केरल चुनाव: SIR की वजह से कांग्रेस को मिली जीत, शशि थरूर ने किया अलग दावा

तिरुवनंतपुरम

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केरल चुनाव के नतीजों को लेकर एक ऐसा दावा कर दिया है, जिससे सियासी भूचाल आ सकता है। शशि थरूर ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा है कि उनका मानना है कि केरल में कांग्रेस SIR की वजह से जीत गई। थरूर यहां SIR की आलोचना कर रहे थे लेकिन उन्होंने दावा किया कि SIR यानी मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन ने केरल में कांग्रेस की जीत में अहम रोल निभाया है।

स्टैनफोर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस में एक राउंडटेबल चर्चा के दौरान शशि थरूर ने केरल के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों पर भी बात की। थरूर ने दावा किया कि बंगाल में वोटर लिस्ट से करीब 91 लाख नाम हटा दिए गए थे जिनमें से कई लाख वैध वोटर्स हैं। उन्होंने कहा, “SIR के मामले में, मैंने जो कहा है वह एक जायज सवाल है। बंगाल को देखें तो यहां 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। उनमें से 34 लाख लोगों ने अपील की है और उन्हें वोट देने का पूरा अधिकार है।”

शशि थरूर ने कहा, “नियमों के मुताबिक हर मामले का अलग-अलग निपटारा होना जरूरी था, इसलिए वोटिंग से पहले सिर्फ कुछ सौ मामलों का ही निपटारा हो पाया। आज भी लगभग 31-32 लाख लोग ऐसे हैं जो शायद आने वाले सालों में वैध वोटर पाए जाएंगे, लेकिन वे वोट देने का मौका गवां चुके हैं।” थरूर ने कहा कि भाजपा ने बंगाल चुनाव 30 लाख वोटों के अंतर से जीता है, जो कि पेंडिंग अपीलों के बराबर है। उन्होंने पूछा, “ऐसे में क्या यह पूरी तरह से निष्पक्ष और लोकतांत्रिक है?”

केरल में कांग्रेस की जीत पर भी बोले
शशि थरूर ने आगे स्वीकार किया कि SIR प्रक्रिया से केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF को भी फायदा हुआ है। थरूर के मुताबिक, केरल में वामपंथी दल (CPM) ‘डबल और ट्रिपल एनरोलमेंट’ (एक ही व्यक्ति का कई जगह नाम) के मास्टर रहे हैं और इन डुप्लीकेट नामों को हटाने से वोटर लिस्ट साफ हो गई, जिससे कांग्रेस को फायदा मिला। उन्होंने कहा, “केरल में मुझे लगता है कि कांग्रेस को नाम हटाने से फायदा हुआ, क्योंकि CPM लंबे समय से डबल एनरोलमेंट, ट्रिपल एनरोलमेंट, मल्टी एनरोलमेंट, यानी एक ही व्यक्ति का चार अलग-अलग बूथों पर नाम होना, जैसी चीजों में माहिर थी। ऐसा पहले होता था। SIR ने ऐसे नामों को हटा दिया।

हालांकि उन्होंने कहा कि बंगाल की तरह केरल में तमिलनाडु में इतनी अपीलें नहीं की गईं जितनी बंगाल में। उन्होंने कहा, “आपने देखा कि केरल और तमिलनाडु में, बहुत कम अपीलें की गईं। लेकिन बंगाल में, इसमें कोई शक नहीं कि 34 लाख अपीलें की गईं। और ये 34 लाख फॉर्म 34 लाख अलग-अलग लोगों ने भरे थे। उनमें से, सिर्फ कुछ सौ अपीलों पर ही सुनवाई हुई है।

गौरतलब है कि हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनावों के नतीजे सामने आए हैं। पश्चिम बंगाल और केरल दोनों में ही सत्ता परिवर्तन देखने को मिला। जहां पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 294 में से 207 सीटें जीत कर राज्य में पहली बार सरकार बनाई। वहीं केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने 140 में से 102 सीटें जीत कर वामपंथियों का किला ढहा दिया।

करारी हार के बाद ममता बनर्जी को झटका, कांग्रेस और लेफ्ट ने BJP के खिलाफ गठबंधन से किया इनकार

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद सत्ता गंवाने वालीं ममता बनर्जी ने भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एकता का आह्वान किया था। लेकिन अब उनके इस आह्वान को कांग्रेस और वाम दलों ने सिरे से खारिज कर दिया है। सीपीआई (एम) ने साफ किया है कि वह किसी भी ऐसी पार्टी के साथ मंच साझा नहीं करेंगे, जो कि अपराध, जबरन वसूली और भ्रष्ट हों। वहीं कांग्रेस ने ममता बनर्जी द्वारा अति-वामपंथियों के साथ जाने वाली बात पर निशाना साधा है।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस प्रवक्ता सौम्य आइच राय ने ममता बनर्जी के विपक्षी एकता के आह्वान पर सबसे पहले प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “हमें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा है। आपने (ममता बनर्जी ने) राष्ट्रीय दलों को, कांग्रेस और वाम और अति-वामपंथियों को एक साथ शामिल होने का निमंत्रण दिया है। अति वामपंथियों से आपका क्या तात्पर्य है? क्या आपका मतलब माओवादियों से है, जिन्होंने 25 मई, 2013 को छत्तीसगढ़ में 18 कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी?”

सीपीआई (एल) का भी इनकार
कांग्रेस के बाद सीपीआई (एल) के सचिव मोहम्मद सलीम बनर्जी ने ममता बनर्जी के प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “ममता बनर्जी के साथ हम बिलकुल नहीं जाएंगे। हम ऐसी किसी भी अपराधी, जबरन वसूली करने वाली भ्रष्ट और सांप्रदायिक व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे। हम जनता और हाशिए पर खड़े लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे।”

आपको बता दें, अपनी पूरी राजनीति कांग्रेस और वामपंथियों के विरोध पर खड़ी करने वाली ममता बनर्जी ने इसी दम पर बंगाल में 15 साल तक शासन चलाया है। लेकिन विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद टीएमसी प्रमुख ने इन सभी दलों को भाजपा के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान दे दिया।

ममता ने किया था एकता का आह्वान
शनिवार को बंगाल में सुभेंदु अधिकारी की सत्ता आने के बाद ममता बनर्जी ने वीडियो संदेश जारी करके विपक्षी एकता का आह्वान किया था। उन्होंने कहा, “मैं बंगाल के सभी विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और गैर सरकारी संगठनों से भाजपा के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह करती हूं। भाजपा का विरोध करने वाले सभी राजनीतिक दलों के साथ एक संयुक्त मंच बनाया जा सकता है।”

उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ, मैं वामपंथियों और अति-वामपंथियों से भी बंगाल और दिल्ली में एकजुट होने का आग्रह करती हूं। अगर कोई राजनीतिक दल मुझसे बात करना चाहता है, तो मैं उपलब्ध हूं। यह याद रखना चाहिए कि हमारा पहला दुश्मन भाजपा है।”

पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा विपक्षी एकता का यह आह्वान राज्य की सच्चाई को प्रदर्शित करता है। पिछले एक दशक में भाजपा के उदय ने ममता बनर्जी को उन्हीं वाम दलों से सहयोग मांगने के लिए मजबूर कर दिया, जिनका तीन दशक पुराना ढहाकर उन्होंने सत्ता हासिल की थी। भले ही ममता ऊपरी स्तर पर इस विपक्षी एकता के सपने देख रही हैं, लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है। क्योंकि न तो कांग्रेस और न ही वाम दल ममता सरकार से खुश नजर आए थे। पश्चिम बंगाल में निचले स्तर पर वाम दलों के कार्यकर्ताओं और टीएमसी के कार्यकर्ताओं का खूनी संघर्ष अभी भी लोगों को याद है। ऐसे में भले ही ममता बनर्जी भाजपा के हिंदुत्व कार्ड का जवाब देने के लिए तृणमूल और लाल झंडे को एक साथ लाने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है, क्योंकि वह ममता ही थीं, जिन्होंने बंगाल से वामपंथ को उखाड़ फेंका था। विधानसभा चुनाव में वामपंथ ज्यादातर सीटों पर अपनी जमानत भी नहीं बचा पाया है।

बंगाल की पहली बीजेपी सरकार के शपथ में भावनाएं, सम्मान और राजनीतिक संदेश

 नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 90 साल के एक बीजेपी सदस्य के पैर छूना फिर ब्रिगेड ग्राउंड में उमड़ी भीड़ के सामने आभार जताते हुए घुटनों के बल बैठ जाना, मंच के बैकग्राउंड में देवी दुर्गा की तस्वीर और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी का गेरुआ (भगवा) कुर्ता पहने होना… पश्चिम बंगाल में बीजेपी की पहली सरकार का शपथ ग्रहण समारोह कई तरह के प्रतीकों से भरा हुआ था।

अगर बंगाल विधानसभा चुनावों ने इतिहास रचा तो बीजेपी ने अपनी पहली सरकार के शपथ ग्रहण के मौके पर इस इतिहास को बनाने में योगदान देने वाले हर पहलू को खास तौर पर सम्मान दिया।

भावनात्मक पहलू
इस पल का भावनात्मक महत्व साफ झलक रहा था। शपथ लेने के बाद सीएम सुवेंदु ने पीएम मोदी के सामने सिर झुकाया और कुछ देर तक उसी झुकी हुई मुद्रा में रहे, जबकि पीएम ने एक हाथ से उनके जुड़े हुए हाथों को थाम लिया और दूसरे हाथ से मुस्कुराते हुए उनकी पीठ थपथपाई।

फिर भीड़ के शोर के बीच उन्होंने सुवेंदु को कसकर गले लगा लिया। सुवेंदु ने गणमान्य व्यक्तियों की कतार के बीच गृह मंत्री अमित शाह के प्रति भी ऐसा ही सम्मान दिखाया।
सुवेंदु पर शाह का भरोसा

2020 में शाह की मौजूदगी में टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के बाद से गृह मंत्री ने ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ बीजेपी के जमीनी विरोध का नेतृत्व करने के लिए सुवेंदु का पूरा समर्थन किया। यह एक ऐसा भरोसा था जिसका फल मिला। लेकिन यह ऐतिहासिक अवसर उन पुराने और अनुभवी नेताओं की लंबी मेहनत को स्वीकार करने का भी एक मौका था।

दिलीप घोष को मौका
आरएसएस के पूर्व प्रचारक और बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष और जिन्हें नए नेताओं के उभरने के दौर में कभी-कभी उपेक्षित महसूस हुआ था सुवेंदु के बाद शपथ लेने वाले पहले मंत्री बने। यह उनके दशकों लंबे भगवा विचारधारा के प्रति समर्पण का एक सम्मान था।

राजनीतिक हिंसा में मारे गए बीजेपी सदस्यों के परिवार से मुलाकात
पीएम मोदी ने बीजेपी के कुछ ऐसे सदस्यों के परिवार वालों से भी मुलाकात की, जिनकी कथित तौर पर पिछले कुछ दशकों में हुई राजनीतिक हिंसा में जान चली गई। बीजेपी ने जिन पांच मंत्रियों को चुना उससे यह साबित होता है कि चुनावों में पार्टी को अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय वर्गों का समर्थन मिला है।

जहां सुवेंदु ब्राह्मण हैं, वहीं घोष ओबीसी हैं; जबकि अशोक कीर्तनिया, खुदीराम टुडू और निशित प्रमाणिक मतुआ, आदिवासी और राजबंशी समुदायों से आते हैं। एकमात्र महिला सदस्य अग्निमित्रा पॉल, कायस्थ समुदाय से हैं।

मुस्लिम समुदाय को जगह नहीं
चूंकि बीजेपी का कोई भी विधायक मुस्लिम नहीं है और राज्य में कोई विधान परिषद भी नहीं है, इसलिए सरकार में किसी मुस्लिम को जगह मिलने की संभावना बहुत कम नजर आती है। यह शायद पहला ऐसा मौका होगा जब बंगाल की किसी सरकार में मुस्लिम समुदाय को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा।

टीएमसी ने बीजेपी पर यह आरोप लगाया था कि वे बाहरी लोग हैं और उन्हें बंगाली संस्कृति की कोई परवाह नहीं है। इन आरोपों का जवाब देने के लिए बीजेपी ने खास तौर पर इस कार्यक्रम का आयोजन टैगोर की जयंती के अवसर पर किया और मंच पर इस महान बंगाली विद्वान की तस्वीर भी लगाई गई थी।

ममता बनर्जी का बड़ा यू-टर्न: भाजपा को रोकने के लिए वाम दलों से गठबंधन के संकेत

नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल में कभी वामपंथ की सबसे बड़ी विरोधी मानी जाने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सुर अब विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद बदलते नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ने भाजपा को रोकने के इराने से विपक्षी दलों से साथ आने की अपील की है। ममता ने संकेत दिए हैं कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उन्हें वामदलों और यहां तक कि धुर-वामपंथियों से भी परहेज नहीं है। उनका यह बयान न केवल बंगाल बल्कि देश की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा कर रहा है। जिस ममता बनर्जी ने तीन दशक पुराने वामपंथी किले को ढहाया था, आज वही उनके साथ मंच साझा करने की बात कह रही हैं।

ममता बनर्जी की राजनीति की नींव ही वामपंथ के विरोध पर टिकी थी। 1970 और 80 के दशक में जब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा अभेद्य माना जाता था, तब ममता बनर्जी एक आक्रामक युवा नेता के रूप में उभरीं।

सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से बनाई पहचान
साल 2006-2008 के दौरान सिंगूर में टाटा नैनो प्लांट के खिलाफ भूमि अधिग्रहण आंदोलन और नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग की घटनाओं ने ममता बनर्जी को बंगाल की जनमानस का मसीहा बना दिया। उन्होंने ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा दिया, जिसने वामपंथ के उस सर्वहारा वर्ग को अपनी ओर खींच लिया जो कभी माकपा (CPIM) का आधार था।

साल 2011 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने वह कर दिखाया जो असंभव माना जाता था। उन्होंने 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका। बुद्धदेव भट्टाचार्य की हार और राइटर्स बिल्डिंग से लाल झंडे का हटना भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक थी। उस समय ममता ने कसम खाई थी कि वह बंगाल से वामपंथ का नामोनिशान मिटा देंगी।

आज की मजबूरी या रणनीति?
पिछले एक दशक में बंगाल की राजनीतिक जमीन पूरी तरह बदल चुकी है। वामदल हाशिए पर चले गए हैं और भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है। ममता बनर्जी अब महसूस कर रही हैं कि मतों का बिखराव अंततः भाजपा को फायदा पहुंचाता है। हालिया बयानों में ममता ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय स्तर पर और विशेष रूप से बंगाल में भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए विपक्ष की एकता अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि देश को बचाना है और धर्मनिरपेक्षता को कायम रखना है तो सभी गैर-भाजपाई ताकतों को एक साथ आना होगा। इसमें उन्होंने विशेष रूप से ‘वाम’ और ‘घोर वामपंथी’ विचारधारा वाले समूहों का नाम लेकर सबको चौंका दिया है।

जमीनी कार्यकर्ताओं का टकराव
बंगाल के गांवों में आज भी टीएमसी और वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच खूनी संघर्ष का इतिहास रहा है। क्या शीर्ष नेतृत्व के हाथ मिलाने से जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता एक-दूसरे को स्वीकार करेंगे? वामदलों के लिए ममता बनर्जी आज भी उनकी सत्ता छीनने वाली नेता हैं। माकपा के कई नेता ममता पर ही भाजपा को बंगाल में जगह देने का आरोप लगाते रहे हैं। धुर-वामपंथी समूह अक्सर संसदीय राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं या बेहद कट्टर रुख अपनाते हैं। ममता का उन्हें साथ आने का न्योता देना यह दर्शाता है कि वह भाजपा के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।

ममता बनर्जी का यह हृदय परिवर्तन राजनीति की उस कड़वी सच्चाई को दर्शाता है जहां “दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।” 2011 में जिस वामपंथ को उन्होंने अपना सबसे बड़ा शत्रु माना था, 2026 की दहलीज पर खड़े बंगाल में वह उसे एक संभावित सहयोगी के रूप में देख रही हैं। भाजपा के ‘हिंदुत्व कार्ड’ की बढ़ती स्वीकार्यता ममता बनर्जी अब एक व्यापक छतरी तैयार करना चाहती हैं। यदि यह गठबंधन आकार लेता है तो यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी गठबंधनों में से एक होगा। जहां ‘तृणमूल’ और ‘लाल सितारा’ एक ही झंडे के नीचे भाजपा को चुनौती देते नजर आएंगे।

 

थलापति विजय से 9 गुना ज्यादा अमीर निकलीं तमिलनाडु की यह विधायक, लॉटरी किंग की पत्नी होने से चर्चा में

तमिलनाडु  
तमिलनाडु की राजनीति में इस वक्त एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। वजह चुनावी जीत नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की दौलत है। AIADMK की विधायक लीमा रोज मार्टिन को राज्य का सबसे अमीर विधायक बताया गया है। उनकी घोषित कुल संपत्ति इतनी ज्यादा है कि बड़े-बड़े उद्योगपति भी पीछे छूट जाएं। ADR यानी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के मुताबिक, लीमा रोज मार्टिन ने चुनावी हलफनामे में करीब 5,863 करोड़ रुपये की नेटवर्थ घोषित की है। वह तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले की ललगुड़ी सीट से AIADMK के टिकट पर चुनाव जीतकर पहली बार विधायक बनी हैं।

लीमा रोज ने इस चुनाव में करीब 60 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए और अपने प्रतिद्वंद्वी को 2739 वोटों से हराया। दिलचस्प बात यह है कि यह उनका पहला चुनाव था और पहली ही बार में वह राज्य की सबसे चर्चित नेताओं में शामिल हो गईं।

कौन हैं लीमा रोज मार्टिन?
लीमा रोज तमिलनाडु के कोयंबटूर की रहने वाली हैं। उनके पति सैंटियागो मार्टिन देशभर में “लॉटरी किंग” के नाम से मशहूर हैं। परिवार की संपत्ति का बड़ा हिस्सा उनके कारोबारी साम्राज्य से जुड़ा हुआ बताया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, लीमा रोज की घोषित संपत्ति अभिनेता विजय से भी करीब 9 गुना ज्यादा है। विजय की पार्टी TVK ने इस चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन संपत्ति के मामले में लीमा रोज उनसे काफी आगे निकल गईं। विजय ने अपनी कुल संपत्ति करीब 648 करोड़ रुपये बताई है।
 
परिवार के पास कितनी संपत्ति?
हलफनामे के मुताबिक, लीमा रोज के नाम पर करीब 139 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और लगभग 910 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति है। वहीं, उनके पति सैंटियागो मार्टिन ने 3262 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 887 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति घोषित की है। उनके बेटे जोस डेसन मार्टिन के पास भी सैकड़ों करोड़ की संपत्ति है। बेटे ने करीब 225 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 439 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति घोषित की है।

सोना, चांदी और हीरे का बड़ा कलेक्शन
लीमा रोज के पास भारी मात्रा में सोना, चांदी और हीरे भी हैं। हलफनामे के अनुसार, उनके पास 19 हजार ग्राम से ज्यादा सोना, 1.31 लाख ग्राम से ज्यादा चांदी और 1217 कैरेट हीरे हैं। इसके अलावा प्लैटिनम भी घोषित किया गया है। परिवार के पास लग्जरी गाड़ियों का भी बड़ा बेड़ा है। लीमा रोज ने अपने नाम पर 10 गाड़ियां बताई हैं, जबकि उनके पति के पास BMW, Lexus जैसी महंगी गाड़ियों समेत कई वाहन हैं।

सिर्फ छठी पास हैं लीमा रोज
सबसे दिलचस्प बात यह है कि करोड़ों-अरबों की मालकिन लीमा रोज की शैक्षणिक योग्यता सिर्फ छठी पास बताई गई है। चुनावी हलफनामे में उन्होंने अपनी शिक्षा Class 6 तक बताई है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों ने इस बार राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाया है। अभिनेता विजय की पार्टी TVK पहली बार चुनाव लड़कर सबसे बड़ी पार्टी बन गई, लेकिन बहुमत से अभी दूर है। ऐसे माहौल में लीमा रोज मार्टिन की संपत्ति ने राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक हलचल मचा दी है।

तमिलनाडु: विजय के समर्थक ने लगाई खुद को आग, TVK में सरकार गठन की देरी से बढ़ी नाराजगी

चेन्नई 

तमिलनाडु में अभी तक सरकार के गठन का रास्ता साफ नहीं हो पाया है. टीवीके भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत से 10 कदम की दूरी उसकी सत्ता बनाने की राह में सबसे बड़ी रोड़ा बन रही है. स्पष्ट बहुमत और अभी तक अन्य दलों के स्पष्ट समर्थन न मिल पाने के कारण सरकार नहीं बन पा रही है। 

लिहाजा शनिवार को होने वाला थलपति विजय का संभावित शपथ ग्रहण कैंसिल हो गया है. उधर राज्य में सरकार न बन पाने की स्थिति में विजय के समर्थकों में रोष भी देखा जाने लगा है. शनिवार को सामने आया कि एक समर्थक ने खुद को आग लगा ली, जिसे गंभीर रूप से झुलसे के बाद अस्पताल ले जाया गया है। 

विजय के सीएम बनने में देरी से नाराज था युवक
असल में, तमिलनाडु में सरकार गठन में हो रही देरी के बीच टीवीके प्रमुख C. Joseph Vijay के एक समर्थक ने कथित तौर पर खुद को आग लगा ली. करीब 40 वर्षीय इसक्कियप्पन गंभीर रूप से झुलस गए हैं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है. बताया जा रहा है कि विजय के मुख्यमंत्री बनने में हो रही देरी से वह बेहद नाराज और भावुक थे. जानकारी के मुताबिक, चार महीने पहले भी इसक्कियप्पन ने विजय के मुख्यमंत्री बनने की कामना करते हुए अपने चेहरे में 16 फीट लंबा ‘वेल’ (भाला) आर-पार किया था। 

तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर बढ़ते तनाव के बीच तमिलिसाई सौंदराराजन ने टीवीके प्रमुख थलपति विजय से शांति बनाए रखने की अपील करने को कहा है. तमिलिसाई ने कहा कि तमिलनाडु में हर व्यक्ति नई सरकार के गठन को लेकर भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है और लोग यह भी चाहते हैं कि बनने वाली सरकार स्थिर हो. उन्होंने कहा कि जनता के जनादेश का सम्मान किया जा रहा है और इसी वजह से सरकार गठन के लिए कई मौके दिए जा रहे हैं। 

वल्लियूर में भी एक युवक ने की आत्मदाह की कोशिश
हालांकि उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि मौजूदा राजनीतिक हालात को लेकर कई कार्यकर्ता भावनात्मक प्रतिक्रिया दे रहे हैं, जो चिंताजनक है. उन्होंने कहा कि वीसीके कार्यालय के बाहर एक युवक पर ब्लेड से हमला किया गया, जबकि वल्लियूर में एक अन्य व्यक्ति ने आत्मदाह की कोशिश की और उसकी हालत गंभीर बनी हुई है। 

तमिलिसाई ने विजय से अपील करते हुए कहा कि वह तुरंत अपने समर्थकों और उन्हें वोट देने वाले लोगों के नाम शांति बनाए रखने का संदेश जारी करें और किसी भी खतरनाक कदम से बचने की सलाह दें। 

थलापति विजय हुए लाचार, मंडरा रहा यह बड़ा खतरा!
तमिलनाडु में जिसका डर है, वही होता दिख रहा है. तमिलनाडु चुनाव में रिजल्ट त्रिशंकु रहा. किसी को बहुमत नहीं मिला. न तो डीएमके-एआईडीएमके और न ही टीवीके. हालांकि, थलापति विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, मगर बहुमत से दूर रह गई. ऐसे में तमिलनाडु में सरकार गठन का पेच फंस गया है. यह पेच भी ऐसा है, जो सुलझता दिख नहीं रहा है. आलम यह है कि थलापति विजय लाचार दिख रहे हैं. महज एक-दो विधायकों की कमी से वह सरकार नहीं बना पा रहे हैं. राज्यपाल साफ कर चुके हैं कि जब तक बहुमत का नंबर नहीं होगा, तब तक सरकार गठन का न्योता नहीं मिलेगा. ऐसे में तमिलनाडु में संवैधानिक खतरा मंडरा रहा है। 

दरअसल, तमिलनाडु में नई सरकार के गठन को लेकर जारी सियासी घमासान अब और गहरा गया है. राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की अटकलें तेज हो गई हैं, क्योंकि सरकार गठन को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है. आरोप-प्रत्यारोप, विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त, फर्जी समर्थन पत्र और ‘लापता’ विधायकों के दावों ने राज्य की राजनीति को बेहद पेचीदा बना दिया है. सबके मन में राष्ट्रपति शासन वाला डर सता रहा है. थलापति विजय तो बड़ी जीत के बाद भी सरकार बनाने को तरस रहे हैं। 

मंडरा रहा बड़ा संवैधानिक खतरा
बहरहाल, तमिलनाडु की मौजूदा सरकार का कार्यकाल 10 मई को समाप्त हो रहा है. अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि अगली सरकार कौन बनाएगा. सरकार की तस्वीर अगर 48 घंटे में साफ नहीं होती है तो तमिलनाडु की तकदीर में कुछ और हो सकता है. जी हां, तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने साफ कर दिया है कि 234 सदस्यीय विधानसभा में कम से कम 118 विधायकों का समर्थन साबित किए बिना किसी भी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया जाएगा। 

किसके पास कितनी सीटें
23 अप्रैल को हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी टीवीके 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. हालांकि, बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े से वह अभी भी पीछे है. वहीं, डीएमके गठबंधन को 73 सीटें मिलीं, जबकि एआईएडीएमके गठबंधन ने 53 सीटों पर जीत दर्ज की. बहुमत जुटाने के लिए टीवीके ने कांग्रेस, विदुथलाई चिरुथिगल काची (वीसीके), सीपीआई और सीपीआई (एम) से बातचीत शुरू की. कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन के बाद टीवीके का आंकड़ा 113 तक पहुंच गया। 

कौन-कौन कर रहा समर्थन
बाद में सीपीआई और सीपीआई (एम) ने भी बिना शर्त बाहरी समर्थन देने का ऐलान किया, जिससे संख्या बढ़कर 117 हो गई. लेकिन मामला यहां भी उलझ गया. थलापति विजय ने दो सीटों से चुनाव जीता है और उन्हें एक सीट छोड़नी पड़ सकती है. ऐसे में प्रभावी संख्या फिर कम हो सकती है और टीवीके बहुमत से पीछे रह सकती है. वीसीके के समर्थन की उम्मीद जरूर जताई जा रही है, लेकिन अंतिम आंकड़ों को लेकर अब भी संशय बना हुआ है। 

 

थलापति विजय की शपथ पर उठे सवाल, 116-118 का ड्रामा और आधी रात का खेल

चेन्नई

 तमिनलाडु की सियासत में सस्पेंस ही सस्पेंस है. ऐसा लग रहा जैसे सांप-सीढ़ी का खेल चल रहा हो. कभी थलापति विजय की टीवीके की सरकार बनती दिखती है तो कभी डीएमके-एआईडीएमके के बीच गठबंधन की हवा चलती है. कभी सरकार बनने की बात आती हो तो कभी फिर इंतजार बढ़ जाता है. थलापति विजय कभी सरकार बनाने के लिए बहुमत होने की बात करते हैं तो कभी उनके नंबर कम पड़ जाते हैं. पहले खबर आई कि थलापति विजय आज सरकार बनाएंगे और शपथग्रहण होगा. मगर अब तमिलनाडु में फिर ट्विस्ट आ गया है. ऐसा लग रहा है कि थलापति विजय के शपथग्रहण पर फिर से ग्रहण लग गया है. कारण कि आधिकारिक तौर पर अब तक गवर्नर ने सरकार बनाने के लिए थलापति विजय को न्योता नहीं दिया है। 

जी हां, टीवीके के संस्थापक एक्टर विजय के 118 विधायकों के बहुमत के आंकड़े को पार करने और सरकार बनाने का दावा पेश करने के कुछ घंटे बाद ही शुक्रवार देर रात उनकी बहुमत की स्थिति को लेकर नया संशय पैदा हो गया. आईयूएमएल ने थलापति विजय को समर्थन देने से इनकार कर दिया. वहीं वीसीके ने अपना फैसला लंबित रखा है और समर्थन के बदले कड़ी शर्तें रखीं. इससे तमिलनाडु की राजनीतिक स्थिति अस्थिर हो गई और बहुमत के आंकड़े फिर से अनिश्चित हो गए। 

116, 117, 118: विजय अब भी बहुमत से दूर
इन सबके बीच सरकार बनाने को लेकर थलापति विजय की टीवीके के लिए असमंजस और अनिश्चितता और बढ़ गई है. कारम कि थलापति विजय अब भी बहुमत के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाए हैं. राज्यपाल से तीसरी बार मुलाकात के बाद भी टीवीके विधानसभा में बहुमत से कुछ कदम दूर है. यही कारण है कि राज्यपाल ने सरकार बनाने के लिए न्योता नहीं दिया है. थलापति विजय की टीवीके के पास 108 सीटें हैं. असल में देखें तो 107 क्योंकि विजय ने दो सीटों से जीत दर्ज की है. ऐसे में एक सीट उन्हें छोड़नी होगी. तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए 118 सीटों की जरूरत है। 

कैसे थलापति विजय को लगा झटका
थलापति विजय के दो सीटों से जीतने के बाद प्रभावी बहुमत घटकर 117 रह गया. डीएमके गठबंधन से अलग हुई कांग्रेस ने अपने पांच विधायकों के साथ विजय को समर्थन दिया है. सीपीआई और सीपीआई(एम) के दो-दो विधायकों ने भी बिना शर्त बाहर से समर्थन देने का ऐलान किया है. लेकिन आईयूएमएल ने डीएमके गठबंधन के साथ रहने का फैसला किया, जिससे विजय की पक्की संख्या घट गई और बहुमत के आंकड़े कड़े हो गए. ऐसे में विजय के बहुमत का आंकड़ा कभी 116 पर अटक जाता है तो कभी 118 पूरा हो जाता है. मगर आईयूएमएल के पीछे हटने से टीवीके अभी 116 पर है और उसे अब भी दो सीटों की जरूरत है। 

आईयूएमएल ने बिगाड़ा विजय का खेल
इधर डीएमके की पुरानी सहयोगी आईयूएमएल के पास दो विधायक हैं. उसने कहा कि वह राज्यपाल आरएन रवि की ओर से आमंत्रित किसी भी पार्टी को ‘स्थिर और धर्मनिरपेक्ष सरकार’ बनाने के लिए समर्थन देगी और भाजपा को ‘पीछे के रास्ते’ से राज्य में घुसने से रोकेगी. चूंकि न तो डीएमके और न ही एआईएडीएमके के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या है. इसलिए माना जा रहा था कि राज्यपाल विजय को सरकार बनाने का न्योता देंगे. टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। 

हालांकि, बाद में खबर आई कि डीएमके की एक और सहयोगी वीसीके ने अपने विधायकों के साथ थलापति विजय को समर्थन देने का फैसला किया है. एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद पार्टी सूत्रों ने बताया कि वीसीके ने समर्थन देने पर सहमति जताई है और शनिवार सुबह टीवीके को समर्थन पत्र सौंपेगी. पार्टी प्रवक्ता ने भी यूएनआई से इस कदम की पुष्टि की। 

शपथग्रहण पर ग्रहण
वहीं, वाम दलों के समर्थन और वीसीके के संभावित समर्थन के साथ थलापति विजय ने राज्यपाल से मुलाकात की. इससेक पहले वो दो बार राज्यपाल से मिल चुके थे और दोनों बार निराशा हाथ लगी थी. अबकी बार थलापति विजय ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और समर्थन पत्र सौंपे. इससे राज्यभर में टीवीके कार्यकर्ताओं में जश्न का माहौल बन गया. खबरें यह भी थीं कि विजय का शपथ ग्रहण शनिवार को हो सकता है। 

रात में अचानक हुआ खेल
हालांकि, रात में हालात अचानक बदल गए. थलापति विजय ने सीपीआई और सीपीआई(एम) नेताओं से मिलकर समर्थन के लिए धन्यवाद दिया और आईयूएमएल और वीसीके नेताओं से मिलने की योजना बनाई, लेकिन दोनों दलों ने अपने रुख पर पुनर्विचार के संकेत दिए. इससे थलापति विजय को तगड़ा झटका लगा. अब सबसे बड़ा यूटर्न है कि आईयूएमएल ने स्पष्ट रूप से टीवीके को समर्थन देने से इनकार कर दिया है. उसने कहा कि वह डीएमके गठबंधन के साथ ही रहेगी. आईयूएमएल ने कहा कि हम पहले भी डीएमके के साथ थे, अब भी हैं और आगे भी रहेंगे। 

थलापति विजय को एक बार फिर झटका लगा है.

वीसीके ने भी लिया यूटर्न
वहीं, वीसीके ने कहा कि बातचीत जारी है और विजय को समर्थन देने पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. खबरें यह भी थीं कि पार्टी समर्थन के बदले कड़ी शर्तें रख रही है. यह बात तब और मजबूत हो गई जब वीसीके के उप महासचिव और नवनिर्वाचित विधायक वन्नियारासु ने सोशल मीडिया पर सत्ता और शासन में हिस्सेदारी की मांग की. इस अनिश्चितता के बीच TVK के सदस्य जो विजय के शपथ ग्रहण की उम्मीद में बड़ी संख्या में जुटे थे, उन्हें निराशा हाथ लगी क्योंकि बहुमत का आंकड़ा पूरा नहीं हो पाया. अब आगे जब तक बहुमत वाला नंबर नहीं दिखा देते एक्टर विजय, तब तक टीवीके सरकार का सपना… सपना ही रहेगा। 

राहुल गांधी के नेतृत्व में मणिशंकर अय्यर का हमला, कांग्रेस के विजय समर्थन को बताया ‘घटिया और भयानक’

नई दिल्ली

तमिलनाडु में नई सरकार में शामिल होने के लिए कांग्रेस ने वर्षों पुराना गठबंधन तोड़ लिया और ऐक्टर वियज की पार्टी टीवीके को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस के इस फैसले की हर तरफ आलोचना हो रही है। सहयोगी के साथ-साथ पार्टी के लोग भी इसकी निंद कर रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने इसे भयानक निर्णय बताया है। वहीं, अखिलेश यादव ने आईना दिखाते हुए कहा है कि मुश्किलों में साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

मणिशंकर अय्यर ने शुक्रवार को कहा कि कांग्रेस के इस फैसले में घटिया राजनीतिक अवसरवादिता की बू आती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर इस कदम से भाजपा को को द्रविड़ राज्य में पिछले दरवाजे से घुसने का मौका मिलता है तो यह राजनीतिक खेल के इतिहास में अब तक का सबसे बुरा गोल होगा, जो कांग्रेस अपने ही गोलपोस्ट में करेगी। अय्यर ने कहा कि वह कल्पना भी नहीं कर सकते कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक ऐसी सुविधावादी राजनीति को अपना आशीर्वाद देंगे।

न्यूज एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए मणिशंकर अय्यर ने कहा कि DMK के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के ठीक बाद कांग्रेस का पाला बदलकर TVK के साथ गठबंधन करना एक भयानक फैसला है। कुछ ही दिन पहले जिन 23 विधानसभा सीटों पर हम हारे और जिन पांच सीटों पर हम जीते उन सभी पर हमारा मुकाबला टीवीके के साथ था।

‘राजनीतिक अवसरवाद’ का लगाया आरोप
अय्यर ने तमिलनाडु के ताजा घटनाक्रम को घटिया राजनीतिक अवसरवाद यानि की Low Political Opportunism बताया है। उन्होंने कांग्रेस के फैसले को अनैतिक करारते हुए गठबंधन की मर्यादा के बताया है। अय्यर के मुताबिक, महज़ सत्ता के लिए दशकों पुराना साथ छोड़ना कांग्रेस की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

राहुल गांधी के नेतृत्व पर उठाए सवाल
लगातार मिल रही चुनावी हार और सांगठनिक कमजोरी का हवाला देते हुए अय्यर ने सीधे तौर पर राहुल गांधी के नेतृत्व को निशाना साधते हुए कहा कि अब समय आ गया है जब कांग्रेस को पीछे हटकर क्षेत्रीय नेताओं को आगे आने का मौका देना चाहिए। अय्यर ने ममता बनर्जी (तृणमूल कांग्रेस), एम.के. स्टालिन (DMK),अखिलेश यादव (सपा) और तेजस्वी यादव (RJD) का नाम सुझाया है।

क्षेत्रीय दलों को कमान देने की वकालत
अय्यर का मानना है कि क्षेत्रीय नेता अपनी जमीन और जनता की नब्ज को कांग्रेस की तुलना में बेहतर समझते हैं। उन्होंने कहा कि INDIA गठबंधन को बचाने और मजबूती देने के लिए इन प्रभावशाली क्षेत्रीय चेहरों को गठबंधन का नेतृत्व सौंपना ही एकमात्र विकल्प बचा है।

DMK-AIADMK में भी हो रही बात
तमिलनाडु में सरकार बनाने को लेकर चल रही खींचतान के बीच एआईएडीएमके के विधायकों को पुडुचेरी के पूरनकुप्पम में एक निजी रिसॉर्ट में ठहराया गया है। सूत्रों ने बताया कि सरकार बनाने के लिए टीवीके को संभावित समर्थन देने के संबंध में प्रयास जारी हैं और कथित तौर पर पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों के जरिए एआईएडीएमके नेताओं के साथ चर्चा चल रही है।

पलानीस्वामी ने की बैठक
एआईएडीएमके के महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने रिसॉर्ट में विधायकों के साथ बैठक की। इस बैठक में 40 विधायक मौजूद थे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि पलानीस्वामी ने चुने हुए विधायकों से एकजुट रहने और धैर्य रखने को कहा है। उन्होंने विधायकों से कहा कि अच्छी चीजे सामने आएंगी, इसलिए आप सभी को अगले कुछ दिनों तक रिसॉर्ट में एकजुट रहना चाहिए।

तमिलनाडु के 8 दल और नंबर गेम में उलझे थलपति, कौन किसका समर्थन करेगा?

चेन्नई

तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से ‘करिश्माई व्यक्तित्वों’ और ‘द्रविड़ अस्मिता’ के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव नतीजे ने राज्य को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां सियासी गणित ने अभिनेता से नेता बने विजय को उलझा दिया है. विधानसभा चुनाव में भले ही विजय की पार्टी नंबर वन बन गई हो, लेकिन बहुमत का नंबर जुटाने के लिए जूझ रहे हैं। 

विजय को सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होने के लिए बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए. टीवीके के पास 108 विधायक हैं और कांग्रेस के पांच विधायकों के समर्थन के बाद 113 का ही आंकड़ा पहुंच रहे हैं. इसके बाद भी 5 विधायकों के समर्थन की जरूरत है. डीएमके व AIADMK के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले दलों को बिना साथ लिए सरकार बनाना संभव नहीं है? 

तमिलनाडु की सियासत में करीब छह दशक के बाद दो ध्रुवीय के बजाय त्रिकोणीय मुकाबला रहा. इस बार तमिलनाडु की राजनीतिक बिसात पर केवल विजय नहीं हैं, बल्कि छोटे दल बड़े धमाल करने की स्थिति में है. राज्य में 8 छोटे दल और बहुमत का जटिल नंबरगेम है, जो थलपति के राजनीतिक भविष्य को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है? 

सरकार बनाने के नंबर गेम में उलझे विजय
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में विजय ने अपनी पार्टी TVK के जरिए सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद पर हमला बोला है. इस तरह उनका लक्ष्य युवाओं का वह वोट बैंक रहा, जो DMK और AIADMK के दशकों पुराने चक्रव्यूह से ऊब चुका था. थलपति के लिए चुनौती यह है कि क्या उनका ‘सिनेमाई करिश्मा’ बूथ स्तर के ‘वोट मैनेजमेंट’ में बदल पाएगा? 

विधानसभा चुनाव में बिना किसी गठबंधन के राज्य की सभी 234 सीटों पर चुनाव लड़ना और 108 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया. पहली ही सियासी पारी में भले ही विजय शतक लगाने में कामयाब रहे, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े से पीछे रह गए. विजय को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस ने अपने 5 विधायकों का समर्थन भी दे दिया. उसके बाद भी बहुमत का 118 का आंकड़ा नहीं पहुंच पा रहा। 

तमिलनाडु के राज्यपाल आरवी अर्लेकर तमिलनाडु में विजय को सरकार का न्योता देने से इनकार कर दिया. राज्यपाल का कहना है कि विजय पहले 118 विधायकों का समर्थन पत्र दिखाएं. ऐसे में विजय के सामने बहुमत का नंबर गेम जुटाना काफी मुश्किल लग रहा है, क्योंकि राज्य में जो भी छोटे दल हैं, वो डीएमके और AIADMK गठबंधन के साथ मजबूती से खड़े हैं। 

तमिलनाड में 8 दलों के पास सरकार बनाने की चाबी
थलापति विजय को सरकार बनाने और बहुमत का आंकड़े जुटाने के लिए वामपंथी दलों और वीसीके की सहमति जरूरी है. विजय ने पहले कई छोटी पार्टियों से संपर्क साधा है, लेकिन वे फिलहाल वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं. तमिलनाडु चुनाव में टीवीके को 108 सीटें मिली तो डीएमके को 59 और AIADMK ने 47 सीटें जीती हैं। 

तमिलनाडु में इन तीनों प्रमुख दलों के अलावा कांग्रेस 5 सीटें जीती है, जिसने पहले ही विजय को अपना समर्थन दे दिया है. पीएमके के 2, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के 2, सीपीआई के 2, सीपीएम  के 2, वीसीके के 2, बीजेपी के एक, डीएमडीके के एक और एक विधायक AMMKMNKZ के हैं। 

विजय अगर वामपंथी दलों के चार विधायकों के साथ वीसीके का समर्थन हासिल कर लेते हैं तो आसानी से सरकार बना लेंगे. हालांकि, कांग्रेस के सिवा कोई भी दल अपनी तक अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. मुस्लिम लीग ने साफ कर दिया है कि डीएमके साथ खड़ी है. वीसीके भी लेफ्ट के साथ सुर में सुर मिलाती नजर आ रही है। 

छोटे दलों किसका गेम बनाएगा-बिगाड़ेंगे?
तमिलनाडु की सियासत इस जगह पर खड़ी है कि बिना किसी छोटे दल के किसी की भी सरकार नहीं बनने वाली. पीएमके ने बीजेपी से साथ में चुनाव लड़ा था, जिसके चलते उसके साथ खड़ी है. कांग्रेस के बाद अगर लेफ्ट और वीसीके विजय को समर्थन दे देते हैं तो आसानी से राज्य में सरकार बन जाएगी। 

कांग्रेस के समर्थन के बाद विजय को सिर्फ 5 विधायकों के अतरिक्त समर्थन की जरूरत है. विजय जरूर वामपंथी दलों का समर्थन चाहते हैं, पर वो भी डीएमके साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. मुस्लिम लीग भी डीएमके साथ खड़ी है. इसी तरह डीएमडीके भी स्टालिन के साथ मजबूती से खड़ी हुई है. केरल के चुनाव नतीजे के बाद लेफ्ट अब कांग्रेस के साथ जाने के लिए तैयार नहीं है. इसीलिए विजय का सियासी गेम उलझा हुआ है। 

तमिलनाडु में पलटेगा गेम! 

तमिलनाडु में सरकार बनाने को लेकर पेच फंसता ही जा रहा है. सूबे में किसी भी दल या गठबंधन के पास बहुमत का नंबर नहीं होने के कारण अभी तक सरकार बनाने का रास्ता साफ नहीं हुआ है. ऐसे में दक्षिण भारत के इस राज्य की राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम देखने को मिल रहा है, जिसकी कल्पना पिछले 50 वर्षों में किसी ने नहीं की थी। 

अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) तमिलनाडु में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत का नंबर पूरा नहीं हो रहा. कांग्रेस ने जरूर विजय की टीवीके को समर्थन दे रखा हो, लेकिन उसके बाद भी सरकार बनाने के लिए बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं पूरा हो रहा। 

तमिलनाडु में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले AIADMK अब एनडीए से बाहर निकालने की तैयारी में है. ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी से गठबंधन तोड़ने के बाद AIADMK तमिलनाडु में टीवीके और डीएमके में किसके साथ हाथ मिलाएगी?

बीजेपी से अलग होने जा रही AIADMK 
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में AIADMK ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी से आगे नहीं नहीं निकल सकी. राज्य में टीवीके को 108 सीटें मिली हैं, लेकिन सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए। 

कांग्रेस ने जरूर विजय की पार्टी को अपना समर्थन दिया है, जिसे मिलकर 113 का नंबर ही हो रहा है. विजय ने सरकार बनाने के लिए राज्यपाल से दो बार मुलाकात कर चुके हैं, लेकिन राज्यपाल ने अभी तक उन्हें मंजूरी नहीं दी. राज्यपाल ने विजय से 118 विधायकों के समर्थन की लिस्ट मांगी है। 

वहीं, जयललिता के निधन के बाद लगातार चार चुनाव हार चुकी AIADMK अपनी राजनीतिक वजूद बचाने के लिए इस गठबंधन पर विचार कर रही है. ऐसे में बीजेपी के साथ होने के चलते AIADMK के साथ विजय भी हाथ मिलाने के लिए तैयार नहीं है. ऐसे में सूत्रों की माने तो AIADMK ने एनडीए से अलग होने का फैसला कर सकती है, जिसके लिए मंथन भी शुरू हो गया है। 

AIADMK किसके साथ मिलाएगी हाथ
तमिलनाडु में विजय और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के दांव से डीएमके नाराज है तो बीजेपी भी खुश नहीं है.  सूत्रों का कहना है कि बीजेपी की रणनीति कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने की है तो ़AIADMK अलग रणनीति पर काम कर रही है. AIADMK अगर एनडीए से अलग होती है तो फिर तमिलनाडु में किसके साथ जाएगी। 

बीजेपी के साथ AIADMK का गठबंधन होने के चलते विजय की पार्टी टीवीके समर्थन लेने से बच रहे हैं. इसके पीछे वजह यह है कि चुनाव के दौरान विजय ने साफ कहा था कि डीएमके उनकी राजनीतिक विरोधी है तो बीजेपी उनकी वैचारिक विरोधी है. ऐसे में बीजेपी से गठबंधन टूटने के बाद विजय को AIADMK के साथ मिलकर सरकार बनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। 

अब सवाल यही है कि AIADMK क्या विजय की पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाएगी या फिर उसे सत्ता में आने से रोकने का दांव चलेगी?  हालांकि, विजय के बढ़ते सियासी प्रभाव को रोकने के लिए राज्य के दो सबसे बड़े कट्टर प्रतिद्वंद्वी डीएमके और एआईएडीएमके हाथ मिला सकते हैं। 

बीजेपी क्या पर्दे के पीछे से चल रही दांव
तमिलनाडु की सियासत में कांग्रेस और विजय की दोस्ती बीजेपी को रास नहीं आ रही है. कहा जा रहा है कि बीजेपी नहीं चाहती है कि कांग्रेस के साथ मिलकर विजय सरकार बनाएं. ऐसे में पर्दे के पीछे से डीएमके और AIADMK गठबंधन का तानाबाना बुन रही है। 

 हालांकि, डीएमके के प्रमुख एमके स्टालिन और पुराने नेता इस अजीब प्रयोग से डरे हुए हैं. उन्हें डर है कि इस बेमेल गठबंधन से समर्थकों के बीच भारी आक्रोश पैदा हो सकता है. इसीलिए डीएमके की तरफ से कहा गया है कि विजय को सरकार बनाने के लिए राज्यपाल को इजाजत देनी चाहिए, विजय के अगुवाई वाली सरकार को छह महीने तक का टाइम देना चाहते हैं। 

विजय अलग ही चल रहे सियासी चाल
तमिलनाडु में जैसे ही डीएमके और AIADMK के बीच संभावित गठबंधन की खबरें फैलीं, विजय की पार्टी टीवीके ने बड़ा दांव चल दिया है. टीवीके ने घोषणा की है कि यदि DMK-AIADMK गठबंधन सरकार बनाने का दावा पेश करता है, तो उनके सभी 108 विधायक सामूहिक इस्तीफा दे देंगे।.यह कदम जनता और प्रशंसकों को सड़कों पर उतारने की एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है। 

तमिलनाडु विधानसभा में नंबर क्या है?
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए. फिलहाल विजय की पार्टी टीवीके के पास सबसे अधिक 108 सीटें हैं। 

वहीं, डीएमकी गठबंधन के पास 74 विधायक हैं, इनमें डीएमके 59, कांग्रेस पांच और अन्य पार्टी के 10 विधायक हैं. कांग्रेस के पास विधायक हैं, जिन्होंने टीवीके को समर्थन दे रखा है, लेकिन डीएमके के साथ लेफ्ट और मुस्लिम लीग का समर्थन बना हुआ है। 

तमिलनाडु में एआईएडीएमके गठबंधन के पास यहां 53 सीटें हैं तो अन्य के पास 6 विधायक हैं. विजय को बहुमत के लिए 118 विधायक चाहिए. कांग्रेस के समर्थन के बाद भी टीवीके को 5 विधायकों का अतरिक्त समर्थन चाहिए. इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वामपंथी दलों और वीसीके की सहमति जरूरी है. विजय ने पहले ही इन पार्टियों से संपर्क साधा है, लेकिन वे फिलहाल वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं। 

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