“एकात्म पर्व” का भव्य समापन, अद्वैत लोक निर्माण से वैश्विक पहचान को नई दिशा
मध्यप्रदेश के पावन तीर्थ ओंकारेश्वर में माँ नर्मदा के तट पर आयोजित पाँच दिवसीय “एकात्म पर्व” का भव्य और आध्यात्मिक समापन हुआ। यह आयोजन आदि शंकराचार्य के प्रकटोत्सव के उपलक्ष्य में “एकात्म धाम” पर संपन्न हुआ, जिसमें देश-विदेश के संतों, विद्वानों और श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने घोषणा की कि ओंकारेश्वर को “अद्वैत दर्शन” के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि लगभग ₹2400 करोड़ की लागत से “अद्वैत लोक” का निर्माण कार्य तेजी से प्रगति पर है, जिसमें 108 फीट ऊँची एकात्मता की प्रतिमा, अत्याधुनिक शंकर संग्रहालय, अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान और डिजिटल लाइब्रेरी जैसी सुविधाएँ शामिल होंगी।
इस अवसर पर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने अद्वैत के वैश्विक संदेश को प्रसारित करने का आह्वान करते हुए कहा कि “शंकर दूत” केवल भारत तक सीमित न रहें, बल्कि विश्वभर में आचार्य शंकर के विचारों को पहुँचाएँ। उन्होंने इसे समय की आवश्यकता बताते हुए एकात्मता के संदेश को मानवता के कल्याण से जोड़ा।
कार्यक्रम में स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती सहित अनेक संतों और विद्वानों ने अद्वैत वेदांत की प्रासंगिकता और उसकी वैश्विक उपयोगिता पर अपने विचार व्यक्त किए। साथ ही गुजरात के शिक्षाविद गौतम भाई पटेल एवं स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती को “शंकर अलंकरण” सम्मान से सम्मानित किया गया।
मुख्य आकर्षण
ओंकारेश्वर को अंतरराष्ट्रीय अद्वैत केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना
₹2400 करोड़ की लागत से “अद्वैत लोक” का निर्माण
108 फीट ऊँची एकात्मता की प्रतिमा और भव्य संग्रहालय।
प्राचीन ग्रंथों की डिजिटल लाइब्रेरी एवं शोध संस्थान
38 हेक्टेयर क्षेत्र में “अद्वैत वन” का विकास (40,000 पौधरोपण)
नर्मदा तट पर लेजर और साउंड शो के माध्यम से शंकराचार्य जीवन दर्शन
2027 में कालड़ी से केदारनाथ तक 17,000 किमी “एकात्म यात्रा”
700+ युवाओं को ‘शंकरदूत’ के रूप में दीक्षा
आध्यात्मिक से वैश्विक तक की यात्रा
यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता, आध्यात्मिक विरासत और अद्वैत दर्शन को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ओंकारेश्वर अब केवल एक तीर्थ स्थल नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और वैश्विक एकात्मता का केंद्र बनने की ओर अग्रसर है।

