8वें वेतन आयोग से पहले कर्मचारियों को मिल सकती है बड़ी खुशखबरी, DA Hike पर जल्द फैसला संभव

नई दिल्ली

केंद्र सरकार के कर्मचारी, पेंशनभोगी और उनसे जुड़े सभी हितधारक इस समय दो बड़े फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। पहला, महंगाई भत्ते (DA) में संशोधन की घोषणा और दूसरा, 8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया में हो रही प्रगति। चूंकि 8वां वेतन आयोग अभी विचार-विमर्श के दौर में है, इसलिए मौजूदा 7वें वेतन आयोग के ढांचे के तहत जल्द ही एक और डीए में इजाफे की घोषणा हो सकती है। डीए में बढ़ोतरी सेवारत कर्मचारियों और पेंशनर्स को साल में दो बार दी जाती है। आइए, 26 जून 2026 तक के सबसे ताजा अपडेट को समझते हैं…

DA की चर्चा क्यों हो रही है?
महंगाई भत्ते में संशोधन साल में दो बार किया जाता है, एक बार जनवरी में और दूसरी बार जुलाई में। ऐसा बढ़ती जीवन लागत की भरपाई के लिए किया जाता है और सरकार इसे केंद्रीय कर्मचारियों व पेंशनभोगियों के लाभ के लिए प्रदान करती है। यह संशोधन अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-IW) के 12 महीने के औसत से जुड़ा होता है।

चूंकि 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें अभी तक लागू नहीं हुई हैं, कर्मचारियों को 7वें वेतन आयोग के ढांचे के तहत ही डीए संशोधन मिलता रहेगा। जुलाई 2026 के डीए संशोधन की आज व्यापक चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि महंगाई और CPI-IW के ट्रेंड एक और इजाफे की ओर इशारा कर रहे हैं।

महंगाई के लेटेस्ट आंकड़े क्या बताते हैं?
सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के ताजा आंकड़े साफ दिखाते हैं कि खुदरा महंगाई लगातार ऊंची बनी हुई है और खाने-पीने की चीजों की कीमतें अब भी अहम वजह बनी हुई हैं। मई 2026 में खुदरा महंगाई अप्रैल 2026 की तुलना में बढ़ गई। समग्र सीपीआई मुद्रास्फीति मई में 3.93 प्रतिशत रही, जो अप्रैल के 3.48 प्रतिशत से अधिक है।

ग्रामीण इलाकों में महंगाई दर 3.74 प्रतिशत से बढ़कर 4.25 प्रतिशत हो गई, जबकि शहरी महंगाई 3.16 प्रतिशत से उछलकर 3.53 प्रतिशत पर पहुंच गई। खाद्य महंगाई भी अप्रैल के 4.20 प्रतिशत के मुकाबले मई में 4.78 प्रतिशत दर्ज की गई।

महंगाई में खासकर खाने-पीने की कीमतों में आई यह तेजी इस उम्मीद को बल देती है कि सरकार जल्द ही डीए में एक और संशोधन और समायोजन पर विचार कर सकती है। हालांकि, अंतिम वृद्धि का निर्णय सीपीआई-आईडब्ल्यू के आंकड़ों और कैबिनेट की मंजूरी पर ही निर्भर करेगा।

अभी कितना महंगाई भत्ता मिल रहा है और कितना बढ़ सकता है?
सभी केंद्र सरकार के कर्मचारियों को इस समय नवीनतम संशोधन के बाद मूल वेतन का 58 प्रतिशत महंगाई भत्ता मिल रहा है। जुलाई 2026 की डीए वृद्धि की घोषणा अभी तक नहीं हुई है, जबकि महीना शुरू होने में बस कुछ ही दिन बाकी हैं।

मुद्रास्फीति के रुझानों और CPI-IW की गतिविधियों के आधार पर 2 से 3 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद बन रही है, लेकिन अंतिम आंकड़ा आधिकारिक गणना और केंद्र सरकार के अपडेट के बाद ही तय होगा। यह लाभ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों दोनों पर समान रूप से लागू होता है।

8वें वेतन आयोग के लिए कर्मचारी संगठनों की क्या मांगें हैं?
पिछले कुछ महीनों से कर्मचारी संघों, स्टेक होल्डर ग्रुप्स और विभिन्न संगठनों ने 8वें वेतन आयोग के समक्ष कई मुद्दे उठाए हैं। इनमें महंगाई से निपटने के लिए उच्च न्यूनतम वेतन, कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने, भत्तों में संशोधन और भुगतान ढांचे में बदलाव जैसी मांगें शामिल हैं। केंद्रीय सरकारी कर्मचारी एवं कामगार परिसंघ ने ज्यादा न्यूनतम वेतन, बेहतर पेंशन लाभ और भत्तों की समीक्षा की बात रखी है।

ऑल इंडिया डिफेंस एम्पलाइज फेडरेशन ने सैलरी स्ट्रक्चर में संशोधन, विसंगतियों को दूर करने और बेहतर सेवा लाभों की मांग की है। वहीं, नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ एक्शन (NJCA) से जुड़े समूह बेहतर फिटमेंट फैक्टर, वेतन असमानताओं में सुधार और कर्मचारी-हितैषी सुधारों पर जोर दे रहे हैं।

कर्मचारी समूहों का मानना है कि अगली वेतन संरचना तय करते समय बढ़ती लागत, लगातार बढ़ती महंगाई, कर्मचारियों का मनोबल, उनकी आजीविका का भविष्य और जीवन-यापन के खर्चों में हो रहे बदलावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया पर ताजा अपडेट
8वां वेतन आयोग अब विचार-विमर्श के चरण में प्रवेश कर चुका है। 3 नवंबर 2025 को गठन के बाद से इसे सात महीने पूरे हो चुके हैं। आयोग सिफारिशें तैयार करने से पहले फीडबैक जुटाने के लिए दिल्ली, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हितधारकों से मुलाकात कर रहा है।

हाल ही में 22-23 जून 2026 को लखनऊ में बैठकें हुईं, जिनमें कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों और वेतन संबंधी चिंताओं पर चर्चा की गई। आयोग के ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी विचार-विमर्श जारी रखने की उम्मीद है। यह प्रक्रिया अभी शुरुआती दौर में है और फिटमेंट फैक्टर, संशोधित सैलरी मैट्रिक्स, पेंशन सुधार या लागू होने की तारीख को लेकर अब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

Modi Cabinet Reshuffle: जल्द हो सकता है बड़ा फेरबदल, TMC-शिवसेना के बागियों को मिल सकता है बड़ा इनाम!

नई दिल्ली

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठन में अगले कुछ दिनों में बड़े स्तर पर फेरबदल हो सकता है. सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार में मंत्रिमंडल के विस्तार और संगठनात्मक बदलाव दोनों पर गंभीरता से मंथन चल रहा है. इस कवायद में कुछ नए चेहरों को सरकार में जगह मिल सकती है, जबकि कुछ मौजूदा मंत्रियों की जिम्मेदारियां बदली जा सकती हैं। 

सूत्रों के अनुसार, हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद एनडीए का कुनबा मजबूत हुआ है. ऐसे में सहयोगी दलों और हाल में एनडीए के साथ आए नेताओं को भी सरकार में प्रतिनिधित्व देने की तैयारी की जा रही है. इसी क्रम में महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से कुछ अहम नेताओं के नाम चर्चा में हैं। 

टीएमसी के एक बागी को कैबिनेट में जगह
सूत्रों का कहना है कि शिवसेना (शिंदे गुट) के सांसद श्रीकांत शिंदे को केंद्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट रैंक के साथ शामिल किया जा सकता है. वहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों में काकोली घोष, सुदीप बंदोपाध्याय और शताब्दी राय के नामों पर भी विचार चल रहा है. इनमें से किसी एक को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। 

इसके अलावा शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) से अलग हुए सांसद संजय दीना पाटिल का नाम भी संभावित मंत्रियों की सूची में बताया जा रहा है. माना जा रहा है कि सहयोगी दलों और नए राजनीतिक साथियों को उचित प्रतिनिधित्व देकर एनडीए अपने राजनीतिक विस्तार को और मजबूत करना चाहता है। 

कुछ मंत्रियों का बदलेगा रोल
सूत्रों के मुताबिक, केवल नए मंत्रियों की नियुक्ति ही नहीं, बल्कि कुछ मौजूदा मंत्रियों की जिम्मेदारियां भी बदली जा सकती हैं. उत्तर प्रदेश और दिल्ली बीजेपी की कमान संभाल चुके पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा को संगठन में अधिक सक्रिय भूमिका देने के लिए केंद्र सरकार से मुक्त किया जा सकता है. यदि ऐसा होता है तो उनके स्थान पर नए चेहरों को मंत्री बनाया जा सकता है। 

जानकारी यह भी है कि भाजपा सरकार में शामिल कुछ वरिष्ठ नेताओं को संगठन में अहम जिम्मेदारी देने की रणनीति पर काम कर रही है. इसके बदले सरकार में अपेक्षाकृत युवा नेताओं को अवसर देकर नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार करने की कोशिश की जा सकती है। 

सिर्फ सरकार ही नहीं, बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे में भी व्यापक बदलाव की संभावना जताई जा रही है. सूत्रों के अनुसार, पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम दो महिला उपाध्यक्षों की नियुक्ति कर सकती है. इसके अलावा त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं को भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद दिए जाने पर विचार चल रहा है। 

70 साल पुराने जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जजों का जन्म भी नहीं हुआ था जब शुरू हुआ था मामला

 नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे अनोखे और 70 साल पुराने जमीन विवाद का निपटारा किया है, जो देश के सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल से होकर गुजरा है। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच के दोनों जजों का तब जन्म भी नहीं हुआ था, जब यह कानूनी विवाद शुरू हुआ था। यह पूरा मामला साल 1957 की एक सेल डीड (बिक्री विलेख) से जुड़ा हुआ है।

क्या है 70 साल पुराना यह जमीन विवाद?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विवाद 4 जून 1957 को हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव में 15.5 बीघा जमीन की खरीद से जुड़ा है। इस जमीन को अपीलकर्ता शराफत अली के पूर्वजों ने खरीदा था। उस समय शराफत अली के पूर्वज नाबालिग थे, इसलिए जमीन की यह खरीद उनके पिता ने की थी। शुरुआत में यह मामला दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की कार्यवाही के रूप में शुरू हुआ, जो बाद में यूपी जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 और चकबंदी ढांचे (कंसोलिडेशन फ्रेमवर्क) के दायरे में चला गया।

चार पीढ़ियों ने लड़ी कानूनी लड़ाई, गुजर गए लोग
इस केस का सफर इतना लंबा रहा कि इस दौरान एक के बाद एक पीढ़ियां गुजर गईं। मुकदमे की इस लंबी और घुमावदार यात्रा के दौरान अपीलकर्ता शराफत अली का भी निधन हो गया। इसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट तक इस लड़ाई को लड़ा। इस तरह एक ही परिवार की चार पीढ़ियां इस 70 साल पुरानी मुकदमेबाजी में उलझी रहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए अहम फैसला सुनाया। इससे पहले निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) और हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अपीलकर्ता इस सेल डीड के निष्पादन को साबित करने में विफल रहे हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों के निष्कर्षों को खारिज कर दिया और डीड को वैध माना।

म्यूटेशन और चकबंदी में कैसे उलझा था मामला?
जमीन की खरीद के बाद जब खरीदार के नाम पर दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) का समय आया, तो बेचने वाले ने शुरुआत में आपत्ति जताई। हालांकि, बाद में उसने आपत्ति वापस ले ली ताकि राजस्व अधिकारी अपीलकर्ताओं के पक्ष में जमीन का म्यूटेशन कर सकें।

लेकिन, जब गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई, तो अपीलकर्ताओं ने पाया कि खरीदी गई जमीन के मालिक के रूप में उनका नाम रिकॉर्ड से गायब था और वह अभी भी बेचने वाले के नाम पर ही दर्ज थी। चकबंदी अधिकारी ने म्यूटेशन रिकॉर्ड के आधार पर अपीलकर्ताओं का नाम जमीन के मालिक के रूप में दर्ज कर दिया। लेकिन बेचने वालों ने इसे फिर से चुनौती दी, जिसके बाद चकबंदी अधिकारी ने नए सिरे से फैसला करने का आदेश दिया था। आखिरकार, अब 70 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का अंतिम समाधान हो गया है।

उत्तर रेलवे का बड़ा रिकॉर्ड: सोलर एनर्जी से 2 महीने में ₹2.2 करोड़ की बचत, 3.4 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन

नई दिल्ली
 नॉर्दर्न रेलवे पर्यावरण संरक्षण और बिजली की लागत कम करने के मकसद से सोलर एनर्जी को बढ़ावा दे रहा है। इस पहल के तहत, अप्रैल और मई के दौरान रूफटॉप सोलर क्षमता में 2.2 MW की बढ़ोतरी की गई है। आने वाले दिनों में सोलर पैनल लगाने के काम को और तेज करने की कोशिश की जाएगी।

चीफ पब्लिक रिलेशंस ऑफिसर हिमांशु शेखर उपाध्याय ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी, एनर्जी सिक्योरिटी, कार्बन उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए, नॉर्दर्न रेलवे ने अपने रिन्यूएबल एनर्जी सफर में एक और अहम उपलब्धि हासिल की है।

कुल सोलर क्षमता बढ़कर लगभग 28.35 MW 
इस फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती दो महीनों में, अलग-अलग रेलवे स्टेशनों और सर्विस बिल्डिंग्स में लगभग 2.2 MW क्षमता वाले ग्रिड-कनेक्टेड रूफटॉप सोलर पावर प्लांट चालू किए गए। इन नए प्लांट के लगने से, नॉर्दर्न रेलवे की कुल सोलर क्षमता बढ़कर लगभग 28.35 MW हो गई है।

यह उपलब्धि कार्बन उत्सर्जन कम करने, नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को पूरा करने और पर्यावरण के अनुकूल ट्रांसपोर्टेशन को बढ़ावा देने की इंडियन रेलवे की कोशिशों को और मजबूत करती है।

इस फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती दो महीनों में, नॉर्दर्न रेलवे के सोलर पावर प्लांट से लगभग 3.4 मिलियन यूनिट बिजली पैदा हुई, जिससे एनर्जी की लागत में लगभग ₹2.2 करोड़ की बचत हुई। इस सोलर पावर जनरेशन से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 2,820 टन की कमी आने की उम्मीद है।

 

धर्म परिवर्तन के बाद OBC आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, इस्लाम अपनाने पर नहीं मिलेगा पिछड़ा वर्ग का लाभ

चेन्नई

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में धर्म परिवर्तन और आरक्षण को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिसके तहत हिंदू धर्म की पिछड़ी, अति-पिछड़ी या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को ‘बैकवर्ड क्लास मुस्लिम’ का दर्जा और आरक्षण देने की बात कही गई थी।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस पी बी बालाजी की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ एक मुस्लिम होता है। पीठ ने कहा, “कोई भी शख्स इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ ‘एक मुसलमान’ रह जाता है, बस बात यहीं खत्म। वह बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के दर्जे या आरक्षण का दावा कतई नहीं कर सकता।”

क्या था मामला?
यह मामला थूथुकुडी जिले के रहने वाले समीर अहमद की याचिका के बाद सामने आया। पहले उसका नाम परमशिवम था। परमशिवम का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। 2015 में उसने इस्लाम धर्म अपनाकर अपना नाम समीर अहमद रख लिया और मुस्लिम रीति-रिवाजों से शादी की। धर्म परिवर्तन के बाद समीर ने तहसीलदार के पास ‘मुस्लिम लेब्बाई’ जाति का कम्युनिटी सर्टिफिकेट पाने के लिए आवेदन किया। इस जाति को तमिलनाडु में ‘पिछड़े वर्ग के मुसलमानों’ का दर्जा प्राप्त है।

तहसीलदार ने समीर का आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद समीर ने हाईकोर्ट का रुख किया और तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें कनवर्टेड मुस्लिमों को आरक्षण देने की बात कही गई थी। तमिलनाडु सरकार ने दलील दी कि कनवर्ट होने वाले व्यक्ति को आरक्षण इसीलिए दिया जा रहा है ताकि वह अपनी पुरानी आरक्षित श्रेणी का लाभ उठा सके। हालांकि हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की दलील को खारिज कर दिया।

क्या बोला मद्रास हाईकोर्ट?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि मुस्लिम समाज में भी कई ऐसे समुदाय मौजूद हैं, लेकिन इन समुदायों की सदस्यता केवल जन्म से तय होती है। बेंच ने कहा, “बेझिझक यह कहा जा सकता है कि वे हिंदू धर्म की जातियों के समान हैं। जैसे जाति जन्म से तय होती है, वैसे ही कोई व्यक्ति जन्म से ही राउथर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम होता है। यह कहना बेतुका है कि किसी को राउथर मुस्लिम में बदला जा सकता है।”

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के इस सरकारी आदेश को संविधान और इस्लाम दोनों के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। बेंच ने साल 1951 के ‘जी माइकल बनाम एस वेंकटेश्वरन’ मामले का हवाला दिया, जिसमें साफ कहा गया था कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपनाता है, तो वह ‘सिर्फ एक मुसलमान’ बनता है और मुस्लिम समाज में उसका स्थान उसकी पिछली जाति से तय नहीं होता।

सिर्फ आरक्षण के लिए नहीं दे सकते लाभ
अदालत ने कहा, “ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक उपदेशकों ने दशकों और सदियों तक यह प्रचार किया कि उनके धर्मों में सामाजिक समानता है, जबकि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था है। धर्म-परिवर्तन के लिए ऐसा रुख अपनाने के बाद, अब यह दावा करना गलत है कि इस्लाम में भी ऊंच-नीच है। हमारी राय में, कुछ समुदायों को ‘पिछड़ा’ और बाकी को ‘अगड़ा’ मानना ​​कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है। इस्लाम एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें सब बराबर हों। अल्लाह की नजर में सब समान हैं। वहां कोई सामाजिक ऊंच-नीच नहीं है।” अदालत ने कहा कि राज्य सरकार सिर्फ इसलिए विभिन्न जातियों के कनवर्टेड मुस्लिमों का एक समूह बनाकर उन्हें आरक्षण नहीं दे सकती कि वे लाभ उठाते रहें।

सुवेंदु अधिकारी का नया कानून चर्चा में, गुंडई पर सख्त कार्रवाई का दावा; ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी कड़ा बताया

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार का दिन एक बड़े धमाके की तरह होगा. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी राज्य के 54 साल पुराने कानून में बदलाव करने जा रही है. एक ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ लाने जा रहे हैं, जो अपराधियों की रीढ़ तोड़ देगा. इस नए कानून को उत्तर प्रदेश के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी कई गुना अधिक घातक और सख्त माना जा रहा है. इसे लेकर पूरे बंगाल के गुंडा-बवालियों में अभी से मौत का खौफ है. जानते हैं पूरी कहानी। 

54 साल पुराने कानूनों की विदाई
बंगाल राज्य सरकार1972 में बने कानून The West Bengal Maintenance of Public Order Act, 1972 उसमें संशोधन करने जा रही है.  इसे 1972 में पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित किया गया था और उसी वर्ष राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून लागू हुआ था। 

इस कानून का संक्षिप्त इतिहास
1960 और 70 का दशक के दौर में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसक आंदोलन और कानून-व्यवस्था की भारी समस्याएं थीं. सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को बनाए रखने, उग्रवादी गतिविधियों को रोकने और अवैध हथियारों पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार को विशेष शक्तियों की जरूरत थी, जिसके लिए यह कानून 1972 में लाया गया था। 

 ‘पश्चिम बंगाल में नया कानून?
लेकिन अब बंगाल सरकार ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ को विधानसभा में पेश करने जा रही है. उसने दशकों पुराने ढर्रे को बदल दिया है. 1972 के कानून अब आधुनिक संगठित अपराध और दंगाई मानसिकता से लड़ने के लिए नाकाफी साबित हो रहे थे. सुवेंदु अधिकारी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब बंगाल में ‘कानून का राज’ होगा, न कि ‘सिंडिकेट का राज’. 54 सालों से चली आ रही ढील अब हमेशा के लिए खत्म होने वाली है। 

7 पीढ़ियों तक होगी वसूली, कोई नहीं बचेगा!
इस कानून का सबसे खौफनाक पहलू इसका ‘रिकवरी मैकेनिज्म’ है. यदि कोई दंगाई सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, तो उसकी भरपाई सिर्फ अपराधी से नहीं, बल्कि उसकी संपत्ति से होगी. कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इसके प्रावधान इतने कड़े हैं कि एक बार दंगा करने पर अपराधी की आने वाली सात पीढ़ियां हर्जाना भरते-भरते कंगाल हो जाएंगी. यह केवल दंड नहीं, बल्कि ‘आर्थिक खात्मा’ है, जो दंगाइयों को कानून हाथ में लेने से पहले सोचने पर मजबूर कर देगा। 

बुलडोजर मॉडल का भी ‘बाप’ है ये बिल
उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ के मॉडल ने देशभर में दंगाइयों के बीच खौफ पैदा किया था, लेकिन सुवेंदु अधिकारी का यह नया बिल उससे भी दो कदम आगे है. इसमें ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन’ (बिना मुकदमे हिरासत) और ‘एक्सटर्नमेंट’ (जिले से निष्कासन) जैसी शक्तियां पुलिस को असीमित अधिकार देती हैं. यह बिल दंगाइयों को पनाह देने वालों के खिलाफ भी ‘जीरो टॉलरेंस’ रखता है. किसी को पनाह देना भी अब दो साल की सीधी जेल का निमंत्रण होगा। 

विपक्ष की रूह क्यों कांप रही है?
जैसे ही इस बिल का ड्राफ्ट सामने आया, विपक्ष के गलियारों में सन्नाटा पसर गया है. जिन नेताओं को लगता था कि वे दंगों के जरिए अपनी राजनीति चमका लेंगे, उनकी रूह अब कांप रही है. वे जानते हैं कि यह कानून न केवल गुंडों को खत्म करेगा, बल्कि उन बड़े चेहरों को भी बेनकाब करेगा जो दंगों को स्पॉन्सर करते हैं. सुवेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि दंगा करना है, तो कीमत चुकाने के लिए तैयार रहो। 

शांति और सुरक्षा का नया युग
यह बिल बंगाल की बदलती तस्वीर का गवाह है. सरकार का कहना है कि यह कानून शरीफ नागरिकों की रक्षा के लिए एक ढाल है. जो बंगाल कल तक अराजकता की आग में जलता था. वह अब अपराधियों के लिए एक बड़ी जेल साबित होगा. सोमवार को जब यह कानून विधानसभा में बहस के लिए आएगा तो देखना यह होगा कि असल में क्या हुआ। 

RBI का नया नियम: किन लोगों को मिलेंगे ₹25,000? जानिए कौन उठा सकेगा इस सुविधा का लाभ

  नई दिल्‍ली

सोचिए एक दिन आपके फोन पर एक मैसेज आता है कि आपके 20,000 रुपये कट गए हैं, जबकि आपने कभी इसका पेमेंट नहीं किया था और ना ही कोई अप्रूवल दिया था. फिर तुरंत आप इसकी जांच करते हुए बैंक से बात करते हैं, बैंक भी ये बताने में असमर्थ होता है कि पैसे कैसे मिलेंगे। 

आपने शिकायत भी दर्ज करा दी कि आपके खाते से 20,000 रुपये का ऑनलाइन फ्रॉड हो चुका है, लेकिन सवाल हमेशा से रहेगा कि आपको पैसा वापस मिलेगा या नहीं? क्‍योंकि ज्‍यादातर ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में कस्‍टमर्स का पैसा रिकवर नहीं हो पाता है. हालांकि, अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सीधे तौर पर शामिल हो चुका है।  

RBI ने एक नया नियम निकाला है, जिसके तहत अगर आपके साथ ऑनलाइन फ्रॉड या UPI के जरिए स्‍कैम होता है तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया आपको मुआवजे का भुगतान करेगा. 24 जून 2026 को, आरबीआई ने नोटिफिकेशन जारी किया है।

किस तरह के फ्रॉड पर मिलेगा मुआवजा
ये नियम स्‍मॉल फाइनेंस बैंकों, पेमेंट बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और स्थानीय क्षेत्र बैंकों को छोड़कर सभी कमर्शियल बैंकों पर लागू होते हैं और 1 जनवरी, 2027 से उस तारीख को या उसके बाद किए गए किसी भी इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन के लिए प्रभावी होंगे। 

सरल शब्दों में कहें तो, इसमें आज आप जितने भी प्रकार के डिजिटल भुगतान करते हैं, वे सभी शामिल हैं, जैसे यूपीआई ट्रांसफर, नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान, चाहे वे कार्ड स्वाइप या टैप करके किए गए हों या कार्ड की जानकारी ऑनलाइन दर्ज करके किए गए हों. अगर आपने डिजिटल माध्यम से पैसे का लेन-देन किया है, तो इसे इस कैटेगरी में रखा जाएगा। 

कौन करेगा भुगतान? 
जब कोई धोखाधड़ी वाला लेनदेन होता है, तो नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है, आप, बैंक, या कोई और? RBI ने यह भी जानकारी दी है कि यह तय किस आधार पर किया जाएगा. आरबीआई का कहना है कि बैंक सिर्फ यह कहकर हट नहीं सकता कि फ्रॉड के दौरान कस्‍टमर्स लापरवाह थे, अब उन्‍हें साबित भी करना होगा। 

RBI ने रखा तीन कंडीशन
    अगर धोखाधड़ी बैंक की गलती के कारण हुई है, जैसे कि सुरक्षा में चूक, सिस्टम में गड़बड़ी, या बैंक द्वारा आपको धोखाधड़ी की सूचना न भेजना, तो नियम स्पष्ट है. बैंक को पूरे पैसे का भुगतान करना होगा, चाहे कस्‍टमर ने इसकी जानकारी दी हो या नहीं। 

    अगर धोखाधड़ी किसी तीसरे पक्ष, जैसे कि भुगतान ऐप, भुगतान गेटवे या दूरसंचार प्रदाता के कारण हुई है, न कि आपके या बैंक के कारण, तो भी आपको शून्य दायित्व और पूर्ण धनवापसी प्राप्त होगी, लेकिन केवल तभी जब कस्‍टमर धोखाधड़ी की घटना की तारीख से पांच कैलेंडर दिनों के भीतर बैंक को इसकी सूचना देता है. पांच दिन बाद रिपोर्ट करें, और आपकी देनदारी बैंक की अपनी आंतरिक नीति के अनुसार तय की जाएगी। 

    अगर धोखाधड़ी आपकी लापरवाही के कारण हुई है, जैसे कि आपने अपना ओटीपी साझा किया, अपने बैंक से मिली स्पष्ट धोखाधड़ी की चेतावनी को अनदेखा किया, या कोई संदिग्ध ऐप डाउनलोड किया, तो नियम अधिक जटिल हैं, और यहीं पर इस अधिसूचना का वास्तव में नया हिस्सा सामने आता है। 

आपकी गलती पर भी मिल सकती है रकम
नए नियमों के तहत, भले ही आप तकनीकी रूप से लापरवाह रहे हों, जैसे कि आपने किसी फ़िशिंग लिंक पर क्लिक किया हो या कोई ऐसा ओटीपी शेयर किया हो जो आपको नहीं करना चाहिए था, फिर भी आपको मुआवजा मिल सकता है, बशर्ते नुकसान कम हो और आपने तुरंत कार्रवाई की हो। 

कितना मिलेगा मुआवजा? 
नोटिफिकेशन में कहा गया है कि मुआवजे का भुगतान पूरे लाइफ में एक ही बार किसी एक व्‍यक्ति को किया जाएगा. यह भुगतान 25,000 रुपये या 85 फीसदी जो भी कम हो किया जाएगा. अगर मान लीजिए किसी व्‍यक्ति के साथ 50 हजार रुपये की धोखाधड़ी हुई है और कस्‍टमर ने शिकायत दर्ज कराई है, तो उसे अधिकतम 25,000 रुपये का ही मुआवजा दिया जाएगा. अगर उसके साथ दोबारा फ्रॉड होता है तो उसे कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। 

कौन कितना करेगा पेमेंट? 
छोटे धोखाधड़ी के मामलों में, खासकर 29,412 रुपये से कम के नुकसान वाले मामलों में, जहां मुआवजा नुकसान का 85 प्रतिशत होता है. घरेलू धोखाधड़ी के मामलों में, 65 प्रतिशत रिजर्व बैंक द्वारा, 10 प्रतिशत ग्राहक के बैंक द्वारा और बाकी 10 प्रतिशत लाभार्थी बैंक द्वारा वहन किया जाएगा. लाभार्थी बैंक, वह बैंक है जिसने सबसे पहले आपका चोरी हुआ पैसा प्राप्त किया था। 

29,412 रुपये और 50,000 रुपये के बीच के थोड़े बड़े नुकसान के लिए, जहां मुआवजे की अधिकतम सीमा 25,000 रुपये है, RBI, ग्राहक का बैंक और लाभार्थी बैंक क्रमशः 19118 रुपये, 2941 रुपये और 2941 रुपये का योगदान करेंगे। 

 

भारत-जापान शिखर सम्मेलन के लिए 1 जुलाई को भारत आएंगी जापान की प्रधानमंत्री, कई अहम समझौतों पर रहेगी नजर

नई दिल्ली
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर जापान की पीएम साने ताकाइची तीन दिवसीय दौरे पर भारत पहुंचेंगी. पीएम ताकाइची 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होंगी. यह उनका पहला भारत दौरा है. प्रधानमंत्री ताकाइची 1-3 जुलाई, 2026 तक नई दिल्ली के आधिकारिक दौरे पर रहेंगी. यह समिट दोनों पक्षों को द्विपक्षीय सहयोग के पूरे स्पेक्ट्रम की समीक्षा करने और मजबूत करने के साथ-साथ परस्पर हितों के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करने का अवसर देगा। 

यह प्रधानमंत्री ताकाइची का भारत का पहला आधिकारिक दौरा होगा. इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी अगस्त 2025 में जापान के दौरे पर पहुंचे थे, जहां वे 15वें भारत-जापान सालाना समिट में शामिल हुए. यह भारत-जापान विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को और बढ़ाने के लिए दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दिखाता है. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2025 में टोक्यो में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के साथ भारत-जापान आर्थिक मंच कार्यक्रम के दौरान शीर्ष उद्योग जगत के नेताओं को संबोधित करते हुए दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक साझेदारी पर प्रकाश डाला और द्विपक्षीय सहयोग को गहरा करने के लिए पांच-पॉइंट रोडमैप पेश किया। 

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा अभी भारत-जापान बिजनेस फोरम की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई. इसमें कंपनियों के बीच हुई बिजनेस डील का विस्तार से वर्णन दिया गया है. इस प्रगति के लिए मैं आप सभी का बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं. दो दिवसीय जापान दौरे पर पीएम मोदी ने प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष नुकागा फुकुशिरो और जापानी सांसदों के एक समूह के साथ एक बैठक की. इस दौरान भारत और जापान के बीच मजबूत और मैत्रीपूर्ण संबंधों पर चर्चा हुई. इसके अलावा, उन्होंने टोक्यो में जापान के 16 प्रांतों के राज्यपालों से मुलाकात की थी. प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने से संबंधित कई समझौते पर मुहर लगी। 

ताकाइची का पहला भारत दौरा

यह प्रधानमंत्री ताकाइची का भारत का पहला आधिकारिक दौरा होगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह दौरा अगस्त 2025 में 15वें भारत-जापान सालाना शिखर सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री मोदी के टोक्यो दौरे के बाद हो रहा है। यह दौरा भारत-जापान की विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को और बढ़ाने के लिए दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पीएम मोदी ने जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के साथ मियागी प्रांत के सेंडाई शहर का दौरा किया था. इस दौरान दोनों नेताओं ने सेमीकंडक्टर क्षेत्र की अग्रणी कंपनी टोक्यो इलेक्ट्रॉन मियागी लिमिटेड (टीईएल मियागी) का दौरा किया. कारखाने में उन्हें टीईएल की वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में भूमिका, उन्नत मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और भारत के साथ वर्तमान व भविष्य के सहयोग के बारे में जानकारी दी गई थी। 

इस दौरे से दोनों देशों के बीच सेमीकंडक्टर निर्माण, टेस्टिंग और सप्लाई चेन में सहयोग के अवसरों की व्यावहारिक समझ बनी. प्रधानमंत्री की इस यात्रा को भारत के उभरते सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और जापान की उन्नत तकनीक के बीच सामंजस्य के तौर पर रेखांकित किया गया। 

दोनों नेताओं ने इस क्षेत्र में सहयोग गहन करने, जापान-भारत सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन साझेदारी के लिए सहमति को आगे बढ़ाने और भारत-जापान औद्योगिक प्रतिस्पर्धा व आर्थिक सुरक्षा वार्ता को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई. इस दौरान मजबूत, लचीली और भरोसेमंद सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन विकसित करने के साझा लक्ष्य पर भी जोर दिया गया। 

ऑपरेशन सिंदूर के 6 शहीदों के नाम पहली बार सार्वजनिक, वॉर मेमोरियल पर किया गया अंकित

 नई दिल्ली

भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हुए छह जवान अब औपचारिक रूप से देश के सामने आए हैं. सरकार ने पहली बार इन शहीदों के नाम सार्वजनिक किए हैं. इन नामों को नेशनल वॉर मेमोरियल की वेबसाइट पर रोल ऑफ ऑनर में शामिल किया गया है. युद्ध स्मारक की वॉल 3डी पर 2025 सेक्शन में अंकित किया गया है। 

यह पहली बार है जब सरकार ने मई 2025 में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ चलाए गए क्रॉस-बॉर्डर ऑपरेशन सिंदूर में हुई मौतों की आधिकारिक पुष्टि की है. इससे पहले सरकार ने इन शहीदों की पहचान सार्वजनिक नहीं की थी, हालांकि मीडिया और सोशल मीडिया पर कई रिपोर्ट्स और अटकलें चल रही थीं। 

मई 2025 में भारत ने पाकिस्तान और PoK में आतंकवादी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाते हुए एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान चलाया था. इसे ऑपरेशन सिंदूर नाम दिया गया. यह चार दिनों तक चला. इसका मकसद सीमा पार से आने वाले आतंकवाद को कुचलना और भारत की सुरक्षा को मजबूत करना था. इस दौरान भारतीय सेना, वायुसेना और अन्य बलों ने संयुक्त रूप से कार्रवाई की। 

अब तक सरकार ने ऑपरेशन के दौरान हुई सैन्य क्षति के बारे में विस्तार से नहीं बताया था. लेकिन राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर इन छह नामों को शामिल करना सरकार की ओर से पहली आधिकारिक स्वीकृति मानी जा रही है कि ऑपरेशन में भारतीय बलों को नुकसान हुआ था। 

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर अंकित छह शहीद सैनिकों और एयर वारियर्स के नाम इस प्रकार हैं…

    सूबेदार मेजर पवन कुमार – हेडक्वार्टर 10 इन्फैंट्री ब्रिगेड  
    राइफलमैन सुनील कुमार, वीर चक्र – 4 जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री  
    लांस नायक दिनेश कुमार – 5 फील्ड रेजिमेंट  
    एविएशन टेक्नीशियन मूड मुरलीनायक – 851 लाइट रेजिमेंट  
    हवलदार सुनील कुमार सिंह – 237 फील्ड वर्कशॉप कंपनी  
    सार्जेंट सुरेंद्र कुमार, वायु मेडल – 39 विंग

इनमें दो सैनिकों को वीरता के लिए सम्मानित किया गया था – राइफलमैन सुनील कुमार को वीर चक्र और सार्जेंट सुरेंद्र कुमार को वायु मेडल मिला था। 

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का महत्व
राष्ट्रीय युद्ध स्मारक इंडिया गेट के पास है. यहां देश के सभी शहीद सैनिकों के नाम दीवारों पर अमर कर दिए जाते हैं. हर साल नए शहीदों के नाम संबंधित वर्ष के सेक्शन में जोड़े जाते हैं. इन छह नामों को 2025 सेक्शन में शामिल किया गया है। 

रोल ऑफ ऑनर में नाम दर्ज होना सिर्फ औपचारिकता नहीं है. यह देश के लिए इन वीरों के सर्वोच्च बलिदान को मान्यता देने का तरीका है. परिवारों, साथी सैनिकों और पूरे देश के लिए यह भावनात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है. अब इन शहीदों को आधिकारिक रूप से फॉलेन हीरोज कहा जा रहा है। 

सरकार की चुप्पी और अब खुलासा
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कई दिनों तक दोनों तरफ से तनाव रहा. भारत ने आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करने का दावा किया, जबकि पाकिस्तान ने भी कुछ दावे किए. लेकिन भारत सरकार ने शुरुआत से ही सैन्य हताहतों की संख्या या नामों पर चुप्पी साध रखी थी. सुरक्षा कारणों और रणनीतिक वजहों से यह गोपनीयता बरती गई थी। 

अब नाम जारी करने को विशेषज्ञ सकारात्मक कदम मान रहे हैं. इससे परिवारों को न्याय मिला है. देश के लोग अपने शहीदों को सलाम कर सकते हैं. ये छह जवान देश की रक्षा करते हुए अपनी जान न्योछावर कर गए. सूबेदार मेजर पवन कुमार जैसे अनुभवी जवान ब्रिगेड की अगुवाई करते थे। 

राइफलमैन सुनील कुमार जैसे युवा सिपाही सीमा पर तैनात थे. एविएशन टेक्नीशियन और सार्जेंट जैसे एयर वारियर्स ने हवाई समर्थन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हर शहीद के परिवार में अब दर्द है, लेकिन गर्व भी है. पूरे देश को इन वीरों पर गर्व है. इनके बलिदान ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय सशस्त्र बल आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर अडिग हैं। 

केतन अग्रवाल हत्याकांड: फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलेगा केस, पीड़ित परिवार से मिले CM फडणवीस

मुंबई 

महाराष्ट्र के लोनावला ग्रामीण इलाके में केतन अग्रवाल की हत्या के मामले में उनके पिता विशाल अग्रवाल ने पुणे में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर बेटे के लिए न्याय की मांग की है. मुख्यमंत्री ने दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने का भरोसा दिया और मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने के साथ-साथ सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम को विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने की मांग भी तत्काल स्वीकार कर ली। 

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ऑफिस से किए गए सोशल मीडिया पोस्ट में कहा गया, “लोनावला के ग्रामीण इलाके में केतन अग्रवाल की दुखद हत्या के मामले में केतन अग्रवाल के पिता विशाल अग्रवाल ने आज पुणे में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की और अपने बेटे के लिए न्याय की मांग की. हम यह पक्का करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि इस मामले में दोषियों को सबसे कड़ी सज़ा मिले. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उन्हें भरोसा दिलाया कि परिवार को न्याय दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। 

पोस्ट में आगे कहा गया है कि इस मामले में फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने और उज्ज्वल निकम को स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करने की उनकी मांग को भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तुरंत मान लिया और कानून एवं न्याय विभाग के सचिव को इस बारे में निर्देश जारी किए. सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने भी इस मामले में स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर काम करने के लिए अपनी सहमति दे दी है। 

सिया के भाई साहिल को अफेयर के बारे में सब पता था

लोहागढ़ किले से रियल एस्टेट कारोबारी केतन अग्रवाल मर्डर के मामले में जांच लगातार नए मोड़ ले रही है. अब इस हाई-प्रोफाइल केस में पुलिस की नजर सिया गोयल के भाई साहिल गोयल पर भी टिक गई है. पुलिस ने साहिल को पूछताछ के लिए तलब किया है. सूत्रों के मुताबिक, उसे अपनी बहन सिया गोयल और चेतन चौधरी के अफेयर की पहले से जानकारी थी. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि  उसने यह बात परिवार या किसी अन्य व्यक्ति से क्यों नहीं बताई। 

पुलिस अधिकारियों का मानना है कि साहिल का बयान इस पूरे घटनाक्रम की कई अहम कड़ियों को जोड़ सकता है. फिलहाल उससे विस्तृत पूछताछ की जा रही है और उसके बयान को केस डायरी का हिस्सा बनाया जा रहा है. जांच टीम यह भी जानने की कोशिश कर रही है कि परिवार के भीतर सिया की मानसिक स्थिति, उसके रिश्तों और शादी को लेकर क्या चर्चाएं होती थीं। 

 भाई के बयान से खुल सकती हैं कई परतें

सूत्रों के अनुसार, पुलिस के पास ऐसे कुछ इनपुट हैं जिनसे संकेत मिलता है कि साहिल को सिया और चेतन की दोस्ती या संपर्क के बारे में जानकारी थी. हालांकि, अभी तक पुलिस की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि क्या परिवार के किसी अन्य सदस्य को भी इन दोनों के संपर्क की जानकारी थी या नहीं. यदि किसी को पहले से जानकारी थी तो उसने इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया, यह भी जांच का हिस्सा है। 

पूछताछ में सामने आई हत्या की कथित पूरी साजिश
इस बीच पुलिस जांच में एक बड़ा खुलासा सामने आया है. जांच अधिकारियों के अनुसार, आरोपी सिया गोयल और उसके कथित प्रेमी चेतन चौधरी ने पूछताछ के दौरान हत्या की पूरी योजना का क्रमवार विवरण बताया है. पुलिस के मुताबिक, 18 जून को लोहागढ़ किले पर पहुंचने से पहले दोनों ने पूरी योजना तैयार कर ली थी. तय हुआ था कि सिया एक निश्चित स्थान पर बैठकर पहले से तय इशारा करेगी. जैसे ही संकेत मिलेगा, चेतन पीछे से आकर केतन अग्रवाल को अचानक गहरी खाई में धक्का देगा. अधिकारियों का कहना है कि घटना ठीक उसी योजना के अनुसार हुई. केतन को अंतिम क्षण तक किसी तरह का संदेह नहीं हुआ और इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, उसे खाई में धक्का दे दिया गया। 

शुरुआत में दोनों ने बचने की कोशिश की
जांच अधिकारी के मुताबिक, शुरुआती पूछताछ में दोनों आरोपी लगातार एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे. चेतन चौधरी ने पहले दावा किया कि वह किले पर तो मौजूद था, लेकिन घटना वाले स्थान तक नहीं गया था. उसने यह भी कहा कि उसे नहीं पता कि आखिर वहां क्या हुआ. हालांकि पुलिस को उसके बयान पर भरोसा नहीं हुआ. तकनीकी साक्ष्यों, घटनास्थल से मिले तथ्यों और लगातार पूछताछ के बाद दोनों के बयान बदलने लगे. इसके बाद दोनों ने कथित रूप से अपराध स्वीकार करते हुए पूरी योजना पुलिस के सामने रखी 

भागकर शादी नहीं, हत्या का रास्ता क्यों चुना ?
पूछताछ के दौरान पुलिस ने दोनों आरोपियों से यह सवाल भी किया कि यदि वे एक-दूसरे से प्रेम करते थे तो भागकर शादी क्यों नहीं कर ली. पुलिस के अनुसार, दोनों का जवाब था कि यदि वे घर से भाग जाते तो दोनों परिवारों की सामाजिक बदनामी होती. इसी वजह से उन्होंने कथित तौर पर केतन को रास्ते से हटाने की योजना बनाई. यह जवाब जांच अधिकारियों के लिए भी चौंकाने वाला माना जा रहा है क्योंकि पुलिस का मानना है कि यदि यह कथन सही है तो हत्या की साजिश पहले से सोची-समझी थी. पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि 18 जून की घटना पहली कोशिश नहीं थी. अधिकारियों के अनुसार, इससे पहले भी आरोपी केतन अग्रवाल को दो बार लोहागढ़ किले पर लेकर गए थे. जांच के मुताबिक, दोनों मौकों पर कथित योजना किसी कारण सफल नहीं हो सकी. इसके बाद तीसरी बार मौका देखकर वारदात को अंजाम दिया गया. पुलिस इन दावों की पुष्टि के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, मोबाइल लोकेशन और अन्य तकनीकी जानकारियों का विश्लेषण कर रही है। 

नवंबर में होनी थी शाही शादी
केतन अग्रवाल और सिया गोयल की सगाई हो चुकी थी. दोनों की शादी इसी वर्ष नवंबर में राजस्थान के उदयपुर स्थित एक महल में प्रस्तावित थी. दोनों परिवार विवाह की तैयारियों में जुटे थे और कार्यक्रम को लेकर उत्साह था. पुलिस के अनुसार, जांच में यह बात सामने आई है कि सिया कथित रूप से इस शादी से खुश नहीं थी. हालांकि परिवार का दावा है कि उसने कभी इस तरह की कोई बात उनके सामने नहीं रखी। 

पिता ने बेटी के लिए भी मांगी कठोर सजा
सिया के पिता प्रवीण गोयल मीडिया के सामने आए. उन्होंने कहा कि यदि इस अपराध में उनकी बेटी दोषी साबित होती है तो उसे भी उतनी ही कठोर सजा मिलनी चाहिए जितनी किसी अन्य आरोपी को मिलेगी. उन्होंने कहा कि केतन उनके लिए बेटे जैसा था और उसकी मौत ने दोनों परिवारों को पूरी तरह तोड़ दिया है. उन्होंने यह भी कहा कि परिवार शादी की तैयारियों में व्यस्त था और किसी ने भी कभी ऐसी घटना की कल्पना नहीं की थी. सिया की मां पूजा गोयल ने भी पूरे मामले पर अपना पक्ष रखा. उनके अनुसार, सिया और चेतन की पहचान एक क्रिकेट मैच के दौरान हुई थी. परिवार को सिर्फ इतनी जानकारी थी कि दोनों एक-दूसरे को जानते हैं. उन्होंने कहा कि शादी तय करने से पहले कई बार सिया से पूछा गया था कि क्या वह केतन अग्रवाल से शादी करना चाहती है. हर बार उसने सकारात्मक जवाब दिया और यह भी कहा कि उसका किसी अन्य युवक से कोई संबंध नहीं है. पूजा गोयल का कहना है कि परिवार को कभी ऐसा संकेत नहीं मिला जिससे यह लगे कि बेटी किसी मानसिक दबाव में है या शादी नहीं करना चाहती। 

परिवार ने रिश्ते की पूरी कहानी बताई
प्रवीण गोयल ने बताया कि सबसे पहले गोवा में एक पारिवारिक समारोह के दौरान रिश्ते की चर्चा हुई थी. उस समय उन्होंने बेटी की कम उम्र का हवाला देते हुए जल्दबाजी से इनकार किया था. बाद में कर्जत में आयोजित एक अन्य पारिवारिक कार्यक्रम के दौरान अग्रवाल परिवार की ओर से दोबारा प्रस्ताव आया. रिश्तेदारों ने दोनों परिवारों को उपयुक्त बताते हुए इस रिश्ते पर आगे बढ़ने की सलाह दी. इसके बाद दोनों परिवारों की सहमति से विवाह तय हुआ. प्रवीण गोयल ने यह भी कहा कि उन्होंने चेतन चौधरी को कभी देखा तक नहीं था और न ही उससे कोई बातचीत हुई थी. उनके मुताबिक, उन्हें बेटी और चेतन के कथित संबंधों की कोई जानकारी नहीं थी। 

 

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