फलता बना बंगाल की सियासत का नया रणक्षेत्र, क्या ममता के गढ़ में सेंध लगा पाएगी BJP?

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल की सियासत में ‘डायमंड हार्बर’ का इलाका हमेशा से हाई-वोल्टेज रहा है. इस वक्त सबसे बड़ा सियासी अखाड़ा बना हुआ है इसी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला फलता विधानसभा क्षेत्र. चुनावी हिंसा के आरोपों के बाद निर्वाचन आयोग ने 29 अप्रैल को हुए मतदान को रद्द कर फालता में 21 मई को दोबारा मतदान कराने का फैसला किया। 

फलता विधानसभा सीट पर चुनाव कैंपेनिंग के लिए आखिरी 48 घंटे बचे हैं. फलता की धरती पर राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है. इस बार के विधानसभा चुनाव के केंद्र में हैं टीएमसी के कद्दावर उम्मीदवार जहांगीर खान, जिनके इर्द-गिर्द इस इलाके का पूरा समीकरण घूम रहा है। 

बंगाल की सियासत में जहांगीर खान की तूती बोलती थी, लेकिन अब सत्ता बदल चुकी है. ऐसे में फलता सीट जो 15 सालों से टीएमसी का मजबूत गढ़ बना हुआ है, उस पर बीजेपी भी जीत का परचम फहराना चाहती है. ऐसे में क्या जहांगीर खान अपना सियासी प्रभाव जमाए रख सकेंगे या फिर सत्ता के बदलन के साथ ही सियासी गेम भी फालता का बदल जाएगा। 

सिंघम’ बनाम ‘पुष्पा’ की  चुनावी जंग 
फालता का चुनाव आम सियासी लड़ाई से कहीं आगे निकलकर एक एक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा हो चुका है. चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा, जिन्हें यूपी की सियासत में ‘सिंघम’ के तौर पर देखा जाता है. वहीं, टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने एक चुनावी जनसभा में खुलेआम चुनौती देते हुए कहा था, ‘अगर तुम सिंघम हो, तो मैं पुष्पा हूं… पुष्पराज, झुकेगा नहीं। 

पश्चिम बंगाल में हुए सत्ता परिवर्तन और बीजेपी की बड़ी जीत के बाद अब सियासी समीकरण पूरी तरह पलट गए हैं. टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान जो कुछ दिन पहले तक गायब (अंडरग्राउंड) बताए जा रहे थे, वे चुनाव आयोग के निर्देश और पुलिस सुरक्षा के साये में वापस फालता लौटे हैं और अपने प्रचार में जुटे हैं। 

फलता सीट का सियासी समीकरण
फलता विधानसभा सीट दक्षिण 24 परगना जिले में आती है. पारंपरिक रूप से यह इलाका टीएमसी और खासकर अभिषेक बनर्जी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. देश की आजादी के बाद से फलता सीट पर 1952 से लेकर अब तक कुल 17 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और इस बार 18वीं बार चुनाव हो रहे. इस सीट की खासियत यह रही है कि यहां जब भी जो लहर आई, जनता ने लंबे समय तक उसी पार्टी का साथ दिया। 

1952 से लेकर 2006 तक लेफ्ट ने नौ बार फलता सीट पर जीत दर्ज की है. कांग्रेस ने चार बार इस सीट पर जीत का परचम फहरा चुकी है तो टीएमसी भी 4 बार जीतने में सफल रही है. 2011 से लेकर अभी तक टीएमसी का दबदबा है. 2021 के चुनाव में टीएमसी ने यहां करीब 40 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. इतिहास गवाह है कि फलता सीट पहले करीब तीन दशक तक वामपंथ का अभेद्य दुर्ग थी, जिसे बाद में टीएमसी ने अपना नया घर बना लिया। 

देवांग्शु पांडा और जहांगीर खान में फाइट
2026 फलता सीट पर अभूतपूर्व पुनर्मतदान में चलते दोबारा चुनाव हो रहे हैं. बीजेपी के देवांग्शु पांडा और टीएमसी के जहांगीर खान के बीच मुख्य मुकाबला है. फलता का यह किला टीएमसी के पास सुरक्षित गढ़ रहा है, लेकिन बीजेपी अब इस सीट पर हरहाल में जीत का परचम फहराना चाहती है.  बीजेपी उम्मीदवार देवांशु पांडा, जो पेशे से वकील हैं, वे इस बार टीएमसी के ‘खौफ वाले नैरेटिव’ को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. केंद्रीय बलों की भारी तैनाती के कारण इस बार फर्जी वोटिंग या बूथ कैप्चरिंग की गुंजाइश न के बराबर है, जो बीजेपी के पक्ष में जा सकता है। 

बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी ने फलता में खुद कमान संभाल ली है. उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार देवांशु पांडा के समर्थन में एक बड़ी रैली की और सीधे जहांगीर खान पर निशाना साधा. शुभेंदु ने सरेआम चेतावनी देते हुए कहा था कि वह (जहांगीर खान) खुद को पुष्पा कहता है, अब इस ‘पुष्पा’ की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है. फलता के लोगों ने पिछले 10 साल से आजादी से वोट नहीं डाला है, लेकिन इस बार बिना किसी खौफ के मतदान कीजिए और बीजेपी को 1 लाख से अधिक वोटों से जिताइए। 

फलता सीट पर क्या बीजेपी जीत सकेगी
फलता विधानसभा सीट के सियासी समीकरण को देखें तो मुस्लिम और दलित वोटर अहम हैं. इस इलाके में अल्पसंख्यक और दलित मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है, जो अब तक टीएमसी का पारंपरिक वोट बैंक रहे हैं, जहांगीर खान इसी समीकरण के भरोसे अपनी नैया पार लगाना चाहते हैं तो बीजेपी दलित वोटों और हिंदू वोटों के धार्मिक ध्रुवीकरण पर अपनी जीत की आस लगा रही है। 

पश्चिम बंगाल की सत्ता में बीजेपी के आने के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस का रुख पूरी तरह बदल चुका है. फलता में पुलिस ने हाल ही में जहांगीर खान के बेहद करीबी और फलता पंचायत समिति के उपाध्यक्ष सैदुल खान को जानलेवा हमले और हिंसा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। 

आखिरी 48 घंटे में आर-पार की लड़ाई
फलता सीट पर चुनाव कैंपेनिंग के ये आखिरी 48 घंटे बेहद संवेदनशील हैं. एक तरफ टीएमसी और जहांगीर खान अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं और सहानुभूति कार्ड खेलने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें फंसाया जा रहा है. वहीं दूसरी तरफ, बीजेपी इस पुनर्मतदान को ‘आतंक से मुक्ति’ के उत्सव के रूप में प्रचारित कर रही है। 

बंगाल में बीजेपी सरकार बनने के बाद 21 मई को होने वाला यह पुनर्मतदान सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या केंद्रीय बलों और सख्त प्रशासन की मौजूदगी में डायमंड हार्बर के इस इलाके में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं. जहांगीर खान का ‘पुष्पा’ अवतार फाल्टा की जनता को भाता है या शुभेंदु अधिकारी का ‘एक्शन’ रंग लाता है, इसका फैसला 24 मई को नतीजों के साथ होगा। 

 

केरल में BJP का 13 सूत्रीय एजेंडा: लोकसभा चुनाव से पहले अल्पसंख्यक और OBC राजनीति पर फोकस

केरल

केरल विधानसभा चुनाव में तीन सीटों पर जीत से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए 13 सूत्रीय राजनीतिक एजेंडा जारी किया है. पार्टी ने इस एजेंडे में पिछड़े हिंदू समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने और अल्पसंख्यक समुदायों के साथ अपने राजनीतिक समीकरण को नए सिरे से तय करने पर जोर दिया है.

यह राजनीतिक प्रस्ताव शनिवार को तिरुवनंतपुरम में हुई केरल बीजेपी की कोर कमेटी की बैठक में पारित किया गया. बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय मंत्री और केरल बीजेपी अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने की. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, 13 सूत्रीय एजेंडे में राज्य की क्रिश्चियन कम्युनिटी के बीच कोई स्पेशल आउटरीच प्रोग्राम चलाने का उल्लेख नहीं किया गया है. केरल विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने चर्च और क्रिश्चियन कम्युनिटी के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिश की थी.

सूत्रों के अनुसार, पार्टी ने क्रिश्चियन कम्युनिटी से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई है, लेकिन चर्च नेतृत्व के साथ संस्थागत स्तर पर संबंध मजबूत करने की रणनीति से पीछे हट गई है. इसकी एक बड़ी वजह कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ के साथ चर्च नेतृत्व की बढ़ती राजनीतिक नजदीकी मानी जा रही है. इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 का चर्च द्वारा विरोध भी बीजेपी के लिए चुनावी अभियान में असहज स्थिति का कारण बना.

बीजेपी ने अपने नए एजेंडे में ओबीसी आरक्षण को बड़ा मुद्दा बनाया है. पार्टी का कहना है कि धर्म के आधार पर ओबीसी आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए और आरक्षण केवल ओबीसी, एससी, एसटी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक सीमित रहना चाहिए. पार्टी का आरोप है कि केरल में अल्पसंख्यक समुदाय का एक वर्ग ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ ले रहा है, जिसे समाप्त किया जाना चाहिए. राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि बीजेपी पिछड़ा वर्ग आरक्षण को धर्म आधारित आरक्षण में बदलने की किसी भी कोशिश का विरोध करेगी.

उन्होंने कहा कि पार्टी की नीति ‘सबके लिए न्याय, किसी का तुष्टिकरण नहीं’ है. उन्होंने आरोप लगाया कि यदि राज्य सरकार मुस्लिम लीग और जमात-ए-इस्लामी के दबाव में तुष्टिकरण की राजनीति करती है तो बीजेपी उसका कड़ा विरोध करेगी. बीजेपी ने अपने 13 सूत्रीय एजेंडे में सबरीमला मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया है. पार्टी ने सबरीमला गोल्ड लूट मामले में सीबीआई जांच की मांग की है और महिलाओं के प्रवेश को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग भी की है.

इसके अलावा मंदिरों की संपत्तियों और परिसंपत्तियों का ऑडिट कराने की मांग की गई है. पार्टी ने शिक्षा संस्थानों में निवेश बढ़ाने, बच्चों को धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों, आतंकवादी संगठनों और नशे के प्रभाव से बचाने के लिए कदम उठाने की भी बात कही है. बीजेपी का दावा है कि केरल में अब एलडीएफ और यूडीएफ के अलावा तीसरा राजनीतिक विकल्प उभर चुका है और जनता ने उसे स्वीकार करना शुरू कर दिया है.
 
हालांकि चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, केरल में बीजेपी की सीटें बढ़ने के बावजूद उसके वोट शेयर में बड़ा उछाल नहीं आया. पार्टी को 2026 विधानसभा चुनाव में 11.42 प्रतिशत वोट मिले, जबकि 2021 में उसे 11.30 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. पार्टी का लक्ष्य 20 प्रतिशत वोट शेयर हासिल कर राज्य की बड़ी राजनीतिक ताकत बनने का था, लेकिन वह इससे काफी पीछे रह गई. हालांकि, इस केरल विधानसभा चुनाव में बीजेपी अपने लिए सकारात्मक पक्ष भी देख रही है. राजीव चंद्रशेखर के मुताबिक राज्य की 21 सीटें ऐसी रहीं, ​जहां बीजेपी को 20 प्रतिशत से अधिक वोट मिले, वहीं 10 ऐसी सीटें भी रहीं, जहां पार्टी को 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले.

TVK सरकार पर विपक्ष का हमला, विधायकों की खरीद-फरोख्त का दावा

चेन्नई

 तमिलनाडु में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद सत्ता में आए विजय थलापति और उनकी पार्टी के ऊपर गंभीर आरोप लग रहे हैं। तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टी अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (AMMK) प्रमुख दिनाकरन ने विजय और उनकी पार्टी के ऊपर हॉर्स ट्रेडिंग (विधायकों की खरीद-फरोख्त) के आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि तमिलनाडु की सत्ता हासिल करने के लिए तमिलगा वेट्री कझगम ने हॉर्स ट्रेडिंग की है। उन्होंने कहा कि अगर विजय ने एएमएमके से गए विधायक को मंत्री पद दिया, तो फिर वह इस मामले की सीबीआई जांच की मांग करेंगे।

तिरुचिरापल्ली में मीडिया से बात करते हुए दिनाकरन ने विजय और उनकी पार्टी की पूरी राजनीति पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने कहा कि टीवीके की पूरी राजनीति ही हॉर्स ट्रेडिंग पर आधारित है। उन्होंने सीएम विजय पर तंज कसते हुए कहा, “विजय कहते हैं कि वह घोड़े की रफ्तार से काम करेंगे, लेकिन उन्होंने घोड़ा ही मोलभाव करके खरीदा है।”

दरअसल, यह पूरा मामला विजय और उनकी सरकार द्वारा पास किए गए फ्लोर टेस्ट के दौरान का है। AMMK ने तमिलनाडु विधानसभा में एक सीट हासिल की थी। लेकिन फ्लोर टेस्ट के पहले ही उसके एकमात्र विधायक एस. कामराज ने विजय की पार्टी को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इसके बाद पार्टी ने अपने एकमात्र विधायक को निष्कासित कर दिया। विधायक के ऊपर कार्यवाही की मांग करते हुए पार्टी प्रमुख ने कहा कि था राजनीतिक दल में केवल पार्टी प्रमुख को ही चीफ व्हिप जारी करने का अधिकार होता है।

AMMK के अलावा मुख्य विपक्षी दल डीएमके ने भी विजय की पार्टी के ऊपर हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया। डीएमके नेता एसएस शिवशंक ने शनिवार को टीवीके पर एआई़डीएमके और एएमएमके के विधायकों की हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विजय की सरकार कुछ ही दिनों की मेहमान है। मीडिया से बात करते हुए डीएमके नेता ने कहा कि लगातार विरोध और राजनीतिक अहंकार ही टीवीके और विजय के पतन का कारण बनेगी।

‘मैं घोर सनातनी हूं’— Digvijaya Singh बोले- एकादशी व्रत रखता हूं, नर्मदा परिक्रमा भी कर चुका हूं

इंदौर 

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह  इंदौर में थे, वे जब रेसीडेंसी कोठी में विधायक उषा ठाकुर से मिले तो दोनों में मीठी नोक झोंक हुई। ठाकुर ने भोजशाला के फैसले पर कुछ कहा कि तो दिग्विजय सिंह ने कहा कि मैं घोर सनातन धर्म को मानने वाला हुं। मैने नर्मदा परिक्रमा है। एकादशी का उपवास करता हुं। उषा ने कहा कि आप पक्के सनातनी है तो सार्वजनिक रुप से स्वीकार करना चाहिए। भोजशाला को लेकर जो फैसला आया है। उसका आपको सम्मान करना चाहिए। तो दिग्विजय सिंह ने कहा कि तुम्हें कैसे मान लिया कि मैंने फैसले का विरोध किया है। 

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक दिवसीय दौरे पर इंदौर पहुंचे। वे पूर्व विधायक अश्विन जोशी के निधन पर शोक प्रकट करने उनके निवास पर पहुंचे। इसके बाद वे अन्य कार्यकर्ता व नेतागणो से भी मिले।

मीडिया से चर्चा के दौरान सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में अच्छे दिन लाने का वादा किया था, लेकिन आज आम जनता महंगाई और आर्थिक संकट से जूझ रही है। उन्होंने कहा कि पेट्रोल, डीजल और रोजमर्रा की जरूरतों की वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। जिससे गरीब और अधिक गरीब होता जा रहा है, जबकि कुछ चुनिंदा लोग लगातार अमीर बनते जा रहे हैं।

सिंह ने कहा कि पहले भाजपा नेताओं द्वारा कांग्रेस पर लोगों का मंगलसूत्र छीनने जैसे आरोप लगाए जाते थे, लेकिन अब जनता को सोना नहीं खरीदने, विदेश यात्रा नहीं करने और तेल कम उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की अर्थव्यवस्था लगातार कमजोर हो रही है और रुपये की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट आई है। बेरोजगारी कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही है।

नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और घोटालों को लेकर भी सिंह ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नीट परीक्षा में धांधली रोकने के लिए समिति द्वारा विस्तृत रिपोर्ट दी गई थी, लेकिन सरकार ने उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। उनका आरोप था कि बार-बार सामने आ रहे घोटाले युवाओं के भविष्य के साथ बड़ा धोखा हैं।
 
भोजशाला मामले में इंदौर हाईकोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि फैसले का अध्ययन किया जाएगा और आगे की कार्रवाई कानून व संविधान के दायरे में रहकर ही की जाएगी। उन्होंने कहा कि भोजशाला एक एएसआई संरक्षित स्थल है और वहां पूजा-अनुष्ठान को लेकर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट करेगा।

सोनिया गांधी वोटर लिस्ट विवाद: राऊज एवेन्यू कोर्ट में सुनवाई 4 जुलाई तक टली

नई दिल्ली

राउज एवेन्यू कोर्ट में सोनिया गांधी के खिलाफ दायर रिवीजन पिटीशन पर सुनवाई एक बार फिर टल गई है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 4 जुलाई को होगी। यह याचिका वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने से जुड़े आरोपों पर आधारित है, जिसमें बिना भारतीय नागरिकता प्राप्त किए नाम शामिल होने का दावा किया गया है। अदालत में फिलहाल मामले की प्रक्रिया जारी है और अगली तारीख पर आगे की सुनवाई होगी।

पिछली सुनवाई में राउज एवेन्यू कोर्ट ने मामले में दोनों पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया था। इसी दौरान शिकायतकर्ता के वकील विकास त्रिपाठी ने भारत निर्वाचन आयोग से प्राप्त कुछ दस्तावेजों को कोर्ट रिकॉर्ड में शामिल करने की अनुमति मांगी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

राउज एवेन्यू कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष ने कहा कि उनकी फिलहाल मांग ट्रायल शुरू कराने की नहीं है, बल्कि मामले में पुलिस जांच कराने की है। वकील का तर्क था कि इस पूरे प्रकरण में कई ऐसे तथ्य हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है, इसलिए विस्तृत जांच कराई जानी चाहिए। यह मामला सोनिया गांधी से जुड़ी उस याचिका पर आधारित है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि उन्होंने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता प्राप्त की थी, जबकि उनका नाम 1980 की नई दिल्ली मतदाता सूची में पहले से दर्ज बताया जा रहा है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि सोनिया गांधी को 1983 में भारतीय नागरिकता प्राप्त हुई थी, तो फिर 1980 की नई दिल्ली मतदाता सूची में उनका नाम किस आधार पर शामिल किया गया। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या उस समय मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए किसी फर्जी दस्तावेज का उपयोग किया गया था या नहीं। इसी आधार पर मामले में विस्तृत पुलिस जांच की मांग की गई है।

राउज एवेन्यू कोर्ट में विचाराधीन रिवीजन पिटीशन में याचिकाकर्ता ने यह अतिरिक्त दावा किया है कि वर्ष 1982 में सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था। शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि नाम हटाए जाने के पीछे क्या कारण थे और यह प्रक्रिया किन दस्तावेजों या नियमों के आधार पर की गई थी। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। मामले में पहले ही यह आरोप भी शामिल है कि 1983 में नागरिकता मिलने से पहले 1980 की मतदाता सूची में नाम दर्ज होने और बाद में हटाए जाने की परिस्थितियों की जांच की जाए।

सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस की नई रणनीति, बड़े प्लान से बदलेगी सियासत!

भोपाल

मध्यप्रदेश में सत्ता में वापसी की तैयारी में जुटी कांग्रेस ने अब नया सियासी दांव चल दिया है। पार्टी ने फैसला किया है कि आने वाले पंचायत चुनाव में सरपंच उम्मीदवारों को खुला समर्थन दिया जाएगा। अब तक पंचायत चुनाव गैर-दलीय आधार पर होते रहे हैं और राजनीतिक दल सीधे तौर पर दूरी बनाए रखते थे, लेकिन कांग्रेस ने इस परंपरा को तोड़ते हुए गांव स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति बनाई है।

दरअसल, कांग्रेस 2028 विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी ताकत का आंकलन करना चाहती है। पार्टी का मानना है कि पंचायत चुनाव के जरिए बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से प्रदेशभर में पंचायत समितियों का गठन किया गया है। कांग्रेस का दावा है कि अब तक 21 हजार 478 पंचायत समितियां बनाई जा चुकी हैं, जिन्हें प्रत्याशी चयन और समन्वय की जिम्मेदारी दी जाएगी।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पंचायत कमेटियों के गठन का मकसद गांव-गांव संगठन को मजबूत करना है। पार्टी सरपंच चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को समर्थन देगी ताकि कार्यकर्ता सक्रिय हों और कांग्रेस की पकड़ ग्रामीण इलाकों में मजबूत हो सके।

हालांकि कांग्रेस की इस रणनीति पर भाजपा ने सवाल खड़े किए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गैर-दलीय पंचायत चुनाव में खुला समर्थन कांग्रेस के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकता है, लेकिन इससे अंदरूनी गुटबाजी बढ़ने का खतरा भी रहेगा।

मध्यप्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव में समय है। ऐसे में कांग्रेस का यह ‘मिशन एमपी’ आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में बड़ा असर डाल सकता है। अब देखना होगा कि पंचायत चुनाव में खुलकर उतरने का कांग्रेस का यह दांव सत्ता वापसी की राह आसान करता है या नई चुनौतियां खड़ी करता है।

शुभेंदु अधिकारी का बड़ा हमला! अब अभिषेक बनर्जी पर साधा निशाना, डायमंड हार्बर पहुंचेंगी CM

कलकत्ता

पश्चिम बंगाल के नए-नवेले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी आज  शनिवार डायमंड हार्बर का दौरा करने वाले हैं। तृणमूल के दूसरे सबसे बड़े नेता अभिषेक बनर्जी का यह संसदीय क्षेत्र है। मुख्यमंत्री यहां प्रशासनिक और पार्टी से जुड़े दोनों तरह के कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री इस शनिवार को विशेष रूप से एक प्रशासनिक बैठक करने के लिए भी डायमंड हार्बर जा रहे हैं। इस दौरान कई बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। इससे पहले यहां ममता बनर्जी की सरकार थी। आरोप है कि इस दौरान अभिषेक बनर्जी के पसंदीदा अधिकारियों की यहां पोस्टिंग की गई थी।

आपको यह भी बता दें कि इसी इलाके में आने वाले फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की एक बैठक में शामिल होने का भी कार्यक्रम है। यहां चुनाव अभी बाकी है।

इसके बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का 19 मई को एक बार फिर फाल्टा जाने का कार्यक्रम है। उस दिन वे यहां एक रोड शो करने वाले हैं। मुख्यमंत्री ने पिछले मंगलवार को भी चुनाव से जुड़ी एक बैठक की थी।

आपको बता दें कि फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के लिए मतदान 21 मई को होना है। दूसरे चरण के दौरान यहां भी वोट पड़े थे, लेकिन चुनाव आयोग ने बाद में उन वोटों को रद्द कर दिया और 21 मई को दोबारा मतदान की नई तारीख घोषित की। वोटों की गिनती 24 मई को होनी है।

फाल्टा पहले से ही सुर्खियों में था। वहां तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान और उत्तर प्रदेश से तैनात किए गए पुलिस पर्यवेक्षक और आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा के बीच विवाद हो गया था। इसी वजह से चुनाव आयोग ने उस विधानसभा क्षेत्र की पूरी चुनावी प्रक्रिया को रद्द करने का फैसला किया था।

TMC विधायक दिलीप मंडल के आवासों की तलाशी

इससे पहले पुलिस ने दक्षिण 24 परगना जिले में गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के विधायक दिलीप मंडल के दो आवासों में तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई एक कथित वायरल वीडियो के संबंध में की गई है जिसमें विधायक पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कार्यकर्ताओं के खिलाफ भड़काऊ टिप्पणी और धमकी देने का आरोप है। पश्चिम बंगाल पुलिस के जवान, केंद्रीय बलों के साथ आज सुबह डायमंड हार्बर पुलिस जिले के अंतर्गत पायलान इलाके में विधायक के आवास पर पहुंचे और चल रही जांच के हिस्से के तौर पर तलाशी शुरू की।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि तलाशी बिष्णुपुर के विधायक के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में लगाए गए विशिष्ट आरोपों के आधार पर की जा रही है। उन्होंने कहा, “प्राथमिकी में लगाए गए विशिष्ट आरोपों के आधार पर जारी जांच केतहत तलाशी की जा रही है। कानून के अनुसार सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।” पुलिस सूत्रों के अनुसार मंडल के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं के तहत दो प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। जांचकर्ता सोशल मीडिया पर चल रहे कथित वीडियो से जुड़े आरोपों की जांच कर रहे हैं, जिनमें विधायक को कथित तौर पर एक जनसभा के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ धमकी भरे बयान देते हुए देखा गया था।

राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर BJP का हमला, 22 साल में 54 ट्रिप और 60 करोड़ खर्च पर उठे सवाल

नई दिल्ली

राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर खुलासा करते हुए BJP ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं। BJP सांसद संबित पात्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि पिछले 22 साल में किए अपने 54 दौरों पर राहुल गांधी ने करीब 60 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। यह उनकी इनकम के 5 गुना से भी ज्यादा है। संबित पात्रा के मुताबिक, राहुल गांधी करीब 22 साल से निर्वाचित पद पर हैं। उन्होंने इन वर्षों में कई बार विदेश दौरे किए हैं। उन्होंने आधिकारिक तौर पर 54 विदेश यात्राएं की हैं। ये यात्राएं सार्वजनिक हैं, लेकिन इनका खर्च पब्लिक नहीं है। राहुल गांधी की हर विदेश यात्रा पर करीब 3-4 लोग उनके साथ गए और उनकी विदेश यात्राओं का कुल खर्च 60 करोड़ रुपये है।

राहुल गांधी ने विदेश यात्राओं पर इनकम से 5 गुना कैसे किया खर्च?
उन्होंने आगे कहा कि हमारे पास 2013-14 से 2022-23 तक राहुल गांधी की इनकम का विवरण है। इस दौरान, 10 साल में राहुल गांधी की इनकम 11 करोड़ रुपये थी। 11 करोड़ रुपये की इनकम वाले राहुल गांधी ने 60 करोड़ रुपये सिर्फ अपने विदेश दौरों पर खर्च किए हैं। ये कैसे मुमकिन है। उनको कौन फंड कर रहा है। क्या किसी विदेशी कंपनी ने फंड किया तो क्या राहुल गांधी ने नियमों का पालन किया।

विदेशी दौरों पर खर्च 60 करोड़
संबित पात्रा ने आंकड़ों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि साल 2004 से 2026 के बीच राहुल गांधी ने 54 व्यक्तिगत (निजी) विदेश यात्राएं की हैं। उन्होंने दावा किया कि इन यात्राओं पर लगभग 60 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं, जिसमें कोई भी आधिकारिक सरकारी या संसदीय दौरा शामिल नहीं है।

पात्रा ने राहुल गांधी के चुनावी हलफनामों का जिक्र करते हुए कहा कि आकलन वर्ष 2013-14 से 2022-23 तक फॉर्म 26 के हलफनामों में उनके द्वारा घोषित आय के विवरण के आधार पर, 10 वर्षों में उनकी कुल घोषित आय 11 करोड़ रुपये थी। ऐसे में सवाल उठता है कि जब आय 11 करोड़ रुपये थी, तो विदेशी यात्राओं पर 60 करोड़ रुपये कैसे खर्च किए गए?

किस साल में राहुल गांधी ने कितने पैसे कमाए और कितने खर्च किए?
संबित पात्रा बोले कि राहुल गांधी ने 2014-15 में अपनी विदेश यात्रा पर 4.5 करोड़ रुपये खर्च किए थे। वहीं, 2017-18 में राहुल गांधी ने 1.20 करोड़ रुपये कमाए थे और 6 करोड़ रुपये विदेश यात्रा में खर्च किए थे। वहीं, 2019-20 में राहुल गांधी ने 1.39 करोड़ रुपये कमाए थे और उन्होंने विदेश दौरे पर 4.6 करोड़ खर्च कर दिए थे। इसके बाद, 2018-19 में राहुल गांधी की इनकम 1.22 करोड़ थी और उन्होंने अपनी विदेश दौरे पर 3.9 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। इसके बाद 2021-22 में राहुल गांधी ने 1.03 करोड़ रुपये कमाए और विदेश यात्रा पर 2.6 करोड़ रुपये खर्च किए।

20 साल में कितनी बढ़ी राहुल गांधी की संपत्ति?
बीजेपी सांसद ने ये भी बताया कि 2004 में राहुल गांधी ने जब पहली बार चुनाव लड़ा था, तब उनके चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे के मुताबिक, उनकी संपत्ति 55.58 लाख थी। वहीं, 2024 में जब आखिरी बार उन्होंने चुनाव आयोग को हलफनामा दिया तो अपनी संपत्ति करीब 21 करोड़ रुपये की बताई थी। ये कैसे मुमकिन है कि राहुल गांधी अपनी इनकम से कई गुना ज्यादा पैसे विदेश दौरों पर खर्च भी करते रहे और उनकी इनकम लगातार बढ़ती गई। 

संबिता पात्रा को मंत्री बनने के लिए करना होगा कुछ काम
बीजेपी के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर रमेश ने कहा कि विश्वगुरु’ होने के उनके दावे पूरी तरह से विफल हो गए हैं। वह दिन-ब-दिन चीन के सामने घुटने टेक रहे हैं। इसलिए यहां से ध्यान हटाने के लिए यह सब किया जा रहा है। राहुल गांधी की अतीत की विदेश यात्राओं के बारे में बात करने के बजाय, पात्रा को मंत्री पद पर दावा करने के लिए बेहतर विषय ढूंढने चाहिए।

बीजेपी को देश को देना चाहिए जवाब
कांग्रेस नेता मणिकम टैगोर ने कहा कि देश नौकरियों, किसानों, मणिपुर और चीन पर जवाब चाहता है। उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया बीजेपी को विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ दुष्प्रचार वाला अभियान चलाने के बजाय बेरोजगारी, महंगाई, गिरती खपत, विदेश नीति में विफलताओं और कमजोर अर्थव्यवस्था पर सवालों का जवाब देना चाहिए।

केरलम में वीडी सतीशन जमीनी योद्धा का सम्मान

•    डॉ. सुधीर सक्सेना 

वदासरी दामोदरन (वीडी) सतीशन अब साक्षर-राज्य केरलम के मुख्यमंत्री होंगे। दस दिनों की माथा-पच्ची और रायशुमारी के उपरांत अंततः 14 मई को दिल्ली में उनके नाम का ऐलान हो गया। गुरुवार की सुबह सुश्री दीपा दासमुंशी के वरिष्ठ पर्यवेक्षकों मुकुल वासनिक और अजय माकन तथा वरिष्ठ नेता जयराम रमेश की मौजूदगी में इस आशय की घोषणा से अंततः अटकलों का कुहासा छंट गया और यह स्पष्ट हो गया कि पार्टी नेतृत्व अपने जमीनी योद्धा का चयन करने के मूड में है और केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला कुर्सी की दौड़ में पिछड़ गये हैं। यह ऐलान इसलिये भी मानीखेज था, क्योंकि यह खबर छनकर आ रही थी कि निर्वाचित विधायकों का बहुमत वेणुगोपाल के साथ है, जिन्हें पार्टी में दिल्ली की किल्ली के नजदीक माना जाता है। लेकिन बुधवार की शाम पहले पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के माकन, दासमुंशी और वासनिक से विमर्श ने सतीशन का नाम आगे कर दिया। इसके बाद घड़ी के कांटे तेजी से घूमे। गुरुवार की सुबह राहुल गाँधी ने केसी वेणुगोपाल से चर्चा की। तकरीबन तीस मिनट की बातचीत में राहुल अपने निकट सहयोगी को दौड़ से हटने के लिये मनाने में सफल रहे और इसके कुछ घंटो बाद विधिवत वीडी के नाम की घोषणा कर कर दी गयी।

31 मई, सन 1964 को नेत्तूर में जनमे सतीशन खाँटी कांग्रेसी नेता हैं। छात्र जीवन में वह एनएसयूआई से जुड़ गये। सन 1986-87 में वह महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे। यूनिवर्सिटी आफ केरल से उन्होंने एलएलएम किया और हाईकोर्ट में दस साल प्रैक्टिस। सन 1996 में उन्होंने परवूर से असेंबली का पहला चुनाव लड़ा, लेकिन ‘प्रथम ग्रासे मक्षिकापातः’ की तर्ज पर वह सीपीआई के पी. राजू से हार गये। सन 2001 के चुनाव में उन्होंने राजू हिसाब चुकता किया और इसके बाद क्रमशः केएम दिनकरन, रवीन्द्रन, शारदा मोहन और एमटी निक्सन जैसे नेताओं को हरा कर लगातार असेंबली में पहुंचे। सन 2021 में रमेश चेन्निथला के स्थान पर नेता प्रतिपक्ष बने और तदंतर विधानसभा के भीतर और बाहर अपनी सक्रियता से सबका ध्यान आकृष्ट किया। केरलम के कांग्रेस नेताओं में वह संघर्ष, साख और सक्रियता  के मामले में सबसे आगे हैं। कोट्टायम के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक निजाम सैयद के मुताबिक सतीशन इज द बेस्ट च्वॉयस फॉर चीफ मिनिस्टरशिप। जनभावनाओं का ज्वार उनके साथ है और कार्यकर्ता उनके पीछे। 
आखिर क्या वजह है कि निजाम व अन्य मलयाली पत्रकार सतीशन को ‘सर्वोत्तम पसंद’ निरूपित कर रहे हैं वजह साफ है। सतीशन जमीनी योद्धा है और आडंबर से कोसों दूर। वह कुशल और प्रभावशाली वक्ता हैं और उन्हें सुनना ‘सांद्र अनुभव’ से गुजरना है। वह लेखक तो नहीं, अलबत्ता गंभीर पाठक हैं और साहित्यिक जलसों में उन्हें आग्रहपूर्वक बुलाया जाता है। आधुनिक मलयाली साहित्य में उनकी गहरी रूचि है और वह जेन-जी में बेहद लोकप्रिय है। उन्हें सियासी नजूमी भी माना जा सकता है, क्योंकि चुनावों में उनकी भविष्यवाणियाँ खरी उतरती रही हैं। इस दफा  तो उन्होंने सार्वजनिक ऐलान कर कर दिया  था कि यदि यूडीएफ को सौ से कम सीटें मिलीं तो वह राजनीति सन्यास ले लेंगे। केरलम में काँग्रेसनीत गठबंधन को जिताने में उन्होंने रात-दिन एक कर दिया। पार्टी में उन्हें ‘टास्क मास्टर’ माना जाता है और इसके चलते वह प्रियंका और राहुल के विश्वासपात्र बनकर उभरे। मासांत में वह अपना 62वीं वर्षगांठ बतौर सीएम मनायेंगे। उनका टास्क मास्टर होना यकीनन उम्मीदें जगाता है। त्रिवेंद्रम और दिल्ली में चले दस दिनी घटनाक्रम ने यह भी दर्शा दिया कि महत्वाकांक्षी शशि थरूर के नाम पर कहीं कोई विचार नहीं किया गया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।राष्ट्रीय , अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर गहरी समझ रखते हैं । भोपाल में निवास )

सतीशन को CM बनाने की चर्चा पर कांग्रेस में घमासान, वेणुगोपाल चुप तो चेन्निथला नाराज

तिरुवनंतपुरम

कांग्रेस ने 10 दिनों की खींचतान के बाद वीडी सतीशन को केरल का सीएम बनाने का फैसला लिया है। उनके मुकाबले में दो कैंडिडेट और माने जा रहे थे, राहुल गांधी के करीबी केसी वेणुगोपाल और दूसरे रमेश चेन्निथला। कांग्रेस ने तिरुअनंतपुरम से लेकर दिल्ली तक चली बैठकों के बाद केसी वेणुगोपाल को तो मना लिया और वीडी सतीशन के नाम का ऐलान हो गया। केसी वेणुगोपाल को लेकर कहा जा रहा है कि वह हाईकमान की बात से सहमत हो गए हैं और उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें संतुष्ट कर लिया गया है, लेकिन रमेश चेन्निथला के बारे में कहा जा रहा है कि वह नाराज हैं। यही नहीं गुरुवार को विधायक दल की बैठक में भी वह नहीं पहुंचे।

उनकी नाराजगी सीएम पद न मिलने को लेकर है और इसके अलावा पर्याप्त सम्मान न मिलने से भी वह आहत बताए जा रहे हैं। चेन्निथला का कहना है कि मुख्यमंत्री चुनने की प्रक्रिया में उनकी कोई राय ही नहीं ली गई, जबकि वह केरल कांग्रेस के सीनियर नेता हैं और लंबे समय से पार्टी के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनकी नाराजगी उस समय खुलकर सामने आ गई, जब वह विधायक दल की मीटिंग में ही नहीं पहुंचे। इसी मीटिंग में सतीशन को आधिकारिक तौर पर विधायक दल का नेता चुना गया। हालांकि उन्होंने वीडी सतीशन के नाम का समर्थन करने वाला पत्र भेज दिया था।

केसी वेणुगोपाल भी मुख्यमंत्री पद की रेस में थे और निराश हुए। फिर भी उनका कहना है कि वह हाईकमान के फैसले के साथ हैं और सतीशन का समर्थन करते हैं। लेकिन चेन्निथला के साथ ऐसा नहीं दिखा। उनके करीबियों का कहना है कि चेन्निथला को 2021 में भी झटका लगा था, जब उन्हें नेता विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं मिली थी। उनके स्थान पर सतीशन को मौका मिला था। फिर 5 साल बाद सीएम की रेस में भी वह पिछड़ ही गए। यही नहीं कहा जा रहा है कि चेन्निथला ने अपनी नाखुशी राहुल गांधी से भी सीधे तौर पर जाहिर कर दी है।

2021 में भी नजरअंदाज करने का आरोप, राहुल से जताई नाराजगी
चेन्निथला ने राहुल गांधी से कहा कि मुझे 2021 में भी नेता विपक्ष नहीं बनाया गया था। तब मैंने पार्टी हित में इस फैसले को स्वीकार कर लिया था ताकि कार्य़कर्ताओं के बीच किसी तरह का भ्रम न रहे। यही नहीं जब वीडी सतीशन के नाम का ऐलान हुआ तो चेन्निथला ने मीडिया से ही बात नहीं की और चुपचाप राजधानी से निकल गए। वहीं उनके समर्थकों का कहना है कि वह गुरुवयूर गए हैं ताकि शुक्रवार को मलयाली महीने के पहले दिन पूजा कर सकें। हालांकि जिस तरह वह मीटिंग में नहीं आए और एक दिन पहले ही निकल गए, उससे स्पष्ट है कि नाराजगी के चलते ही ऐसा किया गया है।

🏠 Home 🔥 Trending 🎥 Video 📰 E-Paper Menu