान करने और असुरक्षित स्थानों पर किसी भी प्रकार की स्थापना रोकने के निर्देश भी दिए।

इसी क्रम में जिला विकास आयुक्त ने खनाबल में यात्रा के अंतर्गत पूंजीगत व्यय और अन्य कार्यों की प्रगति की भी समीक्षा की। बैठक में पीडब्ल्यूडी, जल शक्ति, स्वास्थ्य, पर्यटन, बिजली, एफसीएस एंड सीए सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

223 कार्यों को मंजूरी, 193 आवंटित, 69 प्रगति पर
अधिकारियों ने बताया कि यात्रा से संबंधित कुल 272 कार्य स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें 100 पूंजीगत व्यय और 172 रेवेक्स परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें से 223 कार्यों को प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है, 215 कार्यों के टेंडर जारी किए जा चुके हैं और 193 कार्य आवंटित किए गए हैं। वर्तमान में 69 कार्य प्रगति पर हैं जबकि दो कार्य पूरे हो चुके हैं।

बैठक में सड़क संपर्क, पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छता और यात्रियों के लिए अन्य आवश्यक सुविधाओं की तैयारियों की विस्तार से समीक्षा की गई।

उपायुक्त ने संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि यात्रा शुरू होने से पहले सभी जरूरी कार्य गुणवत्ता के साथ समयबद्ध तरीके से पूरे किए जाएं। प्रशासन ने कहा कि विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय और नियमित निगरानी के जरिए अमरनाथ यात्रा 2026 को सुरक्षित, व्यवस्थित और सुचारु बनाने के प्रयास जारी हैं।

 

ISI समर्थित गैंगस्टर शहजाद भट्टी पर बड़ा एक्शन, पाकिस्तान बॉर्डर से दिल्ली तक नेटवर्क ध्वस्त

नई दिल्ली
 पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से कथित तौर पर जुड़े गैंगस्टर शहजाद भट्टी के नेटवर्क को लेकर देशभर में सुरक्षा एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई शुरू की है. महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) समेत कई केंद्रीय और राज्य एजेंसियों ने महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्यों में व्यापक छापेमारी कर एक ऐसे कथित स्लीपर सेल मॉड्यूल का खुलासा किया है, जिसमें सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म और डार्क वेब के जरिए भारतीय युवाओं को जोड़ने की साजिश सामने आई है. पाकिस्‍तान बॉर्डर से लेकर दिल्‍ली, हरियाणा, मध्‍य प्रदेश , उत्‍तर प्रदेश समेत अन्‍य जगहों पर एक्‍शन लिया गया है। 

पाकिस्तानी गैंगस्टर शहजाद भट्टी के कई ठिकानों पर एक साथ दबिश दी गई है.
सूत्रों के मुताबिक, महाराष्ट्र ATS ने मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक, नवी मुंबई, कल्याण, भंडारा और चंद्रपुर समेत राज्य के 9 जिलों में 50 से अधिक ठिकानों पर एक साथ दबिश दी. इस कार्रवाई में अब तक 57 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की जा रही है. जांच एजेंसियों का दावा है कि ये सभी युवक इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए शहजाद भट्टी गैंग के संपर्क में आए थे और कथित तौर पर उन्हें भारत के संवेदनशील ठिकानों से जुड़ी सूचनाएं जुटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था. जांच एजेंसियों के अनुसार, संदिग्धों को सैन्य ठिकानों, महत्वपूर्ण सरकारी इमारतों, सार्वजनिक स्थलों और अन्य संवेदनशील इंफ्रास्ट्रक्चर की फोटो और वीडियो जुटाने के टास्क दिए जाते थे. सूत्रों का कहना है कि इन सूचनाओं को सीमा पार बैठे हैंडलर्स तक पहुंचाने के बदले पैसे दिए जाते थे. एजेंसियों का दावा है कि कुछ युवाओं को भविष्य में युद्ध जैसी स्थिति के लिए तैयार रहने के निर्देश भी दिए गए थे। 

सुरक्षा एजेंसियों से बचने का गजब तरीका
खुफिया सूत्रों के मुताबिक, यह नेटवर्क छोटे-छोटे मॉड्यूलर सेल्स में काम करता था. यानी एक समूह को दूसरे समूह की गतिविधियों या पहचान की जानकारी नहीं दी जाती थी, ताकि किसी एक सदस्य के पकड़े जाने पर पूरा नेटवर्क उजागर न हो सके. जांचकर्ताओं का मानना है कि इस स्‍ट्रक्‍चर का इस्तेमाल सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए किया गया. ATS की जांच में यह भी सामने आया है कि डार्क वेब ब्राउजर और ऑटो-डिलीट मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर बातचीत को छिपाया जाता था. कार्रवाई के दौरान कई मोबाइल फोन, लैपटॉप और डिजिटल डिवाइस जब्त किए गए हैं. शुरुआती फॉरेंसिक जांच में कुछ उपकरणों में ऐसे ऐप्स मिले हैं, जिनमें संदेश पढ़ने के बाद खुद ही डिलीट हो जाते थे. अधिकारियों का मानना है कि इन तकनीकों का इस्तेमाल एजेंसियों की निगरानी से बचने के लिए किया जा रहा था। 

युवाओं को ऐसे करते थे ट्रेन
जांच एजेंसियों को यह भी जानकारी मिली है कि ऑनलाइन गेमिंग सर्वरों के भीतर निजी चैट रूम बनाए गए थे. आरोप है कि इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवाओं को सुरक्षा व्यवस्था से बचने, मूवमेंट प्लानिंग और हथियारों के इस्तेमाल जैसी जानकारियां दी जा रही थीं. एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क का विस्तार महाराष्ट्र से बाहर किन राज्यों तक था और कितने लोग इसके संपर्क में आए थे. विदर्भ क्षेत्र के भंडारा और चंद्रपुर जिलों में कथित भर्ती अभियान चलाए जाने की बात भी सामने आई है. सूत्रों के अनुसार, भंडारा में एक मोबाइल दुकान के जरिए युवा लड़कों को इस नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की जा रही थी. सोशल मीडिया के माध्यम से पहले संपर्क बनाया जाता था और फिर धीरे-धीरे उन्हें कथित तौर पर देश विरोधी गतिविधियों के लिए प्रेरित किया जाता था। 

हवाला नेटवर्क का इस्‍तेमाल
सूत्रों के मुताबिक, पैसों के लेन-देन के लिए हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया. जांच एजेंसियों को शक है कि कुछ स्थानीय व्यापारियों और कमीशन एजेंटों के बैंक खातों का उपयोग धन पहुंचाने के लिए किया गया. अब इन खातों की विस्तृत जांच की जा रही है. जांच में यह भी सामने आया है कि महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों की जनसंख्या, संवेदनशील इलाकों और स्थानीय गतिविधियों से जुड़ी जानकारियां भी साझा की जा रही थीं. एजेंसियों का कहना है कि नेटवर्क का एक हिस्सा लॉजिस्टिक सपोर्ट देने में लगा था. सूत्रों के अनुसार, डोगरा गैंग नाम से पहचाने जा रहे एक समूह पर संदिग्धों के ठिकाने तैयार करने, यात्रा की व्यवस्था करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें राज्य से बाहर निकालने की जिम्मेदारी होने का संदेह है। 

पाकिस्‍तान बॉर्डर के आसपास भी एक्‍शन
देशभर में चल रही कार्रवाई के तहत केंद्रीय एजेंसियों ने महाराष्ट्र के अलावा मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में भी छापेमारी की है. सूत्रों के मुताबिक, 300 से अधिक संदिग्धों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया या राउंड-अप किया गया है. पंजाब में पाकिस्तान सीमा से सटे इलाकों से 40 से ज्यादा संदिग्धों को पकड़ा गया है. वहीं हरियाणा STF ने करीब 90 युवकों को हिरासत में लेकर उनके सोशल मीडिया अकाउंट हटवाए हैं और उनकी काउंसलिंग की जा रही है. दिल्ली पुलिस ने भी करीब 20 युवकों को राउंड-अप किया है. अधिकारियों का कहना है कि इन युवाओं को सोशल मीडिया के जरिए भड़काने और पैसों का लालच देकर कथित तौर पर नेटवर्क से जोड़ा गया था. कुछ मामलों में महत्वपूर्ण स्थानों की रेकी और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग जैसे टास्क दिए जाने की भी आशंका जताई जा रही है। 

500 से ज्‍यादा डिजिटल प्रोफाइल
सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय एजेंसियों को 500 से ज्यादा संदिग्ध मोबाइल नंबर और डिजिटल प्रोफाइल मिले थे, जिसके बाद यह बड़ा ऑपरेशन शुरू किया गया. जांच एजेंसियों का दावा है कि पाकिस्तान में बैठे आईएसआई से जुड़े कथित ऑपरेटिव आबिद जट्ट और अजमल गुजर सोशल मीडिया के जरिए भारतीय युवाओं से संपर्क करते थे. शुरुआती बातचीत के बाद उन्हें गैंगस्टर शहजाद भट्टी से जोड़ा जाता था, जो कथित तौर पर उन्हें पैसों और दूसरे लालच देकर अलग-अलग टास्क सौंपता था। 

महत्‍वपूर्ण जगहों को निशाना बनाने की साजिश
ATS की तकनीकी टीम को कुछ ऐसे डिजिटल संकेत भी मिले हैं, जिनसे आशंका जताई जा रही है कि आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर और संवेदनशील ठिकानों को निशाना बनाने की साजिश रची जा रही थी. हालांकि जांच एजेंसियों ने अभी तक आधिकारिक तौर पर सभी जानकारियां सार्वजनिक नहीं की हैं. कई डिजिटल डिवाइस की फॉरेंसिक जांच जारी है और अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं। 

हिमाचल पंचायत चुनाव से पहले बसों पर टकराव: HRTC बोला- एडवांस पेमेंट दो, तभी मिलेंगी 400 बसें

 शिमला
 हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया आरंभ हो गई है। पहले चरण का मतदान 26 मई को होगा। राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव में पोलिंग पार्टियों और मत पेटियों को पहुंचाने के लिए हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) से 400 बसों की मांग की है। एचआरटीसी ने आयोग को स्पष्ट किया है कि बसों की बुकिंग तभी की जाएगी जब 50 प्रतिशत अग्रिम भुगतान किया जाएगा। इस संबंध में प्रबंधन ने नियमों का हवाला दिया है।
बस बुकिंग पर कितना खर्च आएगा

बसों की बुकिंग पर लगभग सात करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। अग्रिम बुकिंग के लिए आयोग ने निगम से साढ़े तीन करोड़ रुपये की मांग की है। आयोग ने निगम को पत्र लिखकर बसों की मांग की है, जिसमें यह भी कहा गया है कि बसें अच्छी स्थिति में होनी चाहिए, ताकि यात्रा के दौरान कोई समस्या न आए।

पहले चरण का मतदान 26 मई को होगा, और पोलिंग पार्टियों को 24 और 25 मई को रवाना किया जाएगा। मतदान समाप्त होने के बाद बसें मत पेटियों के साथ वापस लौटेंगी। 

लोगों को पेश आ सकती है दिक्कत
हालांकि, एचआरटीसी की बसों के चुनावी ड्यूटी पर जाने से आम लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। कई रूट बाधित हो सकते हैं, क्योंकि एचआरटीसी के पास पहले से ही बसों की कमी है। अक्सर बसें रूट पर खराब हो जाती हैं, और एक साथ 400 बसों का चुनावी ड्यूटी पर जाना रूट को प्रभावित कर सकता है। 

तीन चरणों में होंगे पंचायत चुनाव

हिमाचल प्रदेश में 31182 पदों के लिए तीन चरणों में पंचायत चुनाव होंगे। कुल 3754 पंचायतों में प्रधान, उपप्रधान, सदस्य, बीडीसी और जिला परिषद के लिए चुनाव होंगे। पहले चरण का मतदान 26 मई को, दूसरे चरण का मतदान 28 मई को और तीसरे चरण का मतदान 30 मई को होगा। मतदान के दिन ही चुनावों की गणना होगी और प्रधान उप प्रधान तथा वार्ड सदस्यों के नतीजे उसी दिन घोषित कर दिए जाएंगे। 

तीन नवंबर, 2024 को बदला था नियम
एचआरटीसी ने तीन नवंबर, 2024 को नियमों में बदलाव किया था। इसके अनुसार, बसें किसी समारोह, कार्यक्रम या रैली के लिए तभी बुक की जाएंगी जब 50 प्रतिशत अग्रिम भुगतान किया जाए। पहले सरकारी कार्यक्रमों और चुनावी रैलियों के लिए बसें बुक की जाती थीं, लेकिन भुगतान नहीं होता था। वित्तीय स्थिति ठीक न होने के बावजूद निगम बसें भेज देता था, लेकिन कई महीनों तक पैसा न आने के कारण निगम को समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

 

तहव्वुर राणा की नागरिकता पर क्यों बेबस है कनाडा? जानिए पूरा कानूनी खेल

 टोरंटो

भारतीय समेत दुनियाभर के कई लोग बसने के लिए कनाडा को इसलिए भी पसंद करते हैं क्योंकि एक बार यहां की नागरिकता हासिल कर ली जाए तो इस देश से निकाले जाने का खतरा लगभग खत्म हो जाता है और फिर यहां के मूल निवासियों की तरह यहां के अधिकार भी हासिल किए जा सकते हैं. कुछ मिलाकर कनाडा में नागरिकता छीनी जानी इतनी आसान नहीं है. इसका बड़ा उदाहरण मुंबई 26/11 आतंकी हमले के आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा का केस है। 

अमेरिका से भारत प्रत्यर्पित किए जाने के बाद अब उस पर भारत में मुकदमा चलने की तैयारी है लेकिन इसी बीच कनाडा में उससे जुड़ा एक दूसरा बड़ा सवाल भी लगातार उठ रहा है. अगर कनाडाई एजेंसियों को सालों पहले ही शक हो गया था कि राणा ने झूठ बोलकर नागरिकता हासिल की थी, तो उसकी नागरिकता अब तक रद्द क्यों नहीं हुई?

यह सवाल केवल राणा तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ सालों में सामने आए मामलों से पता चलता है कि कनाडा में एक बार नागरिकता मिलने के बाद उसे वापस लेना बेहद लंबी, जटिल और धीमी प्रक्रिया बन जाती है. कई मामलों में सरकार को 10 से 20 साल तक लग जाते हैं। 

तहव्वुर राणा पर क्या हैं आरोप?
तहव्वुर हुसैन राणा पर आरोप है कि उसने 2000 में कनाडाई नागरिकता के लिए आवेदन करते समय गलत जानकारी दी थी. उसने दावा किया था कि वह ओटावा में रह रहा है और कनाडा में लगातार मौजूद था. लेकिन बाद में RCMP और अमेरिकी एजेंसियों की जांच में ऐसे दस्तावेज सामने आए जिनसे पता चला कि वह उस दौरान अमेरिका के शिकागो में रह रहा था. कनाडा में दिए गए उसके पते पर दूसरे लोग रहते थे और पड़ोसियों ने भी कहा कि उन्होंने राणा को वहां कभी नहीं देखा। 

जांच में यह भी सामने आया कि राणा शिकागो में कई कारोबार चला रहा था. इसके बावजूद उसे 2001 में कनाडाई नागरिकता और पासपोर्ट दोनों मिल गए. बाद में भारतीय एजेंसियों ने आरोप लगाया कि उसने इसी कनाडाई पासपोर्ट का इस्तेमाल करते हुए मुंबई हमले से पहले भारत की यात्रा की थी। 

आखिर कनाडा में नागरिकता रद्द करना इतना मुश्किल क्यों?

नागरिकता “अधिकार” बन जाती है
कनाडा में एक बार नागरिकता मिलने के बाद व्यक्ति को लगभग वही संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा मिलती है जो जन्म से कनाडाई नागरिकों को मिलती है. यही वजह है कि सरकार किसी की नागरिकता बिना मजबूत कानूनी प्रक्रिया के नहीं छीन सकती. अदालतें यह सुनिश्चित करती हैं कि हर व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिले। 

इसी वजह से नागरिकता रद्द करने के मामलों में विस्तृत जांच होती है, अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड जुटाए जाते हैं, अदालत में सबूत पेश होते हैं और अपील की कई परतें होती हैं. इन सबमें सालों लग जाते हैं। 

बार-बार बदलते रहे कानून
यह देरी सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की वजह से नहीं हुई. कनाडा में नागरिकता कानून खुद कई बार बदले गए. 2015 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Stephen Harper की कंजर्वेटिव सरकार ने कानून बदलकर आतंकवाद, जासूसी और राजद्रोह जैसे मामलों में नागरिकता रद्द करना आसान बना दिया था. सरकार का तर्क था कि जो व्यक्ति कनाडा के खिलाफ गंभीर अपराध करे, उसे नागरिकता रखने का अधिकार नहीं होना चाहिए। 

लेकिन 2015 चुनाव में जस्टिन ट्रूडो और लिबरल पार्टी ने इसका विरोध किया. उनका प्रसिद्ध नारा था- “A Canadian is a Canadian is a Canadian.” लिबरल सरकार का कहना था कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को अलग तरीके से ट्रीट करना गलत है। 

इसके बाद 2017-18 में नियम फिर बदले गए. अब कनाडा में नागरिकता केवल इन आधारों पर छीनी जा सकती है:

    धोखाधड़ी
    गलत जानकारी
    तथ्यों को छिपाना

यानी आतंकवाद में दोषी ठहराया जाना अपने आप नागरिकता खत्म करने का आधार नहीं रह गया.

सरकार के पास सीमित संसाधन
इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि कनाडा के पास ऐसे मामलों को तेजी से निपटाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. हर मामले में विदेशों से रिकॉर्ड मंगाने पड़ते हैं, पुराने दस्तावेजों की जांच होती है, गवाहों से पूछताछ होती है और अदालत में लंबी सुनवाई चलती है. राणा केस में जांच 2009 में शुरू हुई थी, लेकिन 2024 में जाकर सरकार ने संघीय अदालत से अंतिम फैसला मांगा। 

आरोपी के बचाव का हिस्सा बन जाती है लंबी देरी

दिलचस्प बात यह है कि सालों की देरी बाद में आरोपियों के लिए कानूनी बचाव भी बन जाती है. राणा ने भी अदालत में कहा कि इतने पुराने मामलों की घटनाएं अब उसे याद नहीं हैं. कई मामलों में आरोपी यह दलील देते हैं कि सबूत पुराने हो चुके हैं, गवाह उपलब्ध नहीं हैं और सरकार ने कार्रवाई में अत्यधिक देरी की. इससे प्रक्रिया और जटिल हो जाती है। 

सुरक्षा और अधिकारों के बीच फंस गया कनाडा
तहव्वुर राणा केस ने कनाडा के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या देश नागरिक अधिकारों की रक्षा करते-करते राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में बहुत धीमा हो गया है?

मानवाधिकार विशेषज्ञ कहते हैं कि नागरिकता छीनना बेहद गंभीर कदम है और इसमें जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए. दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि अगर किसी ने धोखे से नागरिकता हासिल की हो, तो कार्रवाई दशकों तक नहीं चलनी चाहिए. यही कारण है कि यह मामला अब केवल एक आतंकी आरोपी का नहीं, बल्कि कनाडा की पूरी इमिग्रेशन और नागरिकता प्रणाली की परीक्षा बन चुका है। 

दूसरे देशों से कनाडा कितना अलग?
    ब्रिटेन ने 2010 के बाद से 1,500 से ज्यादा लोगों की नागरिकता रद्द की है, जिनमें बड़ी संख्या आतंकवाद और धोखाधड़ी के मामलों की थी। 
    अमेरिका भी हाल के सालों में ऐसे मामलों में आक्रामक रुख दिखा रहा है.

इसके मुकाबले कनाडा में नागरिकता रद्द करने के मामले बेहद कम हैं. 2024 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक-

    दो दर्जन मामलों में कार्रवाई हुई
    सात मामले अदालत में लंबित हैं
    90 से ज्यादा मामलों में सरकार ने कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई

अब आगे क्या होगा?
राणा की नागरिकता रद्द करने का मामला अभी भी कनाडा की संघीय अदालत में लंबित है. अगर अदालत सरकार के पक्ष में फैसला देती है, तो उसकी कनाडाई नागरिकता समाप्त हो सकती है लेकिन इसमें अभी और समय लग सकता है. इस बीच भारत में उस पर 26/11 मुंबई हमले की साजिश में मुकदमा चलेगा। 

क्या भारत में पेट्रोल-डीजल पर लगेगा कोटा? जानिए फ्यूल राशनिंग का पूरा गणित

नई दिल्ली

ईरान युद्ध और मध्य पूर्व (Middle East) में तेल आपूर्ति मार्गों में आई रुकावट के कारण पूरी दुनिया एक गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रही है। इस संकट के बीच कई देशों में फ्यूल राशनिंग लागू की जा चुकी है। भारत में भी न‍िजी वाहनों के ल‍िए एक ल‍िमिट में पेट्रोल-डीजल और गैस खरीदने का कोटा तय करना एक उपाय हो सकता है। फिलहाल, भारत सरकार ने अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं किया है। अगर देश में कोटा सिस्टम लागू होता है, तो लोग अपने मन के मुताबिक पेट्रोल, डीजल या गैस नहीं खरीद पाएंगे। बता दें कि श्रीलंका, पाकिस्तान, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में QR Code, ऑड-ईवन नियम और साप्ताहिक फ्यूल लिमिट लागू हो चुकी है। अगर भविष्य में हालात और बिगड़ते हैं, तो भारत समेत कई देशों में भी ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो ‘फ्यूल राशनिंग‘ सरकार द्वारा लगाया गया वह प्रतिबंध है, जिसके तहत आप अपनी मर्जी के मुताबिक जितना चाहें उतना पेट्रोल या डीजल नहीं खरीद सकते हैं। सरकार प्रत्येक नागरिक या वाहन के लिए एक ‘कोटा’ तय कर देती है। एक निश्चित समय सीमा (जैसे एक हफ्ता) में आप केवल लिमिट में ही ईंधन खरीद पाएंगे। इसके लिए सरकार QR-कोड, कूपन या गाड़ियों के नंबर के हिसाब से ‘ऑड-ईवन’ (Odd-Even) जैसे तरीके अपनाती है।

2026 के इस वैश्विक संकट में कई देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ईंधन की बिक्री पर सीमा लगा दी है।

श्रीलंका: यहां ‘नेशनल फ्यूल पास’ (QR कोड) सिस्टम लागू है। कारों के लिए हफ्ते में केवल 15-25 लीटर और मोटरसाइकिलों के लिए सिर्फ 5 लीटर पेट्रोल तय किया गया है।

पाकिस्तान: यहां स्थिति इतनी गंभीर है कि एक बार में वाहन को केवल 5 लीटर तेल मिल रहा है। साथ ही सरकारी कर्मचारियों के लिए हफ्ते में केवल 4 दिन काम का नियम बनाया गया है।

फ्रांस और जर्मनी: यूरोप के संपन्न देश भी अब राशनिंग की कगार पर हैं। फ्रांस के कुछ इलाकों में QR कोड के जरिए हफ्ते में 15-20 लीटर की सीमा तय की गई है, जबकि जर्मनी में कुछ जगहों पर एक बार में केवल 10 लीटर पेट्रोल मिल रहा है।

बांग्लादेश और म्यांमार: बांग्लादेश ने ऊर्जा बचाने के लिए स्कूलों को ऑनलाइन कर दिया है और बिजली की रोटेशनल कटौती (Load Shedding) शुरू कर दी है। म्यांमार में ‘ऑड-ईवन’ सिस्टम से पेट्रोल दिया जा रहा है।

स्लोवेनिया और केन्या: स्लोवेनिया ने प्राइवेट ड्राइवरों के लिए हफ्ते में 50 लीटर का कोटा तय किया है, वहीं केन्या ने घरेलू सप्लाई बचाने के लिए तेल के निर्यात पर ही पाबंदी लगा दी है।

ईंधन की किल्लत का असर भारत पर भी पड़ा है। लाइव हिंदुस्तान की बिजनेस टीम ने हाल ही में कुछ शहरों में एक सर्वे किया, जिसमें पाया गया कि पेट्रोल पंप संचालकों ने खुद से ही पेट्रोल-डीजल खरीदने की एक सीमा तय कर रखी है। पूछने पर पता लगा कि कुछ दिनों पहले बाइक सवार ग्राहकों को 200 रुपये और कार चालकों को 2,000 रुपये से ज्यादा का तेल नहीं दिया जा रहा था। अभी भी कई शहरों में पेट्रोल पंप पर अपनी गाड़ी की टंकी फुल कराने पहुंच रहे ग्राहकों को निराश होकर वापस लौटना पड़ रहा है। इससे पता चलता है कि बिना किसी आदेश के पहले ही पेट्रोल पंप संचालकों ने अपनी कार्यशैली बदलकर कोटा सिस्टम शुरू कर दिया है।

वर्क फ्रॉम होम और 4-डेज वर्किंग:– फिलीपींस, लाओस और पाकिस्तान ने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों को घर से काम करने या हफ्ते में कम दिन ऑफिस आने का आदेश दिया है।

कार-लेस-डेज:– न्यूजीलैंड जैसे देश ‘कार-लेस-डेज’ (हफ्ते में एक दिन गाड़ी न चलाना) को फिर से शुरू करने पर विचार कर रहे हैं।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट:- वियतनाम और कंबोडिया जैसे देशों में लोगों को कारपूलिंग और बस-मेट्रो का उपयोग करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि लगभग 30% पेट्रोल पंप बंद हो चुके हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही देशवासियों से ईंधन और यात्रा में कटौती करने की भावुक अपील की है। हालांकि, भारत में अभी तक औपचारिक रूप से राशनिंग लागू नहीं हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो भविष्य में ‘कोटा सिस्टम’ या ‘QR कोड आधारित खरीद’ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

फ्यूल राशनिंग का विचार डरावना लग सकता है, लेकिन यह संकट के समय तेल के समान वितरण को सुनिश्चित करने का एक तरीका है। फिलहाल, बचाव का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम निजी वाहनों का कम से कम उपयोग करें और ईंधन की बर्बादी रोकें।

EV यूजर्स के लिए बड़ी खुशखबरी: सरकार ने 503 करोड़ का प्लान किया मंजूर, मिलेंगे कई फायदे

 नई दिल्ली

देश में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मांग बढ़ी है, लेकिन चुनौतियां अभी कम नहीं हुई है. भारतीय ऑटोमोबाइल मार्केट में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की हिस्सेदारी 5.77 फीसदी तक पहुंच गई है. हालांकि, अभी भी लोगों के मन में बैठी रेंज एंजाइटी खत्म नहीं हुई है. ऐसे में सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है, जिससे ईवी वालों की बड़ी चिंता दूर हो जाएगी। 

भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए भारी उद्योग मंत्रालय ने चार्जिंग स्टेशन इंस्टॉल करने का ऐलान किया है. मंत्रालय देशभर में 4,874 इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग स्टेशन लगाएगा. इस प्रोजेक्ट के लिए सरकार 503.86 करोड़ रुपये खर्च करेगी. ये प्रोजेक्ट पीएम ई-ड्राइव स्कीम का हिस्सा है.
 
कई राज्यों में लगेंगे EV चार्जिंग स्टेशन
12 मई को बेंगलुरू में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान केंद्रीय मंत्री एच डी कुमारस्वामी ने इस बारे में जानकारी दी है. इस कदम का उद्देश्य लोगों के मन में बैठी रेंज एंजाइटी को कम करना है. इसके लिए सरकार इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग का एक मजबूत नेटवर्क तैयार करना चाहती है. इससे जब भी लोगों को जरूरत होगी वे अपने व्हीकल को चार्ज कर पाएंगे। 

इन चार्जिंग स्टेशन पर इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स, थ्री व्हीलर्स, पैंसेजर कार, बस और हैवी ड्यूटी ट्रक्स को भी चार्ज किया जा सकेगा. सरकार की मानें तो इन चार्जिंग स्टेशन को प्लानिंग के तहत अलग-अलग राज्यों में लगाया जाएगा. इसमें कर्नाटक, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु शामिल हैं। 

बढ़ रहा ईवी का दबदबा
इस फंडिंग का बड़ा हिस्सा कर्नाटक में खर्च होगा. रिपोर्ट्स की मानें, तो राज्य में 1243 चार्जिंग स्टेशन इंस्टॉल किए जाएंगे, जिसें लगभग 123.66 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इस प्रोजेक्टर को पूरा करने में प्रमुख पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइसेस का भी योगदान होगा. प्रमुख तेल कंपनियां (जिनके नाम से आप पेट्रोल पंप देखते हैं) इस इंस्टॉलेशन प्रोजेक्ट को लीड करेंगी। 

मौजूदा स्थिति की बात करें, तो पैसेंजर व्हीकल कैटेगरी में ईवी की हिस्सेदारी 5.77 फीसदी की है. वहीं टू-व्हीलर कैटेगरी में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की हिस्सेदारी 7.76 फीसदी तक पहुंच गई है. कमर्शियल व्हीकल कैटेगरी में ईवी का शेयर 2.26 फीसदी है. थ्री व्हीलर कैटेगरी में ईवी का दबदबा है. यहां इलेक्ट्रिक व्हीकल की हिस्सेदारी 60.38 फीसदी की है. ये आंकड़े अप्रैल 2026 में हुई सेल के हैं। 

हंतावायरस से बढ़ी चिंता: वैक्सीन नहीं तो कैसे होगा इलाज, क्या कोरोना जैसी बनेगी महामारी?

 नई दिल्ली

हंतावायरस से प्रभावित लग्जरी क्रूज शिप एमवी होंडियस की घटना ने दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी है. कुछ लोग इसे कोविड-19 जैसी नई महामारी समझ रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह बिल्कुल अलग है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के प्रमुख डॉ. टेड्रोस ने स्पष्ट कहा है कि यह कोविड-19 नहीं है. वर्तमान में हंतावायरस से पब्लिक हेल्थ का खतरा बहुत कम है। 

हंतावायरस चूहों से इंसानों में फैलने वाला वायरस है. यह मुख्य रूप से दो प्रकार की बीमारियां पैदा करता है – एक फेफड़ों पर हमला करता है (Hantavirus Pulmonary Syndrome – HPS) और दूसरा किडनी को प्रभावित करता है. यह वायरस चूहों के मूत्र, लार और मल से फैलता है. जब ये सूखकर हवा में उड़ते हैं तो इंसान उन्हें सांस के साथ अंदर ले लेता है. कोविड-19 की तरह यह हवा में आसानी से नहीं फैलता। 

कोविड-19 से सबसे बड़ा अंतर
कोविड-19 हवा के जरिए बहुत तेजी से फैलता था. एक व्यक्ति से दूसरे में सामान्य बातचीत, खांसने या छींकने से भी संक्रमण हो जाता था. लेकिन हंतावायरस में इंसान से इंसान में संक्रमण बहुत दुर्लभ है. सिर्फ एंडीज स्ट्रेन ही इंसान से इंसान में फैलता है. यह तब होता है जब लंबे समय तक बहुत करीबी संपर्क हो, जैसे घर में साथ रहना या घनिष्ठ संबंध. सामान्य मिलने-जुलने से यह नहीं फैलता। 

वैक्सीन अभी तक क्यों नहीं बना? 
दुनिया भर में हर साल हंतावायरस से लगभग 60 हजार से एक लाख लोग संक्रमित होते हैं, फिर भी यूरोप, अमेरिका और लैटिन अमेरिका में अभी तक इसका कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है. इस वायरस के कारण होने वाली बीमारी बेहद खतरनाक हो सकती है, खासकर एंडीज स्ट्रेन जो 40 प्रतिशत तक मौत का कारण बन सकता है. हंतावायरस ने एक बार फिर इस सवाल को उठा दिया है कि क्या हमें महामारी आने से पहले ही टीका तैयार करना चाहिए।

मॉडर्ना की कोशिश और प्रीक्लिनिकल स्टेज
2023 से अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना दक्षिण कोरिया की कोरिया यूनिवर्सिटी वैक्सीन इनोवेशन सेंटर के साथ mRNA Access प्रोग्राम के तहत काम कर रही है. इस साझेदारी की औपचारिक घोषणा 2024 में की गई थी. चूहों पर किए गए परीक्षणों में इस mRNA वैक्सीन ने अच्छे परिणाम दिखाए हैं. हालांकि, यह वैक्सीन अब भी प्रीक्लिनिकल स्टेज में है और ह्यूमन ट्रायल्स शुरू नहीं हुए हैं। 

विशेष बात यह है कि यह वैक्सीन मुख्य रूप से हेमोरेजिक फीवर विद रीनल सिंड्रोम (HFRS) पैदा करने वाले स्ट्रेन पर काम कर रही है, न कि MV होंडियस क्रूज शिप वाले एंडीज स्ट्रेन पर, जो HPS (हंतावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम) का कारण बनता है। 

क्रूज संकट के दौरान शेयरों में उछाल
MV होंडियस क्रूज शिप पर हंतावायरस के मामले सामने आने के बाद जब मॉडर्ना की इस साझेदारी की खबर आई, तो कंपनी के शेयरों में करीब 10 प्रतिशत की तेजी आई. निवेशकों को उम्मीद है कि अगर भविष्य में बड़े पैमाने पर हंतावायरस का खतरा बढ़ा तो मॉडर्ना का mRNA प्लेटफॉर्म काम आ सकता है. लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अभी तक यह सिर्फ शुरुआती चरण में है। 

लक्षण और मौत का खतरा
हंतावायरस के लक्षण शुरू में फ्लू जैसे होते हैं – बुखार, थकान, सिरदर्द. इसके 4-10 दिन बाद सांस लेने में तकलीफ और फेफड़ों में पानी भरना शुरू हो जाता है. HPS का मौत का दर करीब 40% है, जो कोविड-19 से ज्यादा है. लेकिन क्योंकि यह आसानी से नहीं फैलता, इसलिए बड़े स्तर पर फैलने का खतरा बहुत कम है. कोविड-19 का इनक्यूबेशन पीरियड 2-14 दिन था, जबकि हंतावायरस का 1-8 हफ्ते तक। 

कोविड-19 से मिला सबक
कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को सिखाया कि टीका बनाने का सबसे सही समय महामारी शुरू होने से पहले होता है. जब कोविड-19 आया तब mRNA टेक्नोलॉजी पहले से तैयार थी, जिसकी वजह से कुछ महीनों में ही वैक्सीन बन गई. हंतावायरस के मामले में भी यही स्थिति है. वैज्ञानिक सालों से इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन लगातार फंडिंग और प्राथमिकता न मिलने के कारण प्रगति धीमी रही है। 

दुनिया भर में स्थिति
वर्तमान में कोई भी देश हंतावायरस का स्वीकृत टीका नहीं दे रहा है. कुछ देशों में शोध चल रहा है, लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन और इमरजेंसी उपयोग की मंजूरी अभी दूर है. MV होंडियस वाली घटना ने वैश्विक स्तर पर इस दिशा में ध्यान खींचा है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है कि हंतावायरस जैसे जानलेवा वायरस पर गंभीरता से निवेश किया जाए। 

मॉडर्ना की यह कोशिश एक अच्छी शुरुआत है. अगर मानव परीक्षण सफल रहे तो mRNA आधारित हंतावायरस वैक्सीन बन सकती है. लेकिन इसमें अभी कई साल लग सकते हैं। 

क्रूज शिप पर क्या हुआ?
एमवी होंडियस क्रूज शिप पर कुल 11 मामले सामने आए हैं. तीन लोगों – एक डच जोड़े और एक जर्मन पर्यटक – की मौत हो चुकी है. शिप पर सवार सभी लोगों को उनके देशों में भेज दिया गया है. उन्हें क्वारंटाइन में रखा गया है. स्पेन, नीदरलैंड, अमेरिका समेत कई देशों में यात्री पहुंच चुके हैं. विशेषज्ञों का अनुमान है कि कुछ यात्री अर्जेंटीना में शिप पर चढ़ने से पहले ही संक्रमित हो गए थे, क्योंकि वहां यह वायरस पहले से मौजूद है। 

महामारी बनने का खतरा?
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि हंतावायरस से महामारी बनना लगभग असंभव है. क्योंकि इंसान से इंसान में फैलाव बहुत कम और सीमित है. WHO, ECDC और अन्य एजेंसियां इसे अच्छी तरह नियंत्रित करने में सक्षम हैं. कोविड-19 पूरी दुनिया में फैल गया था क्योंकि यह हवा में आसानी से घूमता था. हंतावायरस ऐसा नहीं है। 

क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
जिन लोगों में लक्षण दिखें (बुखार, थकान, सांस लेने में दिक्कत) उन्हें तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. क्वारंटाइन का समय 6 हफ्ते तक रखा जा रहा है क्योंकि वायरस का इनक्यूबेशन लंबा है. हंतावायरस खतरनाक है, लेकिन इसका फैलाव कोविड-19 जैसा नहीं है. चूहों से बचाव, स्वच्छता और सतर्कता रखने से इसका खतरा बहुत कम किया जा सकता है. WHO और स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार निगरानी कर रहे हैं। 

मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत पर Morgan Stanley का भरोसा बरकरार, FY27 GDP को लेकर बड़ा अनुमान

नई दिल्ली

मिडिल ईस्ट टेंशन के बावजूद मॉर्गन स्टैनली ने भारत की FY27 (वित्त वर्ष 2026-27) के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 6.7 प्रतिशत कर दिया है. यह आंकड़ा अप्रैल में दिए गए 6.2 प्रतिशत के पूर्वानुमान से ऊपर है. जियो पॉलिटिकल टेंशन के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहने की उम्मीद है। 

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, एनालिस्ट ने जानकारी दी है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही थमने के कारण तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है. लेकिन मॉर्गन स्टैनली का मानना है कि FY27 में भारत 6.7 प्रतिशत की दर से बढ़ेगा. FY28 में यह ग्रोथ 7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। 

अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा
तेल की कीमतें जून 2026 तिमाही में सबसे हाई लेवल पर पहुंचने के बाद कम होने की उम्मीद है. शुरुआती तिमाही में विकास थोड़ा धीमा पड़ सकता है, लेकिन बाद में सुधार होगा. घरेलू मांग, निवेश और नीतिगत सहायता से अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा. मॉर्गन स्टैनली ने चेतावनी भी दी है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो विकास पर और ज्यादा दबाव पड़ सकता है। 

ब्याज दरों बदलाव होने की संभावना कम
मॉर्गन स्टैनली का अनुमान है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस वित्त वर्ष में ब्याज दरों को स्थिर रखेगा. RBI नीतिगत दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रख सकता है और जरूरत पड़ने पर कुछ अन्य फैसले भी ले सकता है। 

रिपोर्ट के मुताबिक, महंगाई पर कंट्रोल रखने और रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए RBI सतर्क रहेगा. मिडिल ईस्ट संकट से ऊर्जा कीमतों में उछाल आने का खतरा है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है. फिर भी, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और घरेलू फैक्टर्स से भारत इस चुनौती का सामना कर सकता है। 

भारत को मिलेंगी नई संभावनाएं
इस संकट के बावजूद भारत की स्थिति अन्य देशों की तुलना में बेहतर है. मॉर्गन स्टैनली के अनुसार, निवेश बढ़कर जीडीपी का 37.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जिससे अगले पांच साल में अतिरिक्त 800 अरब डॉलर का पूंजी निवेश आ सकता है। 

यह वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत को नई संभावनाएं देगा. मध्यम अवधि में 6.5 से 7 प्रतिशत की विकास दर बनाए रखना संभव है. सरकार की सुधार नीतियां, इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर और घरेलू खपत इस विकास को और मजबूत बनाएंगी। 

आरबीआई ने दी चेतावनी
हालांकि, Reserve Bank of India (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा किसी भी संभावित आर्थिक झटके से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है और वैश्विक हालात पर लगातार नजर रखे हुए है.  उन्होंने कहा कि आरबीआई अपनी मौद्रिक नीति के जरिए आर्थिक विकास को बनाए रखने और महंगाई को नियंत्रण में रखने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगा। 

आरबीआई गवर्नर ने चेतावनी दी कि अगर पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध लंबे समय तक चलता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है. इसका सीधा असर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। 

कर्नाटक में हिजाब और जनेऊ पर रोक खत्म, CM सिद्दारमैया ने बदला BJP सरकार का फैसला

कर्नाटक

कर्नाटक के स्कूलों में अब छात्र-छात्राओं के हिजाब या जनेऊ पहनने पर रोक नहीं लगेगी। राज्य की सिद्धारमैया सरकार ने 2022 की भाजपा सरकार द्वारा लाए गए उस फैसले को पलट दिया, जिसमें स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। कर्नाटक शिक्षा विभाग द्वारा लाए जा रहे नए नियमों में छात्र-छात्राओं को यूनिफॉर्म के साथ जनेऊ, हिजाब, पगड़ी, रुद्राक्ष और स्कॉर्फ पहनने की अनुमति दे दी है।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक इस मुद्दे पर बात करते हुए कर्नाटक सरकार में शिक्षा मंत्री मधु बांगराप्पा ने कहा कि कि सरकार की तरफ से यह फैसला लिया गया है कि धार्मिक चिन्हों की वजह से छात्र-छात्राओं को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “पारंपरिक और धार्मिक प्रथाओं के कारण बच्चों को असुविधा नहीं होनी चाहिए। हमने स्पष्टता सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए हैं। मंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री ने विभाग को शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले नियमों का ढांचा पूरा करने का निर्देश दिया है। उम्मीद है कि ये नियम स्कूलों में यूनिफॉर्म व्यवस्था को बनाए रखते हुए पारंपरिक और धार्मिक प्रतीकों को सीमित अनुमति देंगे।

वहीं इस मुद्दे पर कर्नाटक सरकार की तरफ से कहा गया कि इस फैसले का उद्देश्य शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन और धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रथाओं के सम्मान के बीच संतुलन बनाने के लिए है। माना जा रहा है कि यह फैसला राज्य में हिजाब के मुद्दे पर एक बार फिर से बहस तेज कर सकता है।

भाजपा ने क्यों किया था हिजाब बैन का फैसला?

कर्नाटक में 2021-22 के दौरान कॉलेज आने वाली मुस्लिम लड़कियों को हिजाब पहनने से रोका गया था। इसके बाद यह एक बड़ा सामाजिक और धार्मिक मुद्दा बन गया था। कॉलेज प्रशासन की तरफ से कहा गया था कि यूनिफॉर्म नियम सभी छात्रों के लिए समान रूप से लागू होता है। इसका विरोध करते हुए छात्राओं ने कहा कि हिजाब उनके धर्म की पहचान का हिस्सा है। ऐसे में वह इसे नहीं हटाएंगी। कर्नाटक के साथ-साथ धीरे-धीरे यह विवाद पूरे राज्य में फैल गया। मुस्लिम छात्राओं द्वारा हिजाब को पहनने के लिए की जा रही इस जिद के जवाब में कुछ हिंदू संगठनों ने भगवा शॉल पहनकर कॉलेज आने की कोशिश की, जिसके बाद विवाद बढ़ गया।

इस विवाद को बढ़ता देख, तत्कालीन भाजपा सरकार ने शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक चिन्हों को पहनने पर रोक लगा दी। इसके बाद मामला कोर्ट पहुंचा। इस मामले पर मार्च 2022 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि हिजाब इस्लाम कि अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। इसके अलावा स्कूलों में यूनिफॉर्म लागू करना सरकार और प्रशासन का क्षेत्र है। ऐसे में राज्य सरकार का आदेश सही है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। यहां पर दो सदस्यीय बेंट ने एक-एक के मत से फैसला दिया।

2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार आ गई। इसके बाद नई सरकार ने हिजाब बैन के फैसले में छूट दे दी। इसके बाद यह मामला दब गया। हालांकि, अब जबकि फिर से यह फैसला सामने आया है, तो इस पर राजनीतिक विवाद की आशंका बनी हुई है।

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