सुपर अल नीनो का कहर! 150 साल का तापमान रिकॉर्ड टूटने का खतरा

नई दिल्ली

एक बात ये कि इस साल गर्मी ज्यादा पड़ेगी क्योंकि ‘एल नीन्यो’ असर डालेगा. ये शायद आपने सुना हो, लेकिन अब तो कह रहे हैं कि इस साल का ‘एल नीन्यो’, ‘सुपर एल नीन्यो’ होने वाला है यानी गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूटने वाले हैं. तो ये सुपर एल नीन्यो क्या बला है? ज्यादातर पब्लिक तो ये भी नहीं समझती कि एल नीन्यो क्या होता है? पहले तो वही समझ लेना चाहिए, उसके बाद समझेंगे कि सुपर एल नीन्यो क्या होता है. तो एल नीन्यो स्पेनिश भाषा में छोटे बच्चे को कहते हैं. छोटे लड़के को या बालक. जी हां, ये बालक कुछ सालों में लौट कर आता रहता है और भारत में गर्मी बढ़ा जाता है. तो स्पैनिश में नाम क्यों है? स्पेन का हमारी गर्मी से क्या लेना-देना? तो वैसे तो स्पेन का एल नीन्यो से भी कोई लेना-देना नहीं है। 

ये नाम एल नीन्यो इसलिए स्पेन की भाषा में है क्योंकि दक्षिण अमेरिका के ज्यादातर देशों पर स्पेन का राज हुआ करता था. जैसे भारत में अंग्रेजों का राज हुआ करता था, तो यहां अंग्रेजी भाषा उनके साथ आई, लेकिन भारत में पहले से लोग रहते थे और हमारी अपनी भाषाएं भी थीं. लेकिन दक्षिण अमेरिका के बड़े से महाद्वीप पर बहुत ज्यादा आबादी नहीं थी. सारा जंगल था. कुछ मूल निवासी वहां के रहा करते थे. तो स्पेन और पुर्तगाल जैसे यूरोप के देशों के लोग वहां गए और बस गए और राज किया तो उनकी भाषाएं दक्षिण अमेरिका की भी भाषाएं हो गईं। 

अभी से दिखने लगा है एल नीन्यो का असर.
नामकरण जान लेते हैं

जैसे ब्राजील में पुर्तगाल की भाषा बोली जाती है. लेकिन बाकी दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के ज़्यादातर देशों में स्पेन की भाषा स्पैनिश बोली जाती है और स्पैनिश में छोटे लड़के को कहते हैं एल नीन्यो. ये नाम दिया गया है मौसम के एक बदलाव को. जो हर कुछ साल में वहां दक्षिण अमेरिका के पूर्व के हिस्से में होता है. अब समझने वाली बात ये है कि ये छोटा बालक अगर दक्षिण अमेरिका के पानी में उथल-पुथल मचाता है, तो भारत में गर्मी क्यों बढ़ जाती है?

नक्शे से समझिए एल नीन्यो की ज्योग्राफी
तो जरा नक्शा देख लेते हैं. एक तो नक्शा हमें ऐसे देखने की आदत है, जिसमें उत्तर और दक्षिण अमेरिका बाईं तरफ होते हैं यानी पश्चिम में और ऑस्ट्रेलिया और जापान दाईं तरफ होते हैं यानी पूर्व में. स्कूल से ऐसे ही देखते आ रहे हैं और इस नक्शे में दक्षिण अमेरिका भारत के पश्चिम में होता है. लेकिन, दुनिया तो गोल है. तो नक्शे को अगर ऐसे खींचे पूर्व की तरफ से तो ऑस्ट्रेलिया के और आगे जाने पर क्या आएगा? दक्षिण अमेरिका ही आ जाएगा. और दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच में है साउथ पैसिफिक ओशियन या दक्षिण प्रशांत महासागर. यानी दाहिनी तरफ पूर्व में दक्षिण अमेरिका का किनारा है – पेरू और एक्वाडोर जैसे देश. बाईं तरफ यानी पश्चिम में एशिया और ऑस्ट्रेलिया है. अब भारत इस नक्शे पर बाईं तरफ है यानी पश्चिम में, प्रशांत से काफी दूर, हिंद महासागर के पास। 

एल नीन्यो क्यों बनता है?
सामान्य दिनों में क्या होता है कि प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से यानी दक्षिण अमेरिका के पास का पानी ठंडा रहता है. वहां ठंडा पानी ऊपर आता रहता है. जबकि पश्चिमी हिस्से यानी इंडोनेशिया और फिलीपींस के पास का पानी बहुत गर्म रहता है. हवाएं चलती है पूर्व से पश्चिम की तरफ यानी दक्षिण अमेरिका से एशिया की चरफ. इन हवाओं को कहते हैं ट्रेड विंड्स. ये हवाएं गर्म पानी को पश्चिम की तरफ धकेलती रहती हैं. यानी दक्षिण अमेरिका से एशिया वाली साइड पर गर्म पानी धकेलती रहती हैं. इस वजह से पूर्व में ठंडा पानी ऊपर आता रहता है, यानी प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका की तरफ ठंडा पानी ऊपर आता रहता है और गर्म पानी एशिया की तरफ जाता रहता है. लेकिन हर 2 से 7 साल में कभी-कभी ट्रेड विंड्स यानी ये वाली हलाएं कमजोर पड़ जाती हैं. इसको कहते हैं एल नीन्यो। 

…फिर भारत में नहीं होती है बारिश
जैसे किसी ने हवा का स्विच ऑफ कर दिया हो. तो वो गर्म पानी जो पश्चिम में जमा था, एशिया की तरफ जमा था वो अब पूर्व की तरफ यानी दक्षिण अमेरिका की ओर बहने लगता है. यानी पूरे प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. 0.5 डिग्री या उससे भी ज्यादा गर्म हो जाता है. इससे क्या होता है कि समुद्र के ऊपर की हवा गर्म हो जाती है. गर्म हवा ऊपर उठती है, बादल बनते हैं, बारिश होती है. लेकिन ये सब वहीं दक्षिण अमेरिका के पास हो जाता है, क्योंकि हवाएं इस तरफ़ चल ही नहीं रही होतीं तो बादल एशिया की तरफ आते ही नहीं वो वहीं पर बरस जाते हैं. दक्षिण अमेरिका में बारिश ही बारिश हो जाती है। 

कैसे प्रभावित होता है भारत का मौसम?
अब भारत पर आइए. हमारा मॉनसून पश्चिम की तरफ से आता है. मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम हवाओं से आता है. मतलब अरब सागर और हिंद महासागर के ऊपर से हवाएं आती हैं समुद्र के पाली की नमी लेकर. और जून से सितंबर तक भारी बारिश लाती हैं. एल नीन्यो होने प्रशांत महासागर में गर्म पानी की वजह से ये हवा का पूरा पैटर्न बदल जाता है. वो हवाएं जो भारत की तरफ नम हवा लाती हैं, वे कमजोर पड़ जाती हैं या रास्ता बदल लेती हैं. तो भारत के ऊपर भी बादल कम बनते हैं. आसमान ज़्यादातर साफ रहता है. अप्रैल, मई, जून के महीनों में सूरज की किरणें सीधे जमीन पर पड़ती हैं. कोई बादल छांव नहीं देता. जमीन तेजी से गर्म होती है. खासकर उत्तर भारत, मध्य भारत, राजस्थान, दिल्ली, यूपी, मध्य प्रदेश आदि इलाकों में। 

2 साल पहले भी हुई थी घटना
2023 में भी जब एल नीन्यो मजबूत था, तो भारत के कई शहरों में तापमान 45-48 डिग्री तक पहुंच गया था. मानसून कमजोर रहा, बारिश कम हुई, और गर्मी लंबी खिंच गई थी. यानी दूर प्रशांत महासागर में पानी गर्म होने से हवा की एक लंबी चेन चलती है जो हजारों किलोमीटर दूर भारत तक असर करती है। 

इस साल सुपर एल नीन्यो
अब इस साल क्या हो रहा है? एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि एल नीन्यो इस साल छोटा बच्चा नहीं रहेगा. ये सुपर एल नीन्यो हो सकता है. क्योंकि प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का पानी बहुत तेजी से गर्म हो रहा है. मध्य प्रशांत महासागर में तो साप्ताहिक तापमान पहले ही +0.9 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया है. पानी की ऊपरी सतह के नीचे भी बहुत गर्म पानी जमा हो गया है और 6 महीने से लगातार बढ़ रहा है. सुपर एल नीन्यो मतलब जब मध्य प्रशांत महासागर में पानी 2 डिग्री या उससे ज्यादा गर्म हो जाए. +0.9 डिग्री तो अभी से हो चुका है. लेकिन 2 डिग्री तक हो गया तो ऐसा 1950 के बाद कुछ ही बार हुआ है. 1982 में हुआ था, 1997 में हुआ था, 2015 में हुआ था. और इस साल इसलिए डर है क्योंकि प्रशांत महासागर में पानी बहुत तेजी से गर्म हो रहा है। 

भट्टी बन जाएगी धरती
धरती के पानी के नीचे बहुत ज्यादा गर्म पानी का बड़ा भंडार बन गया है. ये ऊपर आ रहा है और हवा के साथ मिलकर हवा को और गर्म कर रहा है. पूरी पृथ्वी पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग से गर्म हो रही है. इसलिए जब एल नीन्यो आता है, तो उसका असर और तेज हो जाता है. कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इस साल वाला 150 साल में सबसे मजबूत एल नीन्यो हो सकता है. अगर इस साल का एल नीन्यो, सुपर एल नीन्यो बन गया तो मॉनसून और भी कमजोर हो सकता है यानी बहुत कम बारिश हो सकती है, सूखा पड़ सकता है. गर्मी और हीटवेव की लहरें और लंबी और तेज चलेंगी. और उत्तर भारत पर, मध्य भारत पर और पश्चिम भारत पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा ऐसा हुआ तो. तो छोटे मियां तो छोटे मियां, सुपर एल नीन्यो अगर हो गया तो भट्टी बन जाएगी धरती। 

तेल संकट के बीच भारत दौरे पर आएंगी वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति, मार्को रुबियो का दावा

 नई दिल्ली

पश्चिम एशिया में जारी तनाव और होर्मुज स्ट्रेट संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा अब वैश्विक कूटनीति का बड़ा केंद्र बनती जा रही है. इसी बीच अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज अगले हफ्ते भारत दौरे पर आएंगी, जहां तेल सप्लाई और ऊर्जा सहयोग को लेकर अहम बातचीत होगी। 

रुबियो ने भारत रवाना होने से पहले कहा कि अमेरिका चाहता है कि भारत उससे “जितना चाहे उतना तेल खरीदे.” उन्होंने कहा, “हम भारत को जितनी ऊर्जा चाहिए उतनी बेचने के लिए तैयार हैं. हमें लगता है कि वेनेजुएला के तेल को लेकर भी बड़े मौके मौजूद हैं। .

मार्को रुबियो ने आगे कहा, “मेरी जानकारी के मुताबिक वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति अगले हफ्ते भारत आने वाली हैं.” रुबियो का यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट संकट की वजह से वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता बनी हुई है और भारत वैकल्पिक सप्लाई लाइनों की तलाश में जुटा है। 

भारत तेल खरीद को कर रहा डाइवर्सिफाई
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. होर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ने के बाद भारत लगातार सप्लाई डाइवर्सिफिकेशन पर काम कर रही है. ऐसे में वेनेजुएला, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, भारत के लिए अहम विकल्प बनकर उभर रहा है। 

दिलचस्प बात यह है कि जनवरी 2026 में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाया गया था, जिसके बाद डेल्सी रोड्रिगेज को अंतरिम राष्ट्रपति बनाया गया. तब से वॉशिंगटन और कराकस के रिश्तों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी रोड्रिगेज की कई बार तारीफ कर चुके हैं, खासकर तेल कंपनियों के साथ सहयोग को लेकर। 

तेल क्षेत्र में वेनेजुएला कर रहा सुधार
रिपोर्ट्स के मुताबिक, वेनेजुएला की नई सरकार विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए तेल क्षेत्र में बड़े सुधार कर रही है. अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को ज्यादा स्वतंत्रता देने, टैक्स कम करने और पीडीवीएसए के एकाधिकार को कमजोर करने जैसे कदम उठाए गए हैं। 

भारत और वेनेजुएला के रिश्तों में एक दिलचस्प सांस्कृतिक कनेक्शन भी है. डेल्सी रोड्रिगेज भारतीय आध्यात्मिक गुरु सत्य साईं बाबा की अनुयायी मानी जाती हैं और उपराष्ट्रपति रहते हुए वह दक्षिण भारत स्थित उनके आश्रम का दौरा भी कर चुकी हैं। 

रुबियो खुद 23 से 26 मई तक भारत दौरे पर रहेंगे. इस दौरान ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर बातचीत होगी. माना जा रहा है कि वेनेजुएला की राष्ट्रपति की यात्रा और रुबियो का दौरा, दोनों मिलकर भारत की ऊर्जा रणनीति में नए समीकरण पैदा कर सकते हैं। 

अल नीनो और IOD का डबल असर, धरती बनेगी तंदूर; सूखा और महंगाई का खतरा

 नईदिल्ली 
इस साल गर्मी ने अभी से ही पसीना छुड़ाना शुरू कर दिया है, लेकिन आने वाले दिनों में हालात बेहद गंभीर हो सकते हैं. मौसम वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि इस बार ‘एल नीन्यो’ साधारण नहीं, बल्कि ‘सुपर एल नीन्यो’ के तौर पर दस्तक दे सकता है. वैज्ञानिकों की चेतावनी सच निकली तो तय मानिए, इस बार गर्मी के पिछले सारे रिकॉर्ड टूटने वाले हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि कौन है ‘एल नीन्‍यो’, जिसकी वजह से गर्मी का हाहाकार मचना शुरू हो गया है। 

दरअसल, एल नीन्यो स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका मतलब है ‘छोटा बच्चा’. यह नाम स्‍पेनिश जरूर है, लेकिन इसका सीधा संबंध दक्षिण अमेरिका से है, जहां कभी स्पेन का हुआ करता था. लेकिन सवाल यह है कि दक्षिण अमेरिका का यह ‘बालक’ भारत में गर्मी क्यों बढ़ा रहा है? इसका जवाब छिपा है प्रशांत महासागर की हवाओं और पानी के तापमान में. आमतौर पर यहां पूर्व से पश्चिम की ओर हवाएं चलती हैं, लेकिन एल नीन्यो आने पर यह सिस्टम उलट जाता है और पूरा समुद्र गर्म होने लगता है। 

इस बार खतरा इसलिए ज्यादा है क्योंकि प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है. मध्य प्रशांत में तापमान 0.9 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है और नीचे की सतह पर गर्म पानी का बड़ा भंडार जमा हो गया है. अगर यही तापमान 2 डिग्री या उससे ज्यादा हो जाता है, तो यह ‘सुपर एल नीन्यो’ कहलाएगा. पिछले 70 सालों में ऐसा केवल 1982, 1997 और 2015 में हुआ था. विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार यह 150 साल का सबसे ताकतवर एल नीन्यो बन सकता है। 

भारत पर इसका असर यह होगा कि मानसून कमजोर पड़ेगा, बारिश कम होगी और उत्तर, मध्य व पश्चिम भारत में भयंकर लू चलेगी. ग्लोबल वार्मिंग पहले ही पृथ्वी को गर्म कर रही है, ऐसे में सुपर एल नीन्यो धरती को भट्टी बना सकता है। 

    यहां से आया एल नीन्‍यो का नाम : यह नाम स्पेनिश भाषा के शब्द ‘एल नीन्यो’ से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘छोटा बच्चा’ या ‘बालक’. दरअसल, दक्षिण अमेरिका के अधिकांश देशों पर कभी स्पेन का राज था, इसलिए वहां की मुख्य भाषा स्पेनिश है. मछुआरों ने देखा कि क्रिसमस के आसपास समुद्र का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता था, तो उन्होंने इसे मसीह के शिशु रूप से जोड़कर ‘एल नीन्यो’ नाम दे दिया. दिलचस्प बात यह है कि इस नाम का भारत से कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन इस मौसमी घटना का असर हजारों किलोमीटर दूर हमारे देश पर भी पड़ता है। 

यह नाम धीरे-धीरे पूरी दुनिया में मशहूर हो गया। 

    सामान्य दिनों में प्रशांत महासागर की हवाएं: सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर में ‘ट्रेड विंड्स’ नामक हवाएं पूर्व (दक्षिण अमेरिका) से पश्चिम (एशिया और ऑस्ट्रेलिया) की ओर चलती हैं. ये हवाएं समुद्र की सतह के गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती रहती हैं. इस वजह से इंडोनेशिया, फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के पास का पानी का तापमान लगभग 30 डिग्री तक पहुंच जाता है, जबकि दक्षिण अमेरिका के पेरू और एक्वाडोर के तट का पानी ठंडा रहता है. यहां पर इसका तापमान करीब 20 डिग्री तक रहता है. वहां ठंडा पानी नीचे से ऊपर आता रहता है. यही सामान्य स्थिति दुनिया भर के मौसम को संतुलित रखने में मदद करती है। 

    एल नीन्यो आने पर होने वाले बदलाव: जब एल नीन्यो आता है, तो ट्रेड विंड्स यानी पूर्व से पश्चिम चलने वाली हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या रुक जाती हैं. मानो किसी ने पंखे का स्विच ऑफ कर दिया हो. अब गर्म पानी जो पश्चिम (एशिया के पास) में जमा था, वह वापस पूर्व की ओर यानी दक्षिण अमेरिका की तरफ बहने लगता है. इससे पूरे प्रशांत महासागर का तापमान असामान्य रूप से 0.5 डिग्री या उससे अधिक बढ़ जाता है. यह गर्म पानी अपने ऊपर की हवा को भी गर्म करता है. गर्म हवा ऊपर उठती है, जिससे दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश होती है, लेकिन एशिया की तरफ बादल नहीं आ पाते हैं। 

    ‘छोटा बच्चा’ करेगा भारत को गर्म : भारत का मानसून मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम हवाओं पर निर्भर करता है, जो अरब सागर और हिंद महासागर से नमी लेकर आती हैं. लेकिन एल नीन्यो होने पर प्रशांत महासागर में गर्म पानी की वजह से हवा का पूरा पैटर्न बदल जाता है. वे हवाएं जो भारत की तरफ नमी लाती हैं, कमजोर पड़ जाती हैं या अपना रास्ता बदल लेती हैं. नतीजतन, भारत के ऊपर बादल नहीं बनते, आसमान साफ रहता है. अप्रैल-जून में सूरज की तेज किरणें सीधे जमीन पर पड़ती हैं और कोई छांव नहीं होती. यही कारण है कि उत्तर भारत, राजस्थान, दिल्ली, यूपी, मध्य प्रदेश जैसे इलाके भट्टी की तरह गर्म हो जाते हैं। 

    बड़ी बला से कम नहीं ‘सुपर एल नीन्यो’: सुपर एल नीन्यो साधारण एल नीन्यो का बेहद खतरनाक रूप होता है. इसे तब कहा जाता है, जब मध्य प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का पानी सामान्य तापमान से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक गर्म हो जाए. 1950 के बाद ऐसा केवल तीन बार हुआ है. 1982, 1997 और 2015 में. हर बार इसने दुनिया भर में भीषण सूखा, बाढ़ और असहनीय गर्मी जैसी मौसमी आपदाएं पैदा कीं. इस बार वैज्ञानिक देख रहे हैं कि पानी का तापमान रिकॉर्ड तेजी से बढ़ रहा है, जिससे डर है कि यह 150 साल का सबसे शक्तिशाली सुपर एल नीन्यो बन सकता है। 

सुपर एल नीन्‍यो आया तो क्‍या होगा उसका असर

    कैसा है इस बार का सुपर एल नीन्यो: इस बार की खासियत यह है कि प्रशांत महासागर में न केवल सतह का पानी गर्म हो रहा है, बल्कि सतह के नीचे गर्म पानी का एक विशाल भंडार बन चुका है. यह भंडार लगातार 6 महीने से बढ़ रहा है और अब ऊपर आ रहा है. मध्य प्रशांत में साप्ताहिक तापमान पहले ही +0.9 डिग्री सेल्सियस पहुंच चुका है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब यह नीचे का गर्म पानी पूरी तरह ऊपर आ जाएगा, तो तापमान 2 डिग्री के पार जा सकता है. पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग से पृथ्वी गर्म है, इसलिए इस बार का असर और भी विनाशकारी हो सकता है. कुछ विशेषज्ञ इसे 150 साल का सबसे खतरनाक एल नीन्यो बता रहे हैं। 

    सुपर एल नीन्यो का भारत में असर: अगर यह सुपर एल नीन्यो बन गया तो भारत के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी. पहला असर मानसून पर पड़ेगा यह बहुत कमजोर रहेगा, जिससे देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ सकता है. दूसरा असर तापमान पर पड़ेगा. मई और जून के महीनों में उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत के शहरों में पारा 48 डिग्री या उससे भी ऊपर जा सकता है. हीटवेव यानी लू के दौरान 2-3 दिनों की बजाय हफ्तों तक चल सकती है. खासकर राजस्थान, दिल्ली, यूपी, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में हालात बेहद खराब होंगे. बिजली और पानी के संकट भी गहरा सकते है। 

    पिछले सुपर एल नीन्यो में मौसम: 2015 में आए सुपर एल नीन्यो की याद करें तो उस साल भारत में मानसून 14 फीसदी कमजोर रहा था, जिससे कई राज्यों में सूखे जैसे हालात हो गए थे. 1997 वाले सुपर एल नीन्यो ने दुनिया भर में भारी तबाही मचाई थी – पेरू में बाढ़, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भयंकर सूखा और जंगल की आग लगी थी. 1982 में भी इसने वैश्विक मौसम को अस्त-व्यस्त कर दिया था. अब वैज्ञानिक डरे हुए हैं क्योंकि उन तीनों बार की तुलना में इस बार समुद्र का पानी ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है. अगर इतिहास दोहराता है, तो इस बार हालात उससे भी बदतर हो सकते हैं। 

    ग्लोबल वार्मिंग का सुपर एल नीन्यो पर असर: ग्लोबल वार्मिंग के कारण पूरी दुनिया के समुद्रों का सामान्य तापमान पहले ही बढ़ चुका है. जब एल नीन्यो आता है, तो यह बढ़े हुए तापमान में और इजाफा कर देता है. ऐसे में साधारण एल नीन्यो भी पहले से ज्यादा खतरनाक हो गया है. लेकिन सुपर एल नीन्यो का असर तो और भी भयंकर हो जाता है. मान लीजिए, ग्लोबल वार्मिंग ने पृथ्वी को 1 डिग्री गर्म कर दिया है, और सुपर एल नीन्यो इसमें 2 डिग्री और जोड़ देगा, तो कुल मिलाकर 3 डिग्री का असर होगा. यही कारण है कि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इस बार धरती ‘भट्टी’ बन सकती है, क्योंकि दोनों की ताकतें एक साथ मिल रही हैं। 

एल नीन्यो से भारत में गर्मी क्यों बढ़ जाती है?
एल नीन्यो आने पर प्रशांत महासागर में ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे गर्म पानी पूर्व की ओर दक्षिण अमेरिका के पास चला जाता है. इस बदलाव का असर हवाओं के पूरे पैटर्न पर होता है. जो हवाएं भारत की तरफ हिंद महासागर और अरब सागर से नमी लाती हैं, वे कमजोर पड़ जाती हैं या रास्ता बदल लेती हैं. नतीजतन, भारत के ऊपर बादल नहीं बनते और आसमान साफ रहता है. गर्मी के मौसम में सूरज की सीधी किरणें जब बिना किसी रुकावट के जमीन पर पड़ती हैं, तो तापमान तेजी से बढ़ जाता है. इसी वजह से उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में लू चलने लगती है और मानसून कमजोर हो जाता है। 

‘सुपर एल नीन्यो’ सामान्य एल नीन्यो से कैसे अलग है?
सामान्य एल नीन्यो में प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री सतह का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है. वहीं सुपर एल नीन्यो तब कहलाता है जब यह तापमान 2 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक हो जाए. सुपर एल नीन्यो का असर कहीं अधिक व्यापक होता है. यह न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में मौसम को अस्त-व्यस्त कर देता है. सामान्य एल नीन्यो में हल्की गर्मी और थोड़ी कम बारिश होती है, जबकि सुपर एल नीन्यो में भीषण सूखा, अभूतपूर्व हीटवेव, जंगल की आग और कहीं भारी बाढ़ जैसी आपदाएं आती हैं। 

क्या इस साल वाकई 150 साल में सबसे गर्मी पड़ सकती है?
कई मौसम विशेषज्ञों और जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल का एल नीन्यो 150 साल का सबसे ताकतवर सुपर एल नीन्यो बन सकता है. इसका कारण यह है कि प्रशांत महासागर का पानी पिछली बार की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है. सतह के नीचे गर्म पानी का विशाल भंडार 6 महीने से लगातार बढ़ रहा है और अब ऊपर आ रहा है. मध्य प्रशांत में तापमान पहले ही +0.9 डिग्री पहुंच चुका है, जो सामान्य एल नीन्यो से कहीं अधिक है. साथ ही, ग्लोबल वार्मिंग का असर पहले से ही है, जो इस खतरे को और बढ़ा रहा है. अगर ऐसा हुआ तो पिछले सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे। 

भारत के किन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा है?
सुपर एल नीन्यो का सबसे बुरा असर उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत पर पड़ेगा. खास तौर पर राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस या उससे भी ऊपर जा सकता है. इन इलाकों में पहले से ही गर्मी के रिकॉर्ड टूटते रहे हैं. इस बार हीटवेव की लहरें लंबी और ज्यादा तेज होंगी. मानसून के कमजोर रहने से यहां सूखे जैसे हालात हो सकते हैं, जिससे फसलों को नुकसान होगा और पानी की किल्लत भी हो सकती है. तटीय इलाकों पर मुकाबले कम असर होगा। 

क्या ग्लोबल वार्मिंग का भी इसमें हाथ है?
हां, ग्लोबल वार्मिंग सुपर एल नीन्यो को और अधिक खतरनाक बना रही है. पहले से ही जंगल काटने और प्रदूषण बढ़ाने के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है. समुद्र भी गर्म हो गए हैं. जब एल नीन्यो जैसी प्राकृतिक घटना इस बढ़े हुए तापमान के ऊपर और गर्मी डालती है, तो असर दोगुना हो जाता है. यानी ग्लोबल वार्मिंग बेसलाइन को गर्म कर देती है, और एल नीन्यो उसमें इजाफा करता है। 

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर बड़ा अपडेट, अमेरिकी राजदूत बोले- जल्द दिल्ली पहुंचेगी हमारी टीम

नई दिल्ली
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने गुरुवार कहा कि भारत का तेजी से बढ़ता विनिर्माण क्षेत्र, मजबूत डिजिटल ढांचा, नवाचार क्षमता और कुशल मानव संसाधन अमेरिका की तकनीक, निवेश, आधुनिक शोध और कारोबार में उसकी मजबूत स्थिति को पूरा करते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देशों का लक्ष्य है कि साल 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा, यह दिखाता है कि दोनों अर्थव्यवस्थाएं कितनी तेजी से एक-दूसरे के करीब आ रही हैं और भरोसा कितना बढ़ा है। गोर ने ये बातें अमेरिकी वाणिज्य मंडल के वार्षिक लीडरशिप समिट में कहीं।  

’20 वर्षों में 220 अरब डॉलर से अधिक हुआ व्यापार’
उन्होंने कहा कि पिछले 20 साल में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार लगभग 20 अरब डॉलर से बढ़कर 220 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। यह करीब 11 गुना की बढ़ोतरी है, जो मजबूत आर्थिक संबंधों और भरोसे को दर्शाता है। सर्जियो गोर ने कहा कि आज भारत और अमेरिका एक-दूसरे के बड़े व्यापारिक साझेदार बन चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह हर हफ्ते अमेरिकी दूतावास में आने वाले लोगों से प्रभावित होते हैं और यह देखते हैं कि अमेरिका की बड़ी कंपनियों के प्रमुख अब भारत को प्राथमिकता दे रहे हैं। उबर, वॉलमार्ट, बोइंग, लॉकहीड और जीई जैसी बड़ी कंपनियों के अधिकारी लगातार भारत आ रहे हैं। यह दिखाता है कि दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

उन्‍होंने कहा कि हम इस डील को फाइनल करने के लिए उत्‍सुक हैं, जिससे मार्केट पहुंच का विस्‍तार होगा, बाधाएं कम होंगी और दोनों देशों के व्‍यवसायों के लिए ज्‍यादा निश्चितता पैदा होगी. अगर यह डील सही ढंग से होती है तो यह सप्‍लाई चेन को मजबूत करेगा, नए निवेशों को बढ़ावा देगा और समावेशी विकास को गति देगा. जिससे उद्योगों, श्रमिकों और अर्थव्यवस्थाओं को बड़ा लाभ होगा। 

दोनों देशों के बीच बातचीत जारी 
अंतरिम समझौते के बारीक पहलुओं पर चर्चा करने के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल पिछले महीने वाशिंगटन गया था. अब उम्मीद है कि तकनीकी चर्चाओं के अगले दौर के लिए अमेरिकी  प्रतिनिधिमंडल अगले महीने भारत का दौरा करेगा. इसी शिखर सम्मेलन के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने आगामी अमेरिकी दौरे की पुष्टि की और राजदूत के समय-सीमा संबंधी आशावाद का समर्थन किया। 

23 मई को मार्को रुबियो आ रहे भारत
 जब उनसे पूछा गया कि क्या द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए अमेरिका के मुख्य व्यापार वार्ताकार विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ उनकी आगामी भारत यात्रा पर जाएंगे, तो गोयल ने स्पष्ट किया कि वह उनके साथ नहीं आ रहे हैं, लेकिन अगले महीने उनके आने की कुछ योजना है. रुबियो 23 मई से भारत की चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा शुरू करने वाले हैं, जो देश की उनकी पहली यात्रा होगी और इसमें व्यापार, रक्षा और ऊर्जा सहयोग शामिल होगा। 

व्यापार समझौते पर अंतिम चरण में बातचीत
द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मकसद ऐसा समझौता करना है, जिससे अमेरिकी कंपनियों और कामगारों को अधिक अवसर मिलें। उन्होंने बताया कि अस्थायी व्यापार समझौते पर दोनों देशों के बीच चल रहा वार्ता अंतिम चरण में है और इससे दोनों देशों को लाभ होगा। उन्होंने कहा कि नया समझौता बाजार तक पहुंच आसान बनाएगा, व्यापार की बाधाएं कम करेगा और कारोबार को स्थिरता देगा। इससे आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी, निवेश बढ़ेगा और विकास को गति मिलेगी। 

उन्होंने यह भी बताया कि हाल ही में भारतीय प्रतिनिधिमंडल अमेरिका गया था और अगले महीने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भारत आएगा, ताकि बातचीत आगे बढ़ सके। उन्होंने कहा कि यह बातचीत पिछले डेढ़ साल से चल रही है, जबकि यूरोपीय संघ के साथ समझौते में लगभग 19 साल लगे थे। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले कुछ हफ्तों या महीनों में यह समझौता पूरा हो जाएगा।

भारतीय बाजार में निवेश कर रहीं अमेरिकी कंपनियां
उन्होंने आगे कहा कि दोनों देशों के बीच निवेश लगातार बढ़ रहा है। भारतीय कंपनियां अमेरिका में दवा, विनिर्माण और तकनीक के क्षेत्र में तेजी से निवेश बढ़ा रही हैं, जबकि अमेरिकी कंपनियां भारत के तेजी से बढ़ते बाजार में निवेश कर रही हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में 20 अरब डॉलर से अधिक निवेश करने का वादा किया है, जो बहुत बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि हर देश का दूतावास निवेश लाने की कोशिश करता है। लेकिन इस मामले में भारत में अमेरिकी दूतावास को दुनिया में पहला स्थान मिला है, जो एक बड़ी उपलब्धि है। 

2050 तक भारत की धार्मिक तस्वीर कैसी होगी? हिंदू, मुस्लिम और अन्य धर्मों की आबादी पर बड़ा अनुमान

नई दिल्ली

भारत में इस समय जनगणना चल रही है और माना जा रहा है कि जनगणना के पूरी होने के बाद देश की आबादी के आंकड़ों में काफी बदलाव देखने को मिल सकता है. दरअसल सिर्फ भारत की ही जनगणना नहीं बल्कि 2050 तक अनुमान लगाया जा रहा है कि दुनिया की धार्मिक आबादी में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार आने वाले दशकों में मुस्लिम आबादी सबसे तेजी से बढ़ेगी, जबकि हिंदू आबादी में भी बढ़ोतरी जारी रहेगी. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत 2050 तक हिंदू बहुसंख्यक देश बना रहेगा. लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी भी भारत में ही रहने वाली है. वहीं मौजूदा समय में इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश है, लेकिन आने वाले वर्षों में यह स्थिति बदल सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि 2050 तक भारत में हिंदू जनसंख्या कितनी हो जाएगी और कितने लोग इस्लाम और दूसरे धर्म मानेंगे। 

2050 तक कितनी होगी हिंदू और मुस्लिम आबादी?
प्यू रिसर्च के अनुसार साल 2010 में दुनिया की कुल आबादी करीब 6.9 अरब थी जो 2050 तक बढ़कर 9.3 अरब तक पहुंच सकती है. इसी दौरान मुस्लिम आबादी में सबसे तेज वृद्धि होने का अनुमान लगाया जा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार 2010 के मुकाबले 2050 तक मुस्लिम आबादी करीब 73 फीसदी बढ़ सकती है. वही हिंदुओं की आबादी में लगभग 34 फीसदी बढ़ोतरी का अनुमान है. रिपोर्ट के अनुसार 2010 में दुनिया में मुसलमानों की आबादी करीब 1.6 अरब थी जो 2050 तक बढ़कर लगभग 2.76 अरब हो जाएगी. दूसरी तरफ हिंदुओं की आबादी 1.3 अरब से बढ़कर 1.38 अरब तक पहुंच सकती है। 

दुनिया की आबादी में कितना हिस्सा होगा? 
आंकड़ों के अनुसार 2010 में दुनिया की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 23.2 फीसदी थी, जो 2050 तक बढ़कर करीब 29.7 फीसदी हो सकती है. वहीं हिंदुओं की हिस्सेदारी 15 फीसदी से मामूली घटकर 14.9 फीसदी रहने का अनुमान है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगले चार दशकों तक ईसाई दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक समूह बने रहेंगे, लेकिन मुस्लिम आबादी तेजी से उनके करीब पहुंच जाएगी। 

भारत में क्या होगी स्थिति?
रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2050 तक हिंदू आबादी सबसे ज्यादा रहेगी. अनुमान है कि उस समय भारत में हिंदुओं की आबादी करीब 1.29 अरब हो सकती है. वहीं मुस्लिम आबादी 31 करोड़ से ज्यादा पहुंचने का अनुमान है, यानी दुनिया की कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 11 फीसदी हिस्सा अकेला भारत में रहेगा. अगर अनुमान सही साबित होते हैं तो 2050 तक भारत की कुल आबादी करीब 166 करोड़ हो सकती है, जिसमें लगभग 78 फीसदी हिंदू और 18 फीसदी मुस्लिम होंगे. वहीं 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी 121 करोड़ से ज्यादा थी. इसमें हिंदुओं की संख्या 96.63 करोड़ और मुस्लिमों की संख्या 17.22 करोड़ थी. कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 79.8 फीसदी और मुस्लिमों की 14.2 फीसदी थी. इनके अलावा ईसाई 2.3 फीसदी और सिख 1.7 फीसदी आबादी का हिस्सा थे। 

8वें वेतन आयोग पर बड़ा अपडेट, सालाना इंक्रीमेंट को लेकर बढ़ी कर्मचारियों की उम्मीदें

नई दिल्ली
 केंद्रीय कर्मचारियों के लिए एक बड़ी और अच्छी खबर आ रही है. सरकार अभी आठवें वेतन आयोग (8th Central Pay Commission) को लेकर अलग-अलग संगठनों से बातचीत कर रही है और उनकी राय जान रही है. इसी बीच, केंद्रीय कर्मचारियों के संगठनों मतलब स्टाफ साइड (Staff Side) ने सरकार के सामने कुछ स्पेशल मांगें रखी हैं. अगर सरकार इन मांगों को मान लेती है, तो सरकारी कर्मचारियों की सैलरी में हर साल होने वाली बढ़ोतरी दोगुनी हो जाएगी और न्यूनतम वेतन भी पहले से कई गुना बढ़ जाएगा। 

कर्मचारियों के संगठनों ने राष्ट्रीय संयुक्त परामर्श तंत्र (National Council of Joint Consultative Machinery) के जरिए आठवें वेतन आयोग को एक मांग पत्र भेजा है. इस मांग पत्र में सबसे बड़ी बात यह कही गई है कि कर्मचारियों की सैलरी की समीक्षा के लिए अब 10 साल का लंबा इंतजार नहीं होना चाहिए. महंगाई और बदलते आर्थिक हालातों को देखते हुए हर 5 साल में सैलरी को दोबारा तय किया जाना चाहिए. इसके साथ ही, संगठनों ने मांग की है कि कर्मचारियों की सालाना वेतन बढ़ोतरी (Annual Increment) की दर को मौजूदा 3% से बढ़ाकर सीधे 6% कर दिया जाए. कर्मचारियों का मानना है कि महंगाई के इस दौर में ठीक-ठाक जीवन जीने के लिए इतना इंक्रीमेंट बहुत जरूरी है। 

न्यूनतम सैलरी कितनी हो..?
संगठनों ने यह भी सुझाव दिया है कि आठवें वेतन आयोग के तहत अलग-अलग पे स्केल्स को आपस में मिला देना चाहिए. इसके अलावा, सबसे निचले स्तर लेवल-1 (Level 1) के कर्मचारी की न्यूनतम शुरुआती सैलरी करीब 69,000 रुपये प्रति महीना की जानी चाहिए. संगठनों का कहना है कि एक अच्छा और सही वेतन ढांचा देश के लिए बहुत जरूरी है. इससे सरकारी नौकरी में बेहतरीन और टैलेंटेड युवाओं को आकर्षित किया जा सकेगा, पुराने और अनुभवी कर्मचारियों को नौकरी में बनाए रखा जा सकेगा और सरकारी कामकाज में भी तेजी आएगी। 

खर्च नहीं, देश की तरक्की में एक निवेश है सैलरी बढ़ाना
आमतौर पर माना जाता है कि वेतन आयोग लागू होने से सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ता है. अभी सरकार अपनी कुल कमाई का करीब 13% हिस्सा कर्मचारियों की सैलरी, भत्तों और पेंशन पर खर्च करती है. नया वेतन आयोग आने से यह खर्च और बढ़ेगा. लेकिन कर्मचारी संगठनों का नजरिया बिल्कुल अलग है. उनका कहना है कि सैलरी पर होने वाले इस खर्च को बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक निवेश (Investment) की तरह देखा जाना चाहिए. जब कर्मचारियों की सैलरी बढ़ेगी, तो बाजार में उनकी परचेजिंग पावर बढ़ेगी. लोग ज्यादा सामान खरीदेंगे तो बाजार में डिमांड बढ़ेगी और जब मांग बढ़ेगी तो सरकार के पास टैक्स के रूप में ज्यादा पैसा वापस आएगा. इस तरह यह पूरा चक्र देश की आर्थिक तरक्की में मदद करेगा. बता दें कि आठवें वेतन आयोग को अपनी पूरी रिपोर्ट और सिफारिशें सरकार को सौंपने में करीब 18 महीने का समय लग सकता है। 

जोशीमठ में 7 किमी लंबा जाम, गर्मी और छुट्टियों में वाहनों का भारी दबाव

जोशीमठ

उत्तर भारत में लगातार बढ़ते तापमान और छुट्टियों के सीजन के चलते पहाड़ों पर भीड़ कम नहीं हो रही है. वहीं चारधाम यात्राएं भी जारी हैं, जिसके कारण प्रमुख रास्तों पर जाम लगना आम होता जा रहा है. शुक्रवार को जोशीमठ जिले में फिर से भयंकर जाम लगने की बात सामने आई है. ये जाम 7 किलोमीटर तक लंबा रहा, जिसके कारण यात्रा पर श्रद्धालुओं को अधिक समय जाम में फंसे रहना पड़ रहा है. ये सिलसिला देर रात तक रहता है। 

जानकारी के मुताबिक, जोशीमठ में एक बार फिर से भयंकर जाम लग गया है. मारवाड़ी से टीसीपी जोशीमठ तक गाड़ियों की लंबी लाइन 6 से 7 किलोमीटर तक पहुंच गई और  पूरी कतार लगातार बढ़ती ही जा रही है. इस दौरान पुलिस मौके पर मौजूद रही, एक तरफ की गाड़ियों को छोड़ा जा रहा है लेकिन आधा घंटे के अंतराल में ही यहां 6 से 7 किलोमीटर की लंबी गाड़ियों की कतार देखने को मिल रही है, जो कि हर किसी के लिए मुसीबत बन रही है. ऐसे में चार धाम यात्रियों को भी अधिक से अधिक टाइम जाम में फंसे रहना पड़ रहा है. हालांकि एक साइड की गाड़ियां पूरी होने के बाद दूसरी साइड की गाड़ियां छोड़ी जाएंगी लेकिन यह सिलसिला रोजाना देर रात तक देखने को मिल रहा है। 

असल में जोशीमठ के जीरो बेंड से लेकर मारवाड़ी तक सड़क कई जगहों पर बहुत संकरी हो गई है. सड़क संकरी होने के कारण लगातार जाम लग रहा है. इस समय बद्रीनाथ धाम से लौटने वाली गाड़ियों को निकाला जा रहा है, जिसकी वजह से बद्रीनाथ धाम जाने वाली गाड़ियों की लंबी कतार मारवाड़ी से टीसीपी जोशीमठ 6-7 किलोमीटर तक फैल गई है। 

पिछले 2 साल से सड़क चौड़ीकरण का काम नहीं हुआ है. अब यही जाम यात्रियों के लिए बड़ी मुश्किल बन गया है. अभी तो सिर्फ बद्रीनाथ वाले यात्री आ रहे हैं लेकिन दो दिन बाद हेमकुंड साहिब की यात्रा भी शुरू हो जाएगी. जून महीना मुख्य सीजन का होता है, जब बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी में सबसे ज्यादा भीड़ होती है. अगर ऐसे ही लगातार जाम लगा रहा तो यात्रा कैसे सुचारू चलेगी? कहीं न कहीं अब इस समस्या का जल्दी समाधान निकालना बहुत जरूरी है. वरना अब रोजाना जाम यात्रियों. के लिए मुश्किल खड़ी कर रहा है। 

रिजर्व बैंक का बड़ा तोहफा, सरकार को मिलेगा अब तक का सबसे बड़ा डिविडेंड

नई दिल्ली

ग्लोबल टेंशन के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सरकार के लिए संकटमोचक बनेगा । दरअसल, RBI की ओर से इस वर्ष सरकार को अब तक का सबसे अधिक डिविडेंड दिए जाने की दी मंजूरी । ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार सरकार को इस हफ्ते रिजर्व बैंक से रिकॉर्ड 2.87 ट्रिलियन रुपये रुपये का सरप्लस ट्रांसफरमिलेगा । RBI बोर्ड शुक्रवार को इस डिविडेंड को मंजूरी दी । बता दें कि RBI ने 2024-25 के लिए केंद्र सरकार को 2.69 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड डिविडेंड दिया था जो इससे पिछले वर्ष 2023-24 के 2.11 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 27 प्रतिशत अधिक था।

बहुत से लोगों को लगता है कि आरबीआई किसी निजी कंपनी की तरह अपने शेयरधारकों को डिविडेंड देता होगा, लेकिन ऐसा नहीं है. आरबीआई पूरी तरह देश का केंद्रीय बैंक है और भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 की धारा 47 के तहत यह तय है कि अपने खर्च और जरूरी रिजर्व फंड अलग रखने के बाद जो अतिरिक्त पैसा बचेगा, उसे केंद्र सरकार को ट्रांसफर किया जाएगा. इसी अतिरिक्त रकम को सरप्लस ट्रांसफर या डिविडेंड कहा जाता है. सरकार के लिए यह गैर कर राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है. इस पैसे का इस्तेमाल वित्तीय घाटा कम करने, सड़क, रेलवे और हाईवे जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को फंड करने और कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बढ़ाने के लिए किया जाता है। 

RBI आखिर कमाई कैसे करता है
आरबीआई आम बैंकों की तरह लोगों को लोन नहीं देता, लेकिन उसके पास कमाई के कई बड़े स्रोत होते हैं। 

    सबसे बड़ा जरिया विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेक्स रिजर्व है. आरबीआई अरबों डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड जैसी सुरक्षित जगहों पर निवेश करता है, जिससे उसे ब्याज के रूप में भारी कमाई होती है। 

    इसके अलावा डॉलर और रुपये की खरीद-बिक्री से भी केंद्रीय बैंक को फायदा होता है. जब बाजार में रुपये पर दबाव बढ़ता है, तब आरबीआई डॉलर बेचकर बाजार को स्थिर करने की कोशिश करता है. इसी तरह के फॉरेक्स ऑपरेशंस से भी मुनाफा कमाया जाता है। 

    सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज और नोट छापने की लागत और उसकी वास्तविक वैल्यू के बीच का अंतर भी आरबीआई की कमाई का हिस्सा होता है। 

इस बार रिकॉर्ड डिविडेंड की वजह क्या है
वित्त वर्ष 2026 के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब 10 प्रतिशत की कमजोरी देखने को मिली. इससे आरबीआई की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का मूल्य बढ़ा और उसकी बैलेंस शीट मजबूत हुई. इसके अलावा केंद्रीय बैंक ने रुपये की तेज गिरावट को रोकने के लिए डॉलर बेचकर बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप किया. इससे भी आरबीआई को अच्छा फायदा हुआ. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी बढ़कर करीब 688 अरब डॉलर तक पहुंच गया. निवेश से बेहतर रिटर्न और फॉरेक्स ऑपरेशंस की मजबूत कमाई ने केंद्रीय बैंक के सरप्लस को और बढ़ाने में मदद की। 

सरकार के लिए क्यों अहम है यह रकम
पिछले कुछ वर्षों में आरबीआई से मिलने वाला डिविडेंड तेजी से बढ़ा है और यह सरकार के लिए बेहद अहम राजस्व स्रोत बन चुका है. पिछले तीन वित्त वर्षों में यह रकम तीन गुना से ज्यादा बढ़ चुकी है. अगर इस बार सरकार को 3.5 लाख करोड़ रुपये तक का डिविडेंड मिलता है, तो इससे सरकार को उधारी कम लेने में मदद मिल सकती है. साथ ही वित्तीय घाटे को नियंत्रित रखने और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर खर्च जारी रखने में भी राहत मिलेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भी आरबीआई की ओर से सरकार को ऊंचे स्तर का डिविडेंड मिलता रह सकता है, हालांकि केंद्रीय बैंक ने अभी तक आधिकारिक तौर पर संभावित भुगतान पर कोई टिप्पणी नहीं की है। 

रिजर्व बैंक केैसे करता है कमाई?
RBI अपनी विदेशी मुद्रा संपत्तियों, सरकारी बॉन्ड निवेश और करेंसी छपाई से होने वाली आय के जरिए यह सरप्लस कमाता है। बहरहाल, यह सरप्लस ऐसे समय में मिलने जा रहा है जब अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जंग की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। इससे भारत का आयात बिल बढ़ने, चालू खाते के घाटे पर दबाव बनने और विदेशी निवेशकों की बिकवाली तेज होने की आशंका है। इसी दबाव के बीच RBI का यह बड़ा भुगतान सरकार के लिए राहत का काम करेगा।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
PGIM इंडिया एसेट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड में फिक्स्ड इनकम के प्रमुख पुनीत पाल के मुताबिक बॉन्ड मार्केट पहले से ही RBI से मिलने वाले लगभग 3 ट्रिलियन रुपये के भुगतान को अपनी कीमतों में शामिल कर चुका है। उन्होंने कहा कि ज्यादा डिविडेंड राजकोषीय प्रबंधन में मदद कर सकता है लेकिन इसका तब तक कोई खास असर नहीं पड़ेगा जब तक कि यह काफी ज्यादा न हो।

IAS माता-पिता के बच्चों को आरक्षण क्यों? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी बहस

नई दिल्ली

ओबीसी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया है कि यदि किसी बच्चे के माता-पिता दोनों भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी हैं, तो उन्हें आरक्षण का लाभ क्यों दिया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी पिछड़े वर्गों के क्रीमी लेयर से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की है. न्यायालय ने कहा कि ऐसे बच्चों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और क्रीमी लेयर के बीच के अंतर को भी स्पष्ट किया. अदालत ने जोर दिया कि EWS आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर दिया जाता है, जबकि क्रीमी लेयर सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से सक्षम लोगों को पहचानता है। 

ओबीसी आरक्षण और क्रीमी लेयर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बड़ी टिप्पणी सामने आई है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर किसी उम्मीदवार के दोनों माता-पिता IAS अधिकारी हैं, तो उसे आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए? कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद एक बार फिर क्रीमी लेयर और आरक्षण की सीमा को लेकर बहस तेज हो गई है। 

मामले की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने की. सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि आरक्षण का असली मकसद समाज के उन लोगों तक फायदा पहुंचाना है, जो वास्तव में पिछड़े और वंचित हैं. उन्होंने पूछा कि जब किसी परिवार के माता-पिता देश की सबसे ऊंची प्रशासनिक सेवाओं में पहुंच चुके हैं, तब उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ देने की जरूरत क्यों होनी चाहिए?

शोषित और वंचितों को मिले रिजर्वेशन
सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा- जिनके माता-पिता दोनों IAS अधिकारी हैं, उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आरक्षण का असली मकसद उन लोगों तक फायदा पहुंचाना है, जो वास्तविक रूप से शोषित और वंचित हैं।

‘मां-बाप के पास अच्छी जॉब, उन्हें रिजर्वेशन से निकल जाना चाहिए’
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एजुकेशनल और इकोनॉमिक प्रोग्रेस से सोशल मोबिलिटी आती है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा-  बच्चों के माता-पिता अच्छी जॉब में है, अच्छा कमा रहे हैं, और उनके बच्चे फिर से रिजर्वेशन चाहते हैं। देखिये उन्हें रिजर्वेशन से बाहर आना चाहिए।

EWS में आर्थिक पिछड़ापन
सुप्रीम कोर्ट ने इकोनॉमिक वीक सेक्सशन (EWS) और सोशली बैकवार्ड कम्युनिटी के बीच रिजर्वेशन के अंतर को स्पष्ट किया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा- EWS में सामाजिक पिछड़ापन नहीं है, लेकिन आर्थिक पिछड़ापन है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर संबंधित पक्षों से जवाब भी मांगा है।

सुनवाई के दौरान वकील शशांक रत्नू ने कोर्ट में पक्ष रखते हुए कहा कि उन्हें वेतन के कारण नहीं, बल्कि उनकी स्थिति के कारण बर्खास्त किया गया था. वे ग्रुप ए के कर्मचारी हैं और इसलिए उन्हें बर्खास्त किया गया है. ग्रुप बी के कर्मचारियों को भी बर्खास्त किया जाता है. कर्मचारियों को सिर्फ वेतन के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक और प्रशासनिक स्थिति के आधार पर क्रीमी लेयर में रखा गया है। 

उन्होंने कहा कि ग्रुप ए के कर्मचारियों को इसी वजह से क्रीमी लेयर के दायरे में रखा जाता है. वकील शशांक रत्‍नू ने यह भी कहा कि केवल ग्रुप ए ही नहीं, बल्कि कुछ मामलों में ग्रुप बी कर्मचारियों को भी क्रीमी लेयर के तहत बाहर किया जाता है. इस दौरान कोर्ट ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर आरक्षण का लाभ किन लोगों तक सीमित होना चाहिए और किन्हें इससे बाहर रखा जाना चाहिए। 

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि लंबे समय से OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर की सीमा और उसके मानकों को लेकर बहस चल रही है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि आरक्षण का फायदा समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों तक पहुंचना चाहिए, जबकि कुछ लोग इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखते हैं। 

पहलगाम हमले की चार्जशीट में बड़ा खुलासा, सबसे पहले सलमान ने चलाई थी गोली

पहलगाम

पहलगाम आतंकी हमले की चार्जशीट ने उस खौफनाक साजिश की परतें खोल दी हैं, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच में सामने आया है कि पहलगाम घूमने आए निर्दोष पर्यटकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया. इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. शुरुआती जांच में ही पता चल गया था कि इस वारदात को लश्कर-ए-तैयबा के संगठन TRF यानी द रजिस्टेंस फ्रंट ने अंजाम दिया. हमले के कुछ ही देर बाद TRF ने इसकी जिम्मेदारी ली थी, लेकिन बाद में उसने अपने बयान से पलटते हुए इसे फॉल्स नैरेटिव बता दिया। 

इस हमले की जांच जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अनंतनाग के एडिशनल एसपी गुलाम हसन को सौंपी थी. जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि हमले को तीन आतंकियों ने मिलकर अंजाम दिया था. इनमें फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान, हबीब ताहिर उर्फ छोटू और हमजा अफगानी शामिल थे. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, वैसे-वैसे इस पूरे हमले के मास्टरमाइंड का नाम भी सामने आया. जांच एजेंसियों ने बताया कि इस हमले की साजिश सज्जाद जट्ट उर्फ अली भाई ने रची थी, जो लंबे समय से आतंकी गतिविधियों से जुड़ा हुआ था। 

हमले के तुरंत बाद घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाया गया और पुलिस व फॉरेंसिक टीमों ने घटनास्थल को अपने कब्जे में ले लिया. पूरे इलाके की घेराबंदी की गई और सबूत जुटाने का काम शुरू हुआ. मौके से हथियारों से जुड़े अहम सुराग, कारतूसों के खोखे और अन्य फॉरेंसिक सबूत बरामद किए गए. इसके साथ ही मृतकों के परिवार वालों और घटनास्थल पर मौजूद चश्मदीदों के बयान दर्ज किए गए. शुरुआती जांच में ही यह साफ हो गया था कि हमला पूरी प्लानिंग के साथ किया गया था। 

30 अप्रैल को NIA ने पूरे इलाके में बड़े स्तर पर ग्रिड सर्च ऑपरेशन चलाया. इस अभियान में NIA, फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स, सुरक्षा बलों और एंटी-सैबोटाज टीमों को शामिल किया गया. पूरे जंगल और आसपास के इलाकों को खंगाला गया. जांच एजेंसियों ने हर संभावित जगह से सबूत जुटाने की कोशिश की. इसके बाद CBI से उस लोकेशन की 3D मैपिंग कराई गई, जिसकी रिपोर्ट 7 मई को NIA को सौंप दी गई. इस मैपिंग से आतंकियों की मूवमेंट और हमले के एंगल को समझने में मदद मिली। 

जांच के दौरान NIA ने स्थानीय लोगों से भी बड़े पैमाने पर पूछताछ की. दुकानदारों, पोनी वालों, ढोक में रहने वाले लोगों और टैक्सी ड्राइवरों समेत कुल 1,113 लोगों से सवाल-जवाब किए गए. यही पूछताछ बाद में जांच की सबसे अहम कड़ी साबित हुई. एक अज्ञात गवाह ने एजेंसी को बताया कि हमले से एक दिन पहले उसने बशीर अहमद जोठाड़ को तीन हथियारबंद लोगों के साथ देखा था. गवाह के मुताबिक, बशीर उन तीनों को परवेज के ढोक यानी झोपड़ी में लेकर गया था। 

गवाह ने आगे बताया कि 22 मई की सुबह जब वह बैसरन पार्क गया, तब उसने वहां बशीर और परवेज दोनों को देखा था. कुछ घंटों बाद ही बैसरन में गोलीबारी की खबर आ गई. इसी गवाह ने जांच एजेंसियों को यह भी बताया कि बाद में आतंकियों ने उसे भी पकड़ लिया था और उससे कलमा पढ़ने को कहा था. जब उसने कलमा पढ़ दिया, तब जाकर आतंकियों ने उसे छोड़ा. इस बयान ने जांच एजेंसियों को यह यकीन दिलाया कि हमलावर धर्म के आधार पर लोगों को निशाना बना रहे थे। 

गवाह से मिली जानकारी के बाद NIA ने कई जगहों पर छापेमारी की. जांच में कुछ और अहम सबूत हाथ लगे, जिसके बाद 22 जून को पोनी वाले बशीर अहमद और परवेज अहमद को गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ के दौरान परवेज अहमद ने उस रात की पूरी कहानी जांच एजेंसियों को बताई. उसने कहा कि 21 अप्रैल की शाम करीब 5 बजे वह अपनी पत्नी और छोटे बेटे के साथ ढोक में चाय पीने की तैयारी कर रहा था, तभी उसका मामा बशीर वहां पहुंचा और सबको चुप रहने के लिए कहा। 

कुछ देर बाद बशीर बाहर गया और फिर तीन हथियारबंद लोगों के साथ लौटा. तीनों के हाथों में बंदूकें थीं और वे बेहद थके हुए लग रहे थे. उन्होंने पानी मांगा और अंदर बैठ गए. परवेज ने बताया कि उन लोगों ने कहा कि वे लंबा सफर तय करके आए हैं. इसके बाद उन्होंने अल्लाह के रास्ते में लड़ने वालों की मदद करने पर सवाब मिलने की बात कही. परवेज के मुताबिक, वे लगातार जिहाद और कश्मीर की आजादी की बातें कर रहे थे। 

परवेज ने बताया कि उसकी पत्नी ताहिरा ने उन आतंकियों के लिए खाना बनाया था. खाना खाते समय आतंकी अमरनाथ यात्रा, सुरक्षा बलों की आवाजाही और इलाके में तैनाती के बारे में सवाल पूछ रहे थे. परवेज ने जांच एजेंसियों को बताया कि आतंकी उर्दू बोल रहे थे, लेकिन उनकी बोली में पंजाबी लहजा साफ महसूस हो रहा था. आपस में भी वे पंजाबी में ही बात कर रहे थे. परवेज की पत्नी ताहिरा ने भी जांच के दौरान यही बयान दिया। 

जांच एजेंसियों ने बाद में बशीर अहमद जोठाड़ से भी पूछताछ की. उसने बताया कि हमले से एक दिन पहले वह अपने घोड़े को देखने जंगल की तरफ गया था. तभी अचानक पेड़ों के पीछे से तीन हथियारबंद लोग उसके सामने आ गए. उनके हाथों में बंदूकें थीं. उन्होंने बशीर से कहा कि उन्हें किसी सुरक्षित जगह पर ले जाया जाए और खाने का इंतजाम किया जाए. बशीर ने बताया कि उसे तुरंत समझ आ गया था कि वे मुजाहिद हैं। 

बशीर ने जांच एजेंसियों को बताया कि आतंकियों ने अपने बैग और पाउच उसे छिपाने के लिए दिए थे. बाद में उन सामानों को परवेज ने कंबलों के नीचे छिपा दिया था. तीनों आतंकी करीब पांच घंटे तक ढोक में रुके रहे. रात करीब 10 बजे वे एक-एक करके वहां से निकल गए. जाते समय छोटे कद वाले आतंकी ने परवेज को 3000 रुपये भी दिए. जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह रकम मदद के बदले दी गई थी। 

दोनों आरोपियों से पूछताछ में कई अहम राज सामने आए. इसके बाद 28 जून को बशीर अहमद के ढोक, परवेज अहमद के ढोक और बैसरन मार्गूजा इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया गया. जांच एजेंसियों ने वहां से कई संदिग्ध चीजें बरामद कीं. हालांकि पूछताछ के दौरान NIA को लगा कि दोनों कुछ अहम बातें छिपा रहे हैं. इसी वजह से 9 जुलाई को एजेंसी ने दोनों का नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की अनुमति मांगी, लेकिन 29 अगस्त को कोर्ट ने यह अर्जी खारिज कर दी। 

चार्जशीट में हमले के तरीके का भी बेहद डरावना खुलासा हुआ है. गवाहों के मुताबिक, तीनों आतंकी हथियारों के साथ ब्रेडांगन की तरफ से बैसरन पार्क पहुंचे थे. पार्क में दाखिल होने से पहले वे एक पेड़ के नीचे बैठे और खाना खाया. इसके बाद उन्होंने अपने बैग से कंबल निकाले और खुद को ढक लिया. फिर दो आतंकी पार्क के अंदर हालात देखने गए और कुछ देर बाद वापस लौट आए. इसके बाद तीनों ने अपना सामान एक जगह छोड़ा और हमले की पोजिशन लेने आगे बढ़ गए। 

चार्जशीट के मुताबिक, दो आतंकी पार्क के मेन गेट और ढाबों की तरफ बढ़े, जबकि तीसरा आतंकी जिपलाइन वाले हिस्से की तरफ चला गया. उन्होंने ऐसी जगहें चुनीं, जहां से पूरे पार्क को चारों तरफ से निशाना बनाया जा सके. हबीब ताहिर और हमजा अफगानी ढाबों के पास आम लोगों की तरह बैठ गए, जबकि उनमें से एक आतंकी हथियार के साथ पीछे छिपकर निगरानी करता रहा. दूसरी ओर सुलेमान जिपलाइन वाले हिस्से में पहुंच गया, जहां बाद में कारतूसों के खोखे भी मिले थे। 

गवाहों ने बताया कि आतंकियों ने लोगों से पहले उनका धर्म पूछा. वे हर शख्स से पूछ रहे थे कि वह हिंदू है या मुसलमान. कई लोगों से कलमा पढ़ने को कहा गया. जो लोग कलमा नहीं पढ़ पाए या जिन्होंने खुद को मुसलमान नहीं बताया, उन्हें बेहद करीब से गोली मार दी गई. इस दौरान आतंकी बार-बार कहते रहे- मोदी को बोलो. जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह हमला सिर्फ हत्या नहीं बल्कि एक सुनियोजित आतंकी संदेश भी था। 

चार्जशीट के मुताबिक, दोपहर 2 बजकर 23 मिनट पर पहली गोली जिपलाइन वाले हिस्से से सुलेमान ने अपनी M-4 कार्बाइन से चलाई. इसके तुरंत बाद बाकी दोनों आतंकियों ने AK-47 से फायरिंग शुरू कर दी. जिपलाइन और ढाबों की तरफ से हुई गोलीबारी ने पार्क के बीचों-बीच मौजूद मैदान को मौत के मैदान में बदल दिया. चारों तरफ चीख-पुकार मच गई और लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे. हमलावर लगातार गोलियां बरसाते रहे। 

जांच में यह भी सामने आया कि हमला करने के बाद भागते समय आतंकियों ने एक गवाह को रोका और उससे फिर कलमा पढ़ने को कहा. जब उसने कलमा पढ़ दिया तो उसे छोड़ दिया गया. बाद में जांच एजेंसियों को पार्क से बाहर निकलने वाले रास्ते पर चार और खाली कारतूस मिले. एजेंसियों का मानना है कि ये फायरिंग आतंकियों ने हमला करने के बाद खुशी मनाने के लिए की थी. चार्जशीट में कहा गया है कि इससे साफ साबित होता है कि आतंकियों को अपने किए पर जरा सा भी पछतावा नहीं था। 

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