मोदी सरकार की नई स्कीम का बड़ा तोहफा, मिलेगा कैश, आसान लोन और इंश्योरेंस का लाभ

नई दिल्ली

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी सुविधाओं के लिए स्कीम लाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। इसके तहत सरकार एक्सीडेंटल इंश्योरेंस, हेल्थ फैसलिटीज, मैटरनिटी सपोर्ट, बुजुर्गों के लिए सुरक्षा, कैश, एजुकेशन लोन और अंतिम संस्कार जैसे खर्चों के लिए आर्थिक मदद देने की तैयारी में है। यह जानकारी श्रम और रोजगार मंत्रालय के संयुक्त सचिव और महानिदेशक (श्रम कल्याण) आशुतोष पेडनेकर ने दी है।

सरकार ने बढ़ाए कदम
पेडनेकर ने बताया कि सरकार गिग वर्कर्स को सुविधाएं देने के लिए कदम बढ़ा दिए हैं। इसके लिए नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड फॉर गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स को लागू करने की हरी झंडी दी गई है। यह बोर्ड इस क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं पर काम करेगा। इसके साथ ही गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए एक सोशल सिक्योरिटी फंड भी बनाया जा रहा है।

इस फंड के जरिए सरकार गिग वर्कर्स के लिए एक्सीडेंटल इंश्योरेंस, हेल्थ फैसलिटीज, मैटरनिटी सपोर्ट, बुजुर्गों के लिए सुरक्षा, कैश, एजुकेशन लोन और अंतिम संस्कार जैसे खर्चों के लिए आर्थिक मदद करेगी। इन योजनाओं के स्वरूप को अंतिम रूप देने के लिए सरकार फंड मैनेजर्स और दूसरे संबंधित पक्षों से बातचीत कर रही है। सरकार की ओर से इसके लिए प्लेटफॉर्म कंपनियों को अपने कर्मचारियों का डेटा 22 जून तक ई-श्रम पोर्टल से जोड़ने को कहा गया है। इससे कामगारों को सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे मिल सके।

कंपनियों के लिए क्या प्लान?
सरकार की योजना के तहत एग्रीगेटर कंपनियों का डेटा और ई-श्रम पोर्टल एक-दूसरे से सीधे जुड़ेंगे। इससे कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं की रियल-टाइम ट्रैकिंग संभव होगी। कामगार मोबाइल ऐप के जरिए अपने अधिकारों और इस्तेमाल की जानकारी भी देख सकेंगे।

गिग वर्कर्स कौन हैं?
गिग वर्कर्स ऐसे कर्मचारी होते हैं जो पारंपरिक कर्मचारी-नियोक्ता संबंध से बाहर रहकर तय समय या प्रोजेक्ट के आधार पर काम करते हैं। इसमें फ्रीलांसर, स्वतंत्र ठेकेदार और पार्ट-टाइम कर्मचारी आदि शामिल हो सकते हैं। वहीं, प्लेटफॉर्म वर्कर्स वे हैं जो किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए सीधे लोगों या कंपनियों को सेवाएं देते हैं। उदाहरण से समझें तो ओला-उबर के ड्राइवर या स्विगी-जोमैटो के डिलीवरी ब्वॉय प्लेटफॉर्म वर्कर की कैटेगरी में आते हैं।

भारत में पहली बार नए श्रम कानूनों के तहत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है। फिलहाल देश में करीब 1 करोड़ गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स काम कर रहे हैं और सरकार को उम्मीद है कि दशक के अंत तक यह संख्या बढ़कर 2.5 करोड़ तक पहुंच सकती है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारत का दबदबा, राजनाथ बोले- 4 दिन में ही पाकिस्तान ने मांगा युद्धविराम

नई दिल्ली 
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत ने मात्र चार दिनों के भीतर पाकिस्तान को युद्धविराम की अपील करने पर मजबूर कर दिया। यह जानकारी शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी। ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि भारत की निर्णायक इच्छाशक्ति, आधुनिक सैन्य क्षमता और तीनों सेनाओं के उत्कृष्ट तालमेल का जीवंत उदाहरण था। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि भारत द्वारा अब तक लड़े गए युद्धों और अभियानों की तुलना में ऑपरेशन सिंदूर कई मायनों में अलग और अत्यंत प्रभावशाली रहा। दरअसल देश की सैन्य शक्ति, रणनीतिक क्षमता और सैनिकों के अदम्य साहस का प्रतीक बन चुके ऑपरेशन सिंदूर को लेकर शुक्रवार को एक विशेष अवसर देखने को मिला। 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस ऐतिहासिक सैन्य अभियान पर आधारित एक स्मारक प्रकाशन का विमोचन किया। नई दिल्ली में आयोजित इस समारोह में भारतीय सेनाओं के शीर्ष अधिकारी मौजूद रहे। इस दौरान पूरा वातावरण गर्व, सम्मान तथा राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत दिखाई दिया।

 इस दौरान रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत के सैन्य इतिहास की एक अभूतपूर्व सफलता बताया। राजनाथ सिंह ने कहा कि शुक्रवार को जारी किया गया स्मारक प्रकाशन केवल घटनाओं का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह उन सैनिकों की भावनाओं, संघर्षों और अनुभवों को भी सामने लाता है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित की। उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों और रणनीतियों से नहीं जीते जाते, बल्कि उनमें नेतृत्व, साहस, मानसिक दृढ़ता और दबाव में सही निर्णय लेने की क्षमता सबसे बड़ी भूमिका निभाती है। यह पुस्तक इन्हीं पहलुओं को बेहद मानवीय और प्रेरणादायक तरीके से प्रस्तुत करती है।

उन्होंने कहा कि जब देश के सैनिक सीमाओं पर अपने प्राणों की बाजी लगाते हैं, तब राष्ट्र के नागरिकों का भी दायित्व बनता है कि वे देशहित को सर्वोपरि रखें। रक्षा मंत्री ने लोगों से अपील की कि वे इस प्रकाशन से प्रेरणा लें और ऐसे जिम्मेदार नागरिक बनें जो देश की संप्रभुता और सुरक्षा के महत्व को गहराई से समझ सकें।

समारोह में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान, वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी तथा सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

गौरतलब है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की रणनीतिक योजना, संयुक्त सैन्य समन्वय, आधुनिक तकनीक के उपयोग और जमीनी स्तर पर सैनिकों के साहसिक प्रदर्शन पर अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय सशस्त्र बल अब पारंपरिक युद्ध सीमाओं से आगे बढ़कर तेज, सटीक और बहुआयामी सैन्य अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम देने में सक्षम हैं। इस अभियान ने न केवल भारत की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह संदेश दिया कि भारत अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। स्मारक प्रकाशन को सैनिकों के साहस, समर्पण और राष्ट्रभक्ति को समर्पित एक जीवंत दस्तावेज माना जा रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देने का कार्य करेगा। 

NEET मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, NTA को लगाई फटकार; अब PM खुद कर रहे निगरानी

नई दिल्ली
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह पूरा मामला बेहद दर्दनाक और परेशान करने वाला है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि लाखों छात्र सालों तक मेहनत करते हैं, अपना समय, पैसा और भावनाएं इस परीक्षा में लगाते हैं। ऐसे में अगर हर साल परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे तो यह पूरे सिस्टम पर बड़ा दाग है। वहीं इस मामले में केंद्र की तरफ से उचित कार्रवाई का भरोसा दियाला गया है। केंद्र की तरफ से अदालत में ये बताया गया कि पीएम मोदी खुद इस मामले में निगरानी रख रहे हैं।

एनटीए को खत्म करने की उठी मांग
गौरतलब है कि एनटीए को खत्म करने के लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। यह याचिका फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन यानी फाइमा और यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट यानी यूडीएफ की तरफ से दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि एनटीए को या तो खत्म किया जाए या फिर उसका पूरा ढांचा बदला जाए। याचिका में यह भी कहा गया कि भविष्य में मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक स्वतंत्र संस्था बनाई जाए, ताकि छात्रों का भरोसा दोबारा कायम हो सके।

पूरी तरह सुरक्षित व्यवस्था कहां है: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एनटीए और पूर्व इसरो प्रमुख डॉक्टर के. राधाकृष्णन से सीधे सवाल पूछा कि आखिर बार-बार पेपर लीक और परीक्षा गड़बड़ियां क्यों हो रही हैं। कोर्ट ने कहा, “आपने कहा था कि मजबूत और सुरक्षित व्यवस्था बनाई जाएगी। फिर हर बार ऐसी घटनाएं कैसे हो रही हैं?” अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे समिति की सिफारिशें नाकाम साबित हो रही हैं या फिर उन्हें सही तरीके से लागू ही नहीं किया गया।

राधाकृष्णन समिति ने क्या कहा?
पूर्व इसरो प्रमुख डॉक्टर के. राधाकृष्णन भी अदालत में मौजूद थे। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 2024 में बनी समिति ने लगभग 35 लंबी अवधि और 60 छोटी अवधि वाली सिफारिशें दी थीं। उनके मुताबिक इनमें से ज्यादातर सुझाव लागू भी कर दिए गए हैं। हालांकि कोर्ट इस जवाब से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखा और पूछा कि अगर सुधार लागू हो चुके हैं तो फिर गड़बड़ियां कैसे जारी हैं।

जवाबदेही तय करने की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सबसे ज्यादा जोर जवाबदेही तय करने पर दिया। अदालत ने कहा कि यह पता होना चाहिए कि आखिर इन गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार कौन है। कोर्ट ने कहा, “जिम्मेदारी किसी के कंधे पर तय होनी चाहिए। हमें बताइए कि आखिर जवाबदेह व्यक्ति कौन है।” यह टिप्पणी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि अब तक पेपर लीक मामलों में अक्सर सिस्टम की खामी की बात होती रही है, लेकिन व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने की मांग कम ही उठी थी।

जस्टिस नरसिम्हा ने उठाया निगरानी पर सवाल
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा ने कहा कि केवल सिफारिशें बना देना काफी नहीं है। असली सवाल यह है कि उनकी निगरानी और लागू करने की प्रक्रिया कितनी मजबूत थी। उन्होंने कहा कि अगर एक उच्च स्तरीय समिति बनने के बाद भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो या तो सिफारिशों में कमी है या फिर उन्हें जमीन पर ठीक से लागू नहीं किया गया।

नीट यूजी 2026 के लिए क्या नए सुरक्षा इंतजाम किए गए?
एनटीए की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि नीट यूजी 2026 के लिए कई नए सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं ताकि पेपर लीक और नकल जैसी घटनाओं को रोका जा सके। इन उपायों में आधार आधारित जैविक पहचान सत्यापन, चेहरे की पहचान जांच, सभी परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित गड़बड़ी पकड़ने वाली तकनीक और मोबाइल संकेत अवरोधक शामिल हैं। इसके अलावा प्रश्न पत्रों के परिवहन और सुरक्षित भंडारण के लिए भी कड़े नियम बनाए गए हैं। कई केंद्रों पर पुलिस तैनाती भी बढ़ाई गई है।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?
एनटीए की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि दोबारा परीक्षा पूरी सुरक्षा और पारदर्शिता के साथ कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर बैठक हुई है और सरकार पूरी गंभीरता से काम कर रही है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सभी सुरक्षा उपाय सार्वजनिक नहीं किए जा सकते, क्योंकि ऐसा करने से उनका मकसद कमजोर पड़ सकता है। तुषार मेहता ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस पूरे मामले की निगरानी कर रहे हैं और भविष्य में परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए व्यापक तंत्र तैयार किया जाएगा।

चीन बना रहा ‘पाताल लोक’ जैसा खतरनाक हथियार नेटवर्क? सैटेलाइट तस्वीरों से बड़ा खुलासा

नई दिल्ली

चीन के दूर-दराज के रेगिस्तानी इलाके में एक विशाल सैन्य परिसर तेजी से तैयार हो रहा है. सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह परिसर ऐसा बनाया जा रहा है कि अगर अमेरिका ने चीन के परमाणु हथियारों पर पहला हमला भी कर दिया, तो भी चीन के पास जवाबी हमला करने की पूरी क्षमता बनी रहे। 

सैटेलाइट इमेजरी से पता चलता है कि चीन अपने सबसे लंबी दूरी की मिसाइलों वाले साइलो क्षेत्रों के पास सैकड़ों लॉन्च पैड, बंकर और कम्युनिकेशन नेटवर्क बना रहा है. यह निर्माण चीन की परमाणु शक्ति को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। 

चीन पहले से ही ऐसी मिसाइलें बना चुका है जो अमेरिका के किसी भी शहर तक पहुंच सकती हैं. अब वह इन मिसाइलों को और सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। 

क्या बन रहा है रेगिस्तान में?
पूर्वी शिनजियांग क्षेत्र में दो अष्टकोण (Octagon) आकार के विशाल सैन्य परिसर बनाए गए हैं. इनमें से एक उत्तरी अष्टकोण और दूसरा दक्षिणी अष्टकोण है. इनके चारों ओर सैकड़ों कंक्रीट पैड (Launch Pads) बनाए जा रहे हैं। 

विशेषज्ञों का अनुमान है कि ये पैड मोबाइल मिसाइल लॉन्चर, एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण और सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इन अष्टकोण संरचनाओं में सैनिकों के रहने की व्यवस्था, बड़े वाहनों के लिए शेड, हथियार भंडारण बंकर और कमांड सेंटर भी हैं। 

सैटेलाइट इमेजरी में साफ दिख रहा है कि इन परिसरों के आसपास सड़कें, रेलवे लाइन, एयरफील्ड और ईंधन स्टोरेज सुविधाएं भी बनाई जा रही हैं. हाल के महीनों में इन इलाकों में बड़े सैन्य वाहनों की गतिविधियां और अभ्यास भी देखे गए हैं। 

दूसरी स्ट्राइक क्षमता को मजबूत करना
चीन की परमाणु नीति नो फर्स्ट यूज (पहले हमला न करने) पर आधारित है. इसका मतलब है कि चीन कभी पहले परमाणु हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर उस पर हमला हुआ तो जवाब जरूर देगा. इसी सेकंड स्ट्राइक की क्षमता को और मजबूत करने के लिए चीन यह पूरा नेटवर्क बना रहा है. अगर अमेरिका या कोई दूसरा देश चीन के साइलो को नष्ट करने की कोशिश भी करे, तो मोबाइल लॉन्चर और बंकरों की मदद से चीन जवाबी हमला कर सकेगा। 

अमेरिका के साथ बढ़ता परमाणु प्रतिस्पर्धा
अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ रहा है, खासकर ताइवान को लेकर. चीन का मानना है कि अमेरिका ताइवान मुद्दे पर हस्तक्षेप कर सकता है. ऐसे में चीन अपनी परमाणु क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है. पेंटागन की रिपोर्ट के अनुसार, चीन 2030 तक 1000 परमाणु वॉरहेड बना सकता है. चीन अब साइलो-बेस्ड मिसाइलों के साथ-साथ मोबाइल लॉन्चर और सबमरीन-बेस्ड मिसाइलों पर भी जोर दे रहा है। 

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन का यह निर्माण अभूतपूर्व है। 

    फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट के सदस्य हंस क्रिस्टेंसन ने कहा कि मैंने पहले कभी ऐसा कुछ नहीं देखा. यह एक असाधारण प्रयास है। 

    पैसिफिक फोरम के अलेक्जेंडर नील का मानना है कि हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह इंफ्रास्ट्रक्चर चीन की रणनीतिक परमाणु क्षमता को बहुत मजबूत करेगा। 

    कार्नेगी एंडाउमेंट के टोंग झाओ कहते हैं कि ये अष्टकोण संरचनाएं कमांड, कंट्रोल और कम्युनिकेशन (C3) सिस्टम से जुड़ी हो सकती हैं, जो परमाणु हमले के समय बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। 

भारत के लिए क्या मायने रखता है?
चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता भारत के लिए भी चिंता का विषय है. भारत और चीन की सीमा पर तनाव बना हुआ है. अगर चीन अपनी परमाणु क्षमता को इतनी तेजी से बढ़ा रहा है, तो भारत को भी अपनी रणनीतिक क्षमता पर ध्यान देने की जरूरत है. भारत पहले से ही अग्नि-5 जैसी लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित कर चुका है, लेकिन चीन की गति काफी तेज है। 

चीन रेगिस्तान में जो विशाल परिसर बना रहा है. वह सिर्फ इमारतें नहीं, बल्कि एक मजबूत परमाणु प्रतिरोध की तैयारी है. अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच चीन सेकंड स्ट्राइक क्षमता को इतना मजबूत कर रहा है कि कोई भी देश उसे आसानी से निशाना नहीं बना सके। 

 

 

दहेज प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, बोला- जिनसे पैसे लेते हो, उन्हें ही भिखारी कहते हो

 नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना को लेकर समाज को कड़ा संदेश दिया है. कोर्ट ने बहू-बेटियों के अपमान पर बेहद सख्त रुख अपनाया है. एक मामले की सुनवाई के दौरान देश की सबसे बड़ी अदालत ने साफ कहा कि लड़कों को शादी के बाद दूसरों की बेटियों और उनके परिवार का अपमान करने का कोई हक नहीं है. सुनवाई के दौरान अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में पूछा, ‘आप जिनसे पैसे लेते हो, आखिर उनको ही भिखारी कैसे कह सकते हो?’ इसी सख्त रुख के साथ जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने आरोपी पति तथा उसके परिवार को कोई राहत देने से इनकार करते हुए उन्हें जेल भेजने का फैसला लिया।

दरअसल, यह पूरा मामला दहेज हत्या और खुदकुशी के लिए उकसाने से जुड़ा हुआ था. इस केस में आरोपी पक्ष कोर्ट से कानूनी राहत की उम्मीद कर रहा था. हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लड़के वालों के पुराने बर्ताव पर बार-बार गहरी नाराजगी जताई. जजों का साफ मानना था कि ऐसे गंभीर मामलों में ढिलाई बरतने से समाज में गलत संदेश जाता है. इसी वजह से अदालत ने आरोपियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया. इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने हमारे समाज की इस कड़वी हकीकत पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने सवाल किया, ‘आखिर लड़के, लड़कियों से शादी ही क्यों करते हैं, जब उन्हें बाद में लड़की और उसके पूरे परिवार का अपमान ही करना होता है?

इसी बीच, जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर तो सिर्फ आईपीसी की धारा 498A (दहेज प्रताड़ना) के तहत आरोप लगे हैं, तब सुप्रीम कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. जस्टिस नागरत्ना ने वकील की दलील पर तीखी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि आपको तो खुश होना चाहिए कि आप पर सिर्फ धारा 498A लगी है और इसमें केवल तीन साल की ही सजा का प्रावधान है। 

बहू को पैसा निकालने वाली मशीन न समझें: सुप्रीम कोर्ट
इसके आगे सुप्रीम कोर्ट ने शादियों के बाद लड़कियों के ससुराल में होने वाले आर्थिक शोषण पर भी गहरी चिंता जताई. इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने लड़के वालों की मानसिकता पर चोट करते हुए टिप्पणी की कि आजकल शादी के बाद ससुराल में दुल्हन तथा उसके माता-पिता को पूरी तरह से निचोड़ लेने यानी पैसे ऐंठने की कोशिश की जाती है। 

इतना ही नहीं, अदालत ने लड़की के मायके वालों से पैसे मांगने और फिर उन्हें ही नीचा दिखाने वाले रवैए को बेहद शर्मनाक माना है. बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि समाज में अब यह मैसेज जाना चाहिए कि कोई भी परिवार किसी की बेटी को लाकर उसका या उसके माता-पिता का मानसिक तथा आर्थिक उत्पीड़न नहीं कर सकता. आरोपियों की याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने यह जता दिया कि देश का कानून अब बहू-बेटियों के सम्मान की रक्षा के लिए पूरी तरह से मुस्तैद है। 

जनगणना 2027 को लेकर बड़ा ऐलान, बंगाल में अगस्त से शुरू होगी प्रक्रिया

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शुक्रवार को ऐलान किया कि राज्य में जनगणना 1 अगस्त से शुरू होगी और अगले साल फरवरी के आखिर तक चलेगी. उन्होंने साफ कहा कि जनगणना का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है और सभी लोगों से इसमें हिस्सा लेने की अपील की। 

शुभेंदु अधिकारी ने राज्य सचिवालय नबान्ना में ‘जनगणना, 2027’ के पहले चरण से जुड़ी एक बैठक में शामिल हुए. इसी बैठक के बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल में जनगणना को लेकर बड़ी जानकारी दी। 

उन्होंने बताया कि बंगाल में जनगणना 1 अगस्त से शुरू होगी और अगले साल फरवरी के आखिरी दिन रात 12 बजे तक चलेगी. उन्होंने जोर देकर कहा कि इस पूरी प्रक्रिया का राजनीति से कोई संबंध नहीं है। 

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जहां पूरे देश में जनगणना का काम काफी आगे बढ़ चुका है, वहीं पश्चिम बंगाल इस मामले में पिछड़ा हुआ है. उन्होंने कहा, देश जनगणना में काफी आगे निकल चुका है, लेकिन हम पीछे रह गए हैं। 

इसके साथ ही मुख्यमंत्री शुभेंदु ने राज्य के कुछ हिस्सों में आबादी के बदलते ढांचे का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने इसके लिए बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश से लगती 600 किलोमीटर लंबी सीमा पर अभी तक पूरी बाड़ नहीं लग पाई है. इसकी वजह यह बताई कि पिछली राज्य सरकार ने BSF को जमीन नहीं सौंपी, जिससे बाड़ लगाने का काम अटका रहा. नतीजा यह हुआ कि घुसपैठ होती रही और राज्य के कुछ इलाकों में आबादी की बनावट बदल गई। 

मुख्यमंत्री शुभेंदु ने जनगणना को सरकारी काम और योजनाओं के लिए बेहद जरूरी बताया. उन्होंने कहा कि सही आंकड़े होंगे तभी सरकार ठीक से काम कर पाएगी और लोगों तक सही फायदे पहुंच पाएंगे. उन्होंने बंगाल के सभी लोगों से अपील की कि वे इस जनगणना में जरूर हिस्सा लें। 

मौसम का बड़ा अपडेट! भारत की ओर बढ़ रहे 2500 किमी चौड़े बादल, 5 राज्यों में होगी झमाझम बारिश

नई दिल्ली

भीषण गर्मी का सामना कर रहे उत्तर पश्चिम भारत को मौसम जल्द ही गुड न्यूज दे सकता है। खबर है कि भारत की ओर 2500 किलोमीटर चौड़े बादलों का समूह बढ़ रहा है। भारत के इनसैट-3डीएस उपग्रह ने ये तस्वीरें कैद की हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, मौसम सैटेलाइट द्वारा ली गई यह तस्वीर इस उपमहाद्वीप के ऊपर बारिश लाने वाले सिस्टम के सक्रिय होने का संकेत है।

बादलों का यह समूह उत्तरी भारत में 2000 से 2500 किमी से भी अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। मौसम विभाग ने इन तस्वीरों को शेयर किया है। तस्वीरों में उत्तर और मध्य भारत में फैला हुआ बादलों का विशाल झुंड दिख रहा है। बादलों का जमावड़ा आने वाले तूफानों व भीषण गर्मी के बाद राहत का संकेत है। बादलों का यह घना झुंड पाकिस्तान व उत्तर-पश्चिमी भारत से लेकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, यूपी और मध्य भारत के कुछ हिस्सों तक फैला है।

दिल्ली में झमाझम बारिश शुरू
दिल्ली के कई हिस्सों में गुरुवार शाम को तेज हवाएं चलने और हल्की बारिश होने से शहर में जारी भीषण गर्मी से लोगों को काफी राहत मिली। IMD यानी भारत मौसम विज्ञान विभाग ने बताया कि राष्ट्रीय राजधानी में गरज-चमक के साथ आंधी आई, जिस दौरान पालम में हवा की अधिकतम गति 61 किलोमीटर प्रति घंटा दर्ज की गई। गुरुवार को दिल्ली के प्रमुख मौसम केंद्रों पर अधिकतम तापमान सामान्य से कम दर्ज किया गया।

गिरा राजधानी का तापमान
मौसम में यह बदलाव कई दिनों की भीषण गर्मी के बाद आया है, जिसके दौरान दिल्ली के विभिन्न केंद्रों पर तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया था। आईएमडी के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दिन की तुलना में गुरुवार को शहर भर में अधिकतम तापमान में करीब तीन से पांच डिग्री सेल्सियस की गिरावट आई है।

31 मई तक होती रहेगी बारिश
मौसम कार्यालय ने कहा कि शहर में बारिश और गरज-चमक की यह मौजूदा गतिविधि 31 मई तक जारी रहने की उम्मीद है। स्काईमेट वेदर के महेश पालावत ने कहा, ‘राजस्थान के उत्तरी हिस्सों में पहले ही गरज के साथ बारिश शुरू हो चुकी है और शाम तक इस मौसम प्रणाली के दिल्ली तक पहुंचने और रात भर जारी रहने की संभावना है।’

उन्होंने कहा कि शुक्रवार को तूफान की तीव्रता बढ़ने की संभावना है और यह सिलसिला 30 मई तक जारी रहने के आसार हैं। इसके बाद मौसम प्रणाली के 30 और 31 मई के बीच गुजरात की ओर बढ़ने की संभावना है।

पालावत ने कहा, ‘मॉनसून पूर्व वर्षा के इस दौर के दिल्ली में इस महीने की शुरुआत में और अप्रैल में हुई मॉनसून पूर्व वर्षा से अधिक तीव्र रहने की संभावना है, जिससे पूरे शहर में व्यापक वर्षा होगी।’ उन्होंने मौसम में आए इन बदलावों का कारण पर्वतों के ऊपर मौजूद पश्चिमी विक्षोभ, राजस्थान और आसपास के इलाकों में बने चक्रवाती परिसंचरण और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम हवाओं को बताया, जिनसे शहर में नमी का स्तर बढ़ गया है।

लाखों शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, TET पास करने की समय सीमा बढ़ाई गई

 नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों के लिए टीईटी की पात्रता हासिल करने की समय सीमा को एक साल बढ़ा दिया है। शीर्ष अदालत ने कार्यरत शिक्षकों को टीईटी पास करने के लिए अब 31 अगस्त 2028 तक का समय दिया है। पहले यह डेडलाइन 31 अगस्त 2027 थी। कोर्ट ने यह फैसला कई पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सुनाया है। हालांकि अदालत ने उन याचिकाओं को फिर से खारिज कर दिया है जिसमें 2009 से पहले नियुक्त हुए सभी टीचर्स को अनिवार्य टीईटी के दायरे से बाहर रखने की मांग की गई थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि देश में काम कर रहे सभी टीचरों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी पास करना ही होगा। ऐसे में टीईटी अनिवार्यता मामले में देश के लाखों शिक्षकों की नौकरी पर खतरा अभी भी कायम है।

कुछ दिन पहले देश की सबसे बड़ी अदालत ने राहत की मांग कर रहे शिक्षकों को दो टूक कहा था कि वे स्वार्थी न बनें और केवल अपनी नौकरी की सुरक्षा के बारे में ही न सोचें, बल्कि उन बच्चों के बारे में भी विचार करें जिन्हें क्वालिटी वाली एजुकेशन की आवश्यकता है। अदालत ने यह कड़ी टिप्पणी तब की जब वह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों तथा पश्चिम बंगाल व केरल के शिक्षक संघों द्वारा दायर की गई कईं टीईटी अनिवार्यता विरोधी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में सितंबर 2025 के सर्वोच्छ न्यायालय के उस फैसले की समीक्षा की मांग की गई थी, जिसमें देशभर के गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले कार्यरत शिक्षकों को दो वर्षों के भीतर शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करने का निर्देश दिया गया था। तब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने इन पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
क्या है पूरा मामला

आपको बता दें कि टीचरों को नौकरी में बने रहने या प्रमोशन पाने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से देश भर के हजारों प्राइमरी शिक्षकों की नौकरी पर तलवार लटक गई है। यूपी, झारखंड, एमपी व राजस्थान समेत देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे लाखों शिक्षक हैं जो बगैर टीईटी पास किए वर्षों से स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। अब इन टीचरों को 3 साल ( सितंबर 2025 कोर्ट के फैसले की तिथि से ) में टीईटी पास करना ही होगा वरना या तो इन्हें इस्तीफा देना होगा या फिर इन्हें जबरन रिटायर कर दिया जाएगा। यानी इन्हें 31 अगस्त 2028 तक टीईटी पास करना ही होगा। इस कड़े फैसले से सिर्फ उन्हें छूट मिलेगी जिनकी नौकरी 5 साल की बची है। लेकिन इन्हें भी अगर प्रमोशन चाहिए तो टीईटी पास करना ही पड़ेगा। सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु, यूपी, मध्य प्रदेश समेत कई राज्य पुनर्विचार याचिका दायर कर चुके हैं।

स्कूल टीचरों से खाली हो जाएंगे
कुछ दिन पहले सुनावाई के दौरान तमिलनाडु ने तर्क दिया था कि इस फैसले से अकेले उस राज्य में लगभग चार लाख शिक्षक प्रभावित होंगे। राज्य ने यह भी कहा था कि यदि इसे जमीनी स्तर पर लागू किया गया, तो राज्य को शिक्षकों के बिना कक्षाएं चलानी पड़ेंगी। स्कूल टीचरों से खाली हो जाएंगे। द हिन्दू की एक रिपोर्ट के मुताबिक न्यायमूर्ति दिपांकर दत्ता ने कहा, ‘बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009) बच्चों के लिए बनाया गया है। केवल अपनी नौकरी की सुरक्षा के बारे में सोचकर मतलबी मत बनिए और यह मत कहिए कि मुझे केवल अदालत से अपनी नौकरी की सुरक्षा के आदेश चाहिए और मैं बच्चों के बारे में नहीं सोचूंगा।’वे न्यायमूर्ति मनमोहन के साथ गठित पीठ की अध्यक्षता कर रहे थे और समीक्षा याचिकाकर्ताओं पर जवाब दे रहे थे।

जस्टिस दत्ता ने याद दिलाई टीईटी वाली धारा
जस्टिस दत्ता ने शिक्षा का अधिकार 2009 अधिनियम की धारा 23(2) का जिक्र किया था, जिसमें प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और शिक्षक शिक्षा संस्थानों की अपर्याप्तता के मामलों में शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्य योग्यता हासिल करने के लिए पांच वर्ष का समय दिया गया है। इसके बाद न्यायाधीश ने धारा 23(2) के दूसरे प्रावधान की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसे 2017 में अधिनियम में संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। इसमें 31 मार्च 2015 तक नियुक्त या कार्यरत उन शिक्षकों को अतिरिक्त राहत दी गई थी, जिनके पास न्यूनतम आवश्यक शैक्षणिक योग्यता नहीं थी। उन्हें यह योग्यता प्राप्त करने के लिए चार वर्ष का अतिरिक्त समय दिया गया था।

माननीय उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने पांच राष्ट्रीय पहलों का शुभारंभ किया, द आर्ट ऑफ लिविंग के 45 वर्ष पूरे होने पर स्मारक डाक टिकट का अनावरण किया

माननीय उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने पांच राष्ट्रीय पहलों का शुभारंभ किया, द आर्ट ऑफ लिविंग के 45 वर्ष पूरे होने पर स्मारक डाक टिकट का अनावरण किया

बेंगलुरु
भारत के माननीय उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने आज द आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर में युवा विकास, उद्यमिता, स्थिरता, चेतना अध्ययन और शिक्षा से जुड़ी पांच प्रमुख राष्ट्रीय पहलों का शुभारंभ किया। यह आयोजन ऐसे समय में हुआ है जब इस संस्था ने मानवीय सेवा के 45 वर्ष में प्रवेश किया हैं और इसी माह 70 वर्ष के हुए गुरुदेव रवि शंकर के शांति, कल्याण एवं मानवीय मूल्यों के प्रति उनके जीवनपर्यंत योगदान को रेखांकित किया गया है।

माननीय उपराष्ट्रपति ने अन्य गणमान्य अतिथियों के साथ एक स्मारक डाक टिकट का भी अनावरण किया, जो व्यक्तिगत कल्याण, सामाजिक परिवर्तन और वैश्विक शांति में द आर्ट ऑफ लिविंग के 45 वर्षों के योगदान का प्रतीक है।शुरू की गई पहलों में युवा करियर उत्कृष्टता कार्यक्रम (यूथ करियर एक्सीलेंस प्रोग्राम), पूर्वी ज्ञान प्रणाली संकाय (फैकल्टी ऑफ ईस्टर्न नॉलेज सिस्टम्स), नवाचार एवं उद्यमिता (आर्ट ऑफ लिविंग इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप इंक्यूबेशन), चेतना अध्ययन और मानव क्षमता उत्कृष्टता केंद्र (सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन कॉन्शियसनेस स्टडी एंड ह्यूमन पोटेंशियल), तथा इको शांति सम्मिलित हैं। ये पहलें शिक्षा, नवाचार, पर्यावरणीय स्थिरता और मानव विकास पर संगठन के बढ़ते ध्यान को प्रतिबिंबित करती हैं।

यह शुभारंभ समारोह द आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर में महीने भर चले उत्सव का चरमोत्कर्ष था, जिसमें भारत और विश्व भर के 678 प्रतिष्ठित अतिथियों ने भाग लिया। इनमें विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के राष्ट्रीय नेता, व्यापारिक दिग्गज, खिलाड़ी, उद्यमी, शिक्षाविद, आध्यात्मिक गुरु, राजनयिक, कलाकार और सामाजिक परिवर्तनकर्ता सम्मिलित थे।सभा को संबोधित करते हुए माननीय उपराष्ट्रपति ने गुरुदेव रवि शंकर द्वारा स्थापित इस आंदोलन की असाधारण वैश्विक पहुंच पर विचार व्यक्त किए।
उन्होंने कहा, आज उस महान दूरदर्शिता का उत्सव है जिसने विभिन्न महाद्वीपों में करोड़ों जीवनों को स्पर्श किया है। मैं यह जानकर विस्मित रह गया कि द आर्ट ऑफ लिविंग 182 देशों में विद्यमान है। मानव जाति की लगभग संपूर्ण सभ्यता इस आंदोलन के माध्यम से परस्पर जुड़ रही है।

संगठन की यात्रा का वर्णन करते हुए उन्होंने आगे कहा, पैंतालीस वर्ष पूर्व, एक सरल किंतु गहन विचार के साथ एक आंदोलन का सूत्रपात हुआ था कि आंतरिक शांति ही बाह्य सामंजस्य की आधारशिला है। संघर्ष और अनिश्चितता से घिरे इस संसार में, गुरुदेव रवि शंकर विवेक, जागरूकता, शांति और सद्भाव के मूल्यों से मानवता को निरंतर अनुप्राणित कर रहे हैं।गुरुदेव की सरलता और उनके प्रभाव की प्रशंसा करते हुए राधाकृष्णन ने टिप्पणी की, उनकी मुस्कान, उनकी विनम्रता और उनका स्नेह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को छू लेता है। जो बात उनके योगदान को असाधारण बनाती है, वह उनके भीतर समाहित विनम्रता और मानवता है।

माननीय उपराष्ट्रपति का स्वागत करते हुए गुरुदेव रवि शंकर ने समकालीन चुनौतियों के समाधान में आंतरिक विकास की शाश्वत प्रासंगिकता पर बल दिया।

गुरुदेव ने कहा, आज विश्व ने स्वीकार कर लिया है कि ध्यान अब कोई विलासिता नहीं है। विश्व ध्यान दिवस घोषित करने के लिए 192 देशों के एक साथ आने से यह समझ सुदृढ़ हुई है कि एक स्वस्थ, सुखी और तनावमुक्त जीवन के लिए ध्यान एक मूलभूत आवश्यकता है।
मानव विकास के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण का आह्वान करते हुए उन्होंने आगे कहा, जीवन भर तीन चीजें सदैव हमारे साथ होनी चाहिए: ज्ञान, ध्यान और संगीत।वैश्विक सद्भाव के संदेश के साथ अपनी बात समाप्त करते हुए गुरुदेव ने कहा, आइए हम एक ऐसे वसुधैव कुटुम्बकम् का स्वप्न देखें, जो भय, तनाव और घृणा से मुक्त एक वैश्विक परिवार हो। एक शांत और सौहार्दपूर्ण विश्व का प्रारंभ शांत और सौहार्दपूर्ण व्यक्तियों से ही होता है।

कर्नाटक के माननीय राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने भी सभा को संबोधित किया और संगठन के उद्गम के साथ कर्नाटक के गहन संबंध को रेखांकित किया।उन्होंने कहा, यह कर्नाटक के लिए गौरव का विषय है कि इस वैश्विक आंदोलन की जड़ें हमारी इस पवित्र भूमि से जुड़ी हुई हैं। चार दशकों से अधिक समय से, द आर्ट ऑफ लिविंग विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से व्यक्तिगत, सामुदायिक और वैश्विक स्तर पर शांति और कल्याण को बढ़ावा दे रहा है।शांति स्थापना में गुरुदेव के योगदान पर प्रकाश डालते हुए राज्यपाल ने आगे कहा, मानवीय सेवा से परे, गुरुदेव के शांति-स्थापना के प्रयासों ने दीर्घकालिक संघर्षों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मानवीय मूल्यों के पुनरुत्थान के माध्यम से एक हिंसा-मुक्त और तनाव-मुक्त समाज की उनकी दूरदर्शिता को संपूर्ण विश्व में सराहना और मान्यता प्राप्त हुई है।

इस आयोजन के दौरान शुरू की गई पांच पहलें शिक्षा, नवाचार, स्थिरता और मानव विकास के माध्यम से समकालीन समाज की कुछ अत्यंत तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करती हैं।यूथ करियर एक्सीलेंस प्रोग्राम युवाओं को सिविल सेवा में करियर के लिए तैयार करेगा, साथ ही ग्रामीण और शहरी युवाओं में रोजगार क्षमता बढ़ाने के लिए उद्योग-उन्मुख आतिथ्य प्रशिक्षण भी प्रदान करेगा।
फैकल्टी ऑफ ईस्टर्न नॉलेज सिस्टम्स एक बहुविषयक मंच के रूप में कार्य करेगा जो पूर्वी ज्ञान परंपराओं को समकालीन शिक्षा और अनुसंधान के साथ एकीकृत करेगा, जिससे आधुनिक नैतिक, सामाजिक और पारिस्थितिक चुनौतियों का समाधान किया जा सके।
आर्ट ऑफ लिविंग इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप इंक्यूबेशन पहल का उद्देश्य मार्गदर्शन, प्रोटोटाइपिंग सुविधाओं और प्रारंभिक चरण के वित्तपोषण सहायता के माध्यम से नवाचार-संचालित और हार्डवेयर-केंद्रित स्टार्टअप को पोषित करना है, जिसका लक्ष्य 500 स्टार्टअप को सक्षम बनाना है।

सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन कॉन्शियसनेस स्टडीज एंड ह्यूमन पोटेंशियल चेतना, संज्ञान, मानसिक कल्याण और मानव क्षमता में अनुसंधान, शिक्षा और नवाचार के लिए एक अंतःविषय पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करेगा।द आर्ट ऑफ लिविंग की एक स्थिरता पहल इको शांति का उद्देश्य संधारणीय विकल्पों के माध्यम से एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक को समाप्त करना है, जिसका लक्ष्य 2030 तक प्लास्टिक उत्पादन और उपयोग को प्रतिवर्ष कम से कम 1,00,000 टन कम करना है।

आश्रम प्रवास के दौरान, माननीय उपराष्ट्रपति ने संगठन की विभिन्न सुविधाओं और पहलों का अवलोकन किया। उन्होंने गुरुकुलम का भ्रमण किया, छात्रों से संवाद किया, प्रताप गणपति मंदिर में प्रार्थना की, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के पवित्र अवशेषों के दर्शन किए और लगभग 1,600 स्वदेशी गायों के निवास स्थान गौशाला का भी भ्रमण किया।

इस यात्रा का एक विशेष आकर्षण द आर्ट ऑफ लिविंग के इंट्यूशन प्रोग्राम के अभ्यासकर्ताओं द्वारा दी गई प्रस्तुति थी, जहां बच्चों ने व्यवस्थित प्रशिक्षण और अभ्यास के माध्यम से विकसित अपनी सहज ज्ञान संबंधी क्षमताओं का प्रदर्शन किया।
सेवा, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का महीना भर चला उत्सव लगभग एक महीने तक, द आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से आने वाले लोगों का स्वागत किया, जो वसुधैव कुटुम्बकम् यानी एक विश्व परिवार की भावना को दर्शाता है।

इस उत्सव में सम्मिलित होने वाली प्रतिष्ठित विभूतियों में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, माननीय केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और सर्बानंद सोनोवाल, माननीय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, एन. चंद्रबाबू नायडू और प्रमोद सावंत, राज्यपाल अजय कुमार भल्ला और लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह, महान अभिनेता रजनीकांत, अभिनेता विक्रांत मैसी, उद्योगपति मुकेश अंबानी, अनंत अंबानी और निरंजन हिरानंदानी के साथ-साथ प्रमुख आध्यात्मिक गुरु, कलाकार, राजनयिक और विद्वान उपस्थित थे।

इस पूरे महीने के दौरान नवनिर्मित ध्यान मंदिर में वैश्विक ध्यान सत्र, भारत की कलात्मक विरासत का उत्सव मनाते सांस्कृतिक कार्यक्रम, मानसिक कल्याण एवं चेतना पर परिचर्चाएं, और उन व्यक्तियों के जीवन परिवर्तन की गाथाएं प्रस्तुत की गईं, जिनके जीवन को पिछले साढ़े चार दशकों में गुरुदेव के कार्यों ने प्रभावित किया है।

मूल रूप से, यह उत्सव आंतरिक शांति, सेवा और मानवीय मूल्यों पर आधारित एक तनाव-मुक्त, हिंसा-मुक्त समाज के गुरुदेव के निरंतर चले आ रहे दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करने का माध्यम बना।

क्या भारत में शुरू होने वाले हैं प्लास्टिक के नोट? RBI की तैयारी ने बढ़ाई हलचल

नई दिल्ली
 भारतीय करेंसी नोट पर बड़ा अपडेट आया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में करेंसी नोटों की लगातार बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए प्लास्टिक या पॉलीमर नोट छापने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पटना और मुंबई में हुई केंद्रीय बैंक की पिछली दो बोर्ड बैठकों में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई है।

पॉलिमर नोटों की टिकाऊपन और कम उत्पादन लागत के कारण यह निर्णय लिया जा रहा है। ऐसी संभावना है कि आम जनता के लिए प्लास्टिक नोटों के इस्तेमाल का पायलट प्रोजेक्ट जल्द ही शुरू किया जा सकता है।

प्लास्टिक के नोट कागज के नोटों की जगह क्यों लाए जा रहे?
इस निर्णय के पीछे मुख्य कारण लागत और नोटों का टिकाऊपन है। RBI सूत्रों के अनुसार, पॉलिमर नोटों की उत्पादन लागत वर्तमान में चल रहे कागज के नोटों की तुलना में काफी कम है। इसके अलावा, भारत तकनीकी रूप से आधुनिक हो चुका है और देश के एटीएम को इन प्लास्टिक नोटों को आसानी से निकालने के लिए अपग्रेड किया जाएगा।

पुराने और गंदे नोटों को नष्ट करने में क्या दिक्कतें आ रही हैं?
कागजी नोट ज्यादा साल तक नहीं चल पाते हैं, जिससे वे मूल कागज और गंदे नोटों की तुलना में निम्न गुणवत्ता के होते हैं। आरबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 (FY25) में ही लगभग ₹23.8 अरब मूल्य के नोट नष्ट किए गए, जो पिछले वर्ष ₹21.24 अरब की तुलना में 12.3 प्रतिशत अधिक है। इनमें सबसे अधिक संख्या ₹500 और ₹100 के नोटो की थी।

इतनी बड़ी मात्रा में करेंसी नोटों को नष्ट करना और नए नोट छापना सरकारी खर्च पर भारी बोझ डालता है। वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने की लागत ₹6,372.8 करोड़ थी, जो पिछले वर्ष (₹5,101.4 करोड़) की तुलना में काफी अधिक है। प्लास्टिक नोटों की शुरुआत से इस खर्च में काफी कमी आएगी।

डिजिटल पेमेंट के युग में भी कैश की मांग क्यों बढ़ी?
देश में यूपीआई और डिजिटल लेनदेन तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन नकदी (कैश) की मांग में कोई बदलाव नहीं आया है। 15 मई तक, बाजार में कुल नकदी (सीआईसी) 11.5 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड ₹42.86 लाख करोड़ के उच्च स्तर पर पहुंच गई। छोटे नोटों (10 और 20 रुपये) की मांग अधिक होने के बावजूद, कुल सीआईसी में उनकी हिस्सेदारी क्रमशः 0.7% और 0.8% है। सरकार ने सिक्कों को बढ़ावा देने का प्रयास किया, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है।

2012 का ट्रायल फेल, अब क्या नया बदलाव?
भारत में प्लास्टिक नोटों पर चर्चा पहली बार नहीं हो रही है। 2012 में, तत्कालीन यूपीए सरकार ने पांच शहरों में परीक्षण के तौर पर 1 अरब प्लास्टिक के 10 रुपये के नोट जारी करने का फैसला किया था। हालांकि, एटीएम और बैंकों में तकनीकी समस्याओं के कारण परियोजना को रोक दिया गया था।

हालांकि, पिछले एक दशक में तकनीक में काफी बदलाव आया है। रिपोर्ट्स का कहना है कि अब एटीएम इन टूल्स से आसानी से पुराने और पुराने तकनीकी छात्रों को आसानी से पहचाना जा सकता है।

दुनिया में किन देशों में चलते हैं प्लास्टिक नोट?
पॉलिमर या प्लास्टिक के नोट वर्तमान में लगभग 60 देशों में चल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया 1988 में प्लास्टिक का 10 डॉलर का नोट जारी करने वाला पहला देश था। सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, रोमानिया और कनाडा जैसे देशों ने भी बाद में इन्हें अपना लिया। वहीं, अमेरिकी डॉलर अभी भी कपास और लिनन के विशेष मिश्रण से बनाया जाता है।

 

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