Pune Fort Case: सिया की WhatsApp चैट से बड़ा खुलासा! ट्रैकिंग का प्लान केतन का था या चेतन का? माता-पिता ने की कड़ी सजा की मांग

 पुणे

लोहगढ़ किले पर ट्रैकिंग सिया की जिद थी या चेतन की. ऐसा तो नहीं यह केतन का बनाया हुआ प्लान था ? पुणे के चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच के बीच अब एक नया दावा सामने आया है. इस बार यह दावा किसी पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी का नहीं, बल्कि मुख्य आरोपी सिया गोयल की मां पूजा गोयल का है. उनका कहना है कि जिस लोहगढ़ ट्रैकिंग को लेकर अब पूरी कहानी खड़ी की जा रही है, वहां जाने के लिए सिया नहीं, बल्कि केतन लगातार कह रहे थे. इतना ही नहीं, उन्होंने दावा किया कि इस बात के WhatsApp चैट आज भी सिया के मोबाइल में मौजूद हैं। 

उधर पुलिस का दावा है कि 18 जून को लोहगढ़ किले पर हुई घटना एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी. वहीं दूसरी ओर सिया के माता-पिता का कहना है कि उन्हें अपनी बेटी और चेतन चौधरी के कथित प्रेम संबंधों की कोई जानकारी नहीं थी और न ही कभी यह महसूस हुआ कि सिया शादी से खुश नहीं थी। 

 मां ने खोला WhatsApp चैट का जिक्र

पूजा गोयल ने बातचीत में सबसे अहम दावा ट्रैकिंग को लेकर किया. उन्होंने कहा कि जब 18 जून को लोहगढ़ जाने की बात हुई तो सिया खुद वहां जाने के पक्ष में नहीं थी. उसने वीडियो कॉल पर अपनी होने वाली सास से भी कहा था कि उसे ट्रैकिंग पर नहीं जाना है. पूजा गोयल के मुताबिक, सिया ने उनसे कहा था कि वह केतन को मना कर चुकी है. उसने अपनी होने वाली सास से भी कहा कि आप ही केतन को समझाइए कि ट्रैकिंग का कार्यक्रम टाल दें, क्योंकि अगले दिन महाबलेश्वर जाना था और थकान हो जाएगी. लेकिन परिवार की ओर से जवाब मिला कि यदि केतन कह रहे हैं तो चले जाओ.  यहीं पर पूजा गोयल ने एक और बड़ा दावा किया. उनका कहना है कि इस पूरी बातचीत के WhatsApp चैट मोबाइल में मौजूद हैं। 

केस में भावुक होकर बोले सिया के मां- बाप  …
 केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे नए पहलू सामने आ रहे हैं. इस बीच पहली बार सिया गोयल के माता-पिता ने सामने आकर पूरे मामले पर अपना पक्ष रखा. उन्होंने बताया कि केतन और सिया का रिश्ता कैसे तय हुआ था और चेतन चौधरी के बारे में उन्हें क्या जानकारी थी। 

केतन के घरवालों ने शादी में देखा था सिया को
सिया के पिता प्रवीण गोयल ने बताया कि यह रिश्ता किसी मैट्रिमोनियल वेबसाइट या पारंपरिक रिश्ते के जरिए नहीं हुआ था. उनके मुताबिक, परिवार के एक शादी समारोह के दौरान गोवा में पहली बार सिया को देखकर केतन के परिवार की ओर से रिश्ते की बात की गई थी. बाद में दोनों परिवारों के बीच बातचीत आगे बढ़ी और रिश्ता तय हो गया। 

पुलिस का दावा इससे अलग
हालांकि, पुलिस की जांच अब तक एक अलग तस्वीर पेश कर रही है. जांच अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल साक्ष्य, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और पूछताछ के आधार पर उन्हें यह संदेह है कि लोहगढ़ की यात्रा पहले से बनाई गई योजना का हिस्सा थी. पुलिस के अनुसार, जांच में यह भी सामने आया कि घटना से एक दिन पहले सिया गोयल और चेतन चौधरी पुणे के लुल्लानगर स्थित एक कैफे में मिले थे. वहीं कथित तौर पर पूरी योजना पर चर्चा हुई. पुलिस का आरोप है कि दोनों ने पहले से तय योजना के तहत वारदात को अंजाम दिया. इस मामले में दोनों आरोपी पुलिस हिरासत में हैं और जांच जारी है। 

हमें सिर्फ दोस्ती की जानकारी थी
पूजा गोयल ने यह भी स्वीकार किया कि चेतन चौधरी और सिया एक-दूसरे को जानते थे. उनके अनुसार दोनों की पहचान एक क्रिकेट मैच के दौरान हुई थी और उन्हें केवल इतनी जानकारी थी कि दोनों दोस्त हैं. हालांकि उन्होंने साफ कहा कि उन्हें कभी यह नहीं लगा कि दोनों के बीच प्रेम संबंध हैं. उनका कहना है कि यदि उन्हें जरा भी आभास होता कि मामला सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं है तो वह कभी शादी की तैयारियां आगे नहीं बढ़ातीं. उनका दावा है कि सगाई के बाद भी घर में कभी ऐसा माहौल नहीं बना जिससे लगे कि सिया इस रिश्ते से खुश नहीं है। 

केतन हमारे बेटे जैसे थे
सिया के पिता प्रवीण गोयल बातचीत के दौरान कई बार भावुक दिखाई दिए. उन्होंने कहा कि केतन उनके घर कई बार आए. परिवार के साथ खाना खाया. वह उन्हें “पापा जी” कहकर बुलाते थे और धीरे-धीरे बेटे जैसे हो गए थे. प्रवीण गोयल का कहना है कि यदि केतन को कभी यह संदेह था कि सिया का फोन लगातार व्यस्त रहता है या वह किसी और से बात करती है, तो इस बारे में उन्हें सीधे बताया जाना चाहिए था. उनका कहना है कि यदि परिवारों के बीच यह बातचीत पहले हो जाती तो शायद हालात अलग होते। 

एक बार भी नहीं कहा कि शादी नहीं करनी
पूजा गोयल का दावा है कि शादी तय होने के बाद उन्होंने कई बार सिया से पूछा कि क्या वह केतन से शादी करना चाहती है. हर बार जवाब एक ही मिला मुझे केतन पसंद हैं और मैं शादी करना चाहती हूं. उनका कहना है कि यदि सिया शादी के खिलाफ होती तो परिवार बाली प्री-वेडिंग ट्रिप की तैयारी क्यों करता? उन्होंने बताया कि बेटी की शॉपिंग पर लगभग 50 हजार रुपये खर्च किए गए थे. जन्मदिन की ड्रेस खरीदी गई थी. शादी और जन्मदिन से जुड़े कई कार्यक्रम तय थे. परिवार के अनुसार यदि बेटी ने एक बार भी शादी से इनकार किया होता तो ये सारी तैयारियां वहीं रुक जातीं। 

अगर दोषी है तो सजा मिलनी चाहिए
प्रवीण गोयल से पूछा गया कि यदि जांच में उनकी बेटी दोषी पाई जाती है तो उनका क्या कहना होगा. उन्होंने कहा कि यदि अदालत और जांच एजेंसियां यह साबित कर देती हैं कि उनकी बेटी ने अपराध किया है, तो उसे कानून के मुताबिक सबसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए. उन्होंने यहां तक कहा कि न्याय में किसी तरह की नरमी नहीं बरती जानी चाहिए. पूजा गोयल ने भी कहा कि यदि उनकी बेटी ने वास्तव में अपराध किया है तो उसे भी वहीं से गिरा देना चाहिए। 

‘अगर हम सिया के साथ थे तो हमें फांसी दे दो’
मामले में सामने आए आरोपों और जांच के बीच सिया के माता-पिता ने कहा कि उन्हें चेतन चौधरी के बारे में किसी तरह की जानकारी नहीं थी. उनका कहना है कि अगर उन्हें पहले से किसी भी बात की जानकारी होती तो वे कभी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं होते। 

आजतक से बातचीत में सिया के माता-पिता ने कहा कि यदि जांच में यह साबित हो जाता है किं उनके परिवार की कोई गलती है या उन्हें किसी बात की जानकारी थी, तो उन्हें भी सबसे कड़ी सजा दी जाए. उन्होंने कहा, ‘अगर हमारी गलती पाई गई तो हमें भी फांसी दे दीजिए। 

‘सिया को भी किले से धक्का दे दो’
उन्होंने अपनी बेटी को लेकर भी भावुक बयान दिया. उनका कहना था कि यदि सिया दोषी साबित होती है तो उसे भी कानून के मुताबिक सबसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए. उन्होंने यहां तक कहा कि अगर उसने यह अपराध किया है तो उसे भी उसी किले पर ले जाकर धक्का दे देना चाहिए जहां से गिरकर केतन की मौत हुई। 

सिया के पिता प्रवीण गोयल इमोश्नल होकर बताते हैं कि केतन जब भी उनके घर आता था, उन्हें हमेशा पापा जी कहकर बुलाता था. वह घंटों घर में बैठता, परिवार के साथ समय बिताता और सभी के साथ घुलमिल जाता था. उनके मुताबिक धीरे-धीरे रिश्ता इतना करीब हो गया था कि उन्हें केतन अपने बेटे से भी ज्यादा प्रिय लगने लगा था. उन्होंने कहा कि केतन का व्यवहार, उसका सम्मान और परिवार के प्रति उसका अपनापन उन्हें बेहद प्रभावित करता था. यही वजह है कि जब केतन की मौत की खबर आई तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं थी, बल्कि दो परिवारों के बीच बने एक रिश्ते के टूट जाने जैसा भी था. सिया के माता-पिता के इस बयान के बाद मामले को लेकर चर्चा और तेज हो गई है। 

सिया के इशारे पर केतन ने दिया धक्का?
गौरतलब है कि केतन अग्रवाल की हत्या का मामले में हर दिन नई परतें खुल रही हैं. अब पुलिस जांच में पता चला है कि उनकी मंगेतर सिया गोयल ने ही इशारा देकर अपने प्रेमी चेतन चौधरी से उन्हें लोहागढ़ किले की खाई में धक्का दिलवाया था. यह घटना 18 जून को हुई थी. फिलहाल दोनों आरोपी अब पुलिस की पकड़ में हैं। 

Passport Rule Change: 14 साल बाद पासपोर्ट बनवाना हुआ महंगा, 1 जुलाई से बढ़ेंगी फीस, जानें नई रेट लिस्ट

 नई दिल्ली

केंद्र सरकार ने पासपोर्ट और उससे जुड़ी सर्विस की फीस में बड़ा बदलाव किया है. ये बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब देश भर में पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण माने जाने को लेकर बहस चल रही है. विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट (संशोधन) नियम, 2026 जारी करते हुए इसे अगले महीने से ही लागू करने के निर्देश दिए हैं। 

साल 2012 में आखिरी बार हुआ था फीस में बदलाव
नए नियमों के तहत 1 जुलाई 2026 से पासपोर्ट के नए शुल्क लागू होंगे. इस बदलाव के तहत अब पासपोर्ट बनवाना दो हजार रुपये तक महंगा पड़ सकता है. इससे पहले साल 2012 में आखिरी बार पासपोर्ट बनवाने की फीस बढ़ाई गई थी. इस तरह ये बदलाव 14 साल बाद हुआ है। 

सरकार ने इसके लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. नई व्यवस्था लागू होने के बाद नया पासपोर्ट बनवाने, पासपोर्ट रिन्यू कराने और अन्य संबंधित सेवाओं के लिए संशोधित शुल्क देना होगा. इसके साथ ही पासपोर्ट नियम, 1980 की पुरानी शुल्क सूची (शेड्यूल-IV) को हटाकर नई शुल्क सूची लागू कर दी जाएगी. विदेश मंत्रालय ने कहा है कि 1 जुलाई 2026 से सभी पासपोर्ट सेवाओं पर नए शुल्क लागू होंगे। 

फीस में कितना हुआ बदलाव

1 जुलाई से पासपोर्ट शुल्क में बदलाव, जानिए अब कितना देना होगा
 
36 पेज का पासपोर्ट (नया/री-इश्यू):
पहले: ₹1,500 → अब: ₹2,500 (नॉर्मल)
पहले: ₹3,500 → अब: ₹5,000 (तत्काल)

60 पेज का पासपोर्ट (नया/री-इश्यू):
पहले: ₹2,000 → अब: ₹3,500 (नॉर्मल)
पहले: ₹4,000 → अब: ₹6,000 (तत्काल)

36 पेज का खोया/क्षतिग्रस्त पासपोर्ट:
पहले: ₹1,500 → अब: ₹5,000 (नॉर्मल)
पहले: ₹3,500 → अब: ₹7,500 (तत्काल)

60 पेज का खोया/क्षतिग्रस्त पासपोर्ट:
पहले: ₹2,000 → अब: ₹6,000 (नॉर्मल)
पहले: ₹4,000 → अब: ₹8,500 (तत्काल)

18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का 36 पेज का पासपोर्ट:
पहले: ₹1,000 → अब: ₹1,750 (नॉर्मल)
पहले: ₹3,000 → अब: ₹4,250 (तत्काल)

नाबालिगों का खोया/क्षतिग्रस्त पासपोर्ट:
पहले: ₹1,000 → अब: ₹4,250 (नॉर्मल)
पहले: ₹3,000 → अब: ₹6,750 (तत्काल)

होर्मुज में बढ़ा खतरा! ईरानी ड्रोन हमले के बाद 11 हजार नाविकों की जान पर संकट, समुद्री रास्ते में फिर तनाव

 नई दिल्ली

होर्मुज स्ट्रेट में ड्रोन हमले के बाद एक बार फिर तनाव बढ़ गया है. यह हमला तब हुआ जब यूनाइटेड नेशन की टीम इस क्षेत्र में रेस्क्यू अभियान में जुटी थी. ओमान के तट के पास एक कार्गो शिप पर हुए हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) की समुद्री एजेंसी इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन (IMO) ने इस रेस्क्यू अभियान को रोक दिया है. इस फैसले से करीब 11 हजार नाविकों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, जो अभी भी फारस की खाड़ी में फंसे जहाजों पर मौजूद हैं। 

पिछले कुछ दिनों से संयुक्त राष्ट्र, ओमान और कई सदस्य देशों की मदद से फारस की खाड़ी में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने का अभियान चला रहा था. इस मिशन का मकसद उन जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट पार कराना था, जो युद्ध और सुरक्षा प्रतिबंधों की वजह से कई दिनों से फंसे हुए थे। 

इसी दौरान ओमान के तट के पास सिंगापुर के झंडे वाले कार्गो शिप एवर लवली पर ड्रोन हमला हो गया. हमले में जहाज के ब्रिज को नुकसान पहुंचा. हालांकि किसी नाविक की मौत या गंभीर चोट की खबर नहीं है. इसके तुरंत बाद IMO ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पूरे रेस्क्यू अभियान को अस्थायी रूप से रोक दिया। 

UN ने रेस्क्यू क्यों रोक दिया?
IMO के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगेज ने कहा कि जब तक इवैक्युएशन लिस्ट में शामिल जहाजों की सुरक्षा की गारंटी नहीं मिल जाती, तब तक अभियान आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. हालांकि जिस जहाज पर हमला हुआ, वह UN के रेस्क्यू मिशन का हिस्सा नहीं था. लेकिन घटना ने यह साफ कर दिया कि समुद्री रास्ता अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। 

IMO के मुताबिक इस पूरे इलाके में करीब 20 हजार से ज्यादा नाविक अलग-अलग जहाजों पर फंसे हुए हैं. इनमें से लगभग 11 हजार नाविकों को निकालने के लिए विशेष इवैक्युएशन प्लान तैयार किया गया था. अब रेस्क्यू अभियान रुकने के बाद ये नाविक फिर से बीच समंदर में फंस गए हैं. उन्हें नहीं पता कि वे कब सुरक्षित तरीके से होर्मुज स्ट्रेट पार कर पाएंगे। 

यूनाइटेड नेशन ने पहले ही जहाजों को स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि बिना इजाजत किसी भी तरह की आवाजाही न करें. इसके साथ ही IMO ने भी चेतावनी दी थी कि निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. जहाजों की आवाजाही तभी शुरू की जानी थी, जब IMO, UKMTO और MICA सेंटर के कोऑर्डिनेटेड सिस्टम के जरिए सभी वेसल्स से संपर्क स्थापित हो जाए. इसके बाद संबंधित कोस्टल लाइन्स से बातचीत के बाद ही आगे बढ़ने की इजाजत थी। 

ईरान ने हमला क्यों किया?
ईरान ने कुछ दिन पहले ही चेतावनी दी थी कि उसकी इजाजत के बिना कोई भी जहाज संयुक्त राष्ट्र और ओमान द्वारा तैयार किए गए नए समुद्री मार्ग का इस्तेमाल न करे. ड्रोन हमले के कुछ घंटों बाद ईरान की नई पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी (PGSA) ने बयान जारी कर कहा कि जो जहाज ईरान द्वारा तय किए गए आधिकारिक रास्ते के बजाय दूसरे मार्ग का इस्तेमाल करेंगे, उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी। 

होर्मुज से गुजरने वाले सभी जहाजों के लिए ईरान की तरफ से एक समुद्री कॉरिडोर तय किया गया है. जहाजों को सिर्फ लारक आईलैंड (Larak Island) के पास बनाए गए आधिकारिक मार्ग से ही गुजरने की इजाजत दी गई है. इस रूट के अलावा किसी भी रूट से गुजरने पर सख्त चेतावनी दी गई थी. ईरान ने एक नोटिफिकेशन में स्पष्ट कहा था कि, किसी भी उल्लंघन की स्थिति में होने वाले नुकसान, जुर्माने या दुर्घटना की पूरी जिम्मेदारी संबंधित जहाज के मालिक और कप्तान (मास्टर) की होगी। 

यानी ईरान साफ संदेश देना चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों को उसके नियम मानने होंगे. ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने ओमान की तरफ से दक्षिणी रास्ते को खतरनाक बताकर खारिज कर दिया था और जहाजों को चेतावनी दी थी कि वे सिर्फ तेहरान से मंजूर रास्तों का ही इस्तेमाल करें। 

आखिर विवाद किस रास्ते को लेकर है?
इस समय होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने के लिए दो अलग-अलग समुद्री कॉरिडोर मौजूद हैं. पहला रास्ता ईरान के समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरता है. इस मार्ग पर जहाजों को ईरान की नई एजेंसी PGSA से पहले इजाजत लेनी होती है. बिना परमिट किसी जहाज को प्रवेश नहीं दिया जाता. ईरान का कहना है कि सिर्फ एक यही रूट ही जिससे जहाज को सुरक्षित पासेज दिया जाएगा। 

दूसरा रास्ता ओमान के समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरता है. इसी मार्ग को संयुक्त राष्ट्र और ओमान मिलकर सुरक्षित निकासी के लिए इस्तेमाल कर रहे थे. दर्जनों जहाजों को इस रास्ते से पार भी कराया गया है. 24 जून को ही 60 से ज्यादा विमानों को पार कराया गया था. ईरान का कहना है कि उसके तय रास्ते को छोड़कर दूसरे कॉरिडोर का इस्तेमाल करना नियमों का उल्लंघन है। 

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा कॉरिडोर माना जाता है. दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी-एलपीजी की सप्लाई इसी रास्ते से होती है. भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के कई देशों की ऊर्जा जरूरतें इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं. अगर यहां लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो पूरी दुनिया में तेल और गैस की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं। 

अब आगे क्या होगा?
फिलहाल IMO, ओमान, ईरान और अन्य सदस्य देशों के साथ बातचीत कर रहा है ताकि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही फिर शुरू की जा सके. IMO ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती, तब तक हजारों नाविक समुद्र में फंसे रह सकते हैं. यानी अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के बीच होर्मुज स्ट्रेट में हुए ड्रोन हमले ने पूरी वैश्विक शिपिंग व्यवस्था और हजारों नाविकों की सुरक्षा को फिर से संकट में डाल दिया है. अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला तो इसका असर सिर्फ समुद्री व्यापार ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में तेल की सप्लाई और कीमतों पर भी पड़ सकता है। 

LPG उपभोक्ताओं के लिए नया नियम, 30 दिन के भीतर पूरा करना होगा यह जरूरी काम

नई दिल्ली

मिडिल ईस्ट टेंशन के चलते देशभर में एलपीजी की सप्लाई पर असर पड़ते हुए नजर आया. इस बीच सरकार ने कई बड़े फैसले लिए जिसका सीधा असर एलपीजी उपभोक्ताओं पर पड़ा है. देश में एलपीजी सप्लाई को बढ़ावा देने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है. अब जिन घरों में पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सुविधा उपलब्ध है और उपभोक्ता PNG कनेक्शन ले चुके हैं, उन्हें निर्धारित समय के अंदर अपना LPG कनेक्शन सरेंडर करना होगा. सरकार का मानना है कि इससे गैस डिस्ट्रिबुशन प्रोसेस अधिक ट्रांसपरेंट बनेगा, डुप्लिकेट कनेक्शनों पर रोक लगेगी और जरूरतमंद परिवारों तक LPG की पहुंच बेहतर हो सकेगी। 

हाल के सालों में कई शहरों में PNG नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ है. इसके बावजूद कई ऐसे परिवार हैं जो PNG और LPG दोनों सुविधाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं. सरकार का कहना है कि इससे रिसोर्स और सब्सिडी व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. इसी को ध्यान में रखते हुए नए नियम लागू किए गए हैं। 

क्या है नया 30 दिन वाला नियम?
सरकार द्वारा जारी किए गए नियमों के अनुसार, अगर किसी घरेलू उपभोक्ता ने अपने घर में PNG कनेक्शन ले लिया है, तो उसे 30 दिनों के भीतर अपना LPG कनेक्शन सरेंडर करना होगा. यह नियम इंडेन, भारतगैस और एचपी गैस समेत सभी प्रमुख घरेलू LPG कनेक्शनों पर लागू होगा. जैसे- अगर किसी उपभोक्ता को 10 जून को PNG कनेक्शन मिला है, तो उसे अगले 30 दिनों के भीतर LPG कनेक्शन वापस करना होगा. फिक्स्ड अवधि के बाद ऐसे उपभोक्ताओं को LPG रिफिल या संबंधित सुविधाएं मिलने में दिक्कत आ सकती है. सरकार का फोकस है कि एक परिवार में एक ही घरेलू गैस व्यवस्था को बढ़ावा देना है। 

सरकार ने क्यों उठाया यह कदम?
सरकार की ‘वन हाउसहोल्ड, वन गैस कनेक्शन’ सोच के तहत यह कदम उठाया गया है. अधिकारियों का मानना है कि कई शहरी क्षेत्रों में PNG उपलब्ध होने के बावजूद लोग LPG कनेक्शन बनाए रखते हैं, जिससे गैस डिस्ट्रिबुशन पर अनावश्यक दबाव पड़ता है. नए नियम के जरिए डुप्लिकेट कनेक्शनों को कम करने, सब्सिडी के दुरुपयोग को रोकने और उन इलाकों में LPG की सप्लाई बढ़ाने को कोशिश की जा रही है जहां अभी PNG नेटवर्क नहीं पहुंचा है. इससे गैस डिस्ट्रिबुशन अधिक बेहतर और संतुलित बनने की उम्मीद है। 

PNG अपनाने वालों के लिए क्या हैं सुविधाएं?
सरकार ने उपभोक्ताओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कुछ राहत भी दी है. यदि कोई परिवार भविष्य में ऐसे क्षेत्र में ट्रांसफर होता है जहां PNG की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो उसके लिए LPG कनेक्शन दोबारा हासिल करना आसान बनाया गया है. LPG कनेक्शन सरेंडर करते समय उपभोक्ता ट्रांसफर वाउचर प्राप्त कर सकते हैं. इस डॉक्यूमेंट की मदद से वे नए स्थान पर आसान प्रोसेस के जरिए LPG कनेक्शन दोबारा शुरू करा सकते हैं. इससे उपभोक्ताओं को नए कनेक्शन के लिए लंबे प्रोसेस से नहीं गुजरना पड़ेगा। 

OTP और e-KYC से बढ़ी निगरानी
गैस डिस्ट्रिबुशन प्रोसेस को और सुरक्षित तथा ट्रांसपरेंट बनाने के लिए सरकार पहले ही OTP आधारित डिलीवरी सिस्टम लागू कर चुकी है. अब सिलेंडर की डिलीवरी के समय उपभोक्ता के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर OTP भेजा जाता है, जिसे वेरिफाई करने के लिए डिलीवरी एजेंट को बताना होता है. इसके अलावा, उज्ज्वला योजना समेत अलग-अलग लाभार्थियों के लिए e-KYC प्रोसेस भी जरूरी हो गई है. सरकार चाहती है कि सभी उपभोक्ताओं का डेटा अपडेट और वेरिफाइड रहे ताकि फायदा सही लोगों तक पहुंच सके और फर्जी कनेक्शनों पर रोक लगाई जा सके। 

7 जहाजों से शुरू हुआ सफर, आज 154 जहाज और 82 एयरक्राफ्ट के साथ समुद्री सुरक्षा की रीढ़ बना भारतीय तटरक्षक बल

मुंबई 

भारत का समुद्री क्षेत्र देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामरिक हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. 11,099 किलोमीटर लंबे समुद्री तट, विशाल समुद्री क्षेत्र और विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की निगरानी और सुरक्षा आज भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल है. लेकिन इस संगठन की शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों के साथ हुई थी। 

आज भारतीय तटरक्षक बल के पास 154 जहाज और 82 एयरक्राफ्ट हैं, लेकिन 1977 में इसकी शुरुआत महज सात जहाजों के साथ हुई थी. यह सफर भारत की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था के लगातार विस्तार और बदलती जरूरतों को दर्शाता है। 

भारतीय नौसेना ने क्यों उठाई अलग समुद्री बल की मांग?
1960 के दशक से ही भारतीय नौसेना सरकार से एक ऐसे अलग समुद्री बल के गठन की मांग कर रही थी जो समुद्री कानून लागू करने और भारतीय जलक्षेत्र में सुरक्षा संबंधी कार्यों को संभाल सके. नौसेना का मानना था कि इन कार्यों के लिए अत्याधुनिक और महंगे युद्धपोतों का उपयोग सबसे उपयुक्त विकल्प नहीं है. समय के साथ सरकार ने भी इस तर्क को स्वीकार किया। 

1970 के दशक की शुरुआत तक कई ऐसे कारण सामने आए जिन्होंने अलग तटरक्षक बल की आवश्यकता को और मजबूत कर दिया। 

तस्करी बनी बड़ी चुनौती
उस दौर में समुद्री मार्गों से तस्करी तेजी से बढ़ रही थी और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन चुकी थी. उस समय मौजूद समुद्री एजेंसियां, जैसे सीमा शुल्क विभाग और मत्स्य विभाग, बड़े पैमाने पर हो रही तस्करी को रोकने में सक्षम नहीं थीं। 

इसी पृष्ठभूमि में 1970 में नाग समिति का गठन किया गया. समिति ने अपनी रिपोर्ट में समुद्री तस्करी से निपटने के लिए एक अलग समुद्री बल की आवश्यकता बताई। 

बॉम्बे हाई में तेल मिलने से बढ़ी जरूरत
मुंबई हाई क्षेत्र में तेल की खोज और वहां स्थापित महत्वपूर्ण अपतटीय संरचनाओं की सुरक्षा भी एक बड़ी आवश्यकता बन गई थी. इन परिसंपत्तियों की सुरक्षा और किसी आपदा की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए मजबूत समुद्री सुरक्षा तंत्र की जरूरत महसूस की गई। 

रुस्तमजी समिति की सिफारिश
सितंबर 1974 में सरकार ने पूर्व बीएसएफ महानिदेशक के.एफ. रुस्तमजी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया. समिति को समुद्री तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों से निपटने के मौजूदा तंत्र की समीक्षा करने और सुधार के सुझाव देने की जिम्मेदारी सौंपी गई. 1975 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में समिति ने स्पष्ट रूप से ‘कोस्ट गार्ड’ जैसी संस्था स्थापित करने की सिफारिश की। 

सिर्फ सात जहाजों के साथ हुई शुरुआत
वर्ष 1977 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय तटरक्षक बल की स्थापना को मंजूरी दी. इसके लिए भारतीय नौसेना से दो फ्रिगेट और पांच गश्ती नौकाएं स्थानांतरित की गईं. 1 फरवरी 1977 को भारतीय तटरक्षक बल अस्तित्व में आया. उस समय भारतीय जलक्षेत्र और विशेष आर्थिक क्षेत्र की निगरानी के लिए उसके पास केवल सात जहाज थे। 

बाद में 19 अगस्त 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने भारतीय तटरक्षक बल का औपचारिक उद्घाटन किया। 

ICGS Kuthar बना पहला तटरक्षक जहाज
1978 में भारतीय नौसेना के INS Kuthar को भारतीय तटरक्षक बल को सौंपा गया और उसका नाम ICGS Kuthar रखा गया. उद्घाटन समारोह के दौरान जहाज से नौसेना का ध्वज उतारा गया और तटरक्षक बल का ध्वज फहराया गया. इसी के साथ यह भारतीय तटरक्षक बल का पहला जहाज बना। 

जहाजों के साथ बढ़ी हवाई क्षमता
तटरक्षक बल की क्षमता बढ़ाने के लिए 1978 में निर्माणाधीन दो नौसैनिक सीवर्ड डिफेंस बोट्स को भी तटरक्षक बल को देने का निर्णय लिया गया. इन्हें क्रमशः 1980 और 1981 में सेवा में शामिल किया गया था. इसके बाद 1982 में तटरक्षक बल ने चेतक हेलीकॉप्टरों को खोज और बचाव अभियानों के लिए शामिल किया. इन्हें सुरक्षा रिकॉर्ड के आधार पर मानक सर्च एंड रेस्क्यू हेलीकॉप्टर के रूप में चुना गया। 

22 मई 1982 को गोवा के डाबोलिम एयरफील्ड में भारतीय तटरक्षक बल के पहले एयर स्क्वाड्रन 800 स्क्वाड्रन (CG) को भी कमीशन किया गया। 

सात जहाजों से 154 जहाज और 82 एयरक्राफ्ट तक
भारतीय तटरक्षक बल की शुरुआत ऐसे समय में हुई थी जब उसके पास केवल सात जहाज थे. उसका मुख्य उद्देश्य समुद्री तस्करी पर नियंत्रण, कानून प्रवर्तन और समुद्री क्षेत्रों की निगरानी था. समय के साथ भारत के समुद्री हितों, व्यापारिक गतिविधियों और सुरक्षा आवश्यकताओं का दायरा बढ़ता गया. इसके अनुरूप तटरक्षक बल का भी विस्तार हुआ। 

आज भारतीय तटरक्षक बल 11,099 किलोमीटर लंबे भारतीय समुद्री तट की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. उसके पास 154 जहाज और 82 एयरक्राफ्ट हैं, जो निगरानी, गश्त, खोज एवं बचाव और समुद्री सुरक्षा संबंधी विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। 

भारत की समुद्री सुरक्षा का अहम स्तंभ
भारतीय तटरक्षक बल का इतिहास दिखाता है कि कैसे एक छोटे समुद्री बल ने सीमित संसाधनों के साथ शुरुआत की और धीरे-धीरे देश की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गया. सात जहाजों से शुरू हुआ यह सफर आज 154 जहाजों और 82 एयरक्राफ्ट तक पहुंच चुका है, जो भारत के समुद्री हितों की रक्षा में लगातार सक्रिय हैं। 

 

हाईवे पर बीच रास्ते में फंसी गाड़ियों को मिलेगी तुरंत मदद, NHAI की 24X7 सेवा की तैयारी

 नई दिल्‍ली
 भारत में नेशनल हाइवे और एक्‍सप्रेस की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। जिसके कारण अब लोग लंबी दूरी की यात्रा भी अपनी कार से कर रहे हैं। लेकिन कई बार गाड़ी खराब होने या पंचर होने जैसी स्थिति में लोग परेशान हो जाते हैं और घंटों तक मदद का इंतजार करते हैं। ऐसे लोगों के लिए NHAI की ओर से नई सेवा को शुरू करने की तैयारी की जा रही है। यह क्‍या है और किस तरह से लोगों को मदद मिल पाएगी। हम आपको इस खबर में बता रहे हैं।

शुरू होगी सेवा
सरकार की ओर से लगातार नए हाइवे और एक्‍सप्रेस वे को बनाया जा रहा है। जिस कारण अब लंबे सफर को कार से पूरा करना भी आसान हो गया है। सफर के दौरान कार खराब हो जाए या फिर टायर पंचर हो जाएं तो परेशानी हो जाती है। इस परेशानी के हल के लिए अब नई सेवा को शुरू करने की तैयारी हो रही है।

जनसुविधाओं का नेटवर्क होगा तैयार
अब देशभर के नेशनल हाइवे और एक्‍सप्रेस वे पर जन सुविधाओं का नेटवर्क तैयार करने की शुरुआत की जा रही है। सड़क परिवहन मंत्रालय की ओर से हाल में ही जानकारी दी गई है कि अब हाइवे और एक्‍सप्रेस वे पर पंचर रिपेयर और ऑटोमोबाइल वर्कशॉप को भी शामिल किया जा रहा है।

क्‍या होगा फायदा
इन दोनों सुविधाओं के कारण उन लोगों को फायदा मिल पाएगा जिनकी गाड़ी में परेशानी हो जाती है या फिर टायर पंचर होने से सफर करना रूक जाता है।

PPP मॉडल पर मिलेगी सुविधा
एनएचएलएमएल सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत दीर्घकालिक पट्टे पर सड़क किनारे आधुनिक सुविधाओं का एक नेटवर्क विकसित कर रहा है। रियायतकर्ताओं और पट्टेदारों के साथ किए गए मौजूदा समझौतों के तहत, ऐसे प्रत्येक सुविधा केंद्र (डब्ल्यूएसए) के लिए निर्धारित अनिवार्य सुविधाओं के अतिरिक्त कई सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। वाहन मरम्मत की दुकानें और पंचर ठीक करने की सुविधाएं संविदात्मक ढांचे के तहत अनुमोदित सुविधाओं में शामिल हैं।

 

LPG-LNG पर बड़ी राहत! होर्मुज का टंटा खत्म, तेल-गैस लेकर भारत पहुंचे 30 जहाज

मुंबई 

पश्चिम एशिया से भारत को अब खुशखबरी मिलने लगी हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुल गया है. ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर के बाद से लगातार भारत के तेल-गैस वाले जहाज आ रहे हैं. अब तक भारत आने वाले 30 से अधिक जहाज होर्मुज को पार कर चुके हैं. हालांकि, अब भी दर्जनों जहाज होर्मुज को पार करने का इंतजार कर रहे हैं. भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए होर्मुज वाला समुद्री रास्ता काफी अहम है. कतर से गैस हो या खाड़ी देशों से तेल… भारत इसी रास्ते से अधिकतर माल मंगाता है. दुनिया भर में होने वाली एनर्जी सप्लाई का पांचवां हिस्सा यहीं से गुज़रता है. भारत के लिए एलएनजी और एलपीजी की खरीद के मुख्य पार्टनर खाड़ी देश ही हैं। 

शिपिंग मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से दावा किया कि भारत आने वाले अब तक 30 जहाज होर्मुज को पार कर चुके हैं. जी हां, भारत आने वाले 30 जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़र चुके हैं. 26 जहाज इस अहम समुद्री रास्ते से गुजरने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. होर्मुज को अभी तक जितने जहाज पार किए हैं, उनमें से आधे जहाजों में एलपीजी और एलएनजी है. वहीं, आठ में बल्क कार्गो और सात क्रूड ऑयल टैंकर थे। 

कब कितने जहाज निकले होर्मुज से
डेटा से पता चला है कि 1 मार्च से 17 जून के बीच 19 जहाजों ने होर्मुज को पार किया है. ईरान-अमेरिका की ओर से MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद 11 जहाज सुरक्षित रूप से इस होर्मुज जलडमरूमध्य से पार कर चुके हैं. इनमें से कुछ जहाज भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच गए हैं या पहुंचने वाले हैं. इन 30 जहाजों में से 17 विदेशी झंडे वाले जहाज . इनमें सबसे अधिक पांच मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाले जहाज शामिल हैं। 

26 अब भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत से जुड़े 26 जहाज अभी भी फारस की खाड़ी में फंसे हैं. ये जहाज अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. फारस की खाड़ी होर्मुज के पश्चिम में है. अभी इन 26 जहाजों ने होर्मुज पार नहीं किया है. इन 26 जहाजों में भारतीय झंडे वाले और भारत आने वाले विदेशी झंडे वाले दोनों तरह के जहाज शामिल हैं. इन जहाजों में तीन में ईंधन, 10 में फर्टिलाइजर यानी खाद है और बाकी 13 में अन्य सामान लदा है. गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान पर अटैक किया था. तब से ही होर्मुज में हाहाकार मचा था. अमेरिका-ईरान के बीच समझौता होने के बाद यह होर्मुज खुला है। 

भारत ने रोका सिंधु का पानी, संकट में घिरा पाकिस्तान; बाढ़ आते ही बदली कहानी, अब सिंधु सभ्यता का सहारा क्यों?

नई दिल्ली

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित करने का फैसला लिया. इसके बाद पाकिस्तान में भयंकर पानी का संकट खड़ा हो गया. जिसकी गूंज उसके सरकारी दफ्तरों से लेकर सड़कों तक सुनाई देने लगी. पाकिस्तान के जल प्रबंधन से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि 2025 के खरीफ सीजन की शुरुआत में वहां के अधिकारी 21 फीसदी तक पानी की कमी का अनुमान लगा रहे थे. झेलम और चिनाब नदी में पानी के कम फ्लो को लेकर चिंता बढ़ रही थी. पंजाब और सिंध जैसे कृषि प्रधान प्रांतों में आशंका थी कि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलेगा. हालात ऐसे बन रहे थे कि पाकिस्तान को अपने जलाशयों का इस्तेमाल बेहद सावधानी से करना पड़ सकता था. लेकिन तभी प्रकृति ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरी तस्वीर बदल दी। 

दिलचस्प बात यह है कि जिस संकट की तैयारी पाकिस्तान कर रहा था, वह आखिरकार आया ही नहीं. भारत के फैसले के बाद जल संकट का डर लगातार बढ़ रहा था. पाकिस्तान के अधिकारियों ने अपनी बैठकों में ‘चिनाब नदी में भारत की ओर से कम जल आपूर्ति के कारण पैदा हुए संकट’ का भी जिक्र किया. लेकिन कुछ महीनों बाद ऊपरी इलाकों में बर्फ तेजी से पिघली और अगस्त 2025 में आई भीषण बाढ़ ने पाकिस्तान की जल स्थिति को पूरी तरह बदल दिया. जो देश पानी की कमी से जूझने की तैयारी कर रहा था, उसके जलाशय कुछ ही महीनों में लगभग पूरी क्षमता तक भर गए. हालांकि यह राहत स्थायी नहीं मानी जा रही, क्योंकि अब एक नया और कहीं बड़ा खतरा सामने खड़ा दिखाई दे रहा है। 

जल संकट की तैयारी में जुटा था पाकिस्तान
पाकिस्तान की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक खरीफ सीजन शुरू होने से पहले देश के दो सबसे बड़े जलाशय टरबेला और मंगला लगभग डेड स्टोरेज स्तर के करीब पहुंच चुके थे. पिछले सीजन का बचा हुआ पानी भी बेहद कम था. ऐसे में अधिकारियों ने पूरे सिस्टम में करीब 21 फीसदी जल कमी का अनुमान लगाया था. हालात को देखते हुए पूरे सीजन के लिए जल वितरण योजना को भी टाल दिया गया था. सबसे ज्यादा असर पंजाब और सिंध पर पड़ने की आशंका जताई गई थी, क्योंकि पाकिस्तान की सिंचित कृषि का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों पर निर्भर करता है। 

    पाकिस्तानी अधिकारियों की चिंताओं की वजह भी थी. रिपोर्ट के अनुसार कई बैठकों में झेलम-चिनाब नदी प्रणाली में कम जल प्रवाह को लेकर गंभीर चर्चा हुई. एक बैठक में अधिकारियों ने साफ तौर पर कहा कि ‘चिनाब नदी में भारत की ओर से कम आपूर्ति के कारण पैदा हुए संकट’ से निपटने के लिए जलाशयों का संचालन बेहद सावधानी से करना होगा ताकि सभी प्रांतों को निर्धारित हिस्से का पानी मिल सके। 

फिर बदली किस्मत, बाढ़ बनी वरदान
सीजन के दूसरे हिस्से में मौसम ने अप्रत्याशित करवट ली. ऊपरी सिंधु बेसिन में तापमान बढ़ने से बर्फ तेजी से पिघलने लगी. इससे नदी में पानी का प्रवाह बढ़ गया. इसके बाद अगस्त 2025 के आखिर में चिनाब और पूर्वी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश हुई. इस बारिश ने बड़े पैमाने पर बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी. रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने खरीफ सीजन के लिए 104.03 मिलियन एकड़ फीट (MAF) जल प्रवाह का अनुमान लगाया था. लेकिन वास्तविक जल प्रवाह 122.36 MAF दर्ज किया गया, जो अनुमान से करीब 18 फीसदी अधिक था. इससे पाकिस्तान का पूरा जल संतुलन बदल गया. जहां पहले कमी की आशंका थी, वहीं बाद में जरूरत से ज्यादा पानी मिलने लगा। 

99 फीसदी तक भर गए जलाशय
बाढ़ और बर्फ पिघलने से मिले अतिरिक्त पानी का असर बहुत जल्दी दिखाई देने लगा. सितंबर 2025 तक पाकिस्तान के प्रमुख जलाशय लगभग 99 फीसदी क्षमता तक भर चुके थे. सीजन की शुरुआत में जो जलाशय डेड स्टोरेज के करीब थे, वे कुछ ही महीनों में पानी से लबालब हो गए. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोटरी बैराज के नीचे बहने वाले अतिरिक्त पानी की मात्रा 30.85 MAF तक पहुंच गई थी. यह अनुमानित मात्रा से तीन गुना अधिक और पिछले पांच सालों के औसत से लगभग 71 फीसदी ज्यादा थी. यानी जिस संकट से पाकिस्तान डर रहा था, उसे प्रकृति ने अस्थायी तौर पर टाल दिया। 

लेकिन अब सामने है टरबेला डैम का बड़ा संकट
हालांकि पाकिस्तान को बाढ़ ने तत्काल संकट से राहत दिला दी, लेकिन उसकी जल व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी अब भी बरकरार है. रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता टरबेला जलाशय की घटती क्षमता को लेकर जताई गई है. टरबेला पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक डैम नहीं, बल्कि उसकी कृषि और जल सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है. जब टरबेला डैम शुरू हुआ था तब इसकी लाइव स्टोरेज क्षमता 9.68 MAF थी. लेकिन अब यह घटकर करीब 5.73 MAF रह गई है. यानी दशकों में इसमें लगभग 48 फीसदी क्षमता की कमी आ चुकी है. इसका मुख्य कारण तलछट (Sediment) का लगातार जमा होना बताया गया है। 

इस्लाम भूला पाकिस्तान, सिंधु घाटी सभ्यता को क्यों कर रहा याद

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने जो सिंधु जल समझौते पर भारत को जंग की धमकी दी तो भारत ने जवाब तो दे दिया. लेकिन पिछले साल से पाकिस्तान एक और बड़ा खेल खेलने लग गया है जिसपर ध्यान देने की ज़रूरत है. आज तक पाकिस्तान कभी सिंधु घाटी सभ्यता का नाम भी नहीं लेता था. वो तो अपने स्कूलों-कॉलेजों में उसके बारे में ना ज़्यादा पढ़ाता था और ना ही ज़्यादा कोई रिसर्च वगैरह करवाता था. क्योंकि पाकिस्तान ने अपनी पहचान ही इस्लाम पर खड़ी कर के रखी है. और अपना इतिहास भी वहीं से शुरू हुआ मानता है, जब साल 712 में मोहम्मिद बिन क़ासिम ने हमला कर के सिंध पर क़ब्ज़ा कर लिया था. यानी आज तक वो अपने लोगों को भी यही पढ़ाता था कि जहां से इस्लाम इस इलाक़े में आया वहीं से एक तरह से इतिहास शुरू होता है. लेकिन अब उसको अचानक सिंधु घाटि सभ्यता याद आने लग गई है. अब वो अचानक पिछले कुछ दिनों में सिंधु घाटी सभ्यता को अपनी राष्ट्रीय पहचान का बहुत बड़ा हिस्सा बताता फिर रहा है। 

ये कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है. सोचने वाली बात ये कि है कि अब अचानक पाकिस्तान को हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (मूअन-जो-दड़ो) से इतना प्यार कहां से हो गया? किसको बेवकूफ़ बनाने की कोशिश हो रही है ये? ये सिंधु नदी के पानी पर अपना ऐतिहासिक हक़ जताने का पैंतरा है, ये क्या किसी को समझ नहीं आ रहा? मूअन-जो-दड़ो में सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी खुदाई 1965 में पाकिस्तान ने रुकवा दी थी. एक अमेरिकी जॉर्ज डेल्स तब वो खुदाई कर रहे थे. लेकिन पाकिस्तान तो अपने को फ़ारस की सभ्यता से जुड़ा हुआ बताने में ज़्यादा इंटरेस्टेड, अरब की इस्लामी सभ्यता से ख़ुद को जुड़ा हुआ बताने में ज़्यादा इंटरेस्टेड था। 

पाकिस्तान का सिंधु पर नया गेम समझिए
असली कहानी ये है कि पाकिस्तान अब सिंधु घाटी सभ्यता और इस्लाम से पहले की विरासत का इस्तेमाल करके खुद को सिंधु नदी का वारिस बताना चाहता है. ताकि सिंधु नदी के पानी पर अपना दावा मज़बूत कर सके. अब वो मूअन-जो-दड़ो की बात कर रहा है, तक्षशिला को अपनी विरासत बता रहा है, गांधार उसको याद आ रहा है, बलूचिस्तान का मेहरगढ़ याद आ रहा है. अब तक इस्लाम से पहले का इतिहास उसको नज़र ही नहीं आता था. सरकार वहां डॉक्यूमेंट्रियां बनवा रही है, सेमिनार कर रही है और विदेशों में कार्यक्रम कर रही है कि सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान की पहचान का मुख्य हिस्सा है। 

पाकिस्तान की पानी वाली पॉलिटिक्स समझिए
तक्षशिला में टूरिज़्म करवाया जा रहा है, बड़ा म्यूज़ियम बनाने की बात हो रही है. गांधार की बौध विरासत और मेहरगढ़ को भी इसमें शामिल किया जा रहा है ताकि पाकिस्तान को हज़ारों साल पुरानी लगातार चली आ रही सभ्यता का वारिस बताया जा सके. अप्रैल में वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने विश्व धरोहर दिवस पर तो ये तक कह दिया कि पाकिस्तान सिंधु घाटी, मेहरगढ़ और गांधार सभ्यताओं का चौराहा है. हालांकि इस पर अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने तीखा जवाब दिया कि गांधार का मुख्य इलाक़ा अफगानिस्तान में है और कोई एक देश इस विरासत का पूरा मालिक नहीं बन सकता. हाल ही में पाकिस्तान में ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर टिमथी केन तक्षशिला गए और कहा कि ये जगह ज्ञान का केंद्र थी जो इस पूरे इलाके को जोड़ती थी. तो पाकिस्तान के एक विश्लेषक हैं अकबर अली शाह, उन्होंने जवाब में लिखा कि सिंधु पाकिस्तान की है और उसका इतिहास भी पाकिस्तान का है. तो ये सब जो सिंधु नदी के लिए प्यार उमड़ रहा है और अपने आप को सिंधु नदी का वारिस बताने की कोशिश हो रही है ये सिंधु जल समझौता रोके जाने के बाद ही क्यों हुई क्या किसीको समझ नहीं आता? बहुत अच्छी बात है अगर आप अपनी पहचान इस्लाम से पहले से जोड़ने की कोशिश कर रहे हो. क्योंकि जब यूनानी इस इलाक़े में आए तो सिंधु को उन्होंने इंडस बोला। 

पाकिस्तान किस मुंह से उस सभ्यता का वारिस?
और इंडस के लोगों को बोला इंडो. और ये इलाक़ा हुआ इंडिया. फिर जब फ़ारस के लोग आए तो फ़ारसी में ‘स’ का ‘ह’ हो जाता है. इसलिए सात दिनों का जो यहां सप्ताह था, उसको उन्होंने बोला हफ़्ता. और जैसे सप्ताह का हफ़्ता हो गया, वैसे ही सिंध का हिंद हो गया और सिंधु नदी के लोग कहलाए गए हिंदू. तो बहुत अच्छी बात है कि पाकिस्तान कह रहा है कि वो सिंधु घाटी सभ्यता का वारिस है. क्योंकि इंडस का वरिस तो इंडिया है, सिंधु का वारिस तो हिंद है. टू-नेशन थ्योरी की धज्जियां तो उड़ ही चुकी थीं 1971 में, उसको दफ़्न करने के लिए थैंक यू. बता देना आसिम मुनीर को भी. और सिधु घाटी सभ्यता की बात करते हो तो पता है आपको इतनी सारी खुदाई के बाद भी वहां सब कुछ मिला, एक भी हथियार नहीं निकला है खुदाई में. तो किस मुंह से ख़ुद को उस सभ्यता का वारिस बताते हो? तो ये मत समझना कि ये सब लारे-लप्पे लगाकर पानी मिल जाएगा. याद है वो समझौता क्यों रोका गया था? आतंक और पानी एक साथ नहीं बह सकते. सौ बात की एक बात। 

पाकिस्तान का सिंधु पर यूटर्न
वो तो इस्लाम आने से पहले भारत का जो इतिहास था उससे अपने आपको जोड़ कर ही नहीं देखना चाहता था. तो मूअन-जो-दड़ो में उसने 1965 में खुदाई रुकवा दी थी. जबकी भारत में तो गुजरात और राजस्थान में सिंधु घाटी सभ्यता की जगहों पर खोज चलती रही थी. लेकिन पिछले साल भारत ने सिंधु जल समझौते पर रोक लगाई तो पाकिस्तान ने मूअन-जो-दड़ो में फिर से खुदाई शुरू करवा दी. अब बिलावल भुट्टो-ज़रदारी भी कहते हैं कि वो तो सिंधु घाटी सभ्यता के वारिस हैं. अब वो ख़ुद को सिंधु के सच्चे रखवाले बता रहे हैं. अब तक तो आसिम मुनीर टू-नेशन थ्योरी के गाने गा रहे थे. अब इस्लाम से पहले का इतिहास याद आने लग गया है पाकिस्तान को। 

बाढ़ भी नहीं सुलझा सकती यह समस्या
    सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार मई 2022 में टरबेला की लाइव स्टोरेज 5.827 MAF थी, जो मार्च 2026 तक घटकर 5.580 MAF रह गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 के दौरान इसमें सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई. अधिकारियों का मानना है कि असामान्य रूप से अधिक तलछट आने के कारण यह स्थिति बनी है। 

    टरबेला डैम पाकिस्तान की बिजली उत्पादन क्षमता और सूखा प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाता है. ऐसे में इसकी घटती क्षमता भविष्य में पाकिस्तान के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ अतिरिक्त पानी तो दे सकती है, लेकिन जलाशयों में जमा हो रही तलछट की समस्या का समाधान नहीं कर सकती। 

खाद्य सुरक्षा पर भी मंडरा रहा खतरा
सिंधु बेसिन सिंचाई सिस्टम पाकिस्तान की लगभग 90 फीसदी कृषि उत्पादन जरूरतों को पूरा करती है. ऐसे में सिंधु नदी प्रणाली में किसी भी तरह का बदलाव सीधे खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है. अगर टरबेला और अन्य जलाशयों की क्षमता लगातार घटती रही, तो भविष्य में पाकिस्तान को कृषि उत्पादन और जल वितरण दोनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। 

फिलहाल 2025 का संकट टल गया था, लेकिन पाकिस्तान की नई जल मूल्यांकन रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि असली चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. भारत के फैसले, बदलते मौसम और जलाशयों की घटती क्षमता के बीच पाकिस्तान की जल सुरक्षा आने वाले वर्षों में बड़ी परीक्षा से गुजर सकती है। 

 

सिंगापुर में फंसे सैकड़ों भारतीय कामगार, कंपनियों पर सैलरी और आवास हड़पने के आरोप

 नई दिल्ली

सिंगापुर में भारतीय हाई कमीशन ने शाम को कहा कि वे सिंगापुर की उन तीन कंपनियों के कर्मचारियों के संपर्क में हैं, जिन्हें महीनों से सैलरी नहीं मिली है. वे ‘नेशनल ट्रेड्स यूनियन कांग्रेस’ और ‘मिनिस्ट्री ऑफ मैनपावर’ के साथ भी तालमेल बिठा रहे हैं, जो प्रभावित लोगों की मदद कर रहे हैं. SK इंडस्ट्रीज, KPA इंजीनियरिंग और VVR प्लांट इंजीनियरिंग ने भारत और बांग्लादेश के 400 से ज्यादा कर्मचारियों को बिना वेतन और रहने की जगह के छोड़ दिया है। 

 रिपोर्ट के मुताबिक, इन तीनों कंपनियों के एक कॉमन डायरेक्टर की पहचान भारतीय नागरिक रामू पलानी वेलु के तौर पर हुई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सिंगापुर के स्थायी निवासी रामू के बारे में माना जा रहा है कि वे देश छोड़कर चले गए हैं। 

कॉर्पोरेट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म ‘सयारी’ की जांच से पता चला है कि वे सिंगापुर में सात कंपनियों के डायरेक्टर हैं, जो एयर-कंडीशनिंग, प्लंबिंग और बिल्डिंग से जुड़ी सेवाएं देती हैं।

मजदूरों को दिए गए शॉपिंग वाउचर
NTUC के सेक्रेटरी-जनरल एनजी ची मेंग, माइग्रेंट वर्कर्स सेंटर के प्रतिनिधि और मैनपावर राज्य मंत्री दिनेश वासु डैश ने बुधवार को मजदूरों से मुलाकात की और उन्हें मदद का भरोसा दिलाया. मजदूरों को SGD200 नकद और सुपरमार्केट शॉपिंग वाउचर दिए जा रहे हैं. इसके साथ ही, उनके रहने के लिए दूसरी जगह का इंतजाम किया जा रहा है और उन्हें नौकरी दिलाने की कोशिशें भी चल रही हैं। 

जिन प्रवासी मजदूरों को वेतन नहीं मिला था, उन्होंने सोमवार को मैनपावर मंत्रालय को इस मामले की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि वे एयर-कंडीशनिंग मेंटेनेंस सर्विस देने वाली KPA इंजीनियरिंग और उससे जुड़ी कंपनी SK Industries में अपने मालिकों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं. एनजी ने कहा कि ‘ट्राइपार्टाइट अलायंस फॉर डिस्प्यूट मैनेजमेंट’ और ट्राइपार्टाइट पार्टनर इस मामले से जुड़े मालिकों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं। 

रिपोर्ट के मुताबिक, रामू ने 2025 में VVR प्लांट इंजीनियरिंग का कामकाज संभाला. इससे पहले यह कंपनी भारतीय नागरिक रवि विक्टर और रवि विजयारानी, ​​और उनके सिंगापुर में रहने वाले बेटे रवि मार्टिन अब्राहम की थी. 23 साल के मार्टिन ने बताया कि परिवार ने यह कंपनी रामू को बेच दी थी. उन्होंने कहा, ‘नई कंपनियों के लिए परमिट मिलना आसान नहीं है, इसलिए हमें लगा कि उन्होंने इसी वजह से हमारा पारिवारिक बिजनेस खरीदा है। 

इस कंपनी को काफी कीमती माना जाता था क्योंकि इसके पास खास प्रोसेस सेक्टर के लिए वर्क परमिट थे, जिनसे जुरोंग आइलैंड जैसी जगहों पर प्रोसेस कंस्ट्रक्शन और मेंटेनेंस का काम किया जा सकता है। 

रामू ने साल 2014 में अपना पहला बिजनेस KPA इंजीनियरिंग शुरू किया था और आखिरी बार इसकी कैपिटल SGD 1 मिलियन दर्ज की गई थी. रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय नागरिक सुंदरमूर्ति कोमथी ने 2016 से 2018 के बीच रामू के साथ कंपनी डायरेक्टर के तौर पर काम किया.  उनके जाने के बाद कृष्णमूर्ति सुंदरमूर्ति 2020 में डायरेक्टर बने और अभी भी एक्टिव डायरेक्टर हैं। KPA इंजीनियरिंग में काम करने वाले सैम ने बताया कि कर्मचारी रामू को ‘बिग बॉस’ के तौर पर जानते थे, जबकि रोजमर्रा का कामकाज मूर्ति नाम का एक भारतीय नागरिक संभालता था. सैम ने कहा, ‘हम मूर्ति से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया है। 

साल 2019 में रामू ने SGD 100,000 की रजिस्टर्ड कैपिटल के साथ ‘कम्फर्ट एयर इंजीनियरिंग’ शुरू की और वह इसके अकेले डायरेक्टर हैं. साल 2023 में, उन्होंने SGD200,000 की कैपिटल के साथ ‘SK इंडस्ट्रीज’ रजिस्टर की और इसके भी अकेले डायरेक्टर हैं, जबकि सुंदरमूर्ति कोमथी इसके शेयरहोल्डर हैं। 

साल 2025 में रामू ने एक ही दिन में तीन और कंपनियां रजिस्टर कीं- KMS इंटीग्रेटेड, GM इंटीग्रेटेड और HVS इंडस्ट्रीज. वे इन तीनों के अकेले डायरेक्टर हैं. KMS को SGD100,000 की कैपिटल के साथ रजिस्टर किया गया था, जबकि GM और HVS में से हर एक की कैपिटल SGD10,000 थी। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मिनिस्ट्री ऑफ मैनपावर ने इशारा किया है कि वह नियमों के संभावित उल्लंघन के लिए KPA इंजीनियरिंग और SK इंडस्ट्रीज की जांच कर रही है. यह मामला 400 से ज्याजा ऐसे कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें बिना सैलरी और रहने की जगह के छोड़ दिया गया था. अब भारत और सिंगापुर के अधिकारी, ट्रेड यूनियन और वर्कर ग्रुप उनकी मदद करने और इसके लिए जिम्मेदार लोगों का पता लगाने के लिए काम कर रहे हैं। 

 

‘पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं’ : बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले ने साफ की कानूनी स्थिति

मुंबई 

भारतीय नागरिकता के प्रमाण को लेकर चल रही बहस के बीच एक बार फिर यह सवाल केंद्र में आ गया है कि आखिर किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय करने का अंतिम आधार क्या है. कानूनी सूत्रों और उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार, भारत में नागरिकता से जुड़े सवालों के निपटारे के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 ही मुख्य और कानून है. यही कानून तय करता है कि कौन भारतीय नागरिक हो सकता है, किन आधारों पर नागरिकता प्राप्त की जा सकती है और किन परिस्थितियों में नागरिकता समाप्त भी हो सकती है. बॉम्‍बे हाईकोर्ट 13 साल पुराने एक मामले में भारतीय पासपोर्ट और इंडियन सिटिजनशिप पर बड़ा फैसला दिया था। 

सूत्रों के मुताबिक, आम धारणा के विपरीत पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र या अन्य पहचान संबंधी दस्तावेज अपने आप में किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं हैं. इन दस्तावेजों का अपना प्रशासनिक और वैधानिक महत्व जरूर है, लेकिन इनका उद्देश्य मुख्य रूप से ट्रैवल की अनुमति देना, पहचान स्थापित करना, कर व्यवस्था, कल्याणकारी सेवाओं का लाभ या चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी जरूरतों को पूरा करना है. नागरिकता का सवाल इन दस्तावेजों से ऊपर उठकर नागरिकता अधिनियम, 1955 में निर्धारित कानूनी कसौटियों पर तय होता है। 

क्‍या है एक्‍सपर्ट की राय?
जानकारों का कहना है कि नागरिकता अधिनियम भारत में राष्ट्रीयता के प्रश्न पर सबसे महत्वपूर्ण कानून है. इसके तहत नागरिकता जन्म, वंश, रजिस्‍ट्रेशन, नैचुरलाइजेशन और किसी क्षेत्र के भारत में विलय जैसे विभिन्न आधारों पर प्राप्त की जा सकती है. साथ ही यह कानून यह भी स्पष्ट करता है कि कौन सी श्रेणियां ऐसी हैं, जिन्हें नागरिकता पाने के अधिकार से बाहर रखा गया है. खासतौर पर अवैध प्रवासी यानी ऐसे लोग जो बिना वैलिड दस्तावेज या कानूनी अनुमति के भारत में आए हों या तय शर्तों का उल्लंघन करते हुए यहां रह रहे हों, उनके लिए नागरिकता प्राप्त करने के अधिकांश रास्ते बंद हैं। 

गैर-नागरिकों को भी मिल चुका है पासपोर्ट?
सूत्रों के अनुसार, कानून में नागरिक और अवैध प्रवासी के बीच यह स्पष्ट विभाजन महज तकनीकी व्यवस्था नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा विषय है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों के लिए निर्धारित संवैधानिक अधिकारों, सरकारी लाभों और कानूनी सुरक्षा का अनुचित इस्तेमाल ऐसे लोग न कर सकें, जिनके पास भारत में रहने का वैध आधार ही नहीं है. इसी संदर्भ में पासपोर्ट को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है. सूत्रों का कहना है कि पासपोर्ट को भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना कोई नया फैसला नहीं है. यह न तो हाल में लिया गया कोई निर्णय है और न ही पिछले कुछ वर्षों में बदली हुई व्याख्या. कानूनी रूप से पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं रहा है. पासपोर्ट अधिनियम, 1967 में भी ऐसे प्रावधानों का उल्लेख मिलता है, जिनके तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। 

बॉम्‍बे हाईकोर्ट का 13 साल पुराना फैसला
सूत्रों का कहना है कि 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में साफ कहा था कि पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता. इस पृष्ठभूमि में यह समझना महत्वपूर्ण है कि पासपोर्ट, आधार, पैन या वोटर आईडी जैसे दस्तावेज किसी व्यक्ति की पहचान, निवास, करदाता स्थिति या चुनावी पंजीकरण को दर्शा सकते हैं, लेकिन नागरिकता का अंतिम परीक्षण नागरिकता अधिनियम, 1955 और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही होगा. ऐसे में नागरिकता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कानूनी स्थिति यही है कि भारत में नागरिकता का निर्धारण भावनात्मक या दस्तावेजों की सामान्य उपलब्धता से नहीं, बल्कि विधि द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रमाणों के आधार पर किया जाएगा. यही वजह है कि नागरिकता के मुद्दे पर किसी भी दावे की जांच में मूल कानून और उसके तहत तय मानदंडों को ही सर्वोपरि माना जाता है। 

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