CUET-UG परीक्षा में तकनीकी गड़बड़ी, NTA ने मांगी माफी; जारी किया नया शेड्यूल

नई दिल्ली
 देश में पहले से ही मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट  को लेकर भारी घमासान मचा हुआ है और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी चौतरफा विवादों से घिरी है. इसी बीच, आज यानी 30 मई 2026 को एनटीए की एक और परीक्षा सीयूईटी यूजी 2026 के परीक्षा केंद्रों पर भारी अव्यवस्था देखने को मिली. देश के कई परीक्षा केंद्रों पर सुबह की शिफ्ट का पेपर अपने तय समय पर शुरू नहीं हो सका, जिससे सेंटर्स के बाहर तपती धूप में खड़े उम्मीदवारों और उनके माता-पिता का गुस्सा फूट पड़ा. इस हंगामे के बाद आनन-फानन में एनटीए को आधिकारिक नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण देना पड़ा है। 

एनटीए ने अपने ऑफिशियल नोटिस में स्वीकार किया है कि सीयूईटी यूजी परीक्षा कराने वाली टेक्निकल पार्टनर कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (M/s TCS) के एंड पर एक बड़ी तकनीकी खराबी आ गई थी. इस तकनीकी गड़बड़ी के कारण सुबह की शिफ्ट की परीक्षा में देरी हुई. इस बड़ी चूक का सीधा असर अब दोपहर की शिफ्ट पर भी पड़ा है, जिसके चलते एनटीए को दोपहर के सत्र के समय में बड़ा बदलाव करना पड़ा है. एजेंसी ने इस असुविधा के लिए छात्रों और अभिभावकों से खेद जताया है और भरोसा दिया है कि किसी भी उम्मीदवार का समय का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। 

TCS के सर्वर में खराबी: अटकी सीयूईटी परीक्षा!
भारत की ज्यादातर यूनिवर्सिटीज में सीयूईटी यूजी स्कोर के आधार पर एडमिशन मिलता है. आज, 30 मई को सीयूईटी परीक्षा शुरू होते ही टीसीएस के सिस्टम ने जवाब दे दिया. एनटीए ने बताया कि टीसीएस की तरफ से आई इस तकनीकी खराबी के कारण कुछ चुनिंदा सेंटर्स पर परीक्षा समय से शुरू नहीं हो सकी. कंप्यूटर स्क्रीन और सर्वर डाउन होने की वजह से छात्र अपनी सीटों पर बैठे इंतजार करते रहे. हालांकि, एनटीए का दावा है कि अब इस तकनीकी खराबी को पूरी तरह से ठीक कर लिया गया है और प्रभावित सेंटर्स पर परीक्षा दोबारा सुचारू रूप से शुरू करा दी गई है। 

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोपहर के सत्र के समय में बदलाव किया है और छात्रों के लिए एक जरूरी नोटिस जारी किया है।

दोपहर के सत्र की परीक्षा 4 बजे से होगी शुरू
एनटीए ने दोपहर के सत्र की परीक्षा को एक घंटा आगे बढ़ा दिया है। अब रिपोर्टिंग और एंट्री का समय दोपहर 2:30 बजे से तय किया गया है। परीक्षा शुरू होने का समय दोपहर 4:00 बजे से (पहले यह परीक्षा दोपहर 3:00 बजे शुरू होने वाली थी) निर्धारित किया गया है।

शनिवार सुबह से ही देश के कई परीक्षा केंद्रों से छात्रों और अभिभावकों की शिकायतें आ रही थीं कि कंप्यूटर स्क्रीन काम नहीं कर रही हैं और लॉगिन करने में दिक्कत आ रही है।

टीसीएस ने आधिकारिक तौर पर माना है कि उनकी तरफ से एक तकनीकी खराबी हुई थी, जिसकी वजह से सुबह का सत्र समय पर शुरू नहीं हो सका।

सुबह की पाली के छात्रों को दिया जा रहा पूरा समय
एनटीए ने आश्वासन दिया है कि सुबह के सत्र के जिन छात्रों की परीक्षा देरी से शुरू हुई थी, उन्हें पूरा समय दिया जा रहा है। छात्र अपना पूरा पेपर खत्म करने के बाद ही परीक्षा केंद्र से बाहर आ सकेंगे, ताकि किसी भी छात्र का नुकसान न हो।

NTA ने जारी किया हेल्पलाइन नंबर
एनटीए ने छात्रों और अभिभावकों को हुई इस असुविधा के लिए खेद जताया है और कहा है कि अब इस तकनीकी समस्या को पूरी तरह सुलझा लिया गया है।

यदि किसी छात्र को परीक्षा से जुड़ी कोई अन्य समस्या आ रही है, तो वे हेल्पलाइन नंबर +91-11-40759000 पर संपर्क कर सकते हैं।

 

दोपहर की शिफ्ट का समय बदला: अब 3 नहीं, 4 बजे से शुरू होगा पेपर
सुबह की शिफ्ट में हुई इस देरी का सीधा असर दोपहर के सत्र पर पड़ा है. एनटीए ने तुरंत एडवाइजरी जारी कर दोपहर की शिफ्ट के समय को री-शेड्यूल कर दिया है. नए टाइमिंग के मुताबिक:

    रिपोर्टिंग और एंट्री का समय: दोपहर 2:30 बजे से शुरू होगा.
    परीक्षा शुरू होने का समय: अब दोपहर 3:00 बजे के बजाय शाम 4:00 बजे से परीक्षा शुरू होगी.

एनटीए ने सभी संबंधित परीक्षा केंद्रों को निर्देश जारी कर दिए हैं कि वे नए टाइमिंग के हिसाब से ही उम्मीदवारों को एंट्री दें, जिससे सेंटर्स पर अफरा-तफरी का माहौल न बने। 

सुबह वाले छात्रों को मिलेगा पूरा समय, बीच में निकलने पर रोक
देरी से परेशान सुबह की शिफ्ट के उम्मीदवारों को राहत देते हुए एनटीए ने साफ किया है कि किसी भी उम्मीदवार के साथ नाइंसाफी नहीं होगी. तकनीकी खराबी के कारण जितना भी समय बर्बाद हुआ है, उसकी पूरी भरपाई ‘कंपनसेटरी टाइम’ (Compensatory Time) देकर की जा रही है. छात्रों को प्रश्नपत्र हल करने के लिए निर्धारित पूरा समय दिया जाएगा. इसके साथ ही एनटीए ने सुरक्षा और गोपनीयता का हवाला देते हुए सख्त नियम लागू किया है कि सुबह की शिफ्ट का कोई भी उम्मीदवार अपना पेपर पूरा किए बिना या निर्धारित समय से पहले एग्जाम हॉल से बाहर नहीं निकल सकेगा। 

एनटीए ने जताया खेद, हेल्पलाइन नंबर और ईमेल जारी
पहले से ही विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही एनटीए ने इस घटना के तुरंत बाद उम्मीदवारों और अभिभावकों को हुई मानसिक परेशानी और असुविधा के लिए खेद प्रकट किया है. इसके साथ ही, किसी भी तरह की शंका, शिकायत या मदद के लिए एनटीए ने हेल्पलाइन नंबर और आधिकारिक ईमेल आईडी भी जारी की है. उम्मीदवार और पेरेंट्स किसी भी अपडेट के लिए ऑफिशियल वेबसाइट पर नजर बनाए रख सकते हैं:

    हेल्पलाइन नंबर: +91-11-40759000
    ऑफिशियल ईमेल: cuet-ug@nta.ac.in
    ऑफिशियल वेबसाइट: https://cuet.nta.ac.in

कई केंद्रों से परीक्षा रद्द होने की सूचना

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एनटीए के ट्वीट के नीचे कमेंट सेक्शन में कई उम्मीदवार आज की सीयूईटी यूजी परीक्षा रद्द होने की जानकारी दे रहे हैं. इन उम्मीदवारों ने कमेंट में लिखा है कि नोएडा के सेक्टर 64 समेत कई केंद्रों में परीक्षा शुरू ही नहीं हुई। 

कई अभिभावकों का कहना है कि जो सीयूईटी यूजी परीक्षा सुबह 9 बजे शुरू होकर 10.30 बजे खत्म होनी थी, वो शायद अब तक शुरू ही नहीं हुई है. 1 बज चुका है और उनके बच्चे अभी तक सीयूईटी यूजी परीक्षा केंद्र से बाहर ही नहीं निकले हैं। 

 

बंगाल में Abhishek Banerjee पर हमला, अंडे-पत्थर फेंके; हेलमेट पहनकर बचाई जान

सोनारपुर 

पश्चिम बंगाल के सोनारपुर इलाके में उस समय भारी राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया, जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी पर कथित तौर पर जानलेवा हमला कर दिया गया। मिली जानकारी के अनुसार, अभिषेक बनर्जी सोनारपुर में हाल ही में हुई चुनावी हिंसा में घायल हुए टीएमसी कार्यकर्ताओं से मुलाकात करने और उनका हालचाल जानने पहुंचे थे। लेकिन उनके वहां पहुंचते ही माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया और देखते ही देखते हिंसक झड़प शुरू हो गई।

भाजपा कार्यकर्ताओं पर मारपीट का आरोप
तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि जैसे ही अभिषेक बनर्जी का काफिला सोनारपुर पहुंचा, वहां पहले से मौजूद भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने उनके खिलाफ तीखी नारेबाजी शुरू कर दी, जो कुछ ही पलों में हिंसक मारपीट में बदल गई। उग्र भीड़ ने टीएमसी सांसद पर अंडे फेंके और उनके साथ धक्का-मुक्की की, जिसमें अभिषेक बनर्जी की शर्ट तक फट गई। स्थिति इतनी बेकाबू हो गई थी कि सुरक्षाकर्मियों को अभिषेक बनर्जी के सिर को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें आनन-फानन में हेलमेट पहनाना पड़ा और किसी तरह सुरक्षित बाहर निकाला गया।

घटना के दौरान, स्थानीय लोगों ने ने कथित तौर पर बनर्जी के खिलाफ चोर चोर के नारे लगाए। घटनास्थल से मिले दृश्यों में तनाव बढ़ने पर सुरक्षाकर्मी उन्हें घेरते और उनकी सुरक्षा करते हुए दिखाई दिए।

इस हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए बनर्जी ने आरोप लगाया कि यह घटना भाजपा द्वारा प्रायोजित है। उन्होंने कहा, “यह सब भाजपा द्वारा प्रायोजित है। देखिए उन्होंने क्या किया है। यही उनका लोकतंत्र का उदाहरण है। अभी एक महीना भी नहीं बीता है और पुलिस का नामोनिशान नहीं है।” टीएमसी सांसद ने आगे कहा, “वे मुझे मार डालना चाहते थे। यह पूरी घटना कैमरे में कैद हो गई है। हम निश्चित रूप से हाई कोर्ट को इस बारे में जानकारी देंगे। हम राज्यपाल को भी इस बारे में अवगत कराएंगे। मैं निश्चित रूप से कोर्ट का रुख करूंगा।

ये लोग मुझे जान से मारना चाहते थे: अभिषेकइस भीषण हमले के बाद पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने मीडिया के सामने आकर अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने अत्यंत आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा, “ये लोग पूरी तैयारी के साथ आए थे और मुझे जान से मारना चाहते थे। भीड़ ने हमला करके मेरी शर्ट तक फाड़ दी। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि इतने संवेदनशील मौके पर वहां एक भी पुलिसकर्मी तैनात नहीं था।” उन्होंने आगे कहा कि हेलमेट की वजह से आज उनका सिर बच गया, वरना कोई बड़ी अनहोनी हो सकती थी। अभिषेक बनर्जी ने विपक्षी दलों को ललकारते हुए साफ किया कि टीएमसी इस तरह के कायराना हमलों से डरने वाली नहीं है और वे जनता के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।

स्थानीय लोगों ने क्या कहा?
स्थानीय लोगों ने कहा कि हम लोग मजदूर आदमी हैं. हम लोग कोई पार्टी के नहीं हैं. हम लोगों का रास्ता कभी नहीं बना. जितना पैसा आया, सब खा लिया. हम लोग आज भी परेशान हैं, इसलिए गुस्सा है. एक और शख्स ने कहा कि हम कोई बीजेपी नहीं करते. हम यहीं के रहने वाले हैं. हम दीघा के आदमी हैं. यहां दो कट्ठा जमीन लेकर रहते हैं। 

अभिषेक के खिलाफ क्यों फूटा लोगों का गुस्सा?
इस इलाके के सड़क का हाल बुहत खराब है. इस इलाके में करीब एक किलोमीटर तक सड़क की स्थिति बेहद खराब है. बारिश के दौरान यहां पानी भर जाता है। 

लोगों का कहना है कि जब ममता बनर्जी मुख्यमंत्री थीं, तब कई बार उनसे गुजारिश की गई, आवेदन दिए गए कि सड़कें ठीक कराई जाएं और पानी की सप्लाई व्यवस्था सुधारी जाए. लेकिन लोगों का आरोप है कि उनकी समस्याओं पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. उनके मुताबिक, किसी ने उनके बारे में नहीं सोचा। 

इसी वजह से जब सांसद होने के नाते अभिषेक बनर्जी यहां पहुंचे, तो लोगों ने सवाल उठाया कि पंद्रह साल से सत्ता में रहने के बावजूद इस इलाके का विकास क्यों नहीं हुआ. इन्हीं मुद्दों को लेकर लोगों में गुस्सा था. उनके खिलाफ लगातार नारेबाजी की गई और उन पर अंडे भी फेंके गए। 

‘यह बीजेपी का प्रायोजित हमला, पुलिस गायब थी’
इस हमले और तीखे विरोध के बाद उन्होंने विपक्ष पर सीधा निशाना साधा है. उन्होंने अपनी स्थिति दिखाते हुए मीडिया से कहा, “यह सब पूरी तरह से बीजेपी द्वारा प्रायोजित है. आप खुद देख सकते हैं कि आज मेरा क्या हाल किया गया है. यह इनके लोकतंत्र का असली नमूना है. सबसे बड़ी बात यह है कि मौके पर कहीं भी पुलिस दिखाई नहीं दे रही थी। 

इस घटना के बाद पूरे सोनारपुर इलाके में भारी राजनीतिक तनाव पैदा हो गया है. टीएमसी जहां इसे विपक्षी दल की सोची-समझी साजिश बता रही है, वहीं दूसरी तरफ से इसे स्थानीय लोगों का गुस्सा कहा जा रहा है. फिलहाल इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और दोनों पार्टियों के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। 

मुंबई में फिर महंगी हुई CNG, 15 दिन में दूसरी बार बढ़े दाम; जनता पर बढ़ा बोझ

 मुंबई

मुंबई में एक बार फिर सीएनजी के दाम बढ़ गए हैं. अब सीएनजी 86 रुपये प्रति किलो की दर से मिलेगी. मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) में कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) की कीमतों में सरकारी गैस डिस्ट्रीब्यूटर महानगर गैस लिमिटेड (MGL) ने 2 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी की है। 

इस बदलाव के बाद, मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई और MMR के अन्य हिस्सों में CNG की कीमत 86 रुपये प्रति किलोग्राम हो जाएगी. हाल के हफ़्तों में यह दूसरी बढ़ोतरी है; इससे पहले MGL ने 14 मई को कीमतों में 2 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी की थी। 

जानकारी के मुताबिक, महानगर गैस लिमिटेड ने 1 किलो सीएनजी की कीमत को 84 रुपये से बढाकर 86 रुपये कर दिया है. सीएनजी की बढ़ी हुई कीमतें आज से लागू हो गई हैं. इससे पहले 14 मई को ही सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी की गई थी. तब भी इसमें 2 रुपये बढ़ाकर 82 से 84 रुपये दाम किया गया था। 

तब महानगर गैस लिमिटेड ने CNG Price Hike को लेकर कहा था कि कीमतों में ये इजाफा वेस्ट एशिया संघर्ष (West Asia Conflict) के चलते पैदा हुई ग्लोबल टेंशन के चलते किया गया है. जिसमें गैस खरीदने की लागत में बढ़ोतरी, कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा, भारतीय करेंसी रुपये में गिरावट और सप्लाई चेन में रुकावट शामिल है। 

एक रिपोर्ट में अधिकारी के हवाले से कहा गया था कि इन नए ग्लोबल कारणों के चलते सीएनजी की कीमत में 2 रुपये प्रति किलो का इजाफा करते हुए इसे 84 रुपये प्रति किलो कर दिया गया है। 

सीएनजी महंगी होते ही, किराया बढ़ाने की मांग सीएनजी के दाम बढ़ने से परिवहन लागत में इजाफा होगा. मुंबई में ऑटो यूनियन पहले ही किराए में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं. आंकड़े देखें, तो महानगर गैस लिमिटेड यानी MGL के मुताबिक, मुंबई महानगर क्षेत्र में करीब 12 लाख से अधिक वाहन सीएनजी पर चल रहे हैं। 

साइप्रस दौरे के पीछे बड़ा गेम? ग्रीस तक ब्रह्मोस पहुंचाने की चर्चा से तुर्की में बेचैनी

नई दिल्ली

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बिसात पर भारत ने एक बहुत बड़ा दांव चला है, जिसने तुर्की और उसके सदाबहार दोस्त पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है। हाल ही में भारत और साइप्रस के बीच ‘रणनीतिक साझेदारी’ हुई है, जिसके तहत भारत की सबसे घातक मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ के साइप्रस और ग्रीस तक पहुंचने का रास्ता साफ हो गया है। भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के हालिया साइप्रस दौरे ने इस पूरे घटनाक्रम में आग में घी का काम किया है, जिससे तुर्की में दहशत का माहौल है। साइप्रस द्वारा भारत से ‘ब्रह्मोस’ सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और कामिकाजे ड्रोन्स खरीदने की गहरी दिलचस्पी दिखाने के बाद, तुर्की के रणनीतिक और सुरक्षा हलकों में हड़कंप मच गया है।

क्या है पूरा विवाद और ब्रह्मोस की एंट्री?
हाल ही में साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलिड्स ने भारत का दौरा किया था, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अहम बैठक हुई। इसके तुरंत बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर साइप्रस पहुंच गए। इन दौरों के बाद एक रक्षा सहयोग रोडमैप तैयार किया गया है।

ताजा रक्षा रिपोर्ट्स के मुताबिक, साइप्रस ने दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक ‘ब्रह्मोस’ के साथ-साथ भारत के घातक कामिकाजे ड्रोन (जैसे नागास्त्र-1 और स्काईस्ट्राइकर) हासिल करने की इच्छा जताई है। यह संभावित ब्रह्मोस खरीद यूरोपीय संघ (EU) के ‘SAFE’ प्रोग्राम के तहत ग्रीक साइप्रस प्रशासन को आवंटित लगभग 1.2 बिलियन यूरो के रक्षा पैकेज के अंतर्गत की जा सकती है।

तुर्की की नींद क्यों उड़ी है?
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और अंकारा के रक्षा विश्लेषकों के लिए यह एक बड़ा झटका है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं। तुर्की ने दशकों से उत्तरी साइप्रस पर अवैध कब्जा कर रखा है। साइप्रस के पास ब्रह्मोस और घातक ड्रोन्स जैसी मारक क्षमता आने से क्षेत्रीय सैन्य संतुलन पूरी तरह से बदल सकता है और तुर्की की सुरक्षा को सीधा खतरा पैदा हो सकता है।

तुर्की की मीडिया और रक्षा विशेषज्ञों को डर है कि भारतीय हथियारों की मदद से साइप्रस और ग्रीस मिलकर तुर्की के खिलाफ एक मजबूत और अजेय रक्षा दीवार तैयार कर लेंगे। तुर्की के लोगों का मानना है कि भारत के लिए ‘साइप्रस तो बहाना है, अपनी ब्रह्मोस को ग्रीस तक पहुंचाना है।’ क्योंकि ग्रीस और तुर्की के बीच भी गहरे भू-राजनीतिक और समुद्री सीमा विवाद हैं।

भारत का रणनीतिक पलटवार
मई 2025 में हुए भारत-पाक संघर्ष के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को गुपचुप तरीके से सैकड़ों ड्रोन मुहैया कराए थे। इसके अलावा एर्दोगन कश्मीर मुद्दे पर लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते रहे हैं। अब भूमध्य सागर में तुर्की की नाक के नीचे भारतीय हथियारों की संभावित तैनाती को नई दिल्ली द्वारा एर्दोगन को दिया गया करारा जवाब माना जा रहा है।

साइप्रस और ग्रीस (यूनान) दोनों तुर्की के कट्टर प्रतिद्वंद्वी हैं। अगर ब्रह्मोस साइप्रस के पास आती है, तो यह सीधे तौर पर तुर्की के लिए एक बड़ा सैन्य खतरा बन जाएगा, क्योंकि यह मिसाइल मैक 2.8 से मैक 3 की गति से अचूक हमला करने में सक्षम है। भारत और साइप्रस के बीच द्विपक्षीय रक्षा सहयोग (2026-2031) के लिए एक अहम रोडमैप पर मुहर लगी है, जो दोनों देशों को रणनीतिक साझेदार बनाता है।

मंडराए ग्रीक फाइटर जेट्स कि तुर्की को लगी मिर्ची?
तुर्की और ग्रीस के बीच पूर्वी एजियन सागर के द्वीपों को लेकर पुराना विवाद फिर से भड़क गया है। हाल ही में तुर्की के F-16 फाइटर जेट्स और CN-235 सर्विलांस विमानों ने ग्रीस के हवाई क्षेत्र का बार-बार उल्लंघन किया। इसके जवाब में ग्रीस के लड़ाकू विमानों ने तुरंत उड़ान भरी और दोनों देशों के जेट्स के बीच आसमान में ही ‘सिम्युलेटेड डॉगफाइट’ (छद्म युद्ध जैसी स्थिति) देखने को मिली।

तुर्की के रक्षा मंत्री यासर गुलर ने पश्चिमी तुर्की के सैन्य बेस से बौखलाहट में बयान दिया कि ग्रीस पूर्वी एजियन द्वीपों का अवैध रूप से सैन्यीकरण कर रहा है। उन्होंने ग्रीस को धमकी देते हुए कहा कि तुर्की एजियन सागर, पूर्वी भूमध्यसागर और साइप्रस में अपने हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। एथेंस ने इस पर पलटवार करते हुए तुर्की के दावों को मनगढ़ंत बताकर सिरे से खारिज कर दिया।

सोशल मीडिया पर बहस
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर
तुर्की के यूजर्स ग्रीस और साइप्रस पर जमकर निशाना साध रहे हैं। उनका आरोप है कि ग्रीस भारत को मोहरा बनाकर तुर्की को घेरने की साजिश रच रहा है। तुर्की के रक्षा विशेषज्ञ और राष्ट्रवादी इस बात से खफा हैं कि भारत का इस क्षेत्र में आना उनके देश की रणनीतिक सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।

दूसरी ओर, ग्रीस और साइप्रस के नागरिक ‘X’ पर भारत की जमकर तारीफ कर रहे हैं। ग्रीक यूजर्स इस बात से बेहद खुश हैं कि भारत जैसा शक्तिशाली देश उन्हें आधुनिक हथियार और कूटनीतिक समर्थन उपलब्ध कराएगा, जिससे वे तुर्की की धमकियों का डटकर मुकाबला कर सकेंगे।

30 फरवरी बना मुसीबत! हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला की भारतीय नागरिकता पर उठाए सवाल

गुवाहाटी 
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम महिला को भारतीय नागरिक मानने से इनकार करने वाले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखा है। इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने एक बेहद अजीबोगरीब तथ्य को उजागर किया। अदालत ने पाया कि महिला ने अपने दस्तावेजों में अपनी जन्मतिथि 30.02.1990 (30 फरवरी 1990) बताई थी, जो पूरी तरह से अमान्य और असंभव है। ऐसा इसलिए क्योंकि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार फरवरी के महीने में कभी 30 दिन होते ही नहीं हैं।

जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस प्रांजल दास की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि बिना किसी मजबूत दस्तावेजी सबूत के केवल मौखिक गवाही के आधार पर महिला का अपने पूर्वजों से संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता है।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला दिसंबर 2006 का है। दरंग मंगलदोई के पुलिस अधीक्षक ने महिला की राष्ट्रीयता पर संदेह जताते हुए एक संदर्भ फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को भेजा था। ट्रिब्यूनल से इस मामले पर राय मांगी गई थी। नोटिस मिलने के बाद महिला ट्रिब्यूनल के सामने पेश हुई और खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए अपने लिखित बयान के साथ 9 दस्तावेज और गवाह पेश किए। उसने खुद को आकाश अली नाम के व्यक्ति का वंशज बताया, जिनका नाम 1966 की मतदाता सूची में शामिल था।

कोर्ट ने क्यों खारिज किए दावे?
महिला ने ट्रिब्यूनल के सामने कई दस्तावेज पेश किए थे। उनमें 1966 की मतदाता सूची भी थी, जिसमें उसके कथित दादा आकाश अली का नाम था। 1993 की मतदाता सूची में नूर इस्लाम (आकाश अली के बेटे) और जहूरा के नाम थे, जिन्हें महिला ने अपने माता-पिता बताया था। अदालत और ट्रिब्यूनल ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।

दस्तावेजों को साबित नहीं किया जा सका
ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल दस्तावेज जमा कर देने से उनके भीतर लिखी बातें सच साबित नहीं हो जातीं। दस्तावेजों की सत्यता की पुष्टि उन गवाहों द्वारा की जानी चाहिए जो उनके प्रामाणिक होने की गवाही दे सकें। महिला ने अपने हलफनामे में यह भी दावा किया कि उसके दादा आकाश अली का नाम 2010 की मतदाता सूची में अबू बकर के रूप में दर्ज था और ये दोनों नाम एक ही व्यक्ति के थे, जिसे अदालत ने स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा बताई गई जन्मतिथि 30 फरवरी 1990 पूरी तरह से अमान्य थी।

केवल मौखिक गवाही काफी नहीं
याचिकाकर्ता के वकील एम. देव ने दलील दी कि जमा की गई मतदाता सूचियां प्रमाणित प्रतियां थीं, जो साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 के तहत सार्वजनिक दस्तावेज हैं। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि ट्रिब्यूनल की इस आपत्ति को छोड़ भी दिया जाए तब भी सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या याचिकाकर्ता अपने पूर्वज आकाश अली के साथ अपना संबंध साबित कर पाई? अदालत ने कहा, “यह पूरी तरह स्थापित कानून है कि ऐसे मामलों में केवल मौखिक गवाही लिंक स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं होती है। इसके लिए पुख्ता दस्तावेजी सबूत अनिवार्य हैं।”

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि दस्तावेजों के मूल लेखकों या संबंधित अधिकारियों ने इसकी गवाही नहीं दी थी, इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा इन सबूतों को स्वीकार न करना किसी भी तरह से गैर-कानूनी नहीं था। इसी के साथ अदालत ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराते हुए महिला की याचिका खारिज कर दी।

F-35 को बनाने में अमेरिका को लगे 72 महीने, भारत का AMCA सिर्फ 30 माह में भर सकता है उड़ान!

बेंगलुरु 
भारत ने रक्षा तकनीक की दुनिया में एक ऐसा दांव चला है, जिसने दुनिया के बड़े सैन्य विशेषज्ञों को चौंका दिया है. पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एडवांस मीडियम कंबैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA के लिए जारी हुए आरएफपी ने सिर्फ एक नए विमान की कहानी शुरू नहीं की, बल्कि भारत के डिफेंस इंडस्ट्रियल मॉडल को ही बदलने का संकेत दे दिया है. इसमें सबसे बड़ा संदेश यह है कि करीब सात दशक तक लड़ाकू विमान निर्माण में अकेले खिलाड़ी रहे सरकारी कंपनी एचएएल का एकाधिकार अब टूटता दिख रहा है. पहली बार भारत सरकार ने AMCA जैसे रणनीतिक और अत्यंत संवेदनशील प्रोजेक्ट के लिए निजी कंपनियों को आगे कर दिया है। 

एलएंडटी-बीईएल, टाटा एडवांस सिस्टम्स और भारत फोर्ज-बीईएचएल जैसे निजी समूह अब उस दौड़ में हैं, जो भारत को अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की श्रेणी में ला सकती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत वाकई 30 महीने में वह कर सकता है, जिसके लिए अमेरिका जैसी सुपरपावर को 5 से 6 साल लगे थे?

AMCA सिर्फ फाइटर जेट नहीं, भारत का टेक्नोलॉजिकल टेस्ट है
AMCA परियोजना को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान सिर्फ एक एयरक्राफ्ट नहीं होता. यह उड़ने वाला सुपरकंप्यूटर होता है. इसमें स्टील्थ डिजाइन, सेंसर फ्यूजन, AI आधारित एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम, सुपरक्रूज क्षमता और अत्याधुनिक हथियार एक साथ काम करते हैं. दुनिया में अभी तक केवल अमेरिका, चीन और सीमित स्तर पर रूस ही इस तकनीक को पूरी तरह विकसित कर पाए हैं. भारत अब इसी क्लब में प्रवेश करना चाहता है।
 
 लेकिन असली कहानी यहां टाइमलाइन की है. अमेरिका को 72 महीने, भारत को सिर्फ 30 महीने!

AMCA के RFP के अनुसार:

    पहला प्रोटोटाइप 24 महीने में तैयार करना होगा
    30 महीने के भीतर उसकी पहली उड़ान होगी
    कुल 1800 शॉर्टिज सात वर्षों में पूरी करनी होंगी
    उसके बाद ही सीरियल प्रोडक्शन शुरू होगा

यानी अगर सब कुछ समय पर हुआ तो 2034-35 तक AMCA भारतीय वायुसेना में शामिल हो सकता है. अब इसकी तुलना अमेरिका से कीजिए। 

F-22 और F-35 का उदाहरण
अमेरिका ने 1991 में लॉकहीड मार्टिन-बोइंग टीम को F-22 रैप का कॉन्ट्रैक्ट दिया था. लेकिन पहला प्रोटोटाइप 1997 में रोलआउट हुआ और उसी साल उसकी पहली उड़ान हुई. यानी पहली उड़ान में करीब 72 महीने लगे. F-35 की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. F-35 लाइटिंग-II का कॉन्ट्रैक्ट 2001 में दिया गया. पहला प्रोटोटाइप 2006 में तैयार हुआ. यानी यहां भी लगभग 60 महीने लगे. अब भारत कह रहा है कि वह 30 महीने में पहली उड़ान करा देगा. यही वजह है कि दुनिया की नजरें इस प्रोजेक्ट पर टिक गई हैं। 

HAL का युग खत्म या नई शुरुआत?
AMCA प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा राजनीतिक और औद्योगिक संदेश यह है कि भारत अब सरकारी मॉडल से आगे बढ़कर निजी रक्षा उद्योग पर भरोसा कर रहा है. एचएएल ने दशकों तक मिग-21, जैगुआर, सुखोई-30MKI और तेजस जैसे विमानों का निर्माण किया. लेकिन तेजस प्रोग्राम में हुई लंबी देरी ने सरकार को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या भारत को तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए नए मॉडल की जरूरत है? फिर यहीं से निजी क्षेत्र की एंट्री हुई. हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि प्रोटोटाइप निर्माण के बाद जब AMCA के बड़े पैमाने पर उत्पादन की बारी आएगी, तब एचएएल फिर से रेस में शामिल हो सकता है. क्योंकि HAL के पास मौजूदा असेंबली लाइनें हैं. एयरफोर्स के साथ दशकों का अनुभव है. सप्लाई चेन पहले से विकसित है. बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता है. लेकिन जिस निजी कंपनी को शुरुआती प्रोटोटाइप कॉन्ट्रैक्ट मिलेगा, उसे तकनीकी बढ़त मिल जाएगी. इसलिए यह लड़ाई सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के एयरोस्पेस इकोसिस्टम की है। 

सबसे बड़ी चुनौती- अनुभव की कमी
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारतीय निजी कंपनियां इतनी जल्दी फाइटर जेट निर्माण की क्षमता विकसित कर पाएंगी? सच्चाई यह है कि किसी भी निजी कंपनी ने अभी तक फाइटर जेट की फाइनल असेंबली लाइन नहीं बनाई है. टाटा ने जरूर एयरबस के साथ मिलकर C-295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट लाइन बनाई है, लेकिन वह फाइटर जेट नहीं है. स्टील्थ कोटिंग, सेंसर फ्यूजन और सुपरसोनिक डिजाइन जैसी तकनीकें भारत के लिए नई हैं। 

इसके अलावा RFP में साफ कहा गया है कि नई कंपनी भारतीय नियंत्रण में होगी. विदेशी शेयर होल्डिंग सीमित रहेगी. सीईओ, सीएफओ और बोर्ड भारतीय नागरिक होंगे. विदेशी कंपनियों की प्रत्यक्ष भागीदारी लगभग नहीं होगी. यानी भारत को यह लड़ाई लगभग अकेले लड़नी होगी। 

क्या भारत चुपके से डिफेंस टेक सुपरपावर बन रहा है?
ऐसे में यह बड़ा सवाल बन गया है. यहां एक बड़ा बदलाव दिखाई देता है. पिछले दस वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में कई बड़े परिवर्तन किए हैं. जैसे-

    मिसाइल टेक्नोलॉजी में तेज प्रगति
    स्वदेशी रडार और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम
    ड्रोन और AI आधारित युद्ध प्रणालियां
    ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्षमता

    तेजस Mk1A और टीईडीबीएफ जैसी परियोजनाएं

अब AMCA उस पूरी रणनीति का अगला चरण है. सरकार शायद यह समझ चुकी है कि अगर भारत को भविष्य के युद्धों में आत्मनिर्भर बनना है, तो उसे अब सिर्फ लाइसेंस प्रोडक्शन से आगे बढ़ना होगा. यही वजह है कि AMCA को केवल रक्षा परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय तकनीकी मिशन की तरह देखा जा रहा है। 

AMCA की सबसे बड़ी ताकत उसकी महत्वाकांक्षा है और सबसे बड़ा खतरा भी वही है. अगर टाइमलाइन फिसली तो लागत कई गुना बढ़ सकती है. एयरफोर्स की क्षमता प्रभावित होगी. विदेशी लड़ाकू विमानों पर निर्भरता बढ़ेगी. निजी क्षेत्र का भरोसा भी हिल सकता है. तेजस परियोजना पहले ही दिखा चुकी है कि भारत में जटिल एयरोस्पेस प्रोजेक्ट समय से पीछे जा सकते हैं. ऐसे में 30 महीने की समय सीमा कई विशेषज्ञों को अवास्तविक लग रही है। 

असली गेमचेंजर क्या हो सकता है?
फिर भी इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत अब टेक्नोलॉजी रिस्क लेने को तैयार दिख रहा है. पहले भारत विदेशी तकनीक खरीदता था. अब भारत खुद प्लेटफॉर्म डिजाइन करना चाहता है. पहले सरकारी कंपनियां केंद्र में थीं. अब निजी उद्योग को रणनीतिक जिम्मेदारी दी जा रही है. पहले भारत रक्षा बाजार था. अब वह रक्षा निर्माता बनने की कोशिश कर रहा है. यही बदलाव आने वाले 20 वर्षों में भारत की सैन्य और औद्योगिक शक्ति तय करेगा। 

AMCA सिर्फ एक लड़ाकू विमान नहीं है. यह भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षा, औद्योगिक आत्मविश्वास और रणनीतिक स्वतंत्रता की सबसे बड़ी परीक्षा है. अमेरिका को F-22 और F-35 जैसे स्टील्थ जेट विकसित करने में पांच से छह साल लगे. भारत अब दावा कर रहा है कि वह महज 30 महीनों में पहली उड़ान कराएगा. यह लक्ष्य बेहद कठिन है, शायद जोखिम भरा भी. लेकिन अगर भारत इसका आधा हिस्सा भी समय पर हासिल कर लेता है, तो यह साफ संकेत होगा कि देश चुपचाप दुनिया की नई डिफेंस टेक शक्तियों में शामिल हो रहा है। 

अजीत डोभाल की कूटनीति का असर? रूस पहुंचते ही पुतिन-तालिबान के बीच हुई बड़ी डील

नई दिल्ली

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी एक ही दिन की घटनाएं आने वाले कई वर्षों की रूपरेखा तैयार कर देती हैं. गुरुवार को कुछ ऐसा ही हुआ. इस्लामाबाद में बैठकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तालिबान और भारत के खिलाफ जहर उगल रहे थे. उसी समय रूस में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और तालिबान एक साथ पाकिस्तान की फील्डिंग सेट कर रह थे. हालांकि दोनों के तरीके अलग-अलग थे, लेकिन जो कदम उठाए वह पाकिस्तान खिलाफ था. रूस में पहला इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम आयोजित किया गया, जिसमें 120 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि पहुंचे थे. भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के प्रतिनिधि भी यहां थे. भारत के NSA अजीत डोभाल ने कहा कि आतंकवाद पर ‘दोहरा मापदंड नहीं चलेगा’. वहीं दूसरी तरफ रूस और तालिबान के बीच सैन्य सहयोग समझौते पर मुहर लग रही थी. रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान अफगानिस्तान ने एयर डिफेंस सिस्टम भी मांगे. तीनों घटनाओं को अलग-अलग देखने पर तस्वीर अधूरी लग सकती है. लेकिन इन्हें एक साथ जोड़ें तो पाकिस्तान के लिए उभरती नई रणनीतिक चुनौती साफ दिखाई देती हैं। 

शहबाज शरीफ ने क्या कहा?
पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की वर्षगांठ पर दिए संदेश में शहबाज शरीफ ने आरोप लगाया कि तालिबान सरकार भारत के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद कर रही है. यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते लगातार खराब हो रहे हैं. डूरंड लाइन पर झड़पें बढ़ी हैं और पाकिस्तान की एयरफोर्स कई बार अफगानिस्तान के अंदर हवाई और सैन्य कार्रवाई कर चुकी है. लेकिन जब शहबाज शरीफ जहर उगल रहे थे, तब रूस में कुछ और ही हो रहा था। 

रूस में क्या हो रहा था?
रूस में आयोजित इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम में NSA अजीत डोभाल ने आतंकवाद पर सख्त रुख अपनाया. डोभाल ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरा मापदंड नहीं हो सकता. जिम्मेदार देशों को तय करना होगा कि वे आतंकवाद के प्रायोजकों का समर्थन करेंगे या उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई. डोभाल ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन आतंकवाद को लेकर भारत का रुख लंबे समय से पाकिस्तान के खिलाफ रहा है. यानी जिस दिन शहबाज भारत और तालिबान पर आरोप लगा रहे थे, उसी दिन भारत रूस के मंच से आतंकवाद पर अपनी लाइन दुनिया के सामने रख रहा था. लेकिन पाकिस्तान को इसकी आदत है. इसीलिए पाकिस्तान के लिए असली बुरी खबर अफगानिस्तान से आई। 

असली कहानी रूस-तालिबान डील में छिपी है
द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा घटनाक्रम रूस और तालिबान के बीच हुआ सैन्य सहयोग समझौता है. रूस पहले ही जुलाई 2025 में तालिबान सरकार को मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश बन चुका है. अब उसने रक्षा सहयोग को भी आगे बढ़ा दिया है. हालांकि समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन अफगानिस्तान की प्राथमिकताओं को देखकर कई सवाल उठ रहे हैं. तालिबान की सबसे बड़ी सैन्य चिंता पाकिस्तान की सीमा पार कार्रवाई है. पाकिस्तान ने पिछले कई महीनों में कई बार आतंकवाद विरोधी अभियान के नाम पर अफगान क्षेत्र में हवाई हमले किए हैं. अफगानिस्तान की नजर में यह उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है. यही वजह है कि अफगानिस्तान अब रूस से आधुनिक एयर डिफेंस क्षमता विकसित करना चाहता है ताकि भविष्य में अगर कोई उसकी हवाई सीमा का उल्लंघन करे तो जवाब दिया जा सके। 

पाकिस्तान की टेंशन क्यों बढ़ सकती है?
अभी तक पाकिस्तान के पास एक बड़ा रणनीतिक फायदा था. अफगानिस्तान के पास आधुनिक एयर डिफेंस नेटवर्क नहीं है. लेकिन अगर रूस किसी स्तर पर एयर डिफेंस, रडार, सैन्य प्रशिक्षण, उपकरणों की मरम्मत या पुराने लेकिन प्रभावी रक्षा सिस्टम उपलब्ध कराता है, तो स्थिति बदल सकती है. तालिबानी रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने एयर डिफेंस मांगा है. हो सकता है कि भविष्य में रूस उसे S-400 या पैंटसिर एयर डिफेंस सिस्टम दे. यह भी हो सकता है कि अपने पुराने मिग या सुखोई जेट भी अफगानिस्तान को दे. इसका मतलब यह नहीं कि कल ही अफगानिस्तान को मिग या सुखोई विमान मिल जाएंगे. लेकिन यह जरूर है कि तालिबान पहली बार किसी बड़ी सैन्य शक्ति के साथ औपचारिक रक्षा साझेदारी बना रहा है. और यह बात पाकिस्तान के साथ-साथ अमेरिका को परेशान कर सकती है। 

हिंदू-सिख पर क्या बोला तालिबान?
मॉस्को में तालिबान के रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने हिंदू और सिख समुदायों को अफगानिस्तान लौटने का खुला निमंत्रण भी दिया. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान उनका भी देश है और तालिबान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगा. यह सिर्फ सामाजिक बयान नहीं था. इसे तालिबान की उस कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है जिसमें वह दुनिया के सामने खुद को सिर्फ एक उग्रवादी संगठन नहीं बल्कि एक ‘सामान्य सरकार’ के रूप में पेश करना चाहता है। 

बंगाल कार्रवाई के बाद बढ़ा अलर्ट, आशंका- कहीं इस राज्य में न घुस आएं बांग्लादेशी घुसपैठिये

भुवनेश्वर

ओडिशा सरकार ने पश्चिम बंगाल के साथ सीमा साझा करने वाले अपने जिलों को बांग्लादेशी घुसपैठियों के संभावित प्रवेश को लेकर सतर्क किया है। ओडिशा सरकार ने यह कदम पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी प्रशासन द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ की नीति अपनाए जाने के बाद उठाया है।

पश्चिम बंगाल से सटे बालासोर और मयूरभंज जिलों के अधिकारियों को ओडिशा सरकार ने यह निर्देश तब जारी किए गए, जब उत्तर 24 परगना जिले के बसीरहाट उप-मंडल स्थित हाकिमपुर जांच चौकी पर बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिकों के एकत्र होने की खबर सामने आई।

सीमा पर अलर्ट
पुलिस उपमहानिरीक्ष
क (पूर्वी परिक्षेत्र) पिनाक मिश्रा ने कहा, ‘चूंकि संदिग्ध बांग्लादेशी घुसपैठियों ने पश्चिम बंगाल के भीतर आवाजाही शुरू कर दी है, इसलिए उनके ओडिशा में प्रवेश की आशंका है। इसी कारण हम सतर्क हैं और ऐसी किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठा रहे हैं।’ ओडिशा-पश्चिम बंगाल सीमा पर निगरानी बढ़ा दी गई है ताकि राज्य में किसी भी प्रकार की अवैध आवाजाही को रोका जा सके।

मिश्रा ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से घुसपैठियों का पता लगाकर उन्हें कानून के तहत भारत से निर्वासित करने का स्थायी निर्देश है और हम उसी के अनुरूप कार्य कर रहे हैं। राज्य सरकार ने सभी जिलों विशेषकर सीमावर्ती जिलों में विशेष अभियान चलाया है। घुसपैठियों के जलमार्गों से प्रवेश की संभावना को लेकर मिश्रा ने बताया कि इसके लिए संबंधित पुलिस थानों को सतर्क कर दिया गया हैं।

दो जिलों में ज्यादा सतर्कता
बालासोर और मयूरभंज ओडिशा के दो ऐसे जिले हैं, जिनकी सीमा पश्चिम बंगाल से लगती है। बालासोर जिले के भोगराई और जलेश्वर ब्लॉक पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम जिलों से सटे हुए हैं, जबकि मयूरभंज जिले की पूर्वी सीमा का एक हिस्सा पश्चिम मेदिनीपुर जिले से लगता है।

राजनीतिक बयानबाजी शुरू
इस बीच, ओडिशा में बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विपक्षी बीजू जनता दल (बीजद) के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया।

ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने कहा कि घुसपैठिये राज्य के लिए एक बड़ी समस्या हैं और राज्य सरकार उनकी पहचान तथा निर्वासन के लिए अभियान पहले ही शुरू कर चुकी है, जबकि बीजद नेता गणेश्वर बेहरा ने इस दावे को खारिज कर दिया।

बेहरा ने कहा, ‘ओडिशा में घुसपैठिये ही केवल बड़ी समस्या नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में स्थिति अलग है, वहां उनकी संख्या लाखों में है। ओडिशा में उनकी संख्या 150 से भी कम है। साढ़े चार करोड़ की आबादी वाले राज्य में घुसपैठियों की संख्या करीब 150 हो सकती है। यह बहुत छोटा मुद्दा है, लेकिन राज्य सरकार प्रचार पाने के लिए राई का पहाड़ बना रही है।’

हालांकि, हरिचंदन ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि ओडिशा में अवैध रूप से रह रहे घुसपैठियों ‘बच नहीं सकते’। उन्होंने कहा कि हम राज्य में रह रहे अवैध विदेशी नागरिकों को निर्वासित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

पाकिस्तान बॉर्डर पर बाड़ से बदली सुरक्षा तस्वीर, अब बांग्लादेश सीमा पर स्मार्ट फेंसिंग क्यों जरूरी?

  नई दिल्ली

भारत की सुरक्षा व्यवस्था में बॉर्डर फेंसिंग एक अहम बदलाव साबित हुई है. खासकर पाकिस्तान के साथ लगने वाली सीमा पर बाड़ लगाने के बाद घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों में काफी कमी आई है. वहीं पूर्वी सीमा यानी बांग्लादेश बॉर्डर पर अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यहां स्मार्ट फेंसिंग (Smart Fencing) लगाए बिना सुरक्षा को पूरी तरह मजबूत नहीं किया जा सकता। 

पाकिस्तान के साथ भारत की 3323 किलोमीटर लंबी सीमा है. पहले इस सीमा पर खुली जगहों से आतंकियों और तस्करों के घुसपैठ की घटनाएं आम थीं. 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान सेक्टर में घुसपैठ के जरिए आतंकी हमले होते थे। 

2010 के आसपास भारत सरकार ने पाकिस्तान बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) की मदद से फेंसिंग का काम तेज किया. आज ज्यादातर हिस्सों में ऊंची, मजबूत और बार्ड वायर वाली फेंसिंग लग चुकी है. इस फेंसिंग का सुरक्षा पर सकारात्मक असर साफ दिखता है. घुसपैठ की घटनाओं में भारी कमी आई है। 

पहले जहां हर साल सैकड़ों घुसपैठ की कोशिशें होती थीं, अब उनकी संख्या बहुत कम हो गई है. फेंसिंग के साथ-साथ लाइटिंग, कैमरा और पेट्रोलिंग भी बढ़ाई गई, जिससे BSF को निगरानी रखने में आसानी हुई. खासकर जम्मू-कश्मीर और पंजाब में सुरक्षा स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है. कुछ इलाकों में टोपोग्राफी की वजह से फेंसिंग पूरी नहीं हो पाई है, लेकिन कुल मिलाकर पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग ने सुरक्षा को मजबूत किया है। 

बांग्लादेश बॉर्डर पर क्यों जरूरी है फेंसिंग?
बांग्लादेश के साथ भारत की 4096 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया की सबसे लंबी स्थलीय सीमाओं में से एक है. यह सीमा पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरती है. यहां की जमीन ज्यादातर समतल, नदी-नालों और घने जंगलों वाली है. इस वजह से फेंसिंग लगाना मुश्किल और महंगा है. अब भी कई हिस्सों में कोई फेंसिंग नहीं है। 

बांग्लादेश बॉर्डर पर मुख्य चुनौतियां हैं – अवैध घुसपैठ, गाय तस्करी, ड्रग्स तस्करी, हथियारों की तस्करी और कभी-कभी आतंकियों का आना-जाना. चूंकि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, भाषाई और पारिवारिक संबंध हैं, इसलिए सीमा पार करना थोड़ा आसान है. यही वजह है कि सुरक्षा बलों को 24 घंटे सतर्क रहना पड़ता है. 

स्मार्ट फेंसिंग क्यों जरूरी है?
साधारण फेंसिंग के बजाय स्मार्ट फेंसिंग की जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि बांग्लादेश बॉर्डर की भौगोलिक स्थिति अलग है. स्मार्ट फेंसिंग में सेंसर, CCTV कैमरा, इंफ्रारेड डिटेक्टर, ड्रोन निगरानी, AI आधारित मॉनिटरिंग और रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम शामिल होते हैं। 

यह सिस्टम रात में भी काम करता है. घुसपैठ को तुरंत पकड़ लेता है और कंट्रोल रूम में अलर्ट भेजता है. इससे जवानों की जान बचती है. छोटी-छोटी घटनाओं को बढ़ने से रोका जा सकता है. सरकार पहले ही पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कुछ इलाकों में स्मार्ट फेंसिंग लगा चुकी है. अब इसे पूरे बॉर्डर पर फैलाने की योजना है। 

स्मार्ट फेंसिंग पारंपरिक तार की बाड़ से काफी आगे की आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था है. इसमें साधारण फेंसिंग को सेंसर, कैमरा, AI और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम के साथ जोड़ दिया जाता है, ताकि सीमा पर कोई भी गतिविधि तुरंत पकड़ी जा सके. यह तकनीक खासकर लंबी और चुनौतीपूर्ण सीमाओं पर बहुत उपयोगी है। 

स्मार्ट फेंसिंग में क्या-क्या होता है?

फिजिकल फेंस  

    ऊंची (8-10 फीट) मजबूत स्टील की बाड़ जिसमें बार्ब्ड वायर या इलेक्ट्रिफाइड तार लगे होते हैं.
    कुछ जगहों पर डबल लेयर फेंसिंग (दो दीवारें) भी लगाई जाती है.

सेंसर सिस्टम  

    मोशन सेंसर: कोई व्यक्ति या वस्तु पास आने पर डिटेक्ट करते हैं.
    इंफ्रारेड (IR) सेंसर: रात में भी गर्मी वाली वस्तुओं (मानव शरीर) को पकड़ते हैं.
    फाइबर ऑप्टिक सेंसर: फेंस पर कट या चढ़ाई करने पर अलर्ट.
    वाइब्रेशन सेंसर: फेंस हिलने या काटने पर सिग्नल भेजते हैं.

कैमरा नेटवर्क  

    PTZ कैमरा (Pan-Tilt-Zoom) जो 360 डिग्री घूम सकते हैं.
    थर्मल इमेजिंग कैमरा (रात में बिना रोशनी के देख सकते हैं).
    AI आधारित कैमरा जो इंसान, जानवर या वाहन को अलग-अलग पहचान सकते हैं.
AI और सॉफ्टवेयर  

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गलत अलर्ट (जैसे जानवर) को फिल्टर करता है.
    मशीन लर्निंग से सिस्टम समय के साथ और स्मार्ट होता जाता है.
    रियल-टाइम एनालिसिस करके कंट्रोल रूम को अलर्ट भेजता है.

कमांड एंड कंट्रोल सेंटर  

    सभी सेंसर और कैमरे एक केंद्रीय कंट्रोल रूम से जुड़े होते हैं.
    BSF जवान 24×7 मॉनिटरिंग करते हैं.
    अलर्ट मिलते ही तुरंत रिस्पॉन्स टीम भेजी जाती है.

अन्य टेक्नोलॉजी  

    ड्रोन पेट्रोलिंग
    सोलर पावर बैकअप
    GPS ट्रैकिंग
    मोबाइल ऐप पर अलर्ट

भारत में स्मार्ट फेंसिंग की स्थिति
भारत सरकार ने कॉम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (CIBMS) के तहत स्मार्ट फेंसिंग को बढ़ावा दिया है. पाकिस्तान बॉर्डर पर पहले ही काफी हद तक फेंसिंग + स्मार्ट टेक्नोलॉजी लग चुकी है. बांग्लादेश बॉर्डर पर पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं. बांग्लादेश बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग जल्दी पूरी करने की तैयारी चल रही है। 

फायदे

    24×7 निगरानी: रात-दिन काम करता है.
    कम मैनपावर: कम जवानों के साथ ज्यादा क्षेत्र कवर होता है.
    तेज प्रतिक्रिया: अलर्ट मिलते ही एक्शन लिया जा सकता है.
    कम घुसपैठ: तस्करी और अनधिकृत प्रवेश में भारी कमी.
    डेटा संग्रह: लंबे समय में पैटर्न विश्लेषण करके बेहतर प्लानिंग.

चुनौतियां

    उच्च लागत: शुरुआती खर्च बहुत ज्यादा है.
    रखरखाव: नदियों, बाढ़ और जंगलों वाले इलाकों में रखरखाव मुश्किल.
    तकनीकी ट्रेनिंग: BSF जवानों को नई टेक्नोलॉजी का प्रशिक्षण देना पड़ता है.
    बिजली और इंटरनेट: दूर-दराज के इलाकों में बिजली और कनेक्टिविटी की समस्या.

पाकिस्तान बॉर्डर vs बांग्लादेश बॉर्डर

पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग मुख्य रूप से आतंकवाद और सैन्य घुसपैठ रोकने के लिए लगाई गई. वहीं बांग्लादेश बॉर्डर पर समस्या ज्यादातर आर्थिक, सामाजिक और अपराधिक है. यहां बड़े पैमाने पर अवैध माइग्रेशन होता है, जो स्थानीय संसाधनों और कानून-व्यवस्था पर दबाव डालता है। 

स्मार्ट फेंसिंग बांग्लादेश बॉर्डर पर इसलिए ज्यादा जरूरी है क्योंकि यहां पारंपरिक फेंसिंग लगाना मुश्किल है. नदियां, दलदल और घने जंगल फेंसिंग को नुकसान पहुंचाते हैं. स्मार्ट टेक्नोलॉजी इन चुनौतियों से निपटने में सक्षम है. पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग ने दिखा दिया कि मजबूत बाड़ सुरक्षा को कितना बेहतर बना सकती है। 

अब बांग्लादेश बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग की जरूरत है ताकि पूर्वी सीमा को भी सुरक्षित और आधुनिक बनाया जा सके. सरकार इस दिशा में काम कर रही है. अगर समय पर स्मार्ट फेंसिंग पूरी हो गई तो भारत की सीमा सुरक्षा और मजबूत होगी, जिससे देश के अंदर शांति और विकास को बढ़ावा मिलेगा। 

सस्ते मोबाइल के चक्कर में हो रहे साइबर फ्रॉड का शिकार, Cyber Wing ने जारी किया अलर्ट

नई दिल्ली
भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, खासकर स्मार्टफोन खरीदने के लिए लोग ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर काफी भरोसा कर रहे हैं. हर महीने हजारों लोग ई-कॉमर्स या अन्य वेबसाइट्स से मोबाइल फोन खरीदते हैं।

जैसे-जैसे ऑनलाइन खरीदारी का ट्रेंड बढ़ा है, वैसे-वैसे साइबर अपराधियों ने भी नए-नए तरीके को अपनाकर लोगों को ठगना शुरू कर दिया है. आज साइबर ठग केवल फर्जी कॉल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नकली वेबसाइट, सोशल मीडिया विज्ञापन, फर्जी डिलीवरी एजेंट, रिफंड फ्रॉड और स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स के जरिए लोगों के बैंक खाते खाली कर रहे हैं।

खास बात यह है कि ज्यादातर लोग बड़े डिस्काउंट, फ्लैश सेल और ‘सीमित समय ऑफर’ के लालच में आकर ठगी का शिकार बन जाते हैं. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में ऑनलाइन शॉपिंग से जुड़े साइबर फ्रॉड के मामलों में लगभग 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है। 

एक्सपर्ट का कहना है कि फेस्टिवल, सेल सीजन और नए स्मार्टफोन लॉन्च के दौरान ऐसे मामलों में तेजी से उछाल आता है।
मोबाइल शॉपिंग फ्रॉड? साइबर क्रिमिनल्स कौन सा अपनाते हैं तरीका.

1. फर्जी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स का जाल
साइबर अपराधी बिल्कुल असली वेबसाइट जैसी दिखने वाली नकली साइट तैयार करते हैं. इन वेबसाइट्स पर महंगे फोन बेहद कम कीमत में दिखाए जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर 1 लाख रुपये का फोन 25 या 30 हजार रुपये में ऑफर किया जाता है. यूजर जब वेबसाइट पर जाकर पेमेंट करते हैं, तो या तो डिलीवरी नहीं होती या फिर खाली डिब्बा भेज दिया जाता है. कई मामलों में वेबसाइट कुछ दिनों बाद गायब भी हो जाती है।

2 सोशल मीडिया विज्ञापनों से ठगी
इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर 90 प्रतिशत डिस्काउंट, स्टॉक क्लियरेंस सेल या सरकारी नीलामी जैसे विज्ञापन चलाए जाते हैं. इन विज्ञापनों पर क्लिक करते ही यूजर फर्जी वेबसाइट पर पहुंच जाता है. एक्सपर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया पर दिखने वाले हर विज्ञापन की सत्यता जांचना जरूरी है क्योंकि ठग अब AI आधारित डिजाइन और नकली रिव्यू का इस्तेमाल कर रहे हैं।

3. नकली कस्टमर केयर और रिफंड फ्रॉड
कई बार लोग किसी ऑनलाइन ऑर्डर की शिकायत करने के लिए इंटरनेट पर कस्टमर केयर नंबर खोजते हैं. साइबर अपराधी गूगल सर्च में फर्जी नंबर डाल देते हैं. जैसे ही ग्राहक कॉल करता है, उसे AnyDesk, TeamViewer या QuickSupport जैसे ऐप डाउनलोड करवाए जाते हैं. फिर  स्क्रीन शेयर होते ही ठग बैंकिंग ऐप, यूपीआई और OTP तक पहुंच बना लेते हैं. कुछ ही मिनटों में अकाउंट खाली हो जाता है।

4. फर्जी पेमेंट लिंक और फिशिंग
ठग WhatsApp, SMS या ईमेल के जरिए भुगतान लिंक भेजते हैं. लिंक बिल्कुल असली वेबसाइट जैसा दिखाई देता है. यूजर जैसे ही कार्ड डिटेल या यूपीआई जानकारी भरता है, उसकी सारी जानकारी अपराधियों के पास पहुंच जाती है. साइबर सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक भारत में हर दिन हजारों फिशिंग लिंक एक्टिव किए जाते हैं।

5. डिलीवरी स्कैम
कुछ मामलों में ठग खुद को डिलीवरी एजेंट बताते हैं. वे कहते हैं कि ‘डिलीवरी कन्फर्म करने के लिए OTP बताइए’ या ‘QR कोड स्कैन करें. लोग बिना सोचे-समझे जानकारी साझा कर देते हैं और उनके खाते से पैसे निकल जाते हैं।

क्यों तेजी से बढ़ रहे हैं ऐसे अपराध?
साइबर मामलों से जुड़े एक्सपर्ट यह मानते हैं कि डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन खरीदारी के विस्तार के साथ साइबर अपराधियों को नए अवसर मिल रहे हैं. भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 95 करोड़ से अधिक पहुंच चुकी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऑनलाइन खरीदारी तेजी से बढ़ रही है. युवा वर्ग जल्दी डिस्काउंट और ऑफर के चक्कर में आ जाता है. कई लोग साइबर सुरक्षा के बेसिक नियमों से अनजान हैं. यही कारण है कि साइबर ठग लगातार नए तरीके विकसित कर रहे हैं।

कैसे पहचाने कि ऑनलाइन ऑफर फर्जी है?
यदि कोई फोन बाजार मूल्य से आधे या उससे भी कम दाम पर मिल रहा है, तो सतर्क हो जाइए. कई नकली वेबसाइट्स असली नाम से मिलते-जुलते डोमेन बनाती हैं. इसमे ऑफर या फेक सेल जैसे नाम हैं. देकर प्रोडक्ट को जल्द से जल्द बेचने का प्रयास उनके द्वारा किया जाता है. इस दौरान जब उपभोक्ता ऑनलाइन पेमेंट के लिए जाता है तो वेबसाइट केवल एडवांस पेमेंट मांग रही है और COD विकल्प नहीं दे रही, तो शक करना चाहिए।

फर्जी वेबसाइट्स पर अक्सर टूटी-फूटी हिंदी या अंग्रेजी होती है. कई बार सभी रिव्यू एक जैसे दिखते हैं तो आप समझ जाइए कि यहां पर ऑनलाइन फ्रॉड होने वाला है. अगर इस तरीके के ऑफर आ रहे हैं तो भी समझिए कि यह फ्रॉड करने वाली वेबसाइट है. केवल 5 मिनट का ऑफर, अभी खरीदें वरना मौका खत्म, जैसे मैसेज लोगों पर मानसिक दबाव बनाते हैं।
कैसे सुरक्षित ऑनलाइन खरीदारी करें

केवल भरोसेमंद प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें

मोबाइल हमेशा ऑथराइज्ड वेबसाइट या जाने-माने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से खरीदें. ब्रांड की ऑफिशियल साइट सबसे सुरक्षित विकल्प मानी जाती है।

वेबसाइट का URL जरूर जांचें

वेबसाइट के नाम के आगे HTTPS और लॉक का निशान देखें. गलत स्पेलिंग वाली साइट से बचें.

डिलीवरी के समय वीडियो रिकॉर्ड करें
 

फोन की अनबॉक्सिंग करते समय वीडियो रिकॉर्ड करना सुरक्षित माना जाता है. इससे विवाद की स्थिति में सबूत रहता है.

IMEI नंबर चेक करें

फोन मिलने के बाद *#06# डायल करके IMEI नंबर देखें और बॉक्स पर लिखे नंबर से मिलाएं.संचार साथी पोर्टल पर भी IMEI की जांच की जा सकती है.

OTP और UPI PIN कभी साझा न करें

कोई भी बैंक, कंपनी या डिलीवरी एजेंट OTP नहीं मांगता. OTP साझा करना सीधे खाते तक पहुंच देना है.

स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स से दूर रहें

अनजान व्यक्ति के कहने पर AnyDesk या TeamViewer जैसे ऐप डाउनलोड न करें.
लोगों को बचाने के लिए सरकार चला रही अभियान

सरकार लगातार साइबर अपराध रोकने के लिए अभियान चला रही है. गृह मंत्रालय के तहत इंडियन साइबर क्राइम कॉर्डिनेशन सेंटर्स (I4C) लोगों को जागरूक करने के लिए डिजिटल कैंपेन चला रहा है.इसके अलावा बैंकों और ई-कॉमर्स कंपनियों को भी सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं.  कई फर्जी वेबसाइट्स और साइबर गैंग्स के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है।

ऑनलाइन मोबाइल खरीदारी सुविधाजनक जरूर है, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही भारी नुकसान पहुंचा सकती है. साइबर अपराधी लोगों की जल्दबाजी, लालच और तकनीकी जानकारी की कमी का फायदा उठाते हैं. सस्ते ऑफर, फर्जी वेबसाइट और नकली कॉल के जाल में फंसने से बचने के लिए सतर्क रहना बेहद जरूरी है. याद रखें कि सुरक्षित डिजिटल व्यवहार ही साइबर ठगी से सबसे बड़ा बचाव है. अगर कोई ऑफर जरूरत से ज्यादा अच्छा लगे, तो पहले उसकी जांच करें क्योंकि ऑनलाइन दुनिया में सतर्कता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

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