घायल हाथ छोड़ दूसरे हाथ में प्लास्टर, मासूम शाम्भवी उपाध्याय के मामले ने खड़े किए गंभीर सवाल
उत्तर प्रदेश के देवरिया से स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि मासूम शाम्भवी उपाध्याय के जिस हाथ में चोट थी, डॉक्टरों ने उसकी जगह दूसरे हाथ में प्लास्टर कर दिया। यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह केवल एक चिकित्सीय गलती नहीं बल्कि मरीजों की सुरक्षा और इलाज की गुणवत्ता से जुड़ा बेहद गंभीर विषय है।
प्रमुख बिंदु
● मासूम शाम्भवी उपाध्याय के सीधे हाथ में चोट लगने का दावा।
● परिजनों का आरोप- डॉक्टरों ने घायल हाथ की जगह दूसरे हाथ में प्लास्टर चढ़ा दिया।
● घटना का मामला महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज, देवरिया से जुड़ा बताया जा रहा है।
● परिजनों में नाराजगी, स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल।
● मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग।
सवाल जो सरकार से पूछे जाने चाहिए
क्या मरीजों की सुरक्षा सिर्फ कागजों तक सीमित है?
सरकार लगातार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे करती है, करोड़ों रुपये अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों पर खर्च किए जाते हैं। लेकिन यदि एक घायल बच्चे के उपचार में भी ऐसी चूक हो रही है तो यह व्यवस्था की निगरानी पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?
अक्सर चिकित्सा लापरवाही के मामलों में जांच की घोषणा तो होती है, लेकिन जिम्मेदार लोगों तक कार्रवाई पहुंचते-पहुंचते मामला ठंडा पड़ जाता है। इससे लापरवाही करने वालों का मनोबल बढ़ता है और आम मरीज असुरक्षित महसूस करता है।
क्या अस्पतालों में दोबारा जांच की व्यवस्था है?
किसी भी प्लास्टर, ऑपरेशन या गंभीर उपचार से पहले मरीज की पहचान और प्रभावित अंग की पुष्टि की जानी चाहिए। यदि ऐसी प्रक्रिया मौजूद है तो फिर ऐसी गलती के आरोप सामने क्यों आ रहे हैं?
जनता के लिए जरूरी दिशा निर्देश इलाज के दौरान सतर्क रहें
● डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार को ध्यान से समझें।
● एक्स-रे और मेडिकल रिपोर्ट स्वयं देखें और सुरक्षित रखें।
● प्लास्टर, इंजेक्शन या ऑपरेशन से पहले संबंधित अंग की पुष्टि करें।
● किसी भी गलती की आशंका होने पर तुरंत वरिष्ठ चिकित्सक से संपर्क करें।
● अस्पताल की शिकायत प्रणाली का उपयोग करें।
समाज के लिए संदेश
स्वास्थ्य सेवाएं केवल सरकार या डॉक्टरों की जिम्मेदारी नहीं हैं। समाज को भी जागरूक रहना होगा। मरीजों के अधिकारों की जानकारी होना उतना ही जरूरी है जितना इलाज कराना। जागरूक नागरिक ही बेहतर व्यवस्था की मांग कर सकते हैं।
सरकार से मांग
● पूरे मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए।
● यदि लापरवाही साबित होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई हो।
● सभी सरकारी अस्पतालों में मरीज सुरक्षा प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू किया जाए।
● प्लास्टर, सर्जरी और अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं से पहले अनिवार्य दोहरी जांच प्रणाली लागू की जाए।
● मेडिकल लापरवाही की शिकायतों के लिए पारदर्शी और त्वरित व्यवस्था बनाई जाए।
एक मासूम की पीड़ा ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल शाम्भवी उपाध्याय का नहीं, बल्कि उन लाखों मरीजों का है जो भरोसे के साथ सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने पहुंचते हैं। जरूरत है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, सच्चाई सामने आए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो जो भविष्य में किसी अन्य मरीज के साथ ऐसी घटना होने से रोक सके।नोट: चूंकि यह मामला “आरोप” के रूप में बताया गया है, इसलिए पत्रकारिता और कानूनी दृष्टि से “डॉक्टर ने गलत हाथ में प्लास्टर कर दिया” को अंतिम तथ्य की तरह नहीं, बल्कि “परिजनों का आरोप है” या “जांच का विषय है” के रूप में प्रस्तुत करना अधिक सुरक्षित और पेशेवर रहेगा।
