इंदौर में पेयजल संकट पर कांग्रेस का विशाल धरना प्रदर्शन, भाजपा सरकार पर साधा निशाना

जीतू पटवारी बोले — मंत्री, विधायक और सांसद होने के बावजूद जनता बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान, कांग्रेस ने दी बड़े आंदोलन की चेतावनी

भोपाल, 26 मई 2026।
इंदौर शहर में लगातार गहराते पेयजल संकट और आम जनता को हो रही भारी परेशानियों के विरोध में आज इंदौर जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा विशाल धरना प्रदर्शन आयोजित किया गया। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने प्रदेश की भाजपा सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन करते हुए शहरवासियों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराने की मांग उठाई।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने धरना प्रदर्शन को संबोधित करते हुए कहा कि इंदौर में भाजपा के दो कैबिनेट मंत्री, नौ विधायक, एक सांसद और महापौर होने के बावजूद जनता को पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार केवल प्रचार और आयोजनों में व्यस्त है, जबकि आम नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान है।

उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार जल संकट जैसी मूलभूत समस्या के समाधान में पूरी तरह विफल साबित हुई है और कांग्रेस जनता के अधिकारों एवं मूलभूत सुविधाओं के लिए लगातार संघर्ष करती रहेगी।

धरना प्रदर्शन में पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा, बाला बच्चन, आईसीसी सचिव सत्यनारायण पटेल, इंदौर शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे, इंदौर ग्रामीण कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष विपिन वानखेड़े, महिला कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रीना बौरासी सहित बड़ी संख्या में वरिष्ठ नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

कांग्रेस नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि इंदौर की जनता को शीघ्र नियमित पेयजल उपलब्ध नहीं कराया गया, तो आने वाले समय में कांग्रेस और बड़ा जनआंदोलन करेगी

नंदीग्राम में TMC की बढ़ी मुश्किलें, ममता बनर्जी को नहीं मिल रहा उम्मीदवार!

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं हैं। अब खबर है कि पार्टी को नंदीग्राम में होने वाले उप चुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। फिलहाल, सीट पर उप चुनाव का भी ऐलान नहीं हुआ है। अटकलें हैं कि टीएमसी नेता यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के साथ नंदीग्राम से भी चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी, लेकिन अंत में उन्होंने यह सीट छोड़ने का फैसला किया। खास बात है कि अधिकारी 2021 में भी तत्कालीन सीएम ममता बनर्जी को नंदीग्राम से हरा चुके हैं।

2 नेता कर चुके मना
पूर्वी मिदनापुर जिले की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर उप चुनाव की तारीख का ऐलान कभी भी हो सकता है। अब अटकलों का दौर शुरू हो गया है कि यहां टीएमसी ने उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि यहां से टीएमसी को उम्मीदवार खोजने में मुश्किल हो रही है। साथ ही दो नेताओं ने तो यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। 2026 विधानसभा चुनाव में भी अधिकारी ने भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी को हराया है।

नंदीग्राम से लड़ने नेता मना क्यों कर रहे
अधिकारी के कभी करीबी रहे पवित्र कर भी नंदीग्राम से नहीं लड़ना चाहते। खास बात है कि शुभेंदु ने उन्हें ही इस सीट से हराया है। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, वह कहते हैं, ‘कुछ लोग मुझसे बात करने आए थे, लेकिन मैं दोबारा नंदीग्राम से नहीं लड़ सकता। इसका सवाल ही पैदा नहीं होता है।’ चुनाव से कुछ समय पहले ही कर भारतीय जनता पार्टी छोड़ टीएमसी में गए थे।

2021 में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी के इलेक्शन एजेंट रहे शेख सूफियान भी यहां से चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘मैंने 2006 में नंदीग्राम का चुनाव लड़ा था। उसके बाद टीएमसी में से किसी ने भी मुझसे चुनाव लड़ने के लिए नहीं कहा। मुझे अब चुनावों में दिलचस्पी नहीं है। मैं मेरे परिवार की सलाह मानकर राजनीति से रिटायर हो रहा हूं।’

टीएमसी का क्या है प्लान
रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘उम्मीदवार का चुनाव ममता बनर्जी करेंगी और इस पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी। चुनावों का ऐलान होने दीजिए।’

फलता जैसा लक्ष्य रखा
मुख्यमंत्री बनने के बाद नंदीग्राम के अपने पहले दौरे पर अधिकारी ने अपने समर्थकों को आश्वस्त किया कि सीट खाली करने के बावजूद उनका अपने राजनीतिक गढ़ से जुड़ाव पूरी तरह मजबूत बना हुआ है। उन्होंने अभिनंदन रैली को संबोधित करते हुए अपने समर्थकों से पूछा कि क्या वे नंदीग्राम में भी फाल्टा जैसी जीत का अंतर दोहरा सकते हैं, जहां भाजपा ने एक लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की है।

RJD को बड़ा झटका, रितु जायसवाल ने थामा BJP का दामन; संजय सरावगी ने दिलाई सदस्यता

पटना
 आरजेडी की पूर्व महिला नेता रितु जायसवाल अब भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई हैं. बीजेपी प्रदेश संजय सरावगी ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई. इस मौके पर मंत्री दिलीप जायसवाल भी मौजूद रहे. बता दें कि जायसवाल ने BJP का दामन थामने की औपचारिक घोषणा 24 मई को की थी. आरजेडी छोड़कर रितु जयसवाल के साथ कई अन्य नेता भी बीजेपी में शामिल हुए। इनमें प्रोफेसर राजमणि, सीमा जायसवाल, माया गुप्ता, शकुंतला प्रजापति, संगीता यादव, सुलेखा खातून, पानो देवी, अनिल महतो और शिवशंकर शामिल हैं। 

बीजेपी में शामिल होने के बाद ऋतु जयसवाल ने कहा कि आज वह पूरी मजबूती और आत्मविश्वास के साथ पार्टी में शामिल हो रही हैं. उन्होंने कहा कि उनके पुराने वीडियो सामने लाकर उन्हें ट्रोल किया जा सकता है, लेकिन वह डरने वाली नहीं हैं.उन्होंने कहा कि जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया था, तब उन्हें बागी कहा गया था। इसके बावजूद उन्होंने करीब 65 हजार वोट हासिल किए थे। 

रितु जायसवाल ने कहा कि बीजेपी राष्ट्रहित की राजनीति करती है और देश से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि वे राष्ट्रहित और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की बात करते हैं। 

RJD से क्यों बढ़ी दूरियां?
मुखिया दीदी’ के नाम से पहचान बनाने वाली रितु जायसवाल पहले आरजेडी की महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष रह चुकी हैं. उन्होंने 2020 विधानसभा चुनाव में परिहार सीट से चुनाव लड़ा था और बहुत कम अंतर से हार गई थीं. लेकिन बाद में आरजेडी ने उनका टिकट काट दिया था. पार्टी ने उनकी जगह दूसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारा, जिससे नाराज होकर रितु जायसवाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया था. उन्हें 60 हजार से ज्यादा वोट मिले थे और आरजेडी उम्मीदवार तीसरे स्थान पर पहुंच गया था. इसके बाद आरजेडी ने उन्हें 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था। 

मुखिया के तौर पर बनाई पहचान
रितु जायसवाल का राजनीतिक सफर काफी खास माना जाता है. मुंबई से सीतामढ़ी आकर उन्होंने सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया के रूप में काम किया और अपने काम की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. पढ़ी-लिखी और सक्रिय महिला नेता के रूप में उनकी अच्छी छवि रही है। 

वैश्य समाज पर पकड़
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि
बीजेपी उन्हें अपने साथ जोड़कर वैश्य समाज और महिला वोटरों के बीच पकड़ मजबूत करना चाहती है. सीतामढ़ी, शिवहर और आसपास के इलाकों में युवाओं और महिलाओं के बीच उनकी अच्छी लोकप्रियता मानी जाती है. बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी भी मिल सकती है। 

MP राज्यसभा चुनाव में BJP का ‘सवर्ण कार्ड’, भदौरिया और कांतदेव सबसे आगे

भोपाल 

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार बीजेपी रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी इस बार ‘सवर्ण’ चेहरे पर दांव लगाने की तैयारी में है। बीजेपी अपनी दो सुरक्षित सीटों के साथ कांग्रेस के कब्जे वाली तीसरी सीट पर भी नजर रखे हुए है। पार्टी तीसरी सीट जीतकर दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) को ‘गिफ्ट’ देना चाहती है। इसके लिए बीजेपी कांग्रेस से आए किसी नेता को चेहरा बना सकती है। पार्टी की नजर उन विधायकों पर भी है जो कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकते हैं।

पहली सीट का गणित

सामान्य वर्ग को मौका देने की वजह
मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनका कार्यकाल 26 जून 2026 को समाप्त होगा। इनमें दो सीटें बीजेपी (डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन) और एक सीट कांग्रेस (दिग्विजय सिंह) के पास है। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, पिछले चुनावों में पार्टी ने दलित, ओबीसी और महिला कार्ड खेलकर सामाजिक संतुलन साधा था।

इस बार समीकरण बदल रहे हैं। पार्टी अब ठाकुर या ब्राह्मण कोटे से किसी कद्दावर चेहरे को राज्यसभा भेजना चाहती है। इसी कड़ी में अरविंद भदौरिया और कांतदेव सिंह के नाम चर्चा में हैं। दोनों नेता आरएसएस के करीबी माने जाते हैं और संगठन में गहरी पकड़ रखते हैं।

1. कांतदेव सिंह (प्रदेश उपाध्यक्ष): विंध्य क्षेत्र से आने वाले कांतदेव सिंह की जमीनी पकड़ मजबूत मानी जाती है। यदि बीजेपी किसी क्षत्रिय चेहरे को चुनती है तो वे सबसे प्रबल दावेदार हैं। वे प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के करीबी हैं। उज्जैन संभाग के प्रभारी रहने के साथ सिंगरौली निकाय चुनाव में भी उनकी अहम भूमिका रही है।

2. अरविंद भदौरिया: पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया का नाम भी इस रेस में बना हुआ है। संगठन और सरकार में काम करने का उनका लंबा अनुभव पार्टी के काम आ सकता है। 2020 में मप्र में हुए सत्ता परिवर्तन में अरविंद भदौरिया की अहम भूमिका थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे।

तत्कालीन कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई थी। 22 विधायकों को बैंगलुरू के एक रिसॉर्ट में रखा गया था। विधायकों को अलग-अलग जगहों से बैंगलुरू ले जाने और वहां रुकवाने की जिम्मेदारी अरविंद भदौरिया के पास थी। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सरकार में भदौरिया को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। हालांकि, वे 2023 का विधानसभा चुनाव हार गए थे।

एससी-एसटी वर्ग को एडस्ट किया जा सकता है
सवर्ण कार्ड की चर्चा के बीच बीजेपी अन्य वर्गों को भी नजरअंदाज नहीं कर रही है।
एससी वर्ग: चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी को देखते हुए लाल सिंह आर्य का नाम चर्चा में है।

एसटी वर्ग: बेहतर प्रदर्शन के आधार पर डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी को दोबारा मौका मिल सकता है। मालवा के आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए रंजना बघेल का नाम भी चर्चा में है।

जॉर्ज कुरियन: भरोसेमंद चेहरा फिर हो सकता है रिपीट

केंद्रीय राज्यमंत्री जॉर्ज कुरियन को बीजेपी दोबारा राज्यसभा भेज सकती है। 1980 से पार्टी से जुड़े कुरियन उन वफादार नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने जनसंघ के दौर से पार्टी का झंडा थामे रखा है। वे फिलहाल मत्स्य पालन, पशुपालन और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

तीसरी सीट के राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए राज्यसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न को समझना जरूरी है।
न गुप्त मतदान, न ही ईवीएम का इस्तेमाल

राज्यसभा चुनाव में न गुप्त मतदान होता है और न ही ईवीएम का इस्तेमाल होता है। राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों के नाम के आगे एक से चार तक नंबर लिखा होता है। इसमें विधायकों को वरीयता के आधार पर उस पर चिह्न लगाना होता है। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए जरूरी वोटों की संख्या पहले से तय होती है।

यह संख्या कुल विधायक और राज्यसभा सीटों के आधार पर तय होती है। इसमें एक विधायक के वोट की वैल्यू 100 होती है।
कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है

राज्यसभा चुनाव में एक फॉर्मूला इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है। इसके बाद राज्यसभा सीटों की संख्या में एक जोड़कर भाग दिया जाता है। फिर कुल संख्या में एक जोड़ा जाता है। अंत में जो संख्या निकलती है, वही जीत के लिए जरूरी होती है।

कांग्रेस के पास संख्या बल, लेकिन क्रॉस वोटिंग का डर
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट कांग्रेस के खाते में मानी जा रही है। हालांकि, बीजेपी इस सीट पर भी उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। कांग्रेस को आशंका है कि कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं या मतदान से अनुपस्थित रह सकते हैं। इससे तीसरी सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है।

    दतिया से विधायक राजेंद्र भारती का चुनाव रद्द होने के बाद यह सीट फिलहाल खाली है।
    विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता समाप्त करने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है। हालांकि, वे राज्यसभा चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे।

    बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे हाल के दिनों में बीजेपी के कार्यक्रमों में नजर आई हैं। हालांकि, उन्होंने अब तक इस्तीफा नहीं दिया है। कांग्रेस उनसे संपर्क बनाए हुए है, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी भूमिका को लेकर असमंजस है।

    अटेर से कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे बजट सत्र में उप नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उन्होंने इसके पीछे पारिवारिक कारण बताए थे।

    टिमरनी से कांग्रेस विधायक अभिजीत शाह हाल ही में आरएसएस से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया।

    सुसनेर से कांग्रेस विधायक भैंरो सिंह परिहार ने हाल ही में कहा था कि उनका संघ से वैचारिक जुड़ाव है।

    कांग्रेस को आशंका है कि बीजेपी हाल ही में पार्टी छोड़कर आए किसी नेता को उम्मीदवार बना सकती है। संभावित नामों में सुरेश पचौरी की चर्चा सबसे ज्यादा है। माना जाता है कि उनके दोनों दलों के नेताओं से अच्छे संबंध हैं।

कमलनाथ हो सकते हैं उम्मीदवार
कांग्रेस आलाकमान विधायकों को एकजुट रखने के लिए कमलनाथ को मैदान में उतार सकती है। केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि इससे सीट सुरक्षित रहेगी। पीसीसी चीफ जीतू पटवारी, पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव, पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन के नाम भी चर्चा में हैं।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया है कि बीजेपी उनके विधायकों को तोड़ने के लिए पुराने मामलों को हथियार बना रही है।

एक्सपर्ट बोले- कांग्रेस में एकजुटता मुश्किल
वरिष्ठ पत्रकार एन के सिंह के मुताबिक, तीसरी सीट को लेकर बीजेपी से ज्यादा चुनौती कांग्रेस के सामने है। कमलनाथ का नाम इसलिए सामने आया है ताकि विधायकों को एकजुट किया जा सके, लेकिन यह मुश्किल काम है। कांग्रेस में गुटबाजी का रोग 50 साल पुराना है।

2018 के चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह ने पंगत में संगत कार्यक्रम चलाया था। उसे छोड़ दें तो कांग्रेस में हर समय गुटबाजी हावी रही है। दूसरी तरफ बीजेपी सेंधमारी में उस्ताद मानी जाती है। बीजेपी ऐसे मौके तलाशती रहती है।

भवानीपुर से ज्यादा TMC को क्यों डरा रहा फलता का नतीजा? बंगाल की राजनीति में नए संकेत

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल में फलता विधानसभा सीट पर हुए पुनर्मतदान के नतीजों ने पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार देबांशू पांडा ने इस सीट पर 1.09 लाख से भी ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की है. यह जीत सिर्फ भाजपा की मजबूती को नहीं दिखाती, बल्कि 15 साल सत्ता में बैठी रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक ऐसा बड़ा झटका है जिसने पार्टी के भीतर एक गंभीर संकट का इशारा कर दिया है. जहां टीएमसी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई. ये प्रत्याशी कोई और नहीं, टीएमसी संगठन में सबसे पावरफुल अभिषेक बनर्जी के राइट हैंड मैन कहे जाने वाले जहांगीर खान थे. जिन्होंने आखिरी वक्त मुकाबले से खुद को अलग कर लिया, और अपना वोट भी नहीं डाला। 

ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि टीएमसी के लिए ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर की हार ज्यादा गंभीर थी, या फलता का नतीजा? भवानीपुर में होने वाले किसी भी राजनैतिक उतार-चढ़ाव को लोग अक्सर ममता बनर्जी के पर्सनल जादू और शहर के वोटर्स के मिजाज से जोड़कर देखते हैं, जहां हार-जीत का अंतर कभी-कभी पार्टी की ढिलाई की वजह से बदल सकता है. लेकिन फलता की हार तृणमूल कांग्रेस की उस ‘ग्रासरूट मशीनरी’ यानी जमीनी संगठन की नाकामी को सामने लाती है, जिसके दम पर पार्टी पिछले कई सालों से बंगाल पर राज कर रही है. यह हार इसलिए भी ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि फलता सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के ‘नंबर दो’ और ममता के उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र ‘डायमंड हार्बर’ का एक मुख्य हिस्सा है। 

इस क्षेत्र के पुराने इतिहास को देखें तो दक्षिण 24 परगना जिला हमेशा से टीएमसी का सबसे मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है. इस जिले ने हमेशा तृणमूल कांग्रेस का बढ़-चढ़कर साथ दिया है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में, जब अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर सीट से रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की थी, तब इसी फलता विधानसभा क्षेत्र ने उन्हें अकेले 1.68 लाख वोटों की बड़ी लीड दी थी. उस चुनाव में अभिषेक बनर्जी का वोट शेयर फलता में लगभग 89% था, यानी  एकतरफा मुकाबला. लेकिन, सिर्फ दो साल के भीतर तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर सिर्फ 3.7% पर आ जाना और पार्टी उम्मीदवार का चौथे नंबर पर खिसककर अपनी जमानत तक गंवा देना, किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए बहुत बड़ी नाकामी है. फलता सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि यह वह इंडस्ट्रियल और ग्रामीण इलाका है जहां टीएमसी का बूथ मैनेजमेंट सबसे अचूक माना जाता था. इस सीट पर मिली करारी हार यह साफ करती है कि पार्टी का वह जमीनी ढांचा, जो कभी हर वोटर के घर तक पकड़ रखता था, अब पूरी तरह से बिखर चुका है। 

अभिषेक का ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ ध्वस्त
यह हार सीधे तौर पर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की राजनैतिक साख और उनकी लीडरशिप पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है. अभिषेक बनर्जी लगातार खुद को पार्टी के मॉडर्नाइजेशन और पार्टी ऑर्गेनाइजेशन में खुद को नए के लीडर के रूप में पेश करते रहे हैं. उन्होंने बार-बार ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की तारीफ की है. एक ऐसा मॉडल जिसे वे अच्छे गवर्नेंस, तुरंत एक्शन और अचूक चुनावी रणनीति का प्रतीक बताते थे. चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में, 2 मई को अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय नेतृत्व और भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि भाजपा को उनके डायमंड हार्बर मॉडल में एक मामूली खरोंच लगाने के लिए भी 10 जन्म लेने होंगे, और अगर हिम्मत है तो दिल्ली से अपने नेताओं को बुलाकर फलता में मुकाबला करके दिखाएं. इस तरह की आक्रामक चुनौती के बाद जब नतीजे पूरी तरह उल्टे आते हैं, तो राजनैतिक नुकसान सिर्फ एक सीट का नहीं होता, बल्कि नेता की साख पूरी तरह प्रभावित हो जाती है। 

शुभेंदु अधिकारी ने इस नतीजे के तुरंत बाद तंज कसते हुए कहा कि कुख्यात ‘डायमंड हार्बर’ मॉडल अब तृणमूल के ‘हार-बार’ मॉडल में बदल चुका है. फलता की हार ने यह साबित कर दिया है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की 35 कंपनियों की तैनाती और कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के बीच, जब सरकारी मशीनरी का अनुकूल सहयोग मुमकिन नहीं हो पाता, तब संगठन की असली परीक्षा होती है. यह नतीजा अभिषेक बनर्जी के उस दावे को कमजोर करता है कि उनका संगठन बिना किसी अतिरिक्त मदद के भी अजेय है। 

अंतर्कलह का अंत नहीं
इसके साथ ही, फलता के नतीजे टीएमसी के भीतर पिछले काफी समय से चल रहे ‘पुराने वफादार बनाम नए कॉर्पोरेट-शैली के रणनीतिकार’ के अंदरूनी संघर्ष को और ज्यादा तेज करेंगे. ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से संघर्ष करने, सड़क पर उतरकर आंदोलन करने और जमीनी स्तर के पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने पर टिकी रही है. इसके उलट, अभिषेक बनर्जी पर उन्हीं की पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उनका मॉडल कॉर्पोरेट इलेक्शन मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और पारंपरिक नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को आगे बढ़ाने की वकालत करता है. फलता की इस ऐतिहासिक पराजय से पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के पुराने खेमे को अभिषेक के खिलाफ मुंह खोलने का एक और मौका मिल गया है. पार्टी के भीतर यह आवाजें उठने लगी हैं कि संगठन के फैसलों से पुराने और जमीनी नेताओं को साइडलाइन करने का नतीजा ही फलता में देखने को मिला है। 

ममता की चुनौती अभिषेक को बचाना
चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटने की घोषणा करना यह इशारा करता है कि लोकल लीडरशिप और शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिकारों के बीच गहरा अविश्वास था. ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है. एक तरफ उन्हें अपने घोषित उत्तराधिकारी की साख को बचाना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के बिखरते जा रहे कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं की नाराजगी को दूर करना है. भवानीपुर की जीत या हार ममता के अपने कंट्रोल में होती है, लेकिन फलता का बिखरना यह दिखाता है कि पार्टी पर उनकी पकड़ के बावजूद ऑर्गेनाइजेशन पर कंट्रोल कमजोर हो रहा है। 

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू मतगणना के दिन तृणमूल की गैरमौजूदगी रही. टीएमसी जैसी मजबूत पार्टी का मतगणना केंद्रों पर अपने काउंटिंग एजेंट तक तैनात न कर पाना कार्यकर्ताओं के मनोबल के पूरी तरह टूटने का सबूत है. हालांकि अभिषेक बनर्जी ने हार के बाद इलेक्शन कमीशन पर गड़बड़ी का आरोप लगाया और दावा किया कि टीएमसी कार्यकर्ताओं को परेशान किया गया. कार्यकर्ताओं के बीच संदेश यह गया है कि अगर लीडरशिप उनके अपने ही सबसे सुरक्षित गढ़ में उनकी सुरक्षा और राजनैतिक अस्तित्व पक्का नहीं कर सकती, तो आने वाले बड़े चुनावों में वे पूरी तरह असुरक्षित हैं. जब एक मजबूत किले में पार्टी का वोट शेयर 89% से गिरकर सिर्फ 3.7% हो जाता है, तो कार्यकर्ता इसे सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि नेतृत्व का सरेंडर मानते हैं. इससे दक्षिण 24 परगना सहित दूसरे जिलों में भी नीचे के स्तर के कार्यकर्ताओं में निष्क्रियता या पार्टी छोड़ने (दलबदल) की प्रवृत्ति बढ़ने की प्रबल आशंका है। 

लेफ्ट और कांग्रेस का उभार
फलता के नतीजों ने पश्चिम बंगाल की विपक्षी राजनीति के समीकरण को भी पूरी तरह से बदल दिया है. इस उपचुनाव में माकपा (सीपीआई-एम) का दूसरे स्थान पर आना और कांग्रेस का तीसरे स्थान पर रहना टीएमसी के कोर वोट बैंक में सेंधमारी का साफ संकेत है. टीएमसी की सत्ता मुस्लिम और ग्रामीण वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण पर टिकी रही. लेकिन, लेफ्ट और कांग्रेस का उभार यह दिखाता है कि सत्ता विरोधी (एंटी-इंकंबेंसी) मत अब केवल भाजपा तक सीमित नहीं हैं. बल्कि वे एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प की ओर भी मुड़ रहे हैं. यह टीएमसी के लिए एक बड़ा रणनीतिक खतरा है. दूसरी ओर, भाजपा के लिए फलता की यह जीत एक संजीवनी बूटी की तरह है, जिसने उनके कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंक दिया है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस जीत को ‘डराने-धमकाने पर लोकतंत्र की विजय’ बताया है, जो यह दिखाता है कि भाजपा इस बेहद लोकल नतीजे का उपयोग राज्य स्तर पर टीएमसी के खिलाफ एक बड़े हथियार के रूप में करने जा रही है। 

आखिर में, भवानीपुर की हार या जीत केवल ममता बनर्जी के प्रभाव तक सीमित होती है, लेकिन फलता की हार टीएमसी की जमीनी मशीनरी की ‘फेलियर’ यानी ऑर्गेनाइजेशन की नाकामी का सबूत बन जाती है. यह नतीजा साबित करता है कि पार्टी का अंदरुनी सिस्टम भीतर से कमजोर हो रहा है और बीजेपी के कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के सामने टिकने में नाकाम है. यह हार एक बड़ी चेतावनी है कि राजनीति में सिर्फ आक्रामक बयानबाजी नहीं, बल्कि जमीनी वफादारी और संगठन में तालमेल ही पार्टी की साख को बचाए रखता है। 

मंत्री श्री विश्वास सारंग ने 23 करोड़ से अधिक के विकास कार्यों का किया भूमिपूजन

वार्ड 78 के विश्वकर्मा नगर में सीवेज परियोजना से 35 हजार से अधिक नागरिकों को मिलेगा लाभ

सहकारिता, खेल और युवा कल्याण मंत्री,”विश्वास कैलाश सारंग”,”मध्य प्रदेश के मंत्री” ने नरेला विधानसभा अंतर्गत वार्ड 78 स्थित विश्वकर्मा नगर में 23 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से होने वाली सीवेज परियोजना एवं अन्य विकास कार्यों का भूमिपूजन किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी, जनप्रतिनिधि एवं भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

मंत्री श्री सारंग ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री,”नरेंद्र मोदी”,”भारत के प्रधानमंत्री”के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री,”मोहन यादव”,”मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री” के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में विकास और जनकल्याण के नए आयाम स्थापित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल विकास कार्य करना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के जीवन को अधिक सुगम और सुविधाजनक बनाना है।

उन्होंने बताया कि इस सीवेज परियोजना के पूर्ण होने से क्षेत्र में स्वच्छता व्यवस्था मजबूत होगी, जलभराव और गंदगी जैसी समस्याओं से राहत मिलेगी तथा नागरिकों को स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण प्राप्त होगा।

42 किलोमीटर लंबा बनेगा सीवर नेटवर्क

परियोजना के अंतर्गत लगभग 13 करोड़ रुपये की लागत से 42 किलोमीटर लंबा सीवर नेटवर्क तैयार किया जाएगा। वहीं, लगभग 9 करोड़ रुपये की लागत से 8079 हाउस सीवर कनेक्शन प्रदान किए जाएंगे। इस परियोजना से लगभग 35,306 नागरिकों को प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा।

परियोजना के पूरा होने के बाद क्षेत्रवासियों को आधुनिक सीवेज व्यवस्था, बेहतर स्वच्छता और सुगम नागरिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी। इससे क्षेत्र के समग्र विकास को नई दिशा मिलेगी और नागरिकों का जनजीवन अधिक सुविधाजनक बनेगा।

क्षेत्रवासियों ने किया भव्य स्वागत

कार्यक्रम के दौरान क्षेत्रवासियों ने मंत्री श्री विश्वास सारंग का पुष्पवर्षा एवं माल्यार्पण कर स्वागत किया। साथ ही, करोड़ों रुपये की लागत से होने वाले विकास कार्यों के लिए आभार भी व्यक्त किया।

समाज का मूल आधार है सहकारिता : मंत्री विश्वास कैलाश सारंग

हस्तशिल्प से आजीविका संवर्धन संगोष्ठी में कढ़ाई एवं जूट शिल्प टूलकिट वितरित, कॉमन फैसिलिटी सेंटर और Coopcraft पोर्टल का शुभारंभ

भोपाल। सहकारिता मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने कहा कि समाज का मूल आधार सहकारिता है और सहयोग, समन्वय व सहभागिता के बिना किसी भी कार्य में सफलता संभव नहीं है। वे मध्यप्रदेश राज्य सहकारी संघ में आयोजित “हस्तशिल्प से आजीविका संवर्धन” विषयक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।

मंत्री श्री सारंग ने कहा कि राज्य सहकारी संघ द्वारा संचालित योजनाओं के माध्यम से युवाओं और महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण और टूलकिट के माध्यम से हस्तशिल्प कार्यों को गति मिलेगी, जिससे परिवारों की आय में वृद्धि होगी और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।

कार्यक्रम में विकास आयुक्त (हस्तशिल्प), वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित सीएचसीडीएस योजना के अंतर्गत निर्मित कॉमन फैसिलिटी सेंटर (CFC) का लोकार्पण भी किया गया। प्रारंभिक चरण में यह सुविधा केंद्र इंदौर, भोपाल और नौगांव में स्थापित किए गए हैं।

मंत्री श्री सारंग ने कार्यक्रम में प्रतीक स्वरूप छह महिला प्रतिभागियों — किरण राजपूत, नीलम यादव, आशा मेहरा, कविता रजक, सोनी यादव और महिमा यादव — को कढ़ाई एवं जूट शिल्प टूलकिट वितरित किए।

इस अवसर पर “सहकारिता के नवयुग का शंखनाद” पुस्तिका का विमोचन भी किया गया, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025 के दौरान मध्यप्रदेश में हुए कार्यों और गतिविधियों का संकलन प्रस्तुत किया गया है। साथ ही “Coopcraft” वाणिज्यिक पोर्टल का शुभारंभ भी किया गया।

कार्यक्रम को सहकारिता आयुक्त मनोज पुष्प ने भी संबोधित किया। शुरुआत में राज्य सहकारी संघ के प्रबंध संचालक ऋतुराज रंजन ने स्वागत भाषण दिया। कार्यक्रम में हस्तशिल्प के उप संचालक वैभव यशवंत मोहारे और अपेक्स बैंक के प्रबंध संचालक मनोज गुप्ता सहित अनेक अधिकारी एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे।

100 करोड़ की लागत से तेजी से आकार ले रहा श्री खेड़ापति हनुमान लोक कॉरिडोर

मंत्री विश्वास सारंग ने किया निरीक्षण, कहा – आस्था, संस्कृति और विकास का बनेगा नया प्रतीक

राजधानी भोपाल के प्राचीन और प्रसिद्ध श्रद्धा केंद्र श्री खेड़ापति हनुमान मंदिर परिसर में लगभग 100 करोड़ रुपए की लागत से निर्माणाधीन “श्री खेड़ापति हनुमान लोक कॉरिडोर” तेजी से आकार ले रहा है। सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने सोमवार को निर्माण कार्यों का निरीक्षण कर अधिकारियों को तय समय सीमा में उच्च गुणवत्ता के साथ कार्य पूर्ण करने के निर्देश दिए।

मंत्री श्री सारंग ने कहा कि छोला स्थित श्री खेड़ापति हनुमान मंदिर भोपाल की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है। सदियों पुरानी इस आस्था को भव्य स्वरूप देने के उद्देश्य से “विरासत भी और विकास भी” की भावना के साथ हनुमान लोक कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है।

करीब 21 एकड़ क्षेत्र में बनने वाले इस भव्य कॉरिडोर को महाकाल लोक की तर्ज पर आधुनिक सुविधाओं से विकसित किया जाएगा। परियोजना में श्रद्धालुओं के लिए सुगम दर्शन व्यवस्था, आकर्षक कॉरिडोर, दर्शक दीर्घा, पार्किंग, सार्वजनिक आयोजनों के लिए आधुनिक अधोसंरचना और सौंदर्यीकरण कार्य शामिल हैं।

मंत्री श्री सारंग ने बताया कि मंदिर परिसर का विकास प्राचीन नागर शैली की वास्तुकला के अनुरूप किया जा रहा है, जिसमें राजस्थान के व्हाइट मार्बल का उपयोग होगा। साथ ही सुंदरकांड की झलक प्रस्तुत करने वाला आध्यात्मिक और भव्य कॉरिडोर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनेगा।

दशहरा मैदान में भी आधुनिक सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। यहां विशाल मंच, दर्शक दीर्घा, रावण दहन स्थल और सार्वजनिक आयोजनों के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं तैयार की जाएंगी। परिसर के चारों ओर 15 मीटर चौड़ी कांक्रीट सड़क भी बनाई जा रही है, जिससे यातायात और आवागमन सुगम होगा।

परियोजना के तहत दर्शक दीर्घा के नीचे 100 से अधिक दुकानों का निर्माण प्रस्तावित है, जिससे स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।

निरीक्षण के दौरान मंत्री श्री सारंग ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि निर्माण कार्यों के दौरान श्रद्धालुओं, स्थानीय रहवासियों और व्यापारियों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाए तथा कार्यों की गुणवत्ता से किसी प्रकार का समझौता न हो। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में “श्री खेड़ापति हनुमान लोक कॉरिडोर” भोपाल की नई पहचान बनकर उभरेगा।

कोयंबटूर की दर्दनाक घटना ने झकझोरा देश, संवेदनशीलता पर उठे सवाल

मासूम बच्ची के साथ हुई दरिंदगी के बाद वायरल प्रेस कॉन्फ्रेंस वीडियो पर जनता नाराज़, समाज में जागरूकता और जिम्मेदारी की जरूरत

तमिलनाडु के के सुलुर क्षेत्र में एक 10 वर्षीय बच्ची के साथ हुई दर्दनाक घटना ने पूरे देश को भावुक और आक्रोशित कर दिया है। इस घटना ने न सिर्फ कानून व्यवस्था बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

घटना के बाद पुलिस प्रशासन द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें कुछ अधिकारी बातचीत के दौरान मुस्कुराते नजर आए। वीडियो सामने आने के बाद लोगों ने इसे गंभीर मामले के प्रति असंवेदनशील रवैया बताते हुए नाराज़गी जताई।

हालांकि प्रशासन का कहना है कि मामले में तेजी से कार्रवाई की गई है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की भाषा, व्यवहार और प्रस्तुति कितनी महत्वपूर्ण होती है।

समाज के लिए क्या है संदेश?

यह घटना केवल एक अपराध की खबर नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी भी है। बच्चों की सुरक्षा केवल कानून या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर परिवार, स्कूल और नागरिक का कर्तव्य है।

  • बच्चों को “गुड टच” और “बैड टच” की जानकारी देना जरूरी है।
  • माता-पिता को बच्चों के व्यवहार और मानसिक स्थिति पर लगातार ध्यान देना चाहिए।
  • स्कूलों और समाज में सुरक्षा और जागरूकता को लेकर नियमित अभियान चलाए जाने चाहिए।
  • सोशल मीडिया पर संवेदनशील मुद्दों पर जिम्मेदारी और मर्यादा बनाए रखना भी बेहद जरूरी है।

संवेदनशीलता ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी

ऐसी घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि किसी भी पीड़ित की पहचान और सम्मान की रक्षा करना समाज और मीडिया दोनों की जिम्मेदारी है। जागरूकता फैलाना जरूरी है, लेकिन मानवता और संवेदनशीलता उससे भी ज्यादा जरूरी है।

यह समय केवल गुस्सा जाहिर करने का नहीं, बल्कि बच्चों के लिए सुरक्षित और जागरूक समाज बनाने की दिशा में मिलकर काम करने का है।

में तेज रफ्तार कार का कहर, बाइक सवार दंपति को मारी जोरदार टक्कर

हरमाड़ा थाना क्षेत्र में सड़क पार करते समय हुआ हादसा, सीसीटीवी में कैद हुई पूरी घटना; कार चालक मौके से फरार

के हरमाड़ा थाना क्षेत्र में तेज रफ्तार का एक और खतरनाक मामला सामने आया है। लोहा मंडी के पास सड़क पार कर रहे बाइक सवार दंपति को एक तेज रफ्तार कार ने जोरदार टक्कर मार दी। हादसा इतना भीषण था कि बाइक सवार पुष्पेंद्र सिंह और उनकी पत्नी वंदना कंवर करीब 20 फीट दूर जाकर गिरे।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, बाइक सवार बिना पूरी तरह ट्रैफिक देखे जल्दबाजी में सड़क पार कर रहे थे। इसी दौरान तेज गति से आ रही कार ने उन्हें टक्कर मार दी। टक्कर के बाद दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसे में दोनों को कई फ्रैक्चर और गंभीर चोटें आई हैं, जिन्हें इलाज के लिए निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों के अनुसार दोनों की हालत गंभीर बनी हुई है।

पूरी घटना पास लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई। वीडियो में कार की तेज रफ्तार साफ दिखाई दे रही है। हादसे के तुरंत बाद कार चालक मौके से फरार हो गया। पुलिस ने मामला दर्ज कर आसपास के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी चालक की तलाश शुरू कर दी है।

पुलिस का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और जल्द ही फरार चालक को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

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